
60 के दशक में जब भूमापन हुआ और सेटलमेंट करने वाले अधिकारी जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्र में आए तब उन्होंने वहां के निवासियों को कहा कि यहाँ तो अथाह भूमि है, आप लोग कहिये, किसके नाम कितनी दर्ज करें?
यहाँ के लोग #पशुपालन करते थे, कृषि की अनुकूलता भी नहीं थी, थोड़ी बहुत जो थी, वह पथरीली भूमि के आसपास खडीन रूप में थी।
फिर, जनसंख्या की विरलता इतनी थी कि प्रति वर्गकिमी औसत एक से दस के बीच था।
वहां के लोग #अधिकारियों को गम्भीरता से नहीं ले पाए।
“यह जो दिख रही है, हमारी ही तो है, आप क्या हमारे नाम लिखोगे,,,,!” जैसे वाक्य सुनने को मिले।
आज उन लोगों के पास एक इंच भी भूमि नहीं है।
कानून बनाकर, वह भूमि सरकार ने अपने तरीके से उपयोग ली।
कहीं डेजर्ट नेशनल पार्क बनाया, कोई आर्मी के लिए दी, प्रायवेट कम्पनियों को दी,,,, वह तो ठीक था, पर कांग्रेस सरकार ने एक काम और किया कि भूमि को नहरी क्षेत्र में अधिग्रहित कर बेचना शुरू किया।
खुली बिक्री में बेचारे पशुपालक कहाँ टिकते,,,, सो भूमि अमूमन धन्ना सेठों ने काले को सफेद बनाने हेतु खरीद ली।
हाल ही चर्चा में आये रॉबर्ट वाड्रा प्रकरण से इसे समझा जा सकता है।
दूसरा काम किया, कानून बनाकर अपने वोटरों को आवंटन। इससे बाहरी लोग आकर बसने लगे, चारागाह सिमट गए और सेवण घास नष्ट हो गई।
अंतिम समय में कुछ लोगों ने पशु बेचकर थोडी बहुत भूमि खरीदी, वही उनकी आज पूंजी है।
जो कभी अपने इलाके के राजा थे, स्वाभिमान से सर उठाकर जीते थे, संघर्ष ही जिनके उत्सव थे, आज आधार कार्ड, राशनकार्ड लिये कतारों में खड़े पिद्दी से क्लर्क के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं।
भारत के हरेक कोने में, हरेक व्यसाय में, हर उद्योग में, प्रत्येक रोजगार में, लोग अपनी मर्जी के मालिक थे।
स्वाभिमान का आलम यह था कि एक नाई तक यदि अपने व्यवसाय से इंकार कर देता तो राजा की शादी रुक जाती।
आज,,,, दुर्भाग्य से मालिक से नौकर बनने की होड़ मची है। बेरोजगारों की फ़ौज, गले में अपनी नीलामी का पट्टा बांधे, गुलाम बनने को प्रस्तुत है और खरीददार नहीं मिल नहीं रहे।
स्टोरी का मुख्य पहलू
1.देश में जितने प्रकार की लूट हुई है, कानून बनाकर हुई है। कानून, जिसे कि सरकारी भाषा में #नियम कहा जाता है, पहले लुटेरों के अनुकूल बनाये जाते हैं, नाम लुभावना रखा जाता है, अंततः कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने का साधन बनता है।
2.आजादी के बाद रियासतों के विलीनीकरण से लेकर, राजपूतों की जमीन छीनने के सब काम कानून के नाम पर ही हुए।
3.अंग्रेजों ने भी लूट का माध्यम कानून बनाया। ऐसा कानून में लिखा है,,,, यूँ कहकर शोषण किया गया।
4.इस्लाम ने जो भी तबाही मचाई, उनकी पुस्तक में उल्लिखित कानून की आड़ लेकर मचाई।
5.बामसेफ आदि दलित वादी संगठन ब्राह्मणों पर शोषण का इल्जाम लगाते समय यही तर्क देते हैं कि कानून बनाना उनके हाथ था, अतः शोषण हुआ।
6.ईसाइयों ने दुनिया में साम्राज्यवाद को यह कहकर जायज ठहराया था कि वह बाइबल की इच्छानुसार है।
क्या दुनिया में कोई ऐसा नियम है जो एकदम निर्दोष हो। जीरो साइड इफेक्ट वाला,,,???
खोजने पर जो चीज मिलेगी, उसे #हिंदुत्व कहते हैं, पहले उसे धर्म कहा जाता था।
आगे और हे
#किस्सा_जागते_शहर_मुम्बई_का –
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उस मुंबई का जिसे पुर्तगालियों ने ब्रिटेन को दहेज़ में दे दिया था ! सपनों का शहर, आमची मुंबई, बंबई, माया नगरी शहर एक है, लेकिन नाम अनेक! जहां रात हो या दिन सुबह हो या शाम हर पल ज़िंदगी एक जोश के साथ दौड़ती नज़र आती है. जहां कोई थमता नहीं, कोई रुकता नहीं. शायद इसीलिए मुंबई के बारे में कहा जाता है कि ‘ऐसा शहर जो कभी नहीं सोता.’ इस जागते शहर पर कई साम्राज्यों ने राज किया है. बात तब की है, जब इसका नाम मुंबई नहीं था. तब ये पुर्तगालियों के अधीन हुआ करता था, और फिर इस पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ. लेकिन कैसे..? क्या आप जानते हैं.
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एक वक़्त था, जब मुंबई को दहेज के तौर पर दे दिया गया था. इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है.
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मुंबई सात द्वीपों से बना एक शहर है, जहां पहले इसके मूल निवासी मछुवारे थे. इन द्वीपों पर छोटे छोटे गांव हुआ करते थे . हालांकि, मुंबई में मिले प्राचीन अवशेषों से यह साबित होता है कि मुंबई द्वीप समूह पाषाण युग से बसा हुआ है. यहां 250 ई.पू. में भी लोग रहा करते थे.
इसके बाद तीसरी शताब्दी ई.पू. में मुंबई के इन द्वीपों पर मौर्य साम्राज्य के महान सम्राट अशोक का शासन रहा.
बालकेश्वर मंदिर और एलिफेंटा की गुफाएं भी अति प्राचीन हैं, हालांकि तब इसे ‘हैप्टानेसिया’ कहा जाता था.
वहीं, लगभग 1200 ई. के आसपास इस द्वीप पर माहिम बस्ती की स्थापना हुई. और 1343 ई. के आसपास गुजरात के हिन्दू राजाओं ने यहां पर राज्य किया.
इसके बाद, भारत आने वाले पुर्तगालियों ने 1507 में इस पर हमला किया, हालांकि वो असफल रहे, लेकिन अब उनकी नजर बंबई पर पड़ चुकी थी.
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इसके बाद 1534 ई. में सुल्तान बहादुर शाह के शासनकाल में पुर्तगालियों ने दोबारा से बंबई पर हमला किया और इस बार वह बहादुर शाह से इस द्वीप समूह को हथियाने में कामयाब रहे.पुर्तगालियों ने वहां पर व्यापार के लिए एक कारखाना खोला और उन्होंने इसे बोम बहिया कहा, जिसका अर्थ था एक ‘अच्छी खाड़ी.’हालांकि बाद में यही नाम अंग्रेजों के उच्चारण के द्वारा बॉम्बे हो गया. 1626 ई. के आसपास बॉम्बे में रेशम, कपास, चावल और तम्बाकू जैसे माल का व्यापार शुरू कर दिया गया. जल्द ही यहां एक शिप बिल्डिंग यार्ड और उसके बाद एक बड़ा गोदाम व सुरक्षा के लिए एक किला बनाया गया. उस वक़्त ब्रिटिश शासन की भी नज़र मुंबई पर थी, लेकिन वहां पुर्तगालियों का शासन हुआ करता था, जिसके लिए दोनों में कई बार विवाद भी हुए. हालांकि, इस विवाद को ख़त्म करने के लिए पुर्तगाल के राजा ने अपनी बेटी कैथरीन का विवाह इंग्लैंड के राजा से करने का फैसला किया.इस तरह से सन 1661 में पुर्तगाल के राजा ने अंग्रेजों से अपना गठबंधन मजबूत करने के लिए इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से अपनी बेटी कैथरीन की शादी कर दी. इस शादी के बदले पुर्तगाल ने बहुत कुछ ब्रिटेन को दिया और साथ ही बंबई भी दहेज़ के रूप में इंग्लैड के राजा को दे दी गई. हालांकि राजा की इस द्वीप में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी लिहाजा उन्होंने इसे 1668 में ईस्ट इण्डिया कंपनी को 10 पाउंड में पट्टे पर दे दिया.
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कुछ सालों के भीतर ही कंपनी के गवर्नर गेराल्ड औंगियर ने कई गोदामों के साथ बंदरगाहों के निर्माण कराने की योजना बनाई, और उसकी रिपोर्ट लंदन भेजी गई.
कंपनी ने इनकी योजनाओं का समर्थन दिया और उन्हें एक नया शहर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया. इसके बाद यहां पर लोगों के लिए जमीन खरीदने और घर बनाने की सुविधाओं का प्रबंध किया गया. गेराल्ड ने कई इमारतें और द्वीपों को जोड़ने का काम किया और लोगों के लिए महल, अस्पताल, चर्च और एक टकसाल का निर्माण कराया.आकड़ों के अनुसार 1670 में कंपनी के पास रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए 1,500 सैनिक थे, जिसमें अंग्रेजी और स्थानीय दोनों प्रकार के लोग शामिल थे.इसके बाद बॉम्बे में पहली बार 1670 में प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की गई और कई कारखाने लगाए गए. सन 1661 में बंबई की आबादी लगभग 10 हजार ही थी. बढ़ते व्यापार और काम की तलाश में यहां लोग बढ़ते चले गए. वहीं अंग्रेजों को भी बड़ी संख्या में लोगों की आवश्यकता थी, इसलिए 1675 में यहां की आबादी बढ़कर 60 हज़ार हो गई. और इसके कुछ सालों बाद बढ़ते काम को देखकर सन 1687 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना मुख्यालय सूरत से स्थानांतरित करके मुंबई बना लिया.
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ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यवसाय के लिए यहां लोगों को काम पर लगाया और उन मेहनतकश भारतीयों ने अपने खून पसीने से इस द्वीप को एक नए शहर की तरह चमका दिया.हालांकि, एक वक़्त ऐसा भी आया, जब मुंबई पर मुगलों की सेना ने आक्रमण कर दिया. बात उस वक़्त की है, जब अंग्रेज, डच और पुर्तगाली समुद्र पर राज किया करते थे. ऐसे में इनके जहाजों के कप्तान लगातार विदेशी जहाजों पर भी अपना कब्ज़ा कर लिया करते थे.
सन 1668 ई. के आसपास अंग्रेजों और मुगलों के बीच संघर्ष का दौर शुरू हुआ, जब अंग्रेजों ने मुगलों के 14 जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें बंदरगाह पर खड़ा कर दिया गया. ऐसे में मुगलों ने बदला लेने के लिए 1689 ई. में एक सैन्य टुकड़ी को बॉम्बे भेजा. मुगलों की सेना ने बंदरगाह में प्रवेश किया और किले को चारों तरफ से घेर लिया. इस तनातनी में कई लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी और वहां की आबादी में भी इससे भारी गिरावट आई. हालांकि, बाद में दोनों में समझौता हो गया और ये लड़ाई खत्म हो गई. लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और मुंबई एक बार फिर से बदहाल हो गया.बॉम्बे के गवर्नर सर रोबर्ट ग्रांट ने 1779 से 1883 के बीच कई सड़कों का निर्माण कराया. इसके बाद 1853 में विक्टोरिया और थाणे को जोड़ने वाली पहली भारतीय रेलवे लाइन का निर्माण हुआ. हालांकि, 1857 के विद्रोह के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी पर कुप्रबंधन का आरोप लगा और इन द्वीपों पर ब्रिटिश क्राउन का नियंत्रण हो गया. इसके बाद विक्टोरिया टर्मिनस, जनरल पोस्ट ऑफिस, नगर निगम, प्रिंस ऑफ़ वेल्स संग्रहालय, राजबाई टावर, बॉम्बे विश्वविद्यालय, ओल्ड सचिवालय जैसी कई इमारतों का निर्माण हुआ. वहीं, 1911 में राजा जार्ज और रानी मैरी के भारत आगमन पर गेट-वे ऑफ़ इंडिया बनाया गया. इसी के साथ भारत की आजादी का समय आ चुका था और 1947 को बॉम्बे के साथ पूरा भारत अंग्रेजों से आज़ाद हो गया.
आज़ादी के बाद बॉम्बे को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया. और बॉम्बे का नाम बदलकर मुम्बा देवी के नाम पर मुंबई कर दिया गया.
✍🏻आगे और पढ़े
अपने गौरवशाली नगर #इंद्रप्रस्थ को दिल्ली नही #ढिल्लिकापुरी कहिये ।
इंद्रप्रस्थ यहाँ के जर्रे जर्रे में है। इंद्रप्रस्थ के आँचल में ढिल्लिकापुरी पूरी आयी । इंद्रप्रस्थ पांडवो का नगर।
आज भी अगर आप महरौली के क्षेत्र में जाएंगे तो डीडीए
के जो राजस्व रेकॉर्ड है उनमें परगना जो है, वो इन्द्रप्रथ है। इन्द्रप्रथ उन पाँच गांवो में हैं, जिनमे तिलपथ है , पानीपथ है , सोनिपथ है , बागपथ है ,वरूपथ है। (इस्लामी पत नही सनातन पथ। )
जी हाँ वही पांच गांव जो पांडवों ने दुर्योधन से मांगा था।
तो इंद्रप्रस्थ आज भी विद्यमान है।। परंतु नाम आज हम देल्ही लिखते हैं। जब हम देल्ही लिखते हैं तो हमे लगता है कि कोई अंग्रेज आया होगा देल्हाई !कुछ ऐसा ही रहा होगा। या कोई इस्लामिक मुगलिया नाम !
दुर्भाग्य से हमे हमारी वामपंथी पाठ्यक्रम ने, व हमारी उसप्रकार की शिक्षा ने हमे कभी बताया ही नही की दिल्ली के संस्थापक थे
महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय।
तो ये दिल्ली का वास्तविक नाम ढिल्लिकापुरी लेकिन कहाँ से आया?
यह जानने के लिए हमे पहुंचना होगा उस जगह जिसे आज दुर्भाग्य से कहा जाता कुतुब कॉम्प्लेक्स !
लेकिन वह विष्णुस्तम्भ कॉम्प्लेक्स है।
जहाँ लालकोट का किला बना ,जहाँ पर सत्ताईस विष्णु जैन मंदिर भव्यता से खड़े थे । और जिनका उल्लेख 11वी शताब्दी से लेकर 15वी शताब्दी के बीच दिल्ली के हर पत्थरों – शिलालेखों के ऊपर संस्कृत के अभिलेखों में मिलता है ,
कि -ढिल्लिकापुरी नगरस्य ..!
स्वर्ग जैसी अनुपम है जिसे सम्राट अनंगपाल तोमर ने बसाया था।
आश्चर्य की बात है कि हमे तो कभी किसी ने कहा ही नही की दिल्ली जो हैं वह किसी और ने बसाया होगा! हम तो जब देखते हैं तो बाबर देखते हैं , लोदी देखते हैं ,औरंगजेब देखते हैं , तुगलक देखते हैं, खिलजी देखते हैं. ;!
पुरातत्व विभाग के फार्मर एडिशनल डायरेक्टर जेनरल और नेशनल म्यूजियम के पूर्व महानिदेशक विश्व विख्यात पुरातत्व विशेषज्ञ श्री बी आर मणि ने पुरात्तव विभाग के ओर से 92 से 95 के बीच उत्खनन किया तो मिला अनंगताल…!
एक बेहद सुंदर झील।
उसका पूरा सर्वे कर उन्होंने जो नक्शा दिखाया वह मंत्रमुग्ध करने वाला था।
उसके अंर्तगत सम्राट अनंगपाल ने बनाया अनंगपुर डैम अनंगपुर गांव , और बसाया लालकोट। वे विष्णुस्तम्भ लेकर आएं जिसे लौहस्तंभ भी कहते हैं। उस स्तम्भ के शिखर पर अनंगपाल सम्राट की प्रशस्ति लिखी हुई है। उन्होंने अपने साम्राज्य की स्थिरता के लिए इस स्तम्भ को गाड़ा। कुछ संशय होने पर उन्होंने यह देखने के लिए कि यह कहाँ तक गया है उन्होंने पुनः उसे उखाड़ा तो देखा की यह शेषनाग के शिखर तक गया है..!
(जैसा कि हम मानते हैं कि पृथ्वी को शेषनाग ने थामा है। वैज्ञानिक भाषा मे इसे भुचुम्बकत्व कहते हैं । अर्थात हजारों मैग्नेटिक वेब्स जिसकी वजह से टेक्टोनिक प्लेट हैं जिनसे भूपपर्टी का निर्माण हुआ । यही भुचुम्बकत्व की स्थिरता के बिगड़ने से भूकंप आता है। यही शेषनाग का हिलना है। )
तो सम्राटअनंगपाल ने डरते हुए उसे पुनः गाड़ा और वह संयोग से ढीला हो गया।
तो लोगो ने कहा कि राजा साहब यह तो ढीला रह गया.;!
तो नगर का नाम ढिल्लीकापूरी हो गया।
सभी पत्थरों ,किताबों ,संस्मरणों पर ढिल्लीकापूरी का नाम अंकित है। पुरातत्व विभाग के जनक माने जाने वाले तब के अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी इसकी पुष्टि की।
वायसराय पैलेस जिसे हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं उसके पास एक गांव था (शायद सरवन ) वहां पर जब खुदाई हुई तो जो शिलालेख निकले वह आज भी पुराने किले की म्यूजियम में रखे हैं उन पत्थरों पर स्पष्ट रूप से जो नाम उत्कीर्ण हैं वह है ढिल्लिकापुरी ।
पालम , नारायणा में जो खुदाई हुई वहाँ के शिलालेखों में भी ठीक वही तथ्य।
15वी शताब्दी में संस्कृत का प्रचलन था दिल्ली में।
किसी ने तालाब बनवाई , हवेली ,मंदिर बनवाई , किसी ने दान दिया , तो वहाँ पर शिलालेख लगा देते थे की कौन हैं , कहाँ से आये , किससे विवाह हुआ , कितने संतान हैं , क्या योगदान है किस नगर में हैं !
तो ढिल्लिकापुरी में है।
ढिल्लिकापुरी बाद में ढिल्ली होती गयी।
बाद में जैसे अंग्रेजों ने बेंगलुरू को बंगलोर कर दिया ,
तो ढिल्ली को देल्हाई कर दिया यानी delhi ।
तो हमे लगा कि ये तो बड़ा ब्रिटिश नेम है..!
तो सारे प्रमाण हैं!
बस जमी धूल किसी ने नही झाड़ी!!!
ये वही विडम्बना है कि किसी पुस्तक में यह नही पढ़ाया जाता कि आर्य कभी बाहर से नही आये , कभी भारत पर आक्रमण नही किया !
अब स्वयम देखिए रखीगार्ही तो मिल गयी!
हरियाणा में जो मोहनजोदड़ो से इतनी बड़ी दोगुनी पुरात्विक स्थली है , वहाँ हड़प्पा कालीन अवेशेष मिले हैं और वहाँ पर प्रोफेसर वसंत शिंदे तथा पुरात्तव विभाग के अधिकारियों ने यह सिद्ध किया।
उसके अंतर्गत उन्होंने डीएनए टेस्ट करवाया डीएनए में मिला कि आर्य तो यहीं के थे ! जो आज भी हरियाणा में व्यक्ति हैं , आज भी वहाँ की आकृतियां हैं , वह हूबहू वहीं हैं जो हड़प्पन आकृति है।
खैर , जब मूल भारतीय आर्यों की पूरी सच्चाई पुस्तकों में नही पढ़ाई गयी तो ढिल्लिकापुरी अगर नही पढ़ाई गयी तो आश्चर्य नही है।
आश्चर्य तो यह है कि आज भी इसका पता चल गया.!!!
और भारत की नरेंद्र मोदी सरकार इस विषय को लेकर आगे बढ़ रही है।
इतिहास पर जमी धूल हटनी चाहिए..!
वे लोग जिन्होंने इतिहास पर कब्जा करके पूर्वाग्रह से युक्त हो शासकों की दृष्टि से , आक्रमणकारियों की दृष्टि से इतिहास लिखा…!
औपनिवेशिक दास मानसिकता के प्रचार-प्रसार से इतिहास लिखा उनका एक ही उद्देश्य था कि हमारी स्मृतियों से हमारे पूर्वजों का गौरव सदा के लिए लुप्त हो जाये ! हम यह मानकर चले कि हमारे पूर्वज तो अनपढ़ थे , और जो भी वैज्ञानिक, सांस्कृतिक ,आर्थिक , आधारभूत विकास हुआ वह अंग्रेजों व मुगलों की देन है , जबकि है ठीक इसका उल्टा।
✍🏻…दूसरे महानगरों पर ,किसी
और दिन,,,