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भारत वर्ष का नामकरण

१. भारत के ३ अर्थ -(१) उत्तरी गोलार्द्ध के नकशे के ४ भागों में एक। इनको भू-पद्म के ४ दल कहा गया है-

(विष्णु पुराण २/२)-भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः।२४।

भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः।४०।

यहां भारत-दल का अर्थ है विषुवत रेखा से उत्तरी ध्रुव तक, उज्जैन (७५०४३’ पूर्व) के दोनों तरफ ४५-४५ अंश पूर्व-पश्चिम। इसके पश्चिम में इसी प्रकार केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व तथा विपरीत दिशा में (उत्तर) कुरु, ९०-९० अंश देशान्तर में हैं। उज्जैन से ठीक ४५० पूर्व का पर्वत यव-द्वीप (जावा) में है। नकशे की पूर्व सीमा पर (विषुव से प्रायः ८० दक्षिण) होने के कारण इसे भी सुमेरु (८०६’ दक्षिण, १२००३५’ पूर्व) कहते हैं। पश्चिमी सीमा पर मिस्र का गिजा का पिरामिड है (३१० पूर्व)।

(२) हिमालय को पूर्व से पश्चिम समुद्र तक फैलाने पर उससे दक्षिण समुद्र तक को भारत कहा गया है। यह हिमालय तक सीमा होने के कारण हिमवान् या हिमवत् वर्ष भी कहा गया है। इसके ९ खण्ड हैं, जिनमें वर्तमान भारत को कुमारिका खण्ड कहते हैं। कुमारिका खण्ड के दक्षिण ध्रुव तक का समुद्र भी कुमारिका खण्ड ही है जिस प्रकार आज भारत महासागर कहते हैं।

विष्णु पुराण (२/१)-

हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन् महात्मनः। तस्यर्षभोऽभवत् पुत्रो मेरुदेव्यां महाद्युतिः॥२७॥

ऋषभाद् भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः। कृत्वा राज्यं स्वधर्मेण तथेष्ट्वा विविधान् मखान्॥२८॥

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते। भरताय यतः पित्रा दतं प्रातिष्ठिता वनम्॥३२॥

स्कन्द पुराण, प्रभास खण्ड, अध्याय१७२-

भरतो नाम राजाभूदाग्नीध्रः प्रथितः क्षितौ। यस्येदं भारतं वर्षं नाम्ना लोकेषु गीयते॥१॥

भारतं नवधा कृत्वा पुत्रेभ्यः प्रददौ पृथक्। तेषां नामाङ्कितान्येव ततो द्वीपानि जज्ञिरे॥२॥

इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गान्धर्वस्त्वथ वारुणः॥३॥

अयं तु नवमो द्वीपः कुमार्य्या संज्ञितः प्रिये। अष्टौ द्वीपाः समुद्रेण प्लाविताश्च तथापरे॥४॥

ग्रामादिदेश संयुक्ताः स्थिताः सागर-मध्यगाः। एक एव स्थितस्तेषां कुमार्य्याख्यस्तु साम्प्रतम्॥५॥

(३) कुमारिका खण्ड-प्रायः वर्तमान् भारत है। दक्षिण से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है अतः तन्त्र के अनुसार शक्ति त्रिकोण है। शक्ति का मूल रूप कुमारी है, अतः भारत के ९ खण्डों में मुख्य होने से इसे कुमारिका कहते हैं। ऋषभ के पुत्र भरत के नाम पर इसे भारत कहा गया। प्रजा का या विश्व का भरण (अन्न द्वारा) करने के कारण भी इसे भारत कहते हैं-

मत्स्य पुराण, अध्याय ११४-अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः। भरणच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते।५।

निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्। यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः।६।

न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौकर्मविधिः स्मृतः। भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत।७।

इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।८।

अयं तु नवमस्तेषं द्वीपः सागरसंवृतः। योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः।९।

आयतस्तुकुमारीतो गङायाः प्रवहावधिः।तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु।१०।

यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग् यामः प्रकीर्तितः। य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः।१५।

२. भारत के नाम-

(१) भारत-इन्द्र के ३ लोकों में भारत का प्रमुख अग्रि (अग्रणी) होने के कारण अग्नि कहा जाता था। इसी को लोकभाषा में अग्रसेन कहते हैं। प्रायः १० युग (३६०० वर्षों) तक इन्द्र का काल था जिसमें १४ प्रमुख इन्द्रों ने प्रायः १००-१०० वर्ष शासन किया। इसी प्रकार अग्रि = अग्नि भी कई थे।  अन्न उत्पादन द्वारा भारत का अग्नि पूरे विश्व का भरण करता था, अतः इसे भरत कहते थे। देवयुग के बाद ३ भरत और थे-ऋषभ पुत्र भरत (प्रायः ९५०० ई.पू.), दुष्यन्त पुत्र भरत (७५०० ई.पू.) तथा राम के भाई भरत जिन्होंने १४ वर्ष (४४०८-४३९४ ई.पू.) शासन सम्भाला था।

(१) पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदा भराग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदच्छेदोऽग्निंपूरीष्यमंगिरस्वद् भरिष्यामः।  (वाजसनेयी यजुर्वेद ११/१६)

=अग्नि पृथ्वी पर सबके ऊपर है, वह अंगिरा के रूप में प्रकाश देता है, हमारा भरण तथा पूरण करता है। हमें शक्तिशाली अग्नि (अग्रणी) मिले जो हमारे भरण तथा उन्नति में समर्थ हो। उसे हम हवि (कर आदि) से भर देंगे।

(२) स यदस्य सर्वस्याग्र सृजत तस्मादग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम्। शतपथ ब्राह्मण ६/१/१/११)

= सबसे प्रथम उत्पन्न होने के कारण यह अग्रि (नेता) हुआ, इसे परोक्ष में अग्नि कहा जाता है।

(३) तद्वा एनमग्रे देवानां (प्रजापतिः ) अजनयत । तस्मादग्रिरग्रिर्ह वै नामे तद्यग्निरिति। शतपथ ब्राह्मण २/२/४/२)

= प्रजापति ने देवों में इसे ही पहले बनाया, अतः यह अग्रि हुआ, जिसे परोक्ष में अग्नि कहा गया।

(४) विश्व भरण पोषण कर जोई । ताकर नाम भरत आस होई।  (तुलसीदास कृत राम चरित मानस, बालकाण्ड)

= पूरे विश्व का भरण पोषन करनेवाले को भरत कहा जाता है।

(५) दिवा यान्ति मरुतो भूम्याऽग्निरयं वातो अंतरिक्षेण याति ।

अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः ।  (ऋक् संहिता १/१६१/१४)

= देव आकाश की मरुत् अन्तरिक्ष की तथा अग्नि पृथ्वी की रक्षा करते हैं। वरुण जल के अधिपति हैं।

(६) तस्मा अग्निर्भारतः शर्म यं सज्ज्योक् पश्यात् सूर्यमुच्चरन्तम् । 

य इन्द्राय सुनवामेत्याह नरे नर्य्याय नृतमाय नॄणाम् । (ऋक् संहिता ४/२५/४)

= इन्द्र लोगों का कल्याण करता है, नेतृत्व करता है तथा सबसे अच्छा नेता है, दाता अग्नि उनको सुख दे जिससे हम सदा सूर्य का उदय देखें।

(७) अग्निर्वै भरतः । स वै देवेभ्यो हव्यं भरति। (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद् ३/२)

= अग्नि भरत है क्योंकि यह देवों का भरण करता है (भोजन देता है)।

(८) एष (अग्निः) हि देवेभ्यो हव्यं भरति तस्मात् भरतोऽग्नि रित्याहुः । (शतपथ ब्राह्मण १/४/२/२, १/५/१/८, १/५/१९/८) = यह अग्नि देवों को भोजन देता है अतः इसे भरत अग्नि कहते हैं।

(९) अग्नेर्महाँ ब्राह्मण भारतेति । एष हि देवेभ्य हव्यं भरति । (तैत्तिरीय संहिता २/५/९/१, तैत्तिरीय ब्राह्मण३/५/३/१,  शतपथ ब्राह्मण १/४/१/१)

= ब्रह्मा ने अग्नि को महान् कहा था क्योंकि यह देवों को भोजन देता है।

(१०) अग्निर्देवो दैव्यो होता..देवान् यक्षद् विद्वाँश्चिकितवान्…मनुष्यवद् भरत वद् इति। (शतपथ ब्राह्मण,१/५/१/५-७)

= अग्नि देवों को भोग देता है, यह देव तथा विद्वानों का पालन करता है, यह मनुष्य तथा भरत के जैसा है।

(११) अग्निर्जातो अथर्वणा विद्वद्विश्वानि काव्या ।

भुवद्दूतो विवस्वतो वि वो मदे प्रियो यमस्य काम्यो विवक्षसे । (ऋक्संहिता १०/२१/५)

= यह अग्नि अथर्वण ऋषि से उत्पन्न हुआ, जो विश्व तथा काव्य (रचना) को जानता है। यह देवों का आवाहन करता है तथा सभी काम्यों को यज्ञ द्वारा उत्पन्न करता है।

(१२) त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने। (ऋक्संहिता ६/१६/१- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः)

= हे अग्नि! तुम विश्व के हित के लिये यज्ञ करते हो अतः देवों ने मनुष्यों के लिये दिया।

(१३) यो अग्निः सप्त मानुषः श्रितो विश्वेषु सिन्धुषु । तमागन्म त्रिपस्त्यं मन्धातुर्दस्युहन्तममग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम् नभन्तामन्यके समे । (ऋक्संहिता ८/३९/८-नाभाकः काण्वः)

= जो अग्नि ७ मनुष्यों (होता), सभी समुद्रों ३ लोकों में रहकर उनका पालन करता है, उसे पाकर हम कष्ट तथा शत्रुओं को नष्ट करें।

(१४) त्वां दूतमग्ने अमृतं युगे युगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम् ।

देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विश्पतिं नमसा नि षेदिरे । (ऋक्संहिता ६/१५/८)

= हे अग्नि! देवों तथा मनुष्यों ने तुमको दूत बनाया है। तुम हव्य का वहन करते हो, सदा सावधान हो तथा लोकों का पालन करते हो, हम तुमको नमस्कार करते हैं।

(१५) विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे ।

यत् ते धीतीं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव ।  (ऋक्संहिता ६/१५/९)

= हे अग्नि! तुम भूमि तथा आकाश में मनुष्यों तथा देवों का दूत होने से प्रशंसनीय हो\ हमारे मन, बुद्धि, तन की रक्षा करो तथा सुख दो।

(१६) अग्निर्होता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः ।

देवानामुत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ (ऋक़् ६/१५/१३ )

=अग्नि देवों का होता, तेजस्वी तथा गृहपति है। वह सबको जानता है तथा देव-मनुष्यों का पूजनीय है। वह देवों को यज्ञ द्वारा सन्तुष्ट करे।

(१७) आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः । दिवोदासस्य सत्पतिः । (ऋक्संहिता ६/१६/१९)

= अग्नि भरतों का रक्षक, वृत्र आदि असुरों का नाशक, दिवोदास (काशिराज) तथा सज्जनों का स्वामी है।

(१८) उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दवीद्युतत् । शोचा वि भाह्यजर । ॥ (ऋक़् ६/१६/४५)

= हे भारत अग्नि। तुम तेजस्वी तथा युवक हो, हमारी चिन्ता दूर करो।

(१९) त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम् । ईजे यज्ञेषु यज्ञियम् ॥ (ऋक़् ६/१६/४)

= अग्नि! हम तुम्हारी पूजा करते हैं, क्योंकि तुम भरत हो, पोषण करनेवालों में इन्द्र तथा यज्ञों में यज्ञीय (फल) हो।

(२०) भरणात्प्रजनाच्चैष मनुर्भरत उच्यते । एतन्निरुक्त वचनाद् वर्षं तद् भारतं स्मृतम् ।

यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यगग्यामः प्रकीर्तितः । य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः । 

(मत्स्य पुराण ११४/५,६,१५, वायु पुराण ४५/७६, ८६)

= लोकों के भरण तथा पालन के कारण इस देश का मनु (शासक) भरत कहा जाता है। निरुक्त परिभाषा के अनुसार भी इस देश को भारत कहा गया है। मनु का यह विख्यात देश दक्षिण में त्रिकोण तथा उत्तर में चौड़ा है। जो इस देश को पूरी तरह जीत लेता है, उसे सम्राट् कहा जाता है।

(२१) हमारे देश के लोगों की इच्छा रहती है कि लोगों का भरण करें, अतः यह देश भारत है-

दातारो नोभिवर्धन्तां वेदाः सन्तति रेव च । श्रद्धा च नो मा व्यगमत् बहुदेयं च नो स्त्विति। अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । याचिताश्च न सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन ।

= दाताओं, वेद तथा सन्तति की वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कम नहीं होतथा दान के लिये हमारे पास पर्याप्त धन हो। हमारे पास बहुत अन्न हो तथा अतिथि आवें। दूसरे हमसे मांगें, हमें मांगने की जरूरत नहीं हो।

भारत के बारे में यही विचार सभी ग्रीक लेखकों के भी हैं, पर उन लोगों को इसका आकार का पता नहीं था, इसे चौकोर लिखा है।

Megasthenes: Indika

http://projectsouthasia.sdstate.edu/docs/history/primarydocs/Foreign_Views/GreekRoman/Megasthenes-Indika.htm

खंड I
या मेगास्थनीज़ का संक्षिप्त विवरण (एपिटोम)
(डायोडोरस II. 35-42)

(35.) भारत, जो आकार में चतुर्भुज (चार भुजाओं वाला) है, उसकी पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों दिशाएँ महान समुद्र से घिरी हुई हैं।

(36.) इसी प्रकार यहाँ के निवासी प्रचुर जीवन-निर्वाह साधनों के कारण सामान्य कद-काठी से अधिक लंबे होते हैं और अपने गौरवपूर्ण व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध हैं।
भूमि की सतह पर खेती से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के फल उपलब्ध हैं, और इसके नीचे अनेक प्रकार की धातुओं की समृद्ध खदानें भी हैं। यहाँ बहुत मात्रा में सोना, चाँदी, ताँबा और लोहा पाया जाता है, साथ ही टिन और अन्य धातुएँ भी, जिनका उपयोग दैनिक आवश्यक वस्तुओं, आभूषणों तथा युद्ध के हथियार और उपकरण बनाने में किया जाता है।

अनाजों के अतिरिक्त पूरे भारत में बहुत मात्रा में बाजरा उगाया जाता है, जिसे नदियों की प्रचुर जलधाराएँ पर्याप्त सिंचित करती हैं। यहाँ अनेक प्रकार की दालें, चावल, तथा जिसे “बोस्पोरम” कहा जाता है, वह भी उत्पन्न होता है, और भोजन के लिए उपयोगी कई अन्य पौधे भी पाए जाते हैं, जिनमें से अधिकांश स्वतः ही उग जाते हैं।

भूमि अन्य अनेक खाद्य पदार्थ भी उत्पन्न करती है जो पशुओं के पालन-पोषण के लिए उपयुक्त हैं, जिनका वर्णन करना अत्यधिक विस्तृत हो जाएगा।
इसी कारण यह कहा जाता है कि भारत में कभी अकाल नहीं पड़ा और न ही कभी पोषक भोजन की सामान्य कमी हुई। क्योंकि यहाँ वर्ष में दो बार वर्षा होती है—एक शीत ऋतु में, जब अन्य देशों की तरह गेहूँ बोया जाता है; और दूसरी ग्रीष्म अयनांत (summer solstice) के समय, जो चावल, बोस्पोरम, तिल और बाजरा बोने का उचित मौसम होता है—इस प्रकार भारत के निवासी लगभग हमेशा वर्ष में दो फसलें प्राप्त करते हैं।

(38.) यह कहा जाता है कि भारत, अपने विशाल आकार के कारण, अनेक और विविध जातियों से आबाद है, जिनमें से कोई भी मूल रूप से विदेशी नहीं थी, बल्कि सभी स्पष्ट रूप से इसी भूमि की मूल निवासी थीं।
इसके अतिरिक्त भारत ने न तो बाहर से किसी उपनिवेश को स्वीकार किया और न ही किसी अन्य राष्ट्र में अपना उपनिवेश भेजा। …

(२) अजनाभ-विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में इसे अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।

विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-जम्भूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥

पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥

हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः। तस्यर्षभॊऽभवत् पुत्रो मेरुदेव्यां महाद्युतिः॥२७॥

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते। भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठिता वनम्॥३२॥

विष्णु पुराण, खण्ड ४, अध्याय १९-दुष्यन्ताश्चक्रवर्ती भरतोऽभूत्॥१०॥

(३) हिमवत वर्ष- भौगोलिक खण्ड के रूप में इसे हिमवत वर्ष कहा गया है क्योंकि यह जम्बू द्वीप में हिमालय से दक्षिण समुद्र तक का भाग है। अलबरूनी ने इसे हिमयार देश कहा है (प्राचीन देशों के कैलेण्डर में उज्जैन के विक्रमादित्य को हिमयार का राजा कहा है जिसने मक्का मन्दिर की मरम्मत कराई थी)

(४) इन्दु-आकाश में सृष्टि विन्दु से हुयी, उसका पुरुष-प्रकृति रूप में २ विसर्ग हुआ-जिसका चिह्न २ विन्दु हैं। विसर्ग का व्यक्त रूप २ विन्दुओं के मिलन से बना ’ह’ है। इसी प्रकार भारत की आत्मा उत्तरी खण्ड हिमालय में है जिसका केन्द्र कैलास विन्दु है। यह ३ विटप (वृक्ष, जल ग्रहण क्षेत्र) का केन्द्र है-विष्णु विटप से सिन्धु, शिव विटप (शिव जटा) से गंगा) तथा ब्रह्म विटप से ब्रह्मपुत्र। इनको मिलाकर त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम है। इनका विसर्ग २ समुद्रों में होता है-सिन्धु का सिन्धु समुद्र (अरब सागर) तथा गंगा-ब्रह्मपुत्र का गंगा-सागर (बंगाल की खाड़ी) में होता है। हुएनसांग ने लिखा है कि ३ कारणों से भारत को इन्दु कहते हैं-(क) उत्तर से देखने पर अर्द्ध-चन्द्राकार हिमालय भारत की सीमा है, चन्द्र या उसका कटा भाग = इन्दु। (ख) हिमालय चन्द्र जैसा ठण्ढा है। (ग) जैसे चन्द्र पूरे विश्व को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार भारत पूरे विश्व को ज्ञान का प्रकाश देता है। ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते थे जिससे इण्डिया शब्द बना है।

(५) हिन्दुस्थान-ज्ञान केन्द्र के रूप में इन्दु और हिन्दु दोनों शब्द हैं-हीनं दूषयति = हिन्दु। १८ ई. में उज्जैन के विक्रमादित्य के मरने के बाद उनका राज्य १८ खण्डों में भंट गया और चीन, तातार, तुर्क, खुरज (कुर्द) बाह्लीक (बल्ख) और रोमन आदि शक जातियां। उनको ७८ ई. में विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पराजित कर सिन्धु नदी को भारत की पश्चिमी सीमा निर्धारित की। उसके बाद सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थान नाम अधिक प्रचलित हुआ। देवयुग में भी सिधु से पूर्व वियतनाम तक इन्द्र का भाग था, उनके सहयोगी थे-अफगानिस्तान-किर्गिज के मरुत्, इरान मे मित्र और अरब के वरुण तथा यमन के यम।

(६) कुमारिका-अरब से वियतनाम तक के भारत के ९ प्राकृतिक खण्ड थे, जिनमें केन्द्रीय खण्ड को कुमारिका कहते थे। दक्षिण समुद्र की तरफ से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है जिसे शक्ति त्रिकोण कहते हैं। शक्ति (स्त्री) का मूल रूप कुमारी होने के कारण इसे कुमारिका खण्ड कहते हैं। इसके दक्षिण का महासागर भी कुमारिका खण्ड ही है जिसका उल्लेख तमिल महाकाव्य शिलप्पाधिकारम् में है। आज भी इसे हिन्द महासागर ही कहते हैं।

(७) लोकपाल संस्था-२९१०२ ई.पू. में ब्रह्मा ने ८ लोकपाल बनाये थे। यह उनके स्थान पुष्कर (उज्जैन से १२ अंश पश्चिम बुखारा) से ८ दिशाओं में थे। यहां से पूर्व उत्तर में (चीन, जापान) ऊपर से नीचे, दक्षिण पश्चिम (भारत) में बायें से दाहिने तथा पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे जो आज भी चल रहा है।

   बाद के ब्रह्मा स्वायम्भुव मनु की राजधानी अयोध्या थी, और लोकपालों का निर्धारण भारत के केन्द्र से हुआ। पूर्व से दाहिनी तरफ बढ़ने पर ८ दिशाओं (कोण दिशा सहित) के लोकपाल हैं-इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, मरुत्, कुबेर, ईश। इनके नाम पर ही कोण दिशाओं के नाम हैं-अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान।

इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत्। कुबेर ईशः पतयः पूर्वादीनां दिशाः क्रमात्॥ (अमरकोष१/३/२)

अतः बिहार से वियतनाम और इण्डोनेसिया तक इन्द्र के वैदिक शब्द आज भी प्रचलित हैं। इनमें ओड़िशा में विष्णु और जगन्नाथ सम्बन्धी, काशी (भोजपुरी) में शिव, मिथिला में शक्ति, गया (मगध) में विष्णु के शब्द हैं। शिव-शक्ति (हर) तथा विष्णु (हरि) क्षेत्र तथा इनकी भाषाओं की सीमा आज भी हरिहर-क्षेत्र है। इन्द्र को अच्युत-च्युत कहते थे, अतः आज भी असम में राजा को चुतिया (च्युत) कहते हैं। इनका नाग क्षेत्र चुतिया-नागपुर था जो अंग्रेजी माध्यम से चुटिया तथा छोटा-नागपुर हो गया। ऐरावत और ईशान सम्बन्धी शब्द असम से थाइलैण्ड तक, अग्नि सम्बन्धी शब्द वियतनाम. इण्डोनेसिया में हैं। दक्षिण भारत में भी भाषा क्षेत्रों की सीमा कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र है। उत्तर में गणेश की मराठी, उत्तर पूर्व के वराह क्षेत्र में तेलुगु, पूर्व में कार्त्तिकेय की सुब्रह्मण्य लिपि तमिल, कर्णाटक में शारदा की कन्नड़, तथा पश्चिम में हरिहर-पुत्र की मलयालम।

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