
✍🏻: अभी वाराणसी में था तो मैं चौखम्भा प्रकाशन पहुंच गया पूछते पूछते। रिक्शे से उतरा तो पूछने लगा चौखम्भा कहां है तो एक पान वाले ने पूछा किताब लेनी है? हमने कहा हां तो उसने कहा कि वो जो रेमंड का बोर्ड लगा है उसके बगल में देखिए, वहीं किताबें मिल जाएंगी। हम उसे धन्यवाद देकर किताब देखने चल पड़े और पहुंच गए दुकान पर। दुकान पर कुछ बीएचयू के छात्र चिकित्सा के ग्रंथ खरीद रहे थे और उसी समय मैने पूछ लिया, “तन्त्र पर ग्रन्थ हैं?”
“हां, उधर लगे हैं देख लीजिए”
मैं जूते निकाल कर पहुंच गया देखने। सब देखने के बाद हमने सौन्दर्यलहरी, त्रिपुरा रहस्य का ज्ञान खण्ड और तन्त्रसार नामक ग्रन्थ निकाल लिए। ग्रंथों का दाम जोड़ा जा रहा था और तभी हमने जिज्ञासावश पूछ लिया, “श्रीधरी टीका होगी?”
“हां है”
“कितने की है लगभग इस समय?”
“20000 की है 16000 की पड़ेगी”
“अच्छा, अगली बार ले जाऊंगा अभी ले जाने की व्यवस्था नही है” मैं पैसे गिनते हुए बोल रहा था, “अच्छा बिक्री तो अधिक होगी नही इसकी?”
“नही ऐसा नहीं है, विदेश से लोग आते हैं खरीदने”
“विदेश से? अच्छा और भारत वाले?”
“भारत वाले नही लेते, एक दो साल में कभी कभार कोई आता है तो आता है नही तो नही”
ये बात सुनकर मुझे एकदम धक्का लगा। पुरी पीठ के पूर्वाचार्य श्रीधरस्वामी जी जिन्होंने श्रीमद्भागवतमहापुराण पर टीका लिखी और ऐसी टीका जिसपर स्वयं नारायण के अवतार श्री चैतन्यमहाप्रभु भी लट्टू हुए बिना नहीं रह सके उसका महत्त्व भारत के लिए शून्य है? आखिर किसके लिए श्रम किया था आचार्य ने? अमेरिका के लिए? रूस के लिए अथवा सनातनियो के लिए? पुरी मठ के ही पूर्वाचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी ने वैदिक गणित पर जो शोध किया वह किसके लिए था?
क्या रक्षा करेगा हिंदू धर्म की? फेसबुक पर हो हल्ला करने से रक्षा हो जाएगी अथवा अमुक दल का प्रचार करने और उसके लिए लड़ने से हो जाएगी? अमुक दल को धर्म की बागडोर थमा के आप निश्चिंत हो जाएंगे तो धर्म की रक्षा होगी? अपने ही शास्त्रों के प्रति आपकी अरुचि है, आप उनसे कतराते हैं और पुनः कहते हैं कि आचार्य करते क्या हैं? क्या आचार्य आपकी तरह टुच्ची भाषा का प्रयोग करते हुए सबसे लड़ें? गाली गलौज करें अथवा किसी स्वघोषित हिंदूवादी के जेल जाने पर मुकदमा लड़ें? लज्जा आती है आपको? एक आचार्य वृद्धावस्था में भी भ्रमण कर कर के धर्म की अलख जगाने के लिए तत्पर हैं और आप उनपर ही प्रश्न कर देते हैं? आपको भान है कि कितने शास्त्र लुप्त हो चुके हैं और कितने लुप्तप्राय हैं?
चौखम्भा जैसे प्रकाशनों को जीवित रखने से ही धर्म की रक्षा होगी अन्यथा सोशल मिडिया के हिंदुत्व का झुनझुना आप तहमद पहन कर बजाते रह जाएंगे।
बुरा लगा हो तो अपनी खोपड़ी किसी दीवार पर पटक लीजिएगा। चलते हैं।
✍🏻Agey aur he
एक लेख पढ़ रहा था जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती है .. “Will Germans be the eventual custodians of Sanskrit, its rich heritage and culture?”
हिंदी में “क्या जर्मन अंतिम संरक्षक होंगे संस्कृत के और इसके कीमती विरासत व संस्कृति के??”
मतलब क्या है कि जर्मनी जिस तरह से संस्कृत को लेकर गम्भीर है वैसा और कहीं नहीं है और इस आधार पे ही बोला जा रहा कि क्या जर्मनी ही इसका अंतिम संरक्षक होगा ??
जर्मनी के 14 टॉप यूनिवर्सिटियों में संस्कृत की पढ़ाई हो रही है व रिसर्च भी।
साउथ एशिया इंस्टीट्यूट और हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी समर (summer) में स्पोकन कोर्स ऑर्गेनाइज करती है जिसमें एडमिशन लेने के लिए दुनिया भर से होड़ लगा हुआ होता है.. एप्लिकेशन की बाढ़ आ जाती है विश्व भर से जिसमें कि छंटाई करने की नौबत आ जाती है और छंटाई करना भी पड़ता है।
ये यूनिवर्सिटी केवल जर्मनी में ही नहीं बल्कि स्विट्जरलैंड, इटली और आप यकीन नहीं मानोगे भारत में भी संस्कृत स्पोकन का समर स्कूल ऑर्गेनाइज करती है। बताइये कि भारत की चीज भारत को ही बेचा जाता है। किस कारण ??
Professor Dr. Axel Michaels, head of classical Indology (University of Heidelberg) कहते है कि ” आज से 15 साल पहले जब हम इसका शुरुआत किये थे तो शुरुआती के दो साल में ही बंद करने की स्थिति में थे लेकिन हमने ऐसा नहीं किया बल्कि इसको और मजबूत बनाने पे ध्यान दिया और अन्य युरोपियन कंट्री के लिए भी कोर्स के लिए ओपन किया!”
आज जर्मनी में 14 यूनिवर्सिटी हैं जहां संस्कृत की पढ़ाई चल रही और ब्रिटेन के 4 यूनिवर्सिटी में। प्रत्येक वर्ष हम समर में एक महीने के लिए समर स्कूल रन करते हैं जिसमें दुनिया भर के एप्लिकेशन आते हैं।.. अब तक 254 स्टूडेंट इसमें पार्टिशिपेट हो चुके हैं 34 अलग-अलग देशों से.. और प्रत्येक साल इसमें गज्जब का इज़ाफ़ा हो रहा है जिसमें कि हमें एप्लिकेशन को रिजेक्ट भी करना पड़ रहा है।
जर्मनी के बाद अमेरिका से सबसे ज्यादा स्टूडेंट होते हैं उसके बाद ब्रिटेन इटली और अन्य यूरोपीय देश।
आगे प्रोफेसर कहते है कि “किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है! .. यहां तक कि बुद्धीज्म का जो मूल विचार है वो संस्कृत में है..अगर हम शुरुआती दर्शन,इतिहास,भाषा,विज्ञान व संस्कृति के उत्पत्ति को बेहतर ढंग से जानना व समझना चाहते है तो हमें ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट पढ़ने पड़ेंगे जो कि सबसे पुराने विचार व अनुसंधान का नतीजा है!”
Francesca Lunari एक मेडिकल की छात्रा है जो हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी में संस्कृत का अध्ययन कर रही है.. वो कहती है कि “मैं साइको एनालिसिस में ज्यादा इंटरेस्टेड हूँ और इसके लिए ये जानना जरूरी है कि कैसे मानवीय विचार ग्रंथ,संस्कृति और समाज से होते हुए निकला .. और इसको समझने के लिए जो सबसे शुरुआती स्टेप है वो है संस्कृत है।.. मुझे बांग्ला के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक गिरीन्द्र बॉस के मनोविज्ञान को पढ़ना है जो कि बांग्ला में है और भारत में भी लोग इनको नहीं पढ़ते जिन्होंने बहुत कमाल का कार्य किया है इस क्षेत्र में.. मुझे उनके कार्य को डेसिफर करना है और उसके लिए संस्कृत ही शुरुआती स्टेप है।”
ये आगे कहती है कि “हम एक महान वैश्विक संस्कृति व विरासत को पूर्णतः विलुप्त होते हुए देखेंगे यदि हिंदी बांग्ला जैसे मेजर लैंग्वेज को यूं ही इंडियन इंग्लिश के सामने घुटने टेकते हुए पाते है तो .. जो कि दिनों दिन कमजोर ही होता जा रहा है.. यही आज संस्कृत के साथ हुआ है .. और ये चिंता का विषय है क्योंकि इंडियन परिवार अपने बच्चों को अपने लैंग्वेज में न पढ़ा के इंग्लिश पे ज्यादा जोर देते हैं और दे रहे हैं।”
डॉ. माइकल कहते है कि “पॉलिटिक्स व इकोनॉमिक्स के क्रमिक विकास को वह बेहतर समझ सकता है जो चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करता हो”
आने वाले सेमेस्टर में ‘human physiology and psychology in the early Upanishads’ भी पढ़ाया जाएगा।
आईआईटी के मैथेमेटिसियन आनंद मिश्रा कहते है कि “जब हमने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण का स्टडी किया तो पाया कि ये कम्प्यूटिंग लैंग्वेज के हिसाब से सबसे सूटेबल लैंग्वेज है।” .. और इसके ऊपर काम भी शुरू है।
जर्मनी हमेशा से संस्कृत विद्वानों के लिए संरक्षक व भंडार रहा है.. जितने भी हार्वर्ड,कैलिफोर्निया व ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी में संस्कृत विद्वान हैं वे सभी के सभी जर्मन हैं .. ऐसा क्यों है तो इसके जवाब में डॉ माइकल कहते है कि ” ऐसा इसलिए है कि हमने कभी इंडिया को उपनिवेश नहीं बनाया जैसा कि ब्रिटेन ने किया और हमने हमेशा इनके ऊपर रोमांटिक व्यू ही रखा है!”
लेकिन यहाँ जब लंबे समय तक मुगलों व अंग्रेजों के अधीन सबकुछ रहा तो संस्कृत आज सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो गया है।
नरेंद्र मोदी जब जर्मनी यात्रा पे जाते है तो यही बात कहते है कि “आज देश में कोई संस्कृत न्यूज बुलेटिन नहीं है क्योंकि ऐसा लगता है कि इससे सेकुलरिज्म खतरे में पड़ जाएगा!”
ये बातें 2015 की है … आज त्रिभाषा की बात हो रही .. नई शिक्षा नीति की बात हो रही है तो सबसे ज्यादा मरोड़ या परेशानी किससे हो रही है तो वो है संस्कृत .. पता नहीं क्यों इन्हें संस्कृत के नाम से जुलाब होने लगता है.. दस्त रुकते नहीं रुकते हैं.. हिचकोले मार-मार के उबाल मारता है.. रह-रह के उबाल मारता है.. जबकि साफ कह दिया है कि संस्कृत विकल्प में है.. अगर आपको पढ़ना है तो पढ़े नहीं तो विकल्प के रूप में अन्य भारतीय भाषा भी है.. लेकिन नहीं सारा मुड़फुटौवल इसी पे करना है.. पिछले दो दिन से गली-गली से महान भाषाविद के नाना सब उफिया के माफिक बाहर निकल रहे हैं.. जो हिंदी भी ढंग से टाइप नहीं कर पाते वे संस्कृत के एक्सपर्ट बन के बैठे हुए हैं। .. इन्हें विरोध करना ही करना है क्योंकि सेकुलरिज्म की बात जो आ जाती है न।
तुम्हें नहीं पढ़ना है तो मत पढ़ न .. लेकिन जहां संस्कृत का ओरिजिन है वहां गर देश-विदेश से स्कॉलर आ के ज्ञान अर्जित करेंगे तो किनका फायदा है ??? तुम्हें पैसे कमाने है तो तुम पढ़ो न जर्मन,फ्रेंच,पुर्तगाली,रूसी,इटालियन .. तुम्हें कौन मना किया है .. सरकार ने व्यवस्था भी किया हुआ है.. लेकिन जो स्कॉलर लोग हैं उन्हें क्यों तुम अपनी बचकानी सेकुलरिज्म की आड़ में उपहास उड़ा रहे हो ??? क्या ये नहीं होना चाहिए कि जहां विश्व के टॉप यूनिवर्सिटीज में जर्मन स्कॉलर विराजमान हैं वहाँ कोई भारतीय हो ?? क्या ये नहीं हो सकता ?? क्यों नहीं हो सकता.. जब यहां एक्सपर्ट तैयार होंगे तभी तो वो विश्व भर में जाएंगे न .. नहीं तो ऐसा न हो कि हमें संस्कृत पढ़ाने वाले जर्मन लोग ही आगे होंगे। मने हमारी चीज हमें ही पढ़ाएँगे।
कुछ ऐसा ही विरोध रहा तो हिंदी भी हिन्दू के साथ जुड़ जायेगा और सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो जाएगा तब भी कोई फॉरेनर ही हमें हिंदी सीखा रहा होगा।
कुछ तो शर्म करो रे।
जो एक आम भारतीय को बोलना चाहिए वो एक जर्मन प्रोफेसर बोल रहा है.. जो कि मैं ऊपर ही कोट किया हूँ और पुनः इधर भी कर रहा हूँ जो इन शेखुलरों को समर्पित है..
“किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है!”
(इसको आप अपने तरीके से भी बोल सकते है.. मने कि सभ्य तरीके से।)😊