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यदि चतुर्थेश बारहवें स्थान में हो तो पैतृक सम्पत्ति से हाथ धोना पड़ता है।

जिस मनुष्य के चतुर्थ भाव में पूर्व चन्द्र शनि के साथ बृहस्पति से दृष्ट हो तो वह व्यक्ति बाल्यावस्था से ही कविता करने वाला, राज्य भाषा प्रवीण, माता को भारी होता है।

 

यदि सूर्य, मंगल और शनि सप्तमभाव में हो तो माता रोगी रहती है और यदि क्षीण चन्द्र राहु या केतु के साथ सप्तम में हो तो माता को किसी न किसी प्रकार का दुख लगा रहता है।

 

यदि चतुर्थेश गुरू लग्न में हो तो अनेक प्रकार की सवारी सुख होता है। और यदि दशमेश धन भाव में, धनेश लग्न में तथा दोनों चतुर्थ भाव में उच्च, स्वगृही, मित्र क्षेत्री, मित्र शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो तो साईकिल, स्कूटर, मोटर, घोड़ा आदि की सवारी प्राप्त होती है।

यदि सुखेश, लग्नेश के साथ, लग्न, चतुर्थ तथा नवम भाव में हो तो इनकी दशान्तर्दशा में अवश्य ही किसी शुभ वाहन की सवारी प्राप्त होती है।

चतुर्थ स्थान का राहु जिसके हो उसकी माता को दीर्घायु करता है और वर्ष फल में अन्तर्दशा का राहु उस मनुष्य को उस वर्ष कारावास कराता है। जिसका चतुर्थेश चन्द्र, राहु या केतु के साथ लग्न में हो तो वह लड़का नीच से उत्पन्न होता है। यदि शनि, चतुर्थेश या चन्द्रमा के साथ हो तो मातृ मारक योग होता है।

 

 मंगल दशम में हो, दशमेश चतुर्थ में हो, पाप दृष्ट युक्त न होने पर मनुष्य बड़ा भूमिधर तथा सवारी युक्त होता है। पाप ग्रहों से दृष्ट या युक्त होने पर भूमि सुख नहीं  होता  है

 

जिसका चतुर्थेश, नीच, अस्त, शत्रुराशि का होकर 6-8-12 में निर्बली हो तो पैतृक सम्पत्ति का भी ह्रास हो जाता है। यदि चतुर्थ भाव में बलवान बृहस्पति शुभ लग्रेश से युक्त या दृष्ट हो अथवा

 

मित्र शत्रुग्रहों से दृष्ट-युक्त हो तो पाप रहित होने पर मनुष्य धन-धान्यपूर्ण, वाहन युक्त रहकर ऐश्वर्यमय जीवन व्यतीत करता है।

 

” जिसका चतुर्थेश शत्रुग्रहों से दृष्ट युक्त होकर, चतुर्थ भाव में हो तो उडी माता बीमार रहती है, पैतृक सम्पत्ति, वाहनादि का सुख नहीं होता, बन्धु बान्धव, स्त्री, मित्र आदि का सुख नहीं होता। जिसका शनि, मंगल, सूर्य चतुर्थ भाव में शुभ दृष्ट-युक्त हो तो वह मनुष्य कपटी होता है।

 

चतुर्थस्थानपतिना सम्बन्धों यदि विद्यते।

मातृकारकचन्द्रस्य मात्रायुष्यं विनिर्दिशेत् ॥

 यदि चतुर्थेश पूर्ण चन्द्र के साथ शुभ स्थान में विद्यमान हो तो माता की दीर्घायु करता है।

 

क्रुराधिपत्ययुक्तस्तु कुजः पञ्चमगो यदि ।

कुजदायेषु संप्राप्ते करोति निधनं कुजः ॥

 

यदि मंगल पाँचवें स्थान में नीच या शत्रु भाव या राशि का हो तो अपनी दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट करता है।

 

बुध-शुक्रौ पञ्चमस्थानान्योन्यौ मारकौ स्मृतौ ।

बुधदाये तु शुक्रस्तु शुक्रदाये बुधस्तथा ॥

यदि बुध शुक्र किसी जन्मपत्र में पञ्चम स्थान में एक साथ हो तो वे दोनों आपस में भारक होते है। जिसका सूर्य नीच का होकर पञ्चम में हो उसके पिता की अल्पायु होती है।

 

जिसके पञ्चमस्थ शनि को लग्नेश या गुरू पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो उस आदमी को स्वदशान्तर में पालन करता है। जिसका पञ्चमेश शनि या बुध लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो उसका विवाह नहीं होता, यदि विवाह हुआ तो बच्चे नहीं  होते  हैं। यदि लग्नेश गुरू बलवान् होकर पञ्चम भाव में हो तो पुत्र सुख अवश्य होता है। यदि से दृष्ट हो यदि पञ्चम स्थान स्वगृहो, उच्च राशि के चन्द्र या शुक्र से दृष्ट या युक्त हो तो सन्तान अवश्य होती है।

 

यदि पञ्चम स्थान और पञ्चमेश दोनों ही शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो तो सनात काफी होती है। पुरूष ग्रहों के होने पर पुत्र, और स्वी ग्रहों के होने पर कन्यायें अधिक होती है।

 

यदि पञ्चमेश तथा लग्नेश स्वगृही, मित्रगृही या उच्च के होकर एक दूसरे के युक्त या दृष्ट हो तो या फिर बलवान् होकर केन्द्र में या पंचम स्थान में एकति हो तो सन्तान अवश्य उत्पन्न होती है।

 

यदि धनेश में हो और लग्रेश, भाग्येश के साथ सप्तम स्थान में हो तो सन्तान अवश्य होती।

 

जिस किसी के जन्मपत्र में चतुर्थश और दशमेश दोनों बली होकर लाभ में बैठे हों या लाभ स्थान को देखते हों या चतुर्थेश राज्येश केन्द्र त्रिकोण में लाभेश से दृष्ट या युक्त हो और किसी पाप शत्रु ग्रह से किसी प्रकार भी संबंधित न हो तो वह मनुष्य अपने में प्रत्येक प्रकार का सुख पाता है।

 

  • जिस मनुष्य का चतुर्थेश और भाग्येश या राज्येश बलवान होकर शुभ स्थान में शुभ बलवान बृहस्पति से युक्त हो तो वह मनुष्य धनधान्य पूर्ण उच्चाधिकारी होता है।

 

जिसका चतुर्थेश नवम स्थान में बली होकर शुभ मित्र शुभ राशि मीन का गुरू और शुक्र के साथ बैठा हो, और राज्येश पंचम स्थान में अशुभ ग्रह की दृष्टि युति से रहित बैठा हो तो वह मनुष्य धन धान्य पूर्ण, भूमि घर तथा सवारी सुख से युक्त होता है।

 

यदि लग्न में स्वगृही शुभ ग्रह हो और उच्च शुभ ग्रह भाग्य स्थान में हो, दूसरे भाव का अधिपति केन्द्र त्रिकोण में लाभेश से दृष्ट या युक्त हो तो ऐसे योग में उत्पन्न हुआ मनुष्य एक बड़ा राज्याधिकारी होता है।

 

– यदि धन स्थान में उच्च का कोई शुभ ग्रह हो, लग्न और दशम स्थान में भी शुभ ग्रह, धनेश से युक्त तथा दृष्ट हों, और भाग्य स्थान भी किसी शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो या 2-लग्नेश, चतुर्थेश और नवमेश ये तीनों अशुभ दृष्टि रहित होकर दशम स्थान में सुशोभित हो, और दशमेश लग्न में हो या लग्न को देखता हो तो या, 3-लग्नेश, चतुर्थेश तथा दशमेश ये तीनों ग्रह दशम स्थान में हों, और लग्न दशमेश से दृष्ट हो तो या -चतुर्थेश दशम स्थान में हो और दशमेश चतुर्थ स्थान में हो या दोनों चतुर्थ में हो या दशमेश में हों, बली हों, नीचास्त से रहित हों, और बलवान भाग्येश से पूर्णतया दृष्ट या युक्त हो तो मनुष्य एक बहुत ही बड़ा राज्याधिकारी होता है

 

– यदि लग्नेश और भाग्येश, चतुर्थ स्थान में हों और चतुर्थेश लग्न में मित्र क्षैत्री या उच्च का हो तो या 2-चतुर्थेश उच्च मित्र क्षैत्री या शुभ राशि का होकर केन्द्र या त्रिकोण में किसी मित्र शुभ ग्रह से युक्त हो तो वह मनुष्य धन-धान्य पूर्ण भूमिधर होता है।

चतुर्थ भाव  घर, भूमि, माता और गृह-सुख का रहस्य

चलित कुंडली में ग्रह दृष्टि देखने का तरीका

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