
लग्नात् चतुर्थभावेन वासस्थानं विचिन्तयेत्। गृहं क्षेत्रं सुखं मातृं वाहनं च जलाशयम्॥
चतुर्थ भाव से ही जातक का घर, जमीन, माता का सुख, मन की शांति, वाहन और आसपास पानी की स्थिति देखी जाती है। इस भाव का स्वामी जिस राशि-भाव में बैठा हो और जो ग्रह इसे देखते हों, वैसा ही घर का माहौल बनता है। यदि शुभ ग्रह हों तो हवादार और खुला मकान मिलता है, जो मंदिर या स्कूल के पास होता है। यदि पाप ग्रह हों तो तंग और सीलन वाला मकान मिलता है, जो नाले या कबाड़ के पास होता है। चंद्र बलवान हो तो घर में शांति रहती है, और यदि चंद्र निर्बल हो तो घर में अशांति बनी रहती है।
सुखेशे केन्द्रकोणे वा स्वोच्चे मित्रगृहेऽपि वा। शुभग्रहयुते दृष्टे गृहसौख्यं विनिर्दिशेत्॥
यदि चतुर्थेश 1-4-7-10 या 5-9 भाव में हो, अपनी उच्च राशि या मित्र राशि में हो, या गुरु, शुक्र, बुध से देखा जाता हो, तो जातक को पैतृक मकान और बड़ा बगीचे वाला घर मिलता है। इससे माता दीर्घायु होती है और घर में धार्मिक माहौल रहता है। पड़ोसी सज्जन मिलते हैं और बार-बार घर बदलना नहीं पड़ता। यदि चतुर्थेश 2nd या 11th में हो तो घर से ही धन लाभ होता है, और दुकान-मकान एक साथ होने का योग बनता है।
भौमेन चतुर्थयुते दृष्टे वा अग्निभयं गृहे। शनिना शीतदोषश्च राहुणा सर्पवृश्चिकाः॥
: जब मंगल का संबंध 4th से हो तो घर के पास बिजली घर, गैरेज, ईंट भट्ठा या लाल मिट्टी पाई जाती है। इससे किचन में आग का भय और शॉर्ट सर्किट होता है, परिवार में गर्म मिजाज रहता है और जमीन का विवाद होता है। शनि से संबंध हो तो पुराना मकान, लोहे का कबाड़, नाला, सीलन, अंधेरा और मजदूर बस्ती जैसा माहौल होता है। इससे घर में बीमारी, नौकरों से परेशानी और उदासी रहती है। राहु से संबंध हो तो ऊंची-नीची जमीन, गड्ढे, मोबाइल टावर, बिजली के तारों का जाल, कीड़े-मकोड़े और घर में जाले रहते हैं। यदि ईशान कोण दूषित हो तो भ्रम, डर और रात को नींद नहीं आती।
4 मेष राशि 4th में हो तो घर पहाड़ी या ऊंची जगह पर होता है, पुलिस चौकी, अग्नि स्थान या लाल रंग के पत्थर के पास होता है। माहौल गरम और झगड़े वाला रहता है।
वृष 4th में हो तो खेत-खलिहान, गौशाला, बगीचा, बैंक या धनवान इलाके में सुगंधित जगह होती है। माहौल स्थिर और सुखी रहता है।
मिथुन 4th में हो तो चौराहा, बाजार, स्कूल, बस स्टैंड, रेलवे लाइन या प्रिंटिंग प्रेस के पास होता है। शोर ज्यादा रहता है, बातचीत वाला माहौल बनता है।
कर्क 4th में हो तो नदी-तालाब, कुआँ, हैंडपंप, डेयरी या पानी की टंकी पास होती है। घर में सीलन रहती है और माता का प्रभाव ज्यादा होता है।
सिंह 4th में हो तो सरकारी कोठी, मंदिर, ऊंचा टीला या जंगल के पास होता है। माहौल रोबदार रहता है, पर पिता से अनबन होती है।
कन्या 4th में हो तो अस्पताल, दवाखाना, दुकान या हिसाब-किताब वाली जगह पर, गली संकरी होती है। माहौल चिंता वाला रहता है।
तुला 4th में हो तो कपड़ा मार्केट, ब्यूटी पार्लर, संगीत वाली और सुंदर सजी जगह होती है। यहाँ पत्नी का दबदबा रहता है।
वृश्चिक 4th में हो तो तहखाना, भूमिगत पानी टैंक, केमिस्ट की दुकान, गुप्त जगह या पुराना कुआँ होता है। माहौल रहस्यमय और डर वाला रहता है।
धनु 4th में हो तो बड़ा मंदिर, कॉलेज, धर्मशाला या खुला मैदान पास होता है। माहौल धार्मिक और ज्ञानी लोगों का रहता है।
मकर 4th में हो तो फैक्ट्री, मजदूर बस्ती, खदान, पुराना मकान या लोहे का सामान आसपास होता है। माहौल मेहनत और देरी वाला रहता है।
कुंभ 4th में हो तो बिजली घर, तकनीकी सामान, कबाड़ी या लेबर इलाका होता है। माहौल अजीब और अलग सा रहता है।
मीन 4th में हो तो आश्रम, धर्मशाला, अस्पताल या शांत पानी वाली जगह होती है। माहौल भक्ति वाला रहता है।
नक्षत्र संकेत: रोहिणी नक्षत्र का संबंध हो तो घर में गाय, हरियाली, पानी और दूध-दही की सुविधा होती है। आर्द्रा से बिजली का ट्रांसफॉर्मर, आँसू और क्लेश होता है। आश्लेषा से गुप्त तहखाना, रसोई में नाली और साँप का भय होता है। मघा से पितरों का स्थान, पुराना पीपल और राजसी पर खंडहर नुमा घर होता है। मूल से नींव में दोष होता है, और घर के पीछे जंगल या वीरान प्लॉट होता है।
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा। एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्ता चाप्यहमेव हि॥
भावार्थ: भगवान के लिए कोई अपना-पराया नहीं है। जब उद्धव गोकुल गए तो उन्होंने नंद का घर देखा। गोकुल वृष राशि का इलाका था, इसलिए वहाँ गौशाला, यमुना किनारा और कदम्ब का बगीचा था। घर कच्चा था पर आनंद परम था। पर कंस के पाप से वही गोकुल छोड़कर मथुरा-द्वारिका जाना पड़ा। इससे शिक्षा मिलती है कि चतुर्थ भाव कितना भी शुभ हो, यदि पाप कर्म या खराब दशा हो तो महल भी छूट जाता है। घर ईंट-पत्थर से नहीं, संस्कार से बनता है। असली घर तो भगवान का धाम है, यहाँ तो यह संसार एक धर्मशाला है।
मंगल 4th में हो तो रसोई आग्नेय कोण में रखो, गैस के पास पानी मत रखो, वरना रोज झगड़ा और आग का भय रहेगा। शनि 4th में हो तो नैऋत्य कोण भारी रखो, लोहे की अलमारी रखो, उसे खाली मत रखो, वरना रोग और नौकर कष्ट होगा। राहु 4th में हो तो ईशान कोण साफ रखो, तुलसी लगाओ, कूड़ा मत रखो, वरना भ्रम और डिप्रेशन होगा।
यदि चतुर्थेश 6-8-12 में हो तो 36 साल तक किराये पर भटकना पड़ता है, अपना घर देर से बनता है। मुख्य द्वार के सामने गड्ढा, बिजली का खंभा या टी-पॉइंट हो तो 4th भाव का फल खराब हो जाता है। घर के ब्रह्मस्थान यानी बीच में भारी वजन, टॉयलेट या सीढ़ी हो तो गृहस्वामी दुखी रहता है।
गृह-नाश योग: चतुर्थेश 8th में हो और केतु से युत हो तो घर बिक जाता है, कोर्ट केस होता है, घर में अकेलापन रहता है। परिहार: चतुर्थेश का रत्न शुक्ल पक्ष में धारण करें, 16 सोमवार शिव को कच्चा दूध चढ़ाएं।
अग्नि-भय योग: मंगल 4th में हो और सूर्य से दृष्ट हो तो शॉर्ट सर्किट, किचन में आग और भाई से लड़ाई होती है। परिहार: किचन में चाँदी का चौकोर टुकड़ा रखो, मंगलवार को हनुमान को बूंदी का भोग लगाओ।
जल-दोष योग: चंद्र 4th में हो और शनि-राहु से पीड़ित हो तो सीलन, टैंक लीक, छत टपकना और माँ को कफ-बीमारी होती है। परिहार: चाँदी का चंद्र यंत्र उत्तर दिशा में स्थापित करें, सोमवार को चावल-चीनी-मिश्री का दान करें।
वास्तु-भंग योग: 4th भाव पाप कर्तरी में हो तो आगे गंदा नाला और पीछे श्मशान होता है। परिहार: मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का चित्र लगाएं, वायव्य कोण में लाल झंडा लगाओ।
8.मत्स्य पुराण, अध्याय 252, श्लोक 12
वास्तुदोषे समुत्पन्ने गृहे कलहसम्भवे। वास्तुपुरुषं सम्पूज्य शान्तिं कुर्याद् विचक्षणः॥
जब घर में वास्तु दोष से कलह, बीमारी या एक्सीडेंट हो तो बुद्धिमान मनुष्य वास्तु पुरुष की पूजा करके शांति करे। विधि: ईशान कोण में जौ, गेहूं, तिल, उड़द, मूंग से 81 पद का वास्तु मंडल बनाकर 45 देवताओं का आवाहन करो। घी का दीपक और नवग्रह समिधा से हवन करो। सांख्य: गृह प्रवेश पर 1 बार अनिवार्य, फिर हर साल 1 बार। इससे जमीन का शल्य दोष, हड्डी, लोहा, कोयला दबा होने का दोष, दिशा दोष और द्वार वेध खत्म होता है।
ख. भुवनेश्वरी तंत्र, पटल 1, श्लोक 19
चतुर्थभावगे पापे गृहे दुःखसमन्विते। भुवनेशीं भजेन्नित्यं गृहसौख्यमवाप्नुयात्॥
चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हों और घर दुःख से भरा हो तो रोज माँ भुवनेश्वरी को भजो, घर का सुख मिलेगा। मंत्र: ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः। विधि: शुक्रवार को लाल फूल, लाल चंदन और कमल गट्टे की माला से 108 बार जप। माँ को खीर का भोग लगाएं। सांख्य: 21 शुक्रवार तक कुल 2268 मंत्र जप। इससे घर का विस्तार होता है, छोटा घर भी बड़ा लगता है, बेचने की नौबत नहीं आती, क्लेश शांत होता है।
ग. ऋग्वेद खिल सूक्त, श्री सूक्त, मंत्र 1
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
हे अग्नि देव, सुनहरे रंग वाली, हिरण सी चंचल, सोने चाँदी के हार वाली, चंद्रमा जैसी शीतल, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे घर बुलाओ। विधि: शुक्रवार सुबह नहाकर कमल पर केसर से श्री यंत्र बनाकर 16 ऋचा का पाठ करो। घी का दीपक और कमल का फूल चढ़ाओ। सांख्य: 16 शुक्रवार तक 16 पाठ। इससे दरिद्रता जाती है, टूटा घर भी चमकने लगता है, स्थिर लक्ष्मी आती है।
वास्तु पुरुष पूजन से जमीन के नीचे का शल्य, कील, हड्डी और लोहे का दोष कटता है। घर में अकाल मृत्यु, एक्सीडेंट, रोज की बीमारी और पति-पत्नी कलह बंद होती है। किराये का घर भी अपना सा लगता है, मन टिकता है। नींव का पाप, पितृ दोष और ब्रह्मस्थान दोष शांत होता है।
भुवनेश्वरी मंत्र से 21 शुक्रवार में घर “भुवन” जैसा लगता है। दीवारें हटती सी लगती हैं, घुटन खत्म होती है। माँ का स्वास्थ्य सुधरता है, संतान आज्ञाकारी होती है, पड़ोसी मित्र बनते हैं। राहु-शनि के 4th का भय, रात को डर लगना, कुत्तों का रोना और नींद न आना बंद होता है।
श्री सूक्त से लक्ष्मी स्थायी वास करती है। नाले या श्मशान पास हो तो भी दुर्गंध-दोष नहीं लगता, नेगेटिविटी घर में प्रवेश नहीं करती। घर में मांगलिक कार्य होते हैं, शादी, संतान और मुंडन होता है। कर्जा उतरता है, बैंक लोन पास होता है, अपना प्लॉट-मकान बनता है। पुराना विवादित मकान बिककर नया बड़ा मकान मिलता है।
सबसे बड़ा वास्तु है कि सुबह-शाम घर में शंख-घंटी बजाओ और गायत्री मंत्र करो। इससे राहु, केतु और शनि तीनों घर छोड़ भागते हैं। 4th भाव खराब हो तो घर मत बदलो, आदत बदलो। रात को जूठे बर्तन मत छोड़ो, टूटा कांच और बंद घड़ी घर से निकालो, माता-पिता के रोज पैर छुओ, गाय को पहली रोटी दो। घर खुद सुधर जाएगा।
मंगल 4th वाला किचन साफ रखे, गैस के पास पानी न रखे, लाल रंग कम करे। शनि 4th वाला नैऋत्य में लोहे की अलमारी रखे, कबाड़ शनिवार को निकाले। राहु 4th वाला ईशान में तुलसी और साफ पानी का लोटा रखे, नीला रंग हटाए। ये तीन काम सौ उपाय के बराबर हैं।
अंतिम सूत्र: शरीर ही पहला घर है। इसे सात्विक भोजन, अच्छे विचार और व्यायाम से साफ रखो। मन में ईर्ष्या-द्वेष का कबाड़ मत रखो। फिर ईंट-पत्थर का घर कैसा भी हो, तुम राजा हो। राम जी 14 साल पत्ते की कुटिया में रहे, पर अयोध्या वही थी जहाँ राम थे। इसलिए घर नहीं, घरवाले अच्छे बनाओ। जहाँ प्रेम है, वहीं स्वर्ग है।