
जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव (सुख भाव) और ‘भूमिपुत्र’ मंगल किस प्रकार व्यक्ति को अचल संपत्ति का स्वामी बनाते हैं। जब पराक्रम का कारक मंगल और धैर्य व लेबर मैनेजमेंट का कारक शनि एक साथ लग्न और दशम भाव को प्रभावित करते हैं, तो जातक रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में एक सफल ‘बिल्डर या डेवलपर’ बनकर उभरता है। साथ ही, राहु के कारण होने वाली धोखाधड़ी और विवादित संपत्तियों से लाभ कमाने वाले।
लेकिन संपत्ति होना एक बात है और उसका पूर्ण सुख मिलना दूसरी बात। श्रृंखला के इस दूसरे भाग में हम उन सूक्ष्म और व्यावहारिक कारणों का विश्लेषण करेंगे कि आलीशान मकान होने पर भी व्यक्ति वहां क्यों नहीं रह पाता, निर्माण कार्य में रुकावटें क्यों आती हैं, जीवन के किस पड़ाव में घर का सपना पूरा होता है और इन बाधाओं से निकलने के अचूक उपाय क्या हैं।
ज्योतिष शास्त्र में एक ‘भौतिक ढांचे’ (मकान) और ‘घरेलू सुख’ (घर) के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा खींची गई है। कई बार जातक के पास आलीशान बंगला या कई फ्लैट्स होते हैं, लेकिन वे धूल खाते रहते हैं; जातक स्वयं नौकरी, कोर्ट-कचहरी, पारिवारिक कलह या स्वास्थ्य कारणों से वहां रह नहीं पाता।
चतुर्थेश का त्रिक भावों में जाना: यदि चतुर्थ भाव का स्वामी (चतुर्थेश) कुंडली के ६, ८ या १२वें भाव में बैठ जाए, तो जातक भव्य घर बनाने के बावजूद खुद उसके सुख से वंचित रहता है। ऐसा व्यक्ति अक्सर ट्रांसफर, विदेश यात्रा या व्यावसायिक मजबूरियों के कारण किराए के मकानों या होटलों में जीवन बिताने को विवश होता है।
अलगाववादी ग्रहों का प्रभाव: यदि चतुर्थ भाव में राहु, केतु या शनि जैसे क्रूर व अलगाववादी (Separative) ग्रह नीच या शत्रु राशि में होकर स्थित हों, तो घर के भीतर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहता है। मकान तो बन जाता है, लेकिन मानसिक सुकून (जो चौथे घर का वास्तविक नैसर्गिक गुण है) पूरी तरह लुप्त हो जाता है।
अक्सर देखा जाता है कि व्यक्ति जमीन खरीद लेता है, नींव भी डल जाती है, लेकिन अचानक काम बीच में ही रुक जाता है। इसके पीछे गोचर और दशाओं का बड़ा हाथ होता:
राहु-केतु का गोचर और दशा: यदि चतुर्थेश या मंगल कमजोर स्थिति में हों और उसी समय जातक राहु या केतु की महादशा/अंतर्दशा से गुजर रहा हो, तो निर्माण कार्य में अप्रत्याशित वित्तीय संकट या सरकारी अनुमतियों (Approvals) में बाधाएं आती हैं।
शनि की ढैया या साढ़ेसाती: शनि देव निर्माण सामग्री (ईंट, सीमेंट, लेबर) के कारक हैं। यदि गोचर में शनि देव चतुर्थ या अष्टम भाव को प्रभावित कर रहे हों (ढैया या साढ़ेसाती चल रही हो), तो जातक का पैसा कंस्ट्रक्शन में लंबे समय के लिए ब्लॉक हो जाता है और लेबर की समस्या के कारण काम रुक-रुक कर चलता है।
सामूहिक गोचर (Market Transit): जब कालपुरुष की कुंडली में शनि या गुरु जैसी बड़ी शक्तियां वक्री या पीड़ित होती हैं, तो पूरे रियल एस्टेट मार्केट में मंदी का दौर आता है, जिससे बिल्डर्स समय पर पजेशन नहीं दे पाते।
यह हर मध्यवर्गीय या नौकरीपेशा व्यक्ति का यक्ष प्रश्न है कि उसका अपना घर किस उम्र में बनेगा। ज्योतिष में ‘दशा चक्र’ और ‘भाव बल’ के आधार पर समय का निर्धारण तीन मुख्य पड़ावों में किया जाता है:
जीवन के शुरुआती दौर में मकान (24 से 32 वर्ष की आयु): यदि जातक की कुंडली में लग्नेश और चतुर्थेश दोनों केंद्र या त्रिकोण में बेहद बली स्थिति में हों, और युवावस्था के दौरान ही चतुर्थेश, भाग्येश या मंगल की अनुकूल महादशा आ जाए, तो जातक करियर के शुरुआती वर्षों में ही बहुत कम उम्र में (अपने दम पर या पैतृक सहयोग से) अपना घर बना लेता है।
जीवन के मध्य भाग में मकान (33 से 44 वर्ष की आयु): यदि चतुर्थ भाव पर गुरु या शुक्र जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, लेकिन चतुर्थेश पर थोड़ा शनि का प्रभाव हो या अनुकूल दशा जीवन के इस पड़ाव में आकर सक्रिय हो, तो जातक स्थिरता आने के बाद, बैंक लोन या अपनी संचित पूंजी के माध्यम से ३६वें या ४२वें वर्ष के आसपास घर का सुख पाता है।
जीवन के उत्तरार्ध या अंतिम पड़ाव में मकान (45 वर्ष के बाद): यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, या चतुर्थ भाव पर अत्यंत मंद गति ग्रह शनि का गहरा प्रभाव हो, तो जातक को घर का सुख जीवन के अंतिम पड़ाव में (अक्सर रिटायरमेंट के नजदीक) जाकर मिलता है। ऐसी स्थिति में जातक को आसानी से लोन नहीं मिलता या वह लंबे समय तक बचत करने के बाद ही भूमि खरीद पाता है।
यदि किसी जातक की जमीन पर अवैध कब्जा हो गया हो या बिल्डर के साथ पजेशन को लेकर कोर्ट में केस चल रहा हो, तो कुंडली का छठा भाव (मुकदमेबाजी) और दशम भाव सक्रिय भूमिका निभाते हैं:
विजय का योग: यदि कुंडली में षष्ठेश (छठे घर का स्वामी) कमजोर हो, और जातक का लग्नेश व चतुर्थेश उससे कहीं अधिक बलवान होकर शुभ स्थिति में हों, तो जातक लंबी कानूनी लड़ाई (Property Case) के बाद भी अंततः केस जीतकर अपनी संपत्ति वापस पा लेता है।
यदि आपका मकान बनते-बनते रुक गया है, प्रॉपर्टी विवाद में फंसी है या घर में सुख-शांति का अभाव है, तो निम्नलिखित उपचार (Remedies) संजीवनी का कार्य करते हैं:
क) ‘भूमिपुत्र’ मंगल देव की साधना (जमीन व निर्माण बाधा हेतु)
अंगारक स्तोत्र का पाठ: यदि कंस्ट्रक्शन में लगातार रुकावटें आ रही हों, तो प्रत्येक मंगलवार को लाल आसन पर बैठकर ‘अंगारक स्तोत्र’ या ‘ऋणमोचक मंगल स्तोत्र’ का पाठ करें।
हनुमान जी को चोला: मंगलवार के दिन हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाएं और शुद्ध घी का दीपक जलाकर सुंदरकांड का पाठ करें। इससे भूमि से जुड़े विवाद शांत होते हैं।
ख) चतुर्थेश (सुखेश) को बल देना (घरेलू सुख-शांति हेतु)
आपकी कुंडली में चौथे भाव का जो भी स्वामी (चतुर्थेश) बन रहा हो, उसके बीज मंत्र का नियमित रूप से जाप करें।
यदि चतुर्थेश ६, ८, १२वें भाव में जाकर कमजोर या पीड़ित हो गया हो, तो किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह से उसका अनुकूल रत्न धारण करें या उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करें।
ग) शनि देव व राहु की शांति (रुके हुए कंस्ट्रक्शन और धोखे से बचाव हेतु)
मजदूरों की सेवा: शनि देव लेबर के कारक हैं। निर्माण कार्य बिना बाधा के चलता रहे, इसके लिए शनिवार के दिन कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले मजदूरों को काले चने, इमरती या चाय-नाश्ता कराएं और उन्हें नगद दान दें।
राहु का उपाय: यदि प्रॉपर्टी में धोखाधड़ी या पेपरवर्क में गड़बड़ी की आशंका हो, तो बुधवार या शनिवार के दिन बहते जल में कोयला या जटा वाला नारियल प्रवाहित करें।
घ) नवग्रह वास्तु उपाय
नया प्लॉट या मकान लेते समय यह सुनिश्चित करें कि उसका दक्षिण-पश्चिम (South-West/नैऋत्य कोण) हिस्सा भारी और ऊंचा हो, जो जीवन में स्थायित्व देता है। निर्माण कार्य हमेशा उत्तर-पूर्व (North-East) से शुरू करवाकर दक्षिण-पश्चिम की ओर ले जाएं।