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भारत का प्राचीन जलविज्ञान-1

 वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में भूमिगत जल की खोज के वैज्ञानिक फार्मूले, वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही से भूगर्भीय जलान्वेषण

         

 

 

🔥प्राचीन काल के कुएं बावड़ियां आदि जो आज भी उपलब्ध हैं उनमें बारह महीने निरंतर रूप से शुद्ध और स्वादिष्ट जल पाए जाने का एक  कारण यह भी है कि ये कुएं या बावड़ियां हमारे पूर्वजों ने वराहमिहिर द्वारा अन्वेषित जलान्वेषण की पद्धतियों का अनुसरण करके बनाई हैं। वराहमिहिर का जलान्वेषण विज्ञान भूगर्भस्थ जल की प्राप्ति हेतु न केवल भारत अपितु विश्वभर में कहीं भी उपयोगी हो सकता है।🔥

 

मित्रो! जैसा मैने अपनी पिछली पोस्टों में बताया है कि भारतीय जलविज्ञान अन्तरिक्षगत मेघविज्ञान और वृष्टिविज्ञान के स्वरूप को समझे बिना अधूरा है। भारतीय जलवैज्ञानिक वराहमिहिर ने पृथिवी, समुद्र और अन्तरिक्ष तीनों क्षेत्रों के प्राकृतिक जलचक्र को संतुलित रखने के उद्देश्य से ही भूमिगत जलस्रोतों को खोजने और वहां कुएं, जलाशय आदि निर्माण करने वाली पर्यावरण मित्र जलसंग्रहण विधियों का भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुरूप निरूपण किया है। हमने पिछ्ली छह पोस्टों मेंअन्तरिक्षगत मेघविज्ञान, वृष्टिविज्ञान और वर्षा के पूर्वानुमानों से सम्बद्ध भारतीय जलविज्ञान के विविध पक्षों पर चर्चा की।अब हम इस लेखमाला के अंतर्गत  विशुद्ध भूमिगत जल विज्ञान के बारे में प्राचीन भारतीय जलविज्ञान के गौरवशाली ज्ञान विज्ञान और विश्वख्याति अर्जित करने वाले भारतीय जलविज्ञान के चिंतकों की मान्यताओं से अवगत कराएंगे। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है-

 

 

वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में भूमिगत जल की खोज के वैज्ञानिक फार्मूले और वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही से भूगर्भीय जलान्वेषण का जलविज्ञान

 

 वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ के ‘दकार्गल’ अध्याय में 86 प्रकार के वृक्षों, विविध प्रकार की वनस्पतियों, नाना प्रकार के जीव-जन्तुओं और अनेक तरह के शिलाखण्डों की निशानदेही करते हुए भूमिगत जलस्रोतों को खोजने के वैज्ञानिक फार्मूले बताए गए हैं। उदाहरण के लिए वराहमिहिर कहते हैं कि यदि जलविहीन प्रदेश में बेंत का वृक्ष दिखाई दे तो उस वृक्ष के पश्चिम दिशा में तीन हाथ पर डेढ पुरुष प्रमाण यानी साढे सात क्यूबिट्स गहराई तक खोदने पर जल प्राप्त होता है। खोदे गए गड्ढे में पीले रंग का मेंढक, पीले रंग की मिट्टी और परतदार पत्थर का निकलना इस जलप्राप्ति के पूर्व संकेत हैं। ये सब लक्षण यह भी प्रमाणित करते हैं कि उस भूखण्ड के गर्भ में पश्चिम दिशा की जलनाड़ी सक्रिय है –

“यदि वेतसोऽम्बुरहिते देशे हस्तैस्त्रिभिस्ततः पश्चात्।

 सार्धे पुरुषे तोयं वहति शिरा पश्चिमा तत्र।।

चिह्नमपि सार्धपुरुषे मण्डूकः पण्डुरोऽथ मृत्पीता।

पुटभेदकश्च तस्मिन् पाषाणो भवति तोयमधः।।”

                              – बृहत्संहिता, 54.6-7

 

जामुन के वृक्ष की पूर्व दिशा में यदि दीमक की बांबी (वल्मीक) दिखाई दे तो उसके समीप दक्षिण दिशा में दो पुरुष यानी दस क्यूबिट्स के माप का गड्ढा खोदने से स्वादिष्ट जल की प्राप्ति होती है। आधे पुरुष (ढाई क्यूबिट्स ) तक गहरा खोदने पर मछली, कबूतर के रंग का काला पत्थर और नीले रंग की मिट्टी मिलेगी। ये पदार्थ वहां भूमिगत जलप्राप्ति के पूर्व लक्षण हैं –

 

“जम्बूवृक्षस्य प्राग्वल्मीको यदि भवेत्समीपस्थः।

तस्माद्दक्षिणपार्श्वे सलिलं पुरुषद्वये स्वादु।।

अर्धपुरुषे च मत्स्यः पारावतसन्निभश्च पाषाणः।

मृद्भवति चात्र नीला दीर्घंकालं बहु च तोयम्।।”

                         – बृहत्संहिता, 54.9-10

 

वराहमिहिर का यह भी मत है कि जिस वृक्ष की शाखा नीचे की ओर झुकी हो और पीली पड़ गई हो तो उस शाखा के नीचे तीन पुरुष यानी 15 क्यूबिट्स खुदाई करने पर जल की प्राप्ति अवश्य होती है –

 

“वृक्षस्यैका शाखा यदि विनता

 भवति पाण्डुरा वा स्यात्।

 विज्ञातव्यं शाखातले

 जलं त्रिपुरुषं खात्वा।।”- बृहत्संहिता,54.55

 

भूमिगत जल की शिरा किस दिशा में सक्रिय है यह जानने के लिए भी वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में वृक्षों द्वारा की गई निशानदेही से जुड़े निम्नलिखित फार्मुले आज भी बहुत उपयोगी हैं –

 

 🔥1.आकगूलर के पास दीमक की बांबी (वल्मीक) हो तो बांबी के नीचे सवा तीन पुरुष (सवा सोलह क्यूबिट्स) खोदने पर पश्चिमवाहिनी शिरा निकलती है –

 

“अर्कोदुम्बरिकायां वल्मीको दृश्यते शिरा तस्मिन्।

पुरुषत्रये सपादे पश्चिमदिक्स्था वहति सा च।।”

                                  – बृहत्संहिता, 54.19

 

 🔥2.जलरहित क्षेत्र में कपिल वृक्ष से तीन हाथ पूर्व में दक्षिण शिरा बहती है –

 

“जलपरिहीने देशे वृक्षः कम्पिल्लको यदा दृश्यः।।

प्राच्यां हस्तत्रितये वहति शिरा दक्षिणा प्रथमम्।।”

                                    –बृहत्संहिता,54.21

 

 🔥3.बेल व गूलर के पेड़ जहां इकट्ठे हों तो उनके दक्षिण में तीन हाथ दूर तीन पुरुष (15 क्यूबिट्स )  नीचे जल होता है। और आधा पुरुष (ढाई क्यूबिट्स) खोदने पर काला मेंढक निकलता है –

 

“बिल्वोदुम्बरयोगे विहाय हस्तत्रयं तु याम्येन।

पुरुषैस्त्रिभिरम्बु भवेत् कृष्णोSर्धनरे च मण्डूकः।।”

                                   -बृहत्संहिता, 54.18

 

 🔥4.जहां पहले नीलकमल सी, फिर कबूतर वर्ण की मिट्टी दिखाई देती है। एक हाथ नीचे मछली निकलती है। उसमें चकोर जैसी दुर्गन्ध होती है तथा वहां पानी थोड़ा और खारा निकलता है –

 

“मृन्नीलोत्पलवर्णा कापोता चैव दृश्यते तस्मिन्।

हस्तेSजगन्धिमत्स्यो भवति पयोSल्पं च सक्षारम्।।”

                                     -बृहत्संहिता,54.22

 

🔥5.बहेड़े (विभीतक) के पेड़ की निशानदेही करते हुए वराहमिहिर का कथन है कि इसके आस पास ही कहीं दीमक की बांबी (वल्मीक) हो तो उस पेड़ के दो हाथ पूर्व में डेढ़ पुरुष(साढे सात क्यूबिट्स) नीचे जलशिरा होती है –

 

“आसन्नो वल्मीको दक्षिणपार्श्वे विभीतकस्य यदि।

अध्यर्धे तस्य शिरा पुरुषे ज्ञेया दिशि प्राच्याम्।।”

                                    -बृहत्संहिता,54.24

 

🔥6.बहेड़े पेड़ के पश्चिम में बांबी (वल्मीक) हो तो वृक्ष से एक हाथ उत्तर में साढ़े चार पुरुष(साढे बाइस क्यूबिट्स) नीचे जलशिरा होती है –

 

“तस्यैव पश्चिमायां दिशि वल्मीको यदा भवेद्धस्ते।

तत्रोदग्भवति शिरा चतुर्भिरर्धाधिकैः पुरुषैः।।”

                                      -बृहत्संहिता,54.25

 

ग्लोबलवार्मिंग के युग में आज बहुत उपयोगी है वराहमिहिर का पर्यावरणनिष्ठ जलान्वेषण विज्ञान

 

 

प्राचीन काल के जो कुएं बावड़ियां आदि आज उपलब्ध हैं उनमें बारह महीने निरंतर रूप से शुद्ध और स्वादिष्ट जल पाए जाने का एक  कारण यह भी है कि ये कुएं या बावड़ियां हमारे पूर्वजों ने वराहमिहिर द्वारा अन्वेषित जलान्वेषण की पद्धतियों का अनुसरण करके बनाई हैं। परन्तु आज हम उनकी उपयोगिता की उपेक्षा करके पानी-पानी के लिए तरस रहे हैं। पर्याप्त वर्षा के अभाव तथा इनके निकस्थ वृक्षों को काट देने से भी इन जलाशयों का भूमिगत जल रिचार्ज होना बंद हो गया है जिसकी वजह से इनमें से कई पुराने वापी-कूप जलविहीन हो गए हैं। इधर अतीत में अखण्ड स्रोत के रूप में बहने वाली नदियां गाड़ गधेरे तालाब आदि भी बहुत अधिक दोहन हो जाने से वे सूखते गये। अधिक गहाराई में आज जो जलस्रोत बचे हुए हैं उनमें भी आज नलकूपों द्वारा भारी मात्रा में दोहन हो जाने से भूगर्भस्थ जल का अभाव होता जा रहा है।

 

इस प्रकार विज्ञान और टेक्नॉलॉजी का दुरुपयोग करते हुए पारंपरिक जलसंसाधनों की उपेक्षा और उनका निर्ममता से दोहन करने के कारण भूमिगत जलस्तर गिरता गया है और गिरते जलस्तर के कारण पारम्परिक वृक्ष भी सूखते गये। कृषि-उपयोग या बढ़ती बस्तियों के लिए तथा लकड़ी के व्यवसायियों ने इस बेरहमी से वृक्षों की कटाई की कि वे पारम्परिक वृक्ष लुप्त होते चले गये। परिणामतः जिन वनस्पतियों के आधार पर परम्परागत जलविज्ञान जल-संस्थानों की निशान देही करता रहा है, पहले तो वे वृक्ष और वनस्पतियां ही नहीं बचीं जिनसे जलबोध हो सकता। तब भी अभी भी जहाँ जो वृक्ष-वनस्पतियां एवं मिट्टी, पत्थर आदि बचे हैं वहां वराहमिहिर के जलान्वेषण विज्ञान के द्वारा जलस्थिति का ज्ञान हो सकता है। वैसे भी ये लक्षण ऐसे हैं जो न केवल भारत अपितु विश्वभर में कहीं भी उपयोगी हो सकते हैं और इन लक्षणों के आधार पर विश्व में कहीं भी भूगर्भस्थ जल की प्राप्ति के प्रयास किये जा सकते हैं।

 

यह विकासवादियों का जलविज्ञान नहीं

 

वस्तुतः वराहमिहिर का जलविज्ञान प्राकृतिक संसाधनों का उपभोक्तावाद की भावना से संदोहन करने वाले विकासवादियों का जलविज्ञान नहीं है, बल्कि यह विज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शान्ति की कामना करने वाले प्रकृति के उपासकों का जलविज्ञान है।जलचर,भूमिचर और नभश्चर सभी जीवधारियों का कल्याण चाहने की कामना से ही वराहमिहिर ने रेगिस्तान जैसे निर्जल प्रदेशों में भूमिगत जलस्रोतों को खोजने के नए नए उपाय बताए।परम्परागत शैली के कूप, तडाग, सरोवर आदि जलाशयों के कारण भारत का प्रत्येक गांव और नगर जल की आपूर्ति की दृष्टि से यदि आत्मनिर्भर बन सका तो उसका श्रेय वराहमिहिर के पर्यावरणवादी जलविज्ञान और कौटिलीय अर्थशास्त्र की लोकाराधक जलप्रबन्धन व्यवस्था को ही दिया जा सकता है।

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