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भारतीय मानसून विज्ञान

🌲भारतीय जलवैज्ञानिक वराहमिहिर और उनका मानसून वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ सिद्धांत🌲

 

बादलों में गर्भाधान के कारण होती है वर्षा, बादलों के ‘वृष्टिगर्भ’ की अवधि है 195 दिन, मकरसंक्रान्ति और छठ गर्भधारण के पर्व।

 

   💙 भारतीय मानसून विज्ञान-5 💙

 

🎁मानवीय सृष्टिविज्ञान के संदर्भ में जैसे स्त्री में गर्भधारण होने के पश्चात् नौ माह के उपरांत बच्चे का प्रसव होता है उसी प्रकार सूर्य द्वारा मेघों में वृष्टिगर्भ की अवधारणा का सिद्धांत भी सर्वप्रथम वेदों में आविष्कृत हुआ है। मानसूनी वर्षा के बारे में वराहमिहिर की मान्यता है कि बादलों के ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करने की अवधि साढ़े छह महीने यानी 195 दिनों की होती है। बादल चन्द्रमा के जिस नक्षत्र में गर्भ धारण करते हैं ठीक 195 दिनों के बाद उसी नक्षत्र में वर्षा के रूप में बादलों का प्रसव होता है।

 

💠विद्वद्गोष्ठी में चर्चित है मेरा यह शोधलेख💠

(इस लेखमाला का मेरा यह प्रस्तुत शोधलेख 7 फरवरी,2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में तथा 12 मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, हरिद्वार द्वारा ‘आई आई टी’ रुडकी में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अध्येता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚जलसंरक्षण और जलप्रबंधन’ का तथ्यात्मक सार है। )

 

वैदिक संहिताओं के काल में ‘सिन्धुद्वीप’ जैसे वैदिक कालीन मंत्रद्रष्टा ऋषियों के द्वारा जलविज्ञान और जलप्रबन्धन सम्बन्धी मूल अवधारणाओं का आविष्कार कर लिए जाने के बाद सिन्धु घाटी की सभ्यता के पुरातात्त्विक अवशेषों से भी यह पुष्ट हो जाता है कि जल संग्रहण और वाटर हारवेस्टिंग प्रणालियों का जल प्रबंधन की दृष्टि से सदुपयोग सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। वैदिक कालीन जलविज्ञान सम्बन्धी ज्ञान साधना का उपयोग करते हुए कौटिल्य ने एक महान अर्थशास्त्री और जलप्रबंधक के रूप में राज्य के जल संसाधनों को कृषि की उत्पादकता से जोड़कर घोर अकाल और सूखे जैसे संकटकाल से निपटने के लिए अनेक शासकीय उपाय भी किए। भारतीय जलविज्ञान की इसी परंपरागत पृष्ठभूमि में छठी शताब्दी ई. में एक महान खगोलशास्त्री तथा जल वैज्ञानिक वराहमिहिर का आविर्भाव हुआ।

 

वराहमिहिर ने अपने युग में प्रचलित जलविज्ञान की मान्यताओं का संग्रहण करते हुए अपने ग्रन्थ ‘बृहत्संहिता’ में जलविज्ञान का सुव्यवस्थित विवेचन दो भागों में विभाजित करके किया। इनमें से एक प्रकार का जल अन्तरिक्षगत जल है जो समुद्र आदि से वाष्पीभूत होकर आकाश में बादलों के रूप में संचयित होता है और दूसरे प्रकार का जल बादलों से बरस कर भूमिगत जल बन जाता है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से अन्तरिक्षगत जल का विवेचन ‘मौसमविज्ञान’ के अन्तर्गत किया जाता है तो भूमिगत जल का विवेचन ‘जलविज्ञान’ के धरातल पर होता है। वराहमिहिर ने भी आधुनिक विज्ञान के समान जल प्राप्ति के इन  दो आयामों का विवेचन दो अलग अलग शाखाओं के अन्तर्गत किया है। बृहत्संहिता के 21वें‚ 22वें और 23वें अध्यायों में वराहमिहिर ने मेघों से प्राप्त होने वाले अन्तरिक्ष जल की चर्चा की है और 54वें अध्याय में ‘दकार्गलम्’के नाम से भूमिगत जल का शास्त्रीय विवेचन किया है।

🙅वराहमिहिर का जलवैज्ञानिक सिद्धान्त🙅

 वराहमिहिर का जलविज्ञान एकांगी रूप से केवल भूस्तरीय जल अथवा भूगर्भीय जल पर आधारित सैद्धान्तिक विज्ञान ही नहीं बल्कि वर्षाकालीन अन्तरिक्षगत मेघों के पर्यवेक्षण और मौसमविज्ञान सम्बन्धी जलवायु परीक्षण पर आधारित प्रायोगिक विज्ञान भी है। वराहमिहिर का स्पष्ट कथन है कि बलदेव आदि प्राचीन ऋतुवैज्ञानिकों के मतानुसार मौसम वैज्ञानिकों द्वारा आगामी मानसूनों के आने की भविष्यवाणी ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद होने वाली ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति तथा जलवायु परीक्षण के आधार पर की जानी चाहिए-

“मेघोद्भवं प्रथममेव मया प्रदिष्टं

ज्येष्ठामतीत्य बलदेवमतादि दृष्ट्वा।

भौमं दकार्गलमिदं कथितं द्वितीयं

सम्यग्वराहमिहिरेण मुनिप्रसादात्।।”

              -बृहत्संहिता‚ 54.125

 

💘 वराहमिहिर के अनुसार ‘वृष्टिगर्भ’ सिद्धान्त💘

 वर्षा से प्राप्त होने वाले अन्तरिक्ष जल को ही वराहमिहिर ने भूस्तरीय तथा भूगर्भीय जल का मूल कारण माना है। इसलिए एक जलवैज्ञानिक के रूप में वराहमिहिर अन्तरिक्ष जल की तीन अवस्थाओं का विवेचन करते हैं। ये तीन अवस्थाएं हैं-

 🔥1- मेघों का गर्भलक्षण‚

 🔥2- मेघों का गर्भधारण

 🔥3- मेघों का प्रवर्षण।

 

 मानसूनी वर्षा के बारे में वराहमिहिर की मान्यता है कि बादलों के ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करने की अवधि साढ़े छह महीने यानी 195 दिनों की होती है। बादल चन्द्रमा के जिस नक्षत्र में गर्भ धारण करते हैं ठीक 195 दिनों के बाद उसी नक्षत्र में वर्षा के रूप में बादलों का प्रसव होता है –

“यन्नक्षत्रमुपगते गर्भश्चन्द्रे भवेत् स चन्द्रवशात्।

 पंचनवते दिनशते तत्रैव प्रसवमायाति।।”

                           -बृहत्संहिता‚ 21-7

वराहमिहिर का मानना है कि कृष्णपक्ष में दिखाई देने वाला बादलों का गर्भ शुक्ल पक्ष में‚ दिन का गर्भ रात्रि में और रात्रि का गर्भ दिन में वर्षा उत्पन्न करता है (बृहत्संहिता‚ 21-8)। किन्तु समय पर वर्षा न होना तथा बादलों का फटना इस स्थिति का द्योतक है कि बादलों का समय से पहले ही गर्भस्राव हो गया है। वराहमिहिर के अनुसार यदि बादलों के गर्भ धारण के बाद आंधी‚ चक्रवाती तूफान, उल्कापात, दिग्दाह‚ भूकम्प आदि प्राकृतिक उत्पात के लक्षण प्रकट हों तो निश्चित कालावधि में मानसूनी वर्षा की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए तथा यह मान लेना चाहिए कि बादलों का गर्भस्राव हो चुका है –

“गर्भोपघातलिङ्गान्युल्काशनिपांसुपातदिग्दाहाः।

क्षितिकम्पस्वपुरकीलककेतुग्रहयुद्धनिर्घाताः।।”

         – बृहत्संहिता‚ 21-25

                                        

मानवीय सृष्टिविज्ञान के संदर्भ में जैसे स्त्री में गर्भधारण होने के पश्चात् नौ माह के उपरांत बच्चे का प्रसव होता है उसी प्रकार सूर्य द्वारा मेघों में वृष्टिका गर्भ धारण होने के लगभग 195 दिनों के उपरांत पर्जन्यवृष्टि होती है। तब तक वृष्टिगर्भ की अन्तरिक्ष में पालन पोषण और वृद्धि होती रहती है । मानवीय गर्भ का जिस प्रकार प्रसव काल सुनिश्चित है  उसी प्रकार  आचार्य वराहमिहिर ने वृष्टिगर्भ से वर्षा के प्रसव का काल 195 दिन के बाद निर्धारित किया है। अर्थात् वराहमिहिर के अनुसार वृष्टिगर्भ धारण होने के आरंभ से वृष्टिप्रसव होने तक की प्रक्रिया एक सजीव प्रकृति वैज्ञानिक प्रक्रिया है ।

 

🔥’वृष्टिगर्भ’:आर्यों का वैज्ञानिक आविष्कार🔥

वस्तुत: बहुत कम लोगों को ही मालूम होगा कि भातीय ऋतुविज्ञान में ‘वृष्टिगर्भ’ की अवधारणा सूर्य के संवत्सर चक्र से जुड़ी एक वैज्ञानिक अवधारणा है। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की भरत संज्ञा होने के कारण ही इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया इसलिए सूर्य संक्रान्ति के विविध पर्वों मकर संक्रान्ति और छठ पर्व के साथ वृष्टि विज्ञान के भी गूढ़ सिद्धान्त जुड़े हुए हैं। कृषि प्रधान भारतवासियों के लिए वर्षा उनके जीविकोपार्जन का मुख्य आधार है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रक्रिया सूर्य के द्वारा जल में प्रवेश करने से सम्पन्न होती है। यह भारतवंशी सूर्योपासक आर्यों का ही वैज्ञानिक आविष्कार है जिसके अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन से ही आगामी साढ़े छह महीनों यानी 195 दिनों तक तक मेघ सूर्य के वाष्पीकरण की प्रक्रिया से ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करते हैं तथा वर्षा ऋतु में दक्षिण पश्चिमी मानसूनी वर्षा इसी सफल ‘वृष्टिगर्भ’ का परिणाम है।

 

   🔥मकर संक्रान्ति और ‘वृष्टिगर्भ’🔥

हमें अपने देश के राष्ट्रीय लोक पर्वों का आभारी रहना चाहिए कि ये पर्व धार्मिक महोत्सव होने के साथ साथ पर्यावरण संचेतना के प्रति भी लोगों को जागरूक रखते हैं। वैज्ञानिक धरातल पर मकर राशि में सूर्य के प्रवेश होने का तात्पर्य है वाष्पीकरण की सतत प्रक्रिया द्वारा मानसूनों का गर्भाधान होना, जिसे भारतीय ऋतुवैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं। मकर संक्रान्ति की प्रभात वेला में भारतवर्ष का कृषक वर्ग इसी वृष्टिकारक सूर्य को ‘वृष्टिगर्भ’ के सफल निष्पादन हेतु प्रणाम करता है तथा आने वाले समय में सुख-समृद्धि और फसल के अनुकूल मानसूनी वर्षा की कामना करता है।

 

 🔥छठ पर्व मेघों के गर्भधारण का पर्व🔥

जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के इस दौर में छठ पर्व भी महज एक धार्मिक आस्था का पर्व नहीं रह जाता है बल्कि भूमिगत जलस्तर को सुधारने हेतु परम्परागत जल-स्रोतों जैसे तालाब, सरोवर, नदियों आदि जलाशयों के संरक्षण, संवर्धन और उनकी साफ-सफाई का पर्यावरण वैज्ञानिक अभियान भी है ताकि जल संचयन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’ जैसे परम्परागत वृष्टिविज्ञान और जलविज्ञान को पुनर्जीवित किया जा सके।कार्तिक मास में छठ पूजा के बाद देव प्रबोधिनी एकादशी से पुरुष और प्रकृति के मिलन की ऋतु आती है। जब सूर्य ‘हस्तिशुण्डविधि’ से तालाब,सरोवर आदि प्राकृतिक जलाशयों से वाष्पीकरण करते हैं तथा अन्तरिक्ष में मेघों का गर्भधारण होता है। यही मेघ चान्द्रमास के बारह पक्षों यानी छह महीनों के बाद चातुर्मास में मानसूनों की वर्षा द्वारा धरती को धन-धान्य से समृद्ध करते हैं। छठ पूजा के अवसर पर मिट्टी के हाथी भी बनाए जाते हैं जो प्रतीक हैं हाथी के सूंड के आकार के जल स्तम्भों यानी ‘हस्तिशुण्डविधि’ का जिनसे मानसून बनने की प्रक्रिया सक्रिय रहती है।पूजा में गन्ने के बारह पेड़ उसके नीचे मिट्टी का एक घड़ा और छह दिए जलाकर रखे जाते हैं ताकि यथाकाल छह महीने का वृष्टिगर्भ सफल हो सके। छठ पर्व के अवसर पर भारतवर्ष का कृषक वर्ग प्रतिवर्ष अस्त होते और उगते वृष्टिकारक सूर्य से यही कामना करता है कि नियत समय पर मानसूनों की वर्षा हो ताकि उसका राष्ट्र खुशहाल हो सके –

‘निकामे निकामे वर्षन्तु मेघाः’

प्राचीन भारत में मेघविज्ञान

भारत की जल संस्कृति –  भारतीय परंपरा जल में ‘नारायण’ का वास मानती है

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