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आदि शंकराचार्य -भाग-4

गतांक से आगे-

चार मठों की स्थापना-

वैसे तो आदि शंकराचार्य ने अनेक महान कार्य किए किन्तु उनमें से जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है वो उन चार मठों की स्थापना करना है जिसने वास्तव में पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया।हिन्दू धर्म का समस्त संत समाज इन्ही चारो मठों के अधीन है।जिसे इन चारो मठों में से किसी एक से भी स्वीकृति मिलती है,केवल वही संत माना जा सकता है।

जब शंकराचार्य ने अपनी यात्रा आरम्भ की तो उनके साथ उनके चार प्रमुख शिष्य थे-तोटकाचार्य,हस्तामलक,सुरेश्वर एवं पद्मपाद।ऐसी मान्यता है कि शंकराचार्य ने जिन भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था ये चारों उनमें सर्वश्रेष्ठ थे।ये चारो शिष्य चार अलग वर्णों से थे।इन्हीं चारो शिष्यों को आदि शंकराचार्य ने इन चार मठों का प्रथम अधिपति बनाया और उन्हें शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की।इसी कारण आज भी इन मठों के मठाधीशों को “शंकराचार्य” के नाम से ही जाना जाता है। 

आइये अब उन चार मठों और उनके अधिपति शिष्यों के विषय में संक्षेप में जानें। 

1.ज्योतिर्मठ पीठ-दिशा-उत्तर,स्थान-जोशीमठ (उत्तराखंड), तीर्थ-बद्रीनाथ,स्थापना-2645 युधिष्ठिर सम्वत

प्रथम शंकराचार्य-तोटकाचार्य – इनका वास्तविक नाम गिरी था जो सदैव शंकराचार्य की सेवा में रत रहते थे।इस कारण वेदाभ्यास में वे कच्चे थे।एक बार अन्य शिष्यों द्वारा परिहास उड़ाने के कारण शंकराचार्य ने इन्हे मानसिक ज्ञान दिया।तब इन्होने टोटक वृत्त की रचना की जिससे इनका नाम तोटकाचार्य पड़ गया।इन्होने केरल के त्रिशूर में “वदक्के मठ” की स्थापना की।

वर्तमान शंकराचार्य-स्वामी माधवाश्रम (44वें)

महावाक्य-अयंआत्मानं ब्रह्म।वेद-अथर्ववेद।संप्रदाय-नन्दवल।

2.कलिका पीठ-दिशा-पश्चिम,स्थान-द्वारिका (गुजरात),तीर्थ- द्वारिका प्रभास तीर्थ,स्थापना-2648 युधिष्ठिर सम्वत

प्रथम शंकराचार्य-हस्तामलक-इनसे शंकराचार्य कोल्लूर के श्रीवल्ली ग्राम में मिले।इनके पिता का नाम भास्कर था। उस गांव में 2000 परिवार थे और सभी विद्वान और वेद अग्निहोत्र करने वाले।एक दिन भास्कर अपने पुत्र को लेकर शंकराचार्य के पास आए और उनसे कहा कि उनका पुत्र मूर्ख है,कृपया उसे कुछ शिक्षा दें।तब शंकराचार्य ने उस बालक से पूछा कि वो कौन है?इस पर वो बालक,जिसके हाथ में “आमलक” (आंवला) था,उसने अद्वैत सिद्धांत के के 12 श्लोक सुना दिए। तब शंकराचार्य ने उसे अपना शिष्य स्वीकारा और उसका नाम हस्तामलक (हाथ में आंवला रखने वाला) रख दिया।इन्होंने त्रिशूर में “इडयिल मठ” की स्थापना की।

वर्तमान शंकराचार्य-स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (79वें)

महावाक्य-तत्त्वमसि।वेद-सामवेद।संप्रदाय-कितवल।

3.शारदा पीठ-दिशा-दक्षिण।स्थान-श्रृंगेरी,चिकमंगलूर।तीर्थ- रामेश्वरम।स्थापना-2648युधिष्ठिर सम्वत।

प्रथम शंकराचार्य-सुरेश्वर-इन्हीं का नाम पहले मण्डन मिश्र था जिन्हे शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में परास्त किया था।इन्होंने त्रिशूर में “नाडूविल मठ” की स्थापना की।

वर्तमान शंकराचार्य-स्वामी भारती कृष्णतीर्थ (36वें)

महावाक्य-अहं ब्रह्मास्मि।वेद-यजुर्वेद।संप्रदाय-भूरिवल।

4.गोवर्धन पीठ-दिशा-पूर्व,स्थान-पुरी (उड़ीसा)।तीर्थ-पुरी जगन्नाथ।स्थापना-2655 युधिष्ठिर सम्वत।

प्रथम शंकराचार्य: पद्मपाद – ये शंकराचार्य के प्रिय शिष्य थे जिन्होंने अद्वैतवाद में गहन शोध किये। इनकी और मण्डन मिश्र की घनिष्ठ मित्रता थी। आदि शंकराचार्य की आज्ञा पर इन्होने ब्रह्मसूत्रभाष्य पर एक शोध लिखा था किन्तु उनके चाचा ने ईर्ष्यावश इसे जला दिया। इन्होने गुरु-शिष्य परंपरा का प्रचार किया। इन्होने त्रिशूर में “थेक्के मठ” की स्थापना की।

वर्तमान शंकराचार्य-स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (145वें)

महावाक्य-प्रज्ञानं ब्रह्म।वेद-ऋग्वेद।संप्रदाय-भोगवल।

जैसे-जैसे समय बीता,कुछ शंकराचार्य के शिष्यों ने स्वयं अपने मठ बना लिए तथा स्वयं को शंकराचार्य कहने लगे।उनमें से सबसे प्रसिद्ध तमिलनाडु स्थिति कांचीपीठ है।किन्तु केवल इन्ही चार पीठों के मठाधीशों को शंकराचार्य की उपाधि रखने का अधिकार है और अन्य किसी भी मठ को इनसे मान्यता प्राप्त नहीं हुई है।इन्ही मठों में से शृंगेरी मठ के मठाधीश शंकराचार्य को ही आज के लोग भूल से आदि शंकाचार्य समझ लेते हैं।

इन चार पीठों के अतिरिक्त आदि शंकराचार्य ने ही दसनामी सम्प्रदाय की स्थापना की थी।चार वैदिक ऋषि इन सम्प्रदायों के इष्ट के रूप में माने जाते हैं।

गिरि-ऋषि – भृगु,पर्वत-ऋषि – भृगु,सागर-ऋषि-भृगु,पुरी-ऋषि -शांडिल्य,भारती-ऋषि-शांडिल्य,सरस्वती-ऋषि-शांडिल्य,वन- ऋषि-कश्यप,अरण्य-ऋषि-कश्यप,तीर्थ-ऋषि-अवगत

आश्रम-ऋषि-अवगत

आदि शंकराचार्य के जीवन की प्रमुख घटनाएं-

जन्म-2631 युधिष्ठिर संवत वैशाख शुक्ल पंचमी

उपनयन संस्कार-2639 युधिष्ठिर संवत,चैत्र शुक्ल नवमी

संन्यास ग्रहण-2639 युधिष्ठिर संवत,कार्तिक शुक्ल एकादशी

गुरु श्री गोविन्द भगवत्पाद से उपदेश-2640 युधिष्ठिर संवत, फाल्गुन शुक्ल द्वितीय

भाष्य रचना-2640 युधिष्ठिर संवत,ज्येष्ठ कृष्ण पूर्णिमा तक

मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ-2647 युधिष्ठिर संवत,मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीय

मंडन मिश्र की पराजय-2648 युधिष्ठिर संवत, चैत्र शुक्ल चतुर्थी (तीन महीने सत्रह दिन तक शास्त्रार्थ चला।)

मंडन मिश्र की पत्नी भारती द्वारा काम कला सम्बन्धी प्रश्न- 2648 युधिष्ठिर संवत,चैत्र शुक्ल षष्ठी

परकाया प्रवेश-2648युधिष्ठिर संवत, चैत्र शुक्ल अष्टमी (छह महीने बीस दिन परकाया में रहे।)

पुनः अपने शरीर में प्रवेश-2648 युधिष्ठिर संवत, कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी

भारती की पराजय-2648 युधिष्ठिर संवत,कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा

शारदा मठ का निर्माण-2648 युधिष्ठिर संवत, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

शृंगेरी मठ का निर्माण-2648 युधिष्ठिर संवत, कार्तिक शुक्ल नवमी

मंडन मिश्र को सुरेश्वराचार्य की उपाधि-2649 युधिष्ठिर संवत, चैत्र शुक्ल नवमी

सुरेश्वराचार्य का शारदा पीठ का अधिपति बनना-2649 युधिष्ठिर संवत, मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी

तोटकाचार्य का संन्यास-2653 युधिष्ठिर संवत,श्रावण शुक्ल सप्तमी

हस्तामलकाचार्य का संन्यास-2653युधिष्ठिर संवत, आषाढ शुक्ल एकादशी

गोवर्धन मठ का निर्माण एवं पद्मपादाचार्य का अभिषेक- 2654 युधिष्ठिर संवत,वैशाख शुक्ल दशमी

निर्वाण-2663 युधिष्ठिर संवत,कार्तिक पूर्णिमा

प्रमुख रचनाएं-1.अष्टोत्तरसहस्रनामावलिः,  2.उपदेशसहस्री,

3.चर्पटपंजरिकास्तोत्रम्‌,4.तत्त्वविवेकाख्यम् 5.दत्तात्रेयस्तोत्रम्‌

6.द्वादशपंजरिकास्तोत्रम्‌,7.पंचदशी[1.कूटस्थदीप 2.चित्रदीप

3.तत्त्वविवेक,4.तृप्तिदीप,5.द्वैतविवेक,6.ध्यानदीप,7.नाटक दीप,8.पंचकोशविवेक9.पंचमहाभूतविवेक10.पंचकोशविवेक

11.ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्द12.ब्रह्मानन्दे आत्मानन्द13.ब्रह्मानन्दे योगानन्द,14.महावाक्यविवेक15.विद्यानन्द 16.विषयानन्द]

8.परापूजास्तोत्रम्‌9.भवान्यष्टकम्‌ 10.लघुवाक्यवृत्ती11.भाष्य 12.विवेकचूडामणि13.प्रपंचसार14.सर्ववेदान्तसिद्धान्तसार संग्रह 15.साधनपंचकम

भाष्य-

[1.अध्यात्म पटल भाष्य 2.ईशोपनिषद भाष्य3.ऐतरोपनिषद भाष्य 4.कठोपनिषद भाष्य 5.केनोपनिषद भाष्य

6.छांदोग्योपनिषद भाष्य7.तैत्तिरीयोपनिषद भाष्य 8.नृसिंह पूर्वतपन्युपनिषद भाष्य 9.प्रश्नोपनिषद भाष्य10.ब्रह्मसूत्र भाष्य11.बृहदारण्यकोपनिषद भाष्य 12.भगवद्गीता भाष्य

13.ललिता त्रिशती भाष्य 14.मंडूकोपनिषद कारिका भाष्य

15.हस्तामलकीय भाष्य16.मुंडकोपनिषद भाष्य

17.विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र भाष्य 18.सनत्‌सुजातीय भाष्य]

16.अद्वैत अनुभूति17.अद्वैत पंचकम्‌ 18.अनात्मा श्रीविगर्हण

19.अपरोक्षानुभूति 20 उपदेश पंचकम्‌ किंवा साधन पंचकम्‌

21.एकश्लोकी 22.कौपीनपंचकम्‌ 23.जीवनमुक्त आनंदलहरी 24.तत्त्वोपदेश 25.धन्याष्टकम् 26.निर्वाण मंजरी

27.निर्वाणशतकम्‌ 28.पंचीकरणम्‌ 29.प्रबोध सुधाकर

30.प्रश्नोत्तर रत्‍नमालिका 31.प्रौढ अनुभूति 32.यति पंचकम्‌

33.योग तरावली 34.वाक्यवृत्ति35.शतश्लोकी 36.सदाचार अनुसंधानम्‌37.साधन पंचकम्‌ किंवा उपदेश पंचकम्

38.स्वरूपानुसंधान अष्टकम्‌ 39.स्वात्म निरूपणम्‌

40.स्वात्मप्रकाशिका 41.गणेश स्तुति –

1.गणेश पंचरत्‍नम्‌ 2.गणेश भुजांगम्‌

42.शिव स्तुति-

1.कालभैरवाष्टक 2.दशश्लोकी स्तुति 3.दक्षिणमूर्ति अष्टकम्‌

4.दक्षिणमूर्ति स्तोत्रम्‌ 5.दक्षिणमूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम्‌

6.मृत्युंजय मानसिक पूजा (7) वेदसार शिव स्तोत्रम्‌ 8.शिव अपराधक्षमापन स्तोत्रम् 9.शिव आनंदलहरी10.शिव भुजांगम्‌

11.शिव केशादिपादान्तवर्णन स्तोत्रम् 12.शिव नामावलि अष्टकम्‌ 13.शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्‌14.शिव पंचाक्षरा नक्षत्रमालास्तोत्रम्‌15.शिव पादादिकेशान्तवर्णनस्तोत्रम्

16.शिव मानस पूजा 17.सुवर्णमाला स्तुति

43.शक्ति स्तुति-

1.अन्‍नपूर्णा अष्टकम्‌ 2.आनंदलहरी 3.कनकधारा स्तोत्रम्‌

4.कल्याण वृष्टिस्तव5.गौरी दशकम्‌ 6.त्रिपुरसुंदरी अष्टकम्‌

7.त्रिपुरसुंदरी मानस पूजा 8.त्रिपुरसुंदरी वेद ?

आदि शंकराचार्य – भाग -१

आदि शंकराचार्य | भाग -2 | शंकरो शंकर: साक्षात्’

आदि शंकराचार्य -भाग-3

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