
नृत्य- शब्द का अर्थ पूर्ण प्रस्तुति
और भाव की अभिव्यक्ति का सुंदर सृजन है। यह भी
कहा है :
*अन्यद्भावाश्रयं नृत्यं नृत्तं ताललयाश्रितम्।।*
( नृत्य का आधार तो भाव ही है, ताल और लय पर जो पैर थिरकते हैं, वह तो नृत्त है)। भारतीय मनीषा ने नृत्य के सम्पूर्ण शास्त्र का विकास किया है और संसार को ऐसा सुंदर उपहार दिया जिसका अपना विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नृशास्त्र और अपना राजनीतिक शास्त्र है। यह ऋग्वेद से लेकर नाट्यवेद तक का अभिन्न अंग है।
हम नृत्य को केवल चक्कर लेना भर समझते हैं तो समझना
चाहिए कि हमने नृत्य को बिल्कुल नहीं समझा।
समरांगण सूत्रधार का अंतिम अध्याय पांडुलिपियों में अधूरा मिला, अपराजितपृच्छा में भी नृत्य सूत्र अधूरा था, अशोकमल्ल का नृत्य अध्याय अधूरा, अभिनय दर्पण का पाठ खंडित और नृत्तसंग्रह भी आधा अधूरा… हमें पूरा करना था। इस विषय को अनेकविध जानने का उपाय था *विष्णुधर्मोत्तर पुराण* का नृत्तसूत्र,
महाराणा कुम्भा कृत नृत्य *रत्नकोश* और *मानसोल्लास* की चतुर्थ विंशति,
पुंडरिक विट्ठल का *नर्तन निर्णय,*
जॉय सेनापति की *नृत्य रत्नावली*
और भरताचार्य का *नाट्यशास्त्र*… भारत की यह विरासत जनजातियों से लेकर संभ्रांत समाज तक बनी रही है।
*परदेसी चश्मा पहने हुए…कोई बता सकता है किसी और सभ्यता और देश में नृत्य पर इतनी अगणित ग्रंथों की श्रृंखला ??…हमे बस थिरकते , दिल की धड़कनों को तेज करने वाला संगीत, और वीभत्स नृत्य चाहिए…हम तो बेशर्मी की हदे पार कर दी …जब झण्डू बाम , और झुकेगा नहीं साला पर छोटे बच्चे तारीफ पाते हैं.. चुलूलु भर पानी में डूब मरना क्या होता है….ये नहीं समझेंगे*
एक भारत में प्रादेशिक नृत्यों के जितने रूप हैं, उतने पूरी दुनिया के मिलाकर नहीं!
*गरबा*
गुजरात का गरबा #गर्भदीप शब्द से निकला है, इस गरबा नृत्य में छिद्र युक्त कच्चे मिट्टी के घड़े के बीच दीपक रखा होता है। #गरबा ने अपने नाम से नृत्य के रूप में वैश्विक पहचान स्थापित की है। नवरात्रि पर्व आते ही देश के हर प्रांत में गरबा का रंग जम जाता है।
नवरात्रि में पश्चिमी भारत के इस छोर पर गरबा घूमने लगता है तो पूर्वी भारत में बंगाल का नवरात्रि नृत्य #धुनुची होता है और मिथिला (बिहार) में नवरात्रि पर्व का नृत्य *#झिझिया* होता है, लेकिन ये नृत्य लोकस्मृति से गुम हो रहा हैं।
✍️इसी तरह नवरात्रि में अन्य प्रांतों में कौन कौन से नृत्य होते हैं?
ये कहानी जादू टोने और तंत्र की है। बिलकुल वैसी ही जैसी *हरी कुम्हार* -मेरा मतलब हैरी पॉटर की होती है – जिसके बारे में कहते तो हैं कि ये बच्चों की कहानी है, लेकिन पढ़ी-देखी सभी ने है…फिल्म देखना हो तो सब के पास समय है,
ग्रंथ पढ़ना तो हम रिटायरमेंट का काम समझते हैं। खैर भैंस के आगे कौन कितना बिन बजाए…… भैंस नृत्य थोड़ा न करेगी…..चलो अब आप को नाच थोड़े न करना है…चलना है कहानी की और….
मिथिलांचल की इस कहानी में चित्रसेन नाम के एक राजा होते हैं। राजा की कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने भतीजे बलरूचि को राजा बनाने का विचार किया हुआ था। राजा की एक रानी, जो कि राजा से आयु में बहुत छोटी थी, जादू-टोने , तंत्र में माहिर थी। इस रानी को बलरूचि पसंद था, मगर बलरूचि रानी पर कैसे आसक्त होता? उसके मना करने से क्रुद्ध रानी ने जादू टोने से स्वयं को बीमार दर्शाया। वैद्य आये, तरह-तरह की दवाएं दी गईं, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
सब परेशान हो ही रहे थे कि रानी ने बताया कि अगर उसे बलरूचि के रक्त से स्नान करवाया जाये, तभी वो ठीक हो सकती है। राजा के लिए ये कठिन स्थिति थी लेकिन उसने अपने सैनिकों को बलरूचि को वन में ले जाकर मार डालने और उसका रक्त ले आने का आदेश दे दिया। सैनिक बलरूचि को ले तो गए, लेकिन अबतक अगले राजा के रूप में काम करते, बलरूचि की जो छवि राज्य में थी, वो बड़े भले और अच्छे शासक की थी।
सैनिकों ने उसे मारा नहीं,उन्होंने सत्य का पक्ष लिया…*हम तो रिश्ते निभाने असत्य और अधर्म का भी साथ देते है…क्या ख्याल है*
बल्कि राजा का आदेश बताकर, जंगल में भाग जाने कहा। वो लोग किसी भेड़िये को मारकर उसका रक्त ले आये। उससे स्नान करके रानी स्वस्थ हो गयी।
दूसरी ओर जंगल में भागा बलरूचि इधर उधर आश्रय ढूंढता वन में एक कुटिया के पास पहुंचा। भूखे-प्यासे बलरूचि पर झोंपड़ी में रहने वाली बुढ़िया को दया आई और उसने बलरूचि को अपने पास रख लिया। ये बुढ़िया स्वयं भी जादू-टोने में पारंगत थी। उसने बलरूचि को भी तंत्र सिखाना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद राजा चित्रसेन अपने ससुराल जाते हुए उसी वन से गुजर रहे थे कि रास्ते में उनकी पालकी के कहारों में से एक की मृत्यु हो गई। सिपाही आस पास से किसी को पकड़ कर कहार बनाने दौड़े। उन्हें बलरूचि मिला और वो उसी को ले आये।
न राजा ने इतने दिन बाद बलरूचि को पहचाना, न बलरूचि को पता चला कि पालकी में राजा चित्रसेन हैं।
*माया का पर्दा लगता है…*
*तो खून के रिश्तो में ऐसा ही स्वार्थ का पर्दा लग जाता है*
आदत के मुताबिक राजा चित्रसेन रास्ते में पालकी में बैठे एक गाना गाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन एक वाक्य वो भूल रहे थे। जब कई प्रयासों में उन्हें गीत याद नहीं आया तो अचानक बलरूचि ने गीत पूरा कर दिया। अब राजा ने पालकी रुकवाई और देखा तो पाया कि बलरूचि तो जीवित है! वो क्षमा मांगते उसे अपने साथ राज्य में वापस ले चले। इतने दिनों में रानी को भी आपनी गलती महसूस हो गयी थी। उसने भी क्षमा मांगकर बलरूचि का स्वागत किया। तबतक जंगल की बूढ़ी डायन का ध्यान गया कि बलरूचि उसके पास से चला गया है तो वो क्रुद्ध हो गयी। उसने गुस्से में बलरूचि पर तरह-तरह के टोने करने शुरू किये।
इस बार मुकाबला करने के लिए बलरूचि तैयार था, क्योंकि वो उसी बुढ़िया से इतने दिनों में जादू-टोना सीख आया था। ऊपर से उसके पास रानी की सहायता भी थी। जंगल की डायन हार गई। बलरूचि का राज्य निष्कंटक रहे, इसके लिए रानी ने हर वर्ष *झिझिया* खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे यही परंपरा लोक में भी फैली और आज मिथिला के कई गावों में लड़कियां-युवतियां झिझिया खेलती हैं। मिथिलांचल में परंपरागत रूप से शारदीय नवरात्र को तांत्रिक साधनाओं का काल भी माना जाता है। दादी-नानी इस समय घर के छोटे बच्चों की नाभि में तेल लगाती भी दिख जाती हैं। झिझिया एक नृत्य है, इसके साथ थोड़ा तेज, नृत्य के योग्य संगीत बजता है।
बिहार से करीब 2000 किलोमीटर दूर गुजरात से आज डंडिया चलकर बिहार पहुँच चुका है।
अफसोस की मगध नरेश जरासंध ने करीब दो दशक से बिहार के राजसिंहासन पर बैठे मिथिलांचल की छाती पर मूंग दली थी, वो झिझिया को 200 किलोमीटर दूर से पटना तक भी नहीं ला पाए।
उनके शिशुपाल-वक्रदंत जैसे दूसरे साथी भी मिथिलांचल से उनके जैसा ही द्वेष रखते थे। इसलिए लिट्टी-चोखा का नाम बिहार के व्यंजन के नाम पर सुनाई देगा, लेकिन बगिया के बारे में कोई बात नहीं होती थी।
पर अब ऐसा नहीं है….अ के वर्तमान मंत्री स्वयं , देश सेवक *“हर थाली में बिहारी व्यंजन”* की बात करते दिख जाते है।
*थोडा सोचिये पूरे भारत में विदेशी पिज्जा -बासी रोटी आसानी से मिल जाता है…पर इतने वर्ष हम विश्व में हमारी पौष्टिक रोटी क्यों नहीं पहुंचा पाए…हम कहा कम पड़े..??*
झिझिया नृत्य में सर पर एक घड़ा रखकर लड़कियां नृत्य करती हैं। इस घड़े में नौ छेद होते हैं और घड़े के अन्दर एक जलता हुआ दिया रखा जाता है। इसे नौद्वार पूरी शरीर बता या गया है सर से घड़ा तेज घूमने, उठने-बैठने पर भी गिरता नहीं। इन नौ छिद्रों में आती रौशनी वैसी ही दिखती है जैसा कुछ डीजे बजते समय एक इलेक्ट्रानिक गोले से किया जाता है। कुल मिलाकर डंडिया से ज्यादा नहीं तो उससे कम रोचक नृत्य तो बिलकुल नहीं है। इसके साथ गाये जाने वाले गीत के दो स्वरुप आसानी से सुनाई दे जाते हैं। एक में –
*“तोहरे भरोसे माई रे, झिझिया बनैलिये,*
*माई हे, झिझिया पर होईय सहाय”*
जैसा कुछ गाया जाता है और दूसरे में –
*“तोहरे भरोसे ब्रह्मबाबा, झिझिया बनैलिये,*
*झिझिया पर होईय सवार”* जैसा कुछ गाया जाता है।
यहाँ माई जहाँ देवी दुर्गा के रूपों के लिए है, और ब्रह्म बाबा ग्राम देवता होते हैं जिनके नाम पर अधिकांश किसी वृक्ष के नीचे लगा पत्थर गावों में पूजित होता है।
बाकी झिझिया दुर्गा पूजा के नौ दिन चलता है। उम्मीद है मिथिलांचल की कुछ जीवित लोग पढ़ ही लेंगे। इस वर्ष न सही, अगले वर्ष सही! कहीं और से डांडिया लाकर सीखने के बदले अपने झिझिया को पुनःजीवित करके स्वयं मिथिलांचल से शहरों तक लाया ही जा सकता है।
✍️ मगध के जरासंध से पिछले दो दशकों में नहीं हुआ,पर अब तो आशा की किरन जग उठी है….!
*बदलाव दिख रहा है*
*कमल खिल रहा है….*
*अरे आप राजनीति पर कहा चल दिए…*
*माता लक्ष्मी कमल पर ही तो विराजते है*
करीब पचास- पचपन बरस पहले कलकत्ता के पंडालो में धुनुची नृत्य रहता था ।अद्भुत समा बंध जाता था पूरे पांडाल में, गुग्गल,अगर के धुम्र से वातावरण सुगंधित व अलौकिक हो जाता था।
उसके बाद बहुत बरस बीत गए बीकानेर ,राजस्थान रहने की वजह से दुर्गा पूजा व धुनुची नृत्य देखने का अवसर नहीं मिला। हमारे यहाँ देवी के दो या तीन ही मंदिर है एक बीकानेर में ही *नागण्याचै जी* व दूसरा विश्व प्रसिद्ध *करणी माता मंदिर* जिसे दुनिया चूहों वाले मंदिर के नाम से जानती है, यहाँ की आरती व धूप भिन्न तरह से होती है, अन्य मंदिरों की तरह।किसी दिन यहां राजस्थान के धोरा भूमि के *घूमर,* और *तेरह ताल* नौ रात के नृत्य पर अवश्य लिखूंगा…
बीकानेर में बंगाली भी रहने लगे है इस कारण वे अपने समुदाय में दुर्गा पूजा मनाते है वहाँ दो -चार बार अवसर मिला पूजा में शामिल होने का ।
किसी भी पूजा में धुनाची आरती यानि धूप आरती करने की परंपरा है, यह प्राकृतिक धूप जलाने से पूजा के बातावरण शुद्ध और मन पवित्र हो जाता है| धूप दीप आरती एक प्राचीन परंपरा है जिसमे धुनाची इस्तेमाल किया जाता था| हम आजकल पर धर्मियों का अनुसरण कर के अगरबत्ती जला रहे हैं , जो शास्त्र निषेध है (blog link of agarbatti)
अब तो धूपबत्ती भी ज़्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं पर धुनाची आरती ही सही में धूप आरती है जो हमारे प्राचीन आरती पूजा पद्धति को दर्शाता है|
पूजा में धुनुची नृत्य मेरे आकर्षण का केंद्र रहा है जो मुझे बचपन से लेकर आज तक भी प्रभावित करता है।
पीछे की ओर झुका सिर, दोनों हाथों के बीच अदला-बदली करती धुनुची और ढाक की थाप पर थिरकते कदम, दुर्गापूजा पंडालों में धुनुची नृत्य का यह नजारा देख मंत्रमुग्ध हो जाता हूं। क्या पुरूष , क्या स्त्री … यह नृत्य करने वाले कभी दांतों में फंसाकर तो कभी दोनों हाथों के बीच धुनुची की ऐसी अटखेलियां दिखाते हैं कि देखने वाले हैरान रह जाते हैं। उस पर खास बात यह कि गजब का संतुलन रखने की आवश्यकता पड़ती है इस नृत्य में।
इस नृत्य को करने वाले न तो कोई अभ्यास करते है, न ही किसी प्रकार की कोई शिक्षा । बस ढोल-ढाक का साथ मिलता है तो माता के भक्त हाथ में जलती धुनुची लेकर मंत्रमुग्ध होकर नाचने लगते हैं।
धुनुची नृत्य असल में शक्ति नृत्य है। बंगाल की परंपरा में यह नृत्य मां दुर्गा की शक्ति और ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। पुराणों के अनुसार, चूंकि महिषासुर बहुत ही बलशाली था। उसे कोई नर, देवता मार नहीं सकता था। मां उसका वध करने जाती हैं। इसलिए मां के भक्त उनकी शक्ति और ऊर्जा बढ़ाने के लिए धुनुची नृत्य करते हैं। धुनुची में नारियल की जटा और हवन सामग्री (धुनो) रखा जाता है। उसी से मां की आरती की जाती है। धुनुची नृत्य सप्तमी से शुरू होता है और अष्टमी और नवमी तक चलता है।
नवरात्रि आते ही मुझे अपने बंगाल की बहुत याद आती है। वहां का दुर्गा पूजा बड़ा ही भव्य होता है ।ढाक का बजना, देवी मां की ओजपूर्ण प्रतिमा,धुनुची नृत्य ,सिंदूर खेला, रात में पंडाल घूमना यह सब बड़ा ही रोमांचक होता है। मैं यहां रहती हूं मगर मेरा दिल बंगाल में ही अटका रहता है। खैर यह तो हुई मेरी बातें।
यूं तो नवरात्रि पूरे देश में मनाया जाता है। मगर तमिलनाडु में नवरात्रि मनाने का तरीका बाकी सभी प्रांतों से बिल्कुल अलग है ।अमावस्या को अंतिम श्राद्ध तर्पण के पश्चात शुभ समय देखकर सीढ़ियों का एक मंच बनाया जाता है। यह 9 सीढ़ियां अगले 9 दिन के त्यौहार का प्रतीक है। इस मंच के नीचे व आसपास चावल के आटे के घोल से अल्पना बनाई जाती है। और इसे सजाया जाता है ।यह लकड़ी की बनी फोल्डिंग होती है इसे *गोलू पड़ी* कहते हैं ।गोलू यानी छोटी-छोटी मूर्तियां, गुड्डे गुड़िया और पड़ी मतलब चढ़ाव। पहली सीढ़ी के बीच में एक खाली जगह छोड़ी जाती है, जहां पर नवरात्रि के प्रथम दिन कलश में शुद्ध जल भरकर आम्र पत्र का गुच्छा और उस पर आडा नारियल रख कलश स्थापना की जाती है। प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा अर्चना की जाती है प्रथम 3 दिन दुर्गा माता की पूजा अगले 3 दिन लक्ष्मी मां की पूजा और अंतिम 3 दिन सरस्वती देवी की पूजा की जाती है ।9वें दिन खास सरस्वती नवमी मनाया जाता है। इस दिन आयुध पूजा भी की जाती है जिसमें लोग अपने कार्य के हिसाब से काम आने वाले अस्त्र – जो अब टूल्स हो गए…उनकी पूजा करते हैं बिल्कुल जिस तरह हम लोग विश्वकर्मा पूजा करते करते हैं ।
यहां प्रत्येक मंदिर में सांस्कृतिक नृत्य का भी आयोजन होता है
इस बार भी मल्लेश्वर मंदिर (शिव टेंपल) में नृत्य देखने का शुभ अवसर मिला ।
✍🏻गरबा पर फिर कभी और…