
विजय-दशमी पर शत्रुओं के पुतले बनाकर उन पर शस्त्रपरीक्षण की परम्परा कितनी प्राचीन है, इसका अनुमान कठिन है।
रावणादि के पुतले बनाकर शरप्रहार तथा दहन एक निरापद आयोजन है।
*आश्विनशुक्लदशमी विजयादशमी मता ।
चतुर्गोमयपिण्डानि प्रातर्न्यस्य गृहांगणे ।।
चक्ररूपेषु मध्येऽत्र वासुदेवसुकर्षणौ ।
प्रद्युम्नमनिरुद्धं च पूजयेच्चतुरोऽपि हि ।।
सपिधानासु पात्रीषु गोमयीषु चतुसृषु ।
क्लिन्नं धान्यं सरौप्यं च धृत्वा शुक्लाम्बराऽऽवृतम् ।।
संपूज्याऽक्षतपुष्पाद्यैर्नमस्कुर्वीत वै ततः ।
मध्याह्ने भोजयेद्बालान् मिष्टमद्यात्तथा व्रती ।।
अथाऽपराह्णे पूर्वस्यां शमीमूलस्थमृत्तिकाम् ।
गृहीत्वा स्वगृहं नीत्वा संपूज्यापि विधानतः ।।
क्षत्रियश्चेत् स्वकं सैन्यं सज्जीकृत्य च सर्वथा ।
निर्गत्य पूर्वद्वारेण ग्रामाद्बहिरनाकुलः ।।
शत्रुप्रतिकृतिं तत्र निर्मितां पत्रकादिभिः ।
मनसा कल्पितां तां च स्वर्णपुंखशरेण सः ।।
विध्येदिति भृशं प्रीतः प्राप्नुयात् स्वगृहं ततः ।
पश्चाद् युद्धं प्रकुर्याच्चेद् विजयी स्यान्न संशयः ।।
धनं जयं महाराज्यं सुतगोगजवाजिनः ।
अजाविकमिह दद्यादन्ते स्वर्गगतिं तथा ।
श्रीरामः प्रस्थितश्चाद्य विजयायोत्सवं चरेत् ।।
मुक्तमात्रेण रामेण दूराकृष्टेन भारत ||29||
स तेन राक्षसश्रेष्ठ: सरथ: साश्वसारथि: |
प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिप्लुत:||30||
मार्कण्डेय युधिष्ठिर को राम कथा सुना रहे हैं; उसी प्रसंग के उपर्युक्त श्लोक हैं |
इससे रावण दहन के बारे में संकेत प्राप्त होता है |
श्लोकार्थ:—
युधिष्ठिर! श्रीराम द्वारा छोड़े हुए उस बाण के लगते ही रावण रथ, घोड़े, सारथि सहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयंकर लपटों वाली आग के लपेट में आ गया हो ||
✍🏻अत्रि विक्रमार्क
कई लोग (खासकर ब्राम्हण बन्धु) हैं. जिन्हें जय लंकेश या जय रावण का नारा लगाते देखता हूँ और इनका वैचारिक पतन देखकर बड़ा दुख भी होता है..
दरअसल ये लोग वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे असंख्य विद्वानों द्वारा वैदिक संस्कृति के लिए किए गए संघर्षो के ही खिलाफ जा रहे हैं.. अपने बुजुर्गों और बड़ों के खिलाफ..
रावण इन्हीं के दमन के लिए कुख्यात रहा है और कहा जाता है कि वह इन साधुओं की हत्या करके खून को घड़े में भर कर रखता था.. उनके यज्ञ अनुष्टान आदि को नष्ट भ्रष्ट कर देता था..
क्या आपके पूर्वजों ने अपने इस दमनकर्ता के लिए कभी यह कहा कि- जय लंकेश, जय रावण??
क्योंकि यह आखिरी डिफेंस लाइन है, अगर आपको अपने धर्म, संस्कृति से च्युत होने में गौरव होता है तो फिर करिए.. फिर यह रोना छोड़िए कि फलाना यह कर रहा और धिमाका वह..
हैरानी होती है अतीत के असंख्य ऋषि मुनियों, वेद वेदांत, उपनिषद पुराण के रचयिता होने का गौरव छोड़ कर आपको जय लंकेश और जय रावण करने में मजा आता है, आपको ज्ञान के अथाह सागर वाली वेद उपनिषद की किताबो से केवल जय लंकेश करने को मिला???
✍️यह नारा सुनकर आपके पुर्वजो की आत्मा बड़ी खुश होती होगी? आपका व्यक्तिगत अंहकार सब कुछ, पुरखें जाएं भाड़ में??
आपको रावण की जयजयकार करनी ही क्यों है ? उसमें ऐसा क्या था ?
फिर आप उसके दादा ऋषि पुलस्त्य की जयजयकार क्यों नहीं करते ? क्योंकि आपको राजनीतिक दुराग्रह सिद्ध करना है।
वो वर्ण से ब्राह्मण था ?
फिर आप वर्ण और गुण दोनों के आधार पर श्रेष्ठता के उच्चतम स्तर पर स्थित उसके पिता विश्रवा की जयजयकार क्यों नहीं करते ? क्योंकि आपको राजनीतिक दुराग्रह सिद्ध करना है।
फिर आप उसके भाई विभीषण की जयजयकार क्यों नहीं करते, आखिर उन्होंने भी ब्रह्मदेव को संतुष्ट करके वरदान पाया था। वो चाहते तो रावण जैसा पराक्रम भी मांग सकते हैं किंतु उन्होंने केवल भक्ति और धर्म ही मांगा, और इस बात से ब्रह्मा जी इतने गद्गद हुए कि अपनी ओर से कृपा करते हुए बिना मांगे ही विभीषण जी को ब्रह्मास्त्र तक दे दिया। यहां तक कि प्रातःस्मरणीय चिरंजीवी एवं महाभागवत दिव्यों की शृंखला में विभीषण जी का नाम लेने का निर्देश शास्त्रों में है। फिर उनकी जयजयकार क्यों नहीं करते आप ? क्योंकि आपको राजनीतिक दुराग्रह सिद्ध करना है।
फिर आप उसके भाई यक्षराज कुबेर की जयजयकार क्यों नहीं करते, जो अपनी शिवभक्ति से भगवान् शिव के स्थायी सखा और पार्षद बन गए ? वैसे भी कुबेर जी का तेज देखकर ही रावण को ईर्ष्या हुई और उसने तपस्या प्रारम्भ की थी। कुबेर जी की जयजयकार क्यों नहीं ? क्योंकि आपको राजनीतिक दुराग्रह सिद्ध करना है।
कश्मीर के गोनन्द वंश के राजा ,विभीषण के पौत्र और राजा इंद्रजीत के पुत्र राजा रावण परम् शिव भक्त थे ,उन्होंने बटेश्वरनाम के शिव लिङ्ग की स्थापना की थी । सम्पूर्ण भारत में कई शिव लिङ्ग स्थापित करने वाले शिव भक्त व्याकरणाचार्य रावण कृष्णयजुर्वेद के प्रथम भाष्यकार थे ,वे वेद के घनपाठ जटा-माला आदि के आद्य आचार्य थे । इन्हीं शिवभक्त राजा रावण ने भगवान् शिव का सुप्रसिद्ध शिव ताण्डव स्तोत्र की रचना की थी ।
स्रोत: इतिहासवेत्ता कल्हण रचित राजतरंगिणी
जय लंकेश (रावण) का उद्घोष अनुचित है।
सर्वप्रथम तो देखा जाय, जय किसकी होती है ?
धर्म कौन हैं ?
और ?
और ?
विभीषण के रूप में लंका में साक्षात् धर्म ने ही अवतार लिया है !
जिसने साक्षात् धर्मरूपी श्रीराम जी का अपमान किया, सीताहरण जैसा कुकृत्य किया, जिसे स्वयं धर्मरूपी नंदीश्वर ने श्राप दे दिया, जिसने स्वयं धर्मरूपी विभीषण का अपमान किया, उसे धर्म के कारण मिलने वाली जयजयकार का अधिकारी कैसे माना जा सकता है?
✍️ हम गलत मार्ग में चल रहे हैं, कौन जतन से होगा उद्धार
रावण ने छल का रूप धारण किया – शिखा, दण्ड, कमण्डल, काषाय वस्त्र, पाँवों में उपानह, छाता – एक परिव्राजक, परिभ्रमण करने वाले भिखारियों का जो रूप होता है, वह धारण किया।
जिसकी महिमा गा रहे हो वह इतना कायर था कि लक्ष्मण के रहते वहाँ नहीं आया, चले जाने की प्रतीक्षा करता रहा। सीता तो सरलमना हैं, अपहृत होने से पूर्व उनका उसके साथ का जो संवाद है, वह उनके मन में करुणा जगाता है जो आगत जानते हैं। सीता कुछ नहीं छिपातीं। आज भी गाँव गिराम में भ्रमण करते वैरागियों के प्रति स्त्रियों का जो सहज भाव होता है, वह वाल्मीकि के वर्णन में निखर उठता है एवं विडम्बना पर पाठक का मन त्राहि त्राहि करने लगता है (साथ ही मुण्डियों, जटिलों आदि से स्त्रियों को दूर रखने की नीतिज्ञों की चेतावनी भी प्रतिध्वनित होने लगती है।)
उसके आगमन की भयानकता को रेखांकित करने हेतु वाल्मीकि नाक्षत्रिक एवं भौमिक, दोनों उपमाओं का आश्रय लेते हैं, निकट बहती नदी तक मन्द हो जाती है ! राम, लक्ष्मण के न होने पर सीता ऐसे जैसे सूर्य एवं चंद्र के बिना संध्या हो,
देवी सीता के रूप को देख रावण कामबाण से आहत हो गया तथा वेदमन्त्र पढ़ने लगा जिससे कि उनमें विश्वास हो जाय कि यह तो कोई महापुरुष हैं !
ब्रह्मघोषं को वेद वाचन मानें या ब्राह्मण होने का उद्घोष, दोनों ही स्थितियों में तत्कालीन समय अनुसार छल की पराकाष्ठा ही परिलक्षित होती है।
आर्यावर्त के दो महान कुलों का संस्कार था, देवी सीता ने अतिथि ब्राह्मण का आदर करते हुये पाद्य अर्घ्य समर्पित किया एवं भोजन हेतु निमंत्रण भी दिया किन्तु कथित रूप से परम विद्वान, पौलस्त्य राक्षस रावण के मन में तो कुछ और ही था !
ब्राह्मणवेशधारी राक्षस रावण ने परिचय पूछा एवं देवी सीता ने परिचय देने से पूर्व एक मुहूर्त (दो घटी या आज का 48 मिनट) तक विचार किया – दुविधा समझी जा सकती है कि अपरिचित आगंतुक से कुछ अधिक बताना ठीक नहीं, किन्तु ब्राह्मण है, वेदघोष करता है, न बताने पर कहीं रुष्ट हो शाप दे बैठा तो!
अपना परिचय देने के पश्चात देवी सीता ने रावण से परिचय पूछा जो कि समयसम्मत था कि ब्राह्मण से नाम, गोत्र एवं कुल का परिचय पूछा जाना चाहिये –
रावण ने क्या ब्राह्मणत्व वाला परिचय दिया !
हे सीता ! देव, सुर, मनुष्य सहित जिससे समस्त लोक त्रस्त हैं, मैं वह रावण नामधारी राक्षसराज हूँ –
लम्पट ने पटरानी होने का प्रस्ताव रख दिया । देवी सीता तो जैसे आकाश से गिरीं ! श्रीराम के प्रति महेन्द्र एवं सागर, दोनों की उपमा देते हुये मानों उन्हों ने उनके प्रति अपने दृढ़ एवं गहन प्रेम का परिमाण प्रस्तुत कर दिया –
आगे उन्हों ने उसे जो खरी खोटी सुनाई है, वह अप्रतिम है –
ब्रह्मराक्षस रावण अपनी लम्पटता के कारण जगविख्यात था। सीता को अपने अपहरण की आशंका हो गई, उन्होंने उसे श्रीराम का बल प्रभाव बताते हुये चेताया कि जलती हुई आग को कपड़े में बाँध ले जाना चाहता है! मारा जायेगा।
राक्षस समझ गया कि प्रलोभन से नहीं मानेगी, स्यात कुल की डींग हाँकने से मान जाय ! कुल के डींग की प्रवृत्ति आज भी दशहरे के निकट कुछ में मरोड़ने लगती है – *सवर्ग प्रीति।*
उसने कहा – मैं वैश्रवण कुबेर का सौतेला भाई हूँ –
सीता ने उत्तर दिया – अरे, वे तो समस्त देवों के पूजनीय हैं। तुम उनसे अपने को जोड़ पापकर्म करता है –
*कथं वैश्रवणं देवं सर्वभूतनमस्कृतम् !*
श्रीराम के प्रति विश्वास फूट पड़ा – इंद्र की पत्नी शचि का अपहरण कर सम्भव है जीवित रहना किंतु राम की पत्नी का हरण कर कुशल से रह पाना – असम्भव!
अपने प्रति अभिमान भी भर आया – मेरे जैसी स्त्री का अपहरण कर तू अमृत भी पी ले तो जीते जी तुम्हें छुटकारा नहीं होना –
रावण ने सौम्य रूप त्याग कर विकराल रूप धारण कर लिया, कामलोलुप हो उन्हें पकड़ लिया मानों बुध ने अपनी माता रोहिणी को उस भाव से पकड़ने का दुस्साहस किया हो –
जो ब्रह्मबंधु यह लिखते नहीं थकते कि रावण ने देवी सीता को छुआ तक न था (उनके लिये लिख रहा हु… स्पष्ट समझे ….किसकी जय जय कार कर रहे हो) उनके लिये यह श्लोक :
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केश पकड़े, दाहिने हाथ को उनकी जंघा के नीचे लगा, उठा लिया ।
*खरयुक्त: खरस्वन:* – गधों से जुता एवं उनके समान ही ध्वनि करने वाले महारथ पर बिठा कर ले चला।
सीता दु:खी एवं आर्त्त हो राम लक्ष्मण को पुकारने लगीं – *रामेति सीता दु:खार्त्ता … हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक !*
गदहा रावण
राक्षसो रावणो मूर्खो। खर अर्थात गदहे से रावण का सम्बन्ध है। काश्मीर तन्त्र के विद्वान रावण को नाम व लक्षण साम्यता के आधार पर राक्षस रावण बना दिया गया प्रतीत होता है – लगे हाथ खरानना देवी कुलदेवी भी हो गयीं उसकी, ससुराल भी, वहीं बसते उसके श्रीमाली वंशज भी।
भारत कथा प्रधान देश है और उत्तर भारत मनोरञ्जन प्रधान, कोढ़ में खाज। नाम साम्यता के आधार पर ही पुराणियों ने शान्ता को राम की बहन घोषित कर दिया।
पाणिनि खर/खारी जाति का उल्लेख किये हैं। खर और आनणा जाटों के गोत्र हैं। खर+आनणा का भी खरानना हुआ हो सकता है। योद्धा जातियाँ थी हीं।
राक्षस रावण के यहाँ अश्व उतने सुलभ नहीं थे। सीताहरण व युद्ध में भी उसने खर जुते रथ का प्रयोग किया। युद्ध गहन होने पर अश्व भी जोते गये।
(मार्क्सवादी जन अश्व को ass बनाने में विशेष प्रवीण होते हैं, राक्षस रावण भी वाममार्गी ही था। वाम अर्थात सामान्य से विपरीत रीति। )
वाल्मीकि जी राक्षस रावण के रथ हेतु बताते हैं कि चीपों चीपों करते गधे तो जुते ही थे, पहियों की ध्वनि भी गधों की ही भाँति थी – खरश्वन!
मय का दामाद बना दिये गये राक्षस रावण हेतु अब कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसकी तकनीकी बहुत आदिम थी जो लकड़ी के पहियों व धुरों की रगड़ की ध्वनि पर भी विराम नहीं लगा सकती थी। उच्च तकनीकी का पुष्पक तो उसने कुबेर से छीना था।
सावधानीपूर्वक पढ़ने पर सकल रूप में लंका वह देश लगती है जिसे आजकल rogue state कहते हैं, जबर की जबरी खूब चलती रही होगी।
लंका में मुर्गी-पालन भी होता रहा होगा। भैंसा भात के साथ रावण ऑमलेट भी खाता रहा हो तो आश्चर्य नहीं। ऐसा मनई वेद तो पढ़ने से रहा। वह वेदपारग नहीं था, वेदपाठी ब्रह्मराक्षस अवश्य उसके यहाँ रहते रहे होंगे। बिना ज्ञान के विधान थोड़े चलता है! इनमें आपस में भी ज्ञानी होते ही होंगे।
कुल मिला कर भौकाल ही बचा था उसका, जब परायी नार हर लाया। सहमा भी हुआ था। उसके विरुद्ध सब ने राम को सहयोग दिया, समुद्र तटनायक, इन्द्र, वैनतेय, गीध, वानरादि जातियाँ सभी। सभी के भीतर इतनी पीड़ा सञ्चित थी कि अवसर मिलते ही….
हाँ, अब ए दिमाग में पक्का कर लो रावण ब्राह्मण नहीं राक्षस था।
✍🏻फिर मिलते है…