
एक क्षण को अपने भीतर झाँकिए…
क्या आप जीवन में कुछ प्राप्त करना चाहते हैं।
कोई ऐसी उपलब्धि, जिसके लिए आप लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। कोई ऐसा लक्ष्य, जो आपके लिए केवल इच्छा नहीं, बल्कि आपके जीवन का उद्देश्य बन चुका है।
आप शुरुआत करते हैं…
कुछ दिन उत्साह बना रहता है…
फिर मन भटकने लगता है।
कभी पुरानी आदतें आपको पीछे खींचती हैं, कभी सुविधाएँ आकर्षित करती हैं और कभी कठिनाइयाँ आपके संकल्प को कमजोर कर देती हैं।
लेकिन एक प्रश्न है…
क्या किसी सिद्धि की प्राप्ति के लिए केवल इच्छा और प्रयास पर्याप्त हैं, या अपनी चेतना को भी उस यात्रा के अनुरूप विकसित करना आवश्यक है?
सिद्ध योगी चेतना संबंधी इस प्रश्न को एक अलग दृष्टिकोण से देखते है।
संतमत के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों को चेतना के नौ क्रमिक चरणों की यात्रा के रूप में भी समझा जा सकता है। प्रत्येक देवी का विशिष्ट स्वरूप हमें हमारी चेतना के एक विशेष भावात्मक आयाम का स्मरण कराता है, जिसे अपनी साधना के माध्यम से विकसित करने का प्रयास किया जा सकता है।
ध्यान रखें भारत के योगियों के मतानुसार –
किसी देवी की पूजा अर्चना केवल कोई कर्मकांड नही बल्कि उसकी चेतना से सामंजस्य बनाने का एक प्रयास है, ताकि हमारी चेतना वैसी ही तरंगों को अपने भीतर सुदृढ कर सके । *वरना व्रत करना, अनुष्ठान करना केवल एक औपचारिकता रह जाएगी….इतने वर्षों से शिष्टाचार कर के क्या कुछ साध्य हुआ…अंतर में कुछ रंग निखरा , कुछ झलक दिखा…? या…आप से अच्छा पारखी भला कोई हो सकता है???*
और… यहां “सिद्धि” का अर्थ केवल कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त करना नहीं है। यह अपने साधना-पथ के किसी निर्धारित लक्ष्य या उच्चतर अवस्था की प्राप्ति भी हो सकती है। शक्ति के तरंग को अनुभव करना है।
इस दृष्टि से हर दिन की देवी केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि हमारी चेतना की यात्रा में आगे बढ़ने का एक संभावित मार्ग भी बन जाती हैं।क्या हमारी चेतना उर्ध्वगामी हुई…या अब भी …अपने आप में टटोलना है…यही तो नवरात्रि का उद्देश्य है…
पहले दिन हमने माँ शैलपुत्री के स्वरूप का स्मरण करते हुए शांति, स्वच्छता और स्थिरता की भावनात्मक तरंगों को अपनी चेतना में स्थान देने की बात की थी।
क्योंकि जब भीतर अत्यधिक अशांति हो, विचारों में उलझाव हो और मन स्थिर न हो, तब साधना की दिशा में आगे बढ़ना कठिन हो सकता है।
लेकिन शांति और स्थिरता आ जाने के बाद क्या यात्रा पूरी हो जाती है?
नहीं।
अब आवश्यकता है उस चेतना की, जो हमें अपने संकल्प पर टिके रहने और साधना को निरंतर आगे बढ़ाने की क्षमता विकसित करने की दिशा में ले जाए।
यहीं माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप हमारे लिए विशेष अर्थ रखता है।
भारत के योगियों के अनुसार, माँ ब्रह्मचारिणी की चेतना को उस अवस्था के प्रतीक के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ साधक की चेतना तप, अनुशासन और निरंतरता से जुड़ी भावनात्मक तरंगों के साथ सामंजस्य स्थापित करने की दिशा में बढ़ती है।
और इसी विचार में एक गहरा आध्यात्मिक संकेत छिपा है।
माँ ब्रह्मचारिणी का नाम ही हमें ब्रह्मचर्य और तपस्या की ओर ध्यान दिलाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से ब्रह्म तत्व की प्राप्ति की यात्रा में तप, संयम और अनुशासन को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसलिए मैं माँ ब्रह्मचारिणी के स्वरूप को केवल तपस्या करने वाली देवी के रूप में नहीं, बल्कि उस साधना-चेतना के प्रतीक के रूप में देखता हूँ, जो साधक को ब्रह्म तत्व की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार करती है।
आंतरिक साधना के अनुसार –
यदि चेतना में भावों के विशिष्ट तरंग-पैटर्न होते हैं, तो देवी के स्वरूप का एकाग्रतापूर्वक स्मरण करते हुए उन भावों को अपने भीतर विकसित करने का अभ्यास हमारी आंतरिक अवस्था को प्रभावित कर सकता है।
जब हम तप, अनुशासन और निरंतरता के भावों को बार-बार सक्रिय करते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा व्यवहार भी उस दिशा में ढलने लगता है।
यहाँ एक अंतर समझना आवश्यक है।
केवल माँ ब्रह्मचारिणी का स्मरण कर लेना और अपने भीतर तप, अनुशासन तथा निरंतरता को विकसित करने का वास्तविक प्रयास करना – दो अलग बातें हैं।
स्मरण आपको दिशा दे सकता है। साधना उस दिशा में टिके रहने का अभ्यास बन सकती है।
और यही वह चरण है, जहाँ से चेतना की यह यात्रा आगे बढ़ती है।
आज का छोटा-सा साधना प्रयोग
माँ ब्रह्मचारिणी के स्वरूप का स्मरण कीजिए।
कुछ क्षण शांत बैठकर अपने भीतर इन तीन भावों को अनुभव करने का प्रयास कीजिए:
तपस्या – अपने लक्ष्य के लिए आवश्यक कठिनाई को स्वीकार करने की तत्परता।
अनुशासन – मन के भटकने पर भी अपने संकल्प के प्रति जिम्मेदार बने रहना।
निरंतरता – रुक जाने के बाद भी दोबारा अपनी साधना की ओर लौटना।
कल्पना कीजिए कि आप इन भावों से जुड़ी तरंगों को अपनी चेतना में स्थान दे रहे हैं।
उन्हें केवल शब्दों की तरह मत दोहराइए। अनुभव कीजिए कि आप इन गुणों को अपने भीतर विकसित करने के लिए तैयार हो रहे हैं।
इसके बाद अपने जीवन का कोई एक ऐसा संकल्प चुनिए, जिसे आप बार-बार अधूरा छोड़ देते हैं।
आज उसके लिए एक छोटा कदम उठाइए।
कल फिर उस दिशा में आगे बढ़िए।
और जब मन भटके, तो अपने संकल्प की ओर लौट आइए।
यह अभ्यास किसी अलौकिक परिणाम की गारंटी नहीं है। यह अपनी चेतना, भावनाओं और व्यवहार को साधना के उद्देश्य के अनुरूप विकसित करने का एक व्यावहारिक प्रयास है।
चेतना संबंधी में यही सामंजस्य साधना की यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पहले दिन शांति, स्वच्छता और स्थिरता की तरंगें। दूसरे दिन तप, अनुशासन और निरंतरता की तरंगें।
एक दिन से दूसरे दिन की यह यात्रा केवल कैलेंडर का परिवर्तन नहीं, बल्कि अपने भीतर नए गुणों को विकसित करने की एक क्रमिक साधना के रूप में भी देखी जा सकती है।
नवरात्र के नौ दिन हमें यही स्मरण करा सकते हैं कि सिद्धि की यात्रा में प्रत्येक चरण का अपना महत्व है। हर देवी का स्वरूप हमें एक नए भावात्मक आयाम की ओर ध्यान देने और अपनी साधना को आगे बढ़ाने का अवसर देता है।
अब अगला चरण होगा माँ चंद्रघंटा का।
जब चेतना में स्थिरता और संकल्प के भाव विकसित होने लगें, तब साहस, सजगता और सक्रियता की भूमिका क्या होती है? क्या ये भाव हमारी साधना को अगले स्तर की ओर ले जाने में सहायक हो सकते हैं?…
हम तो चल दिए…क्या अब भी आप कोई आमंत्रण के इंतजार कर रहे हो ??