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शास्त्रों के अनुसार कलश पर नारियल कैसे रखें?

वैदिक शास्त्रों और शास्त्रों के अनुसार, कलश पर नारियल को हमेशा लेटाकर (क्षैतिज/Horizontal) इस तरह रखना चाहिए कि उसका “मुख” (जिस तरफ तीन आंखें या डंठल होता है) सीधे पूजा करने वाले (साधक) की ओर हो।

कलश स्थापना के समय नारियल की दिशा बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। गलत तरीके से नारियल रखने पर पूजा का पूरा फल नहीं मिलता और नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है।

शास्त्रीय नियम (श्लोक)

 

नारियल की सही दिशा को लेकर शास्त्रों में एक बहुत ही प्रसिद्ध श्लोक बताया गया है:

 

अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय, ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै।
प्राचीमुखं वित्त विनाशनाय, तस्मात् शुभं संमुख्यं नारिकेलम्॥

 

 

गलत दिशा में नारियल रखने के नुकसान:

 

  • अधोमुखं (मुख नीचे की ओर): यदि नारियल का मुख नीचे कलश के अंदर की तरफ कर दिया जाए, तो इससे शत्रुओं और विवादों में वृद्धि होती है।
  • ऊर्ध्वस्य (मुख ऊपर की ओर/सीधा खड़ा): नारियल को बिल्कुल सीधा खड़ा रखने से घर में बीमारियाँ और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
  • प्राचीमुखं (मुख पूर्व या साधक से दूर): नारियल का मुख पूर्व दिशा या पूजा करने वाले से दूसरी तरफ रखने पर धन की हानि होती है।
  • संमुख्यं (मुख साधक के सामने): नारियल का मुख सीधे अपनी (साधक की) तरफ रखने से सुख, समृद्धि और पूजा का संपूर्ण शुभ फल प्राप्त होता है।

 

नारियल स्थापित करने की सही विधि

 

  1. नारियल का “मुख” पहचानें: नारियल का मुख वह हिस्सा होता है जहाँ से वह पेड़ की डाली से जुड़ा होता है। इसी तरफ तीन काली बिंदियां (जिन्हें नारियल की आंखें कहा जाता है) होती हैं। इसका दूसरा नुकीला हिस्सा इसकी पूंछ कहलाता है।
  2. नारियल को तैयार करें: एक जटावाला, साफ और बिना टूटा हुआ नारियल लें। इसे गंगाजल से पवित्र करें। इसके बाद इसे लाल कपड़े या चुनरी में लपेटकर मौली (कलावा) से बांध लें।
  3. आम के पत्ते रखें: जल से भरे कलश के कंठ (गले) पर 5, 7 या 11 आम या अशोक के पत्ते इस तरह रखें कि उनका नुकीला सिरा ऊपर की ओर रहे।

4- लेटाकर स्थापित करें: अब तैयार किए गए नारियल को पत्तों के ऊपर लेटाकर (Horizontal) रखें। यह पक्का कर लें कि नारियल की तीन आंखों वाला मुख सीधे आपकी तरफ देख रहा हो।

(नोट: कुछ विशेष क्षेत्रीय परंपराओं में नारियल को सीधा खड़ा भी रखा जाता है ताकि वह देवता के मुख का प्रतीक लगे, लेकिन अधिकांश शास्त्रीय ग्रंथों में इसे साधक की ओर मुख करके लेटाना ही सबसे उत्तम और प्रामाणिक माना गया है।)

 

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