
छत्रपति राजाराम महाराज हिंदवी स्वराज्य के तीसरे छत्रपति थे। उनका जन्म 24 फरवरी 1670 को राजगढ़ किला में महारानी सोयराबाई के गर्भ से हुआ था। जन्म के समय वे उल्टे (पालथे) पैदा हुए थे, इसलिए कुछ लोगों के मन में इसे अपशकुन माना गया। लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने सकारात्मक भाव से कहा कि यह बालक एक दिन दिल्ली की बादशाहत को उलट कर रख देगा।
राजाराम महाराज का बचपन स्वराज्य के विस्तार के दौर में बीता। स्वराज्य की स्थापना, संघर्ष और अनुशासित शासन व्यवस्था के संस्कार उन्हें बचपन से ही मिले। उन्हें सैन्य शिक्षा हंबीरराव मोहिते से प्राप्त हुई, जबकि दरबार के वातावरण से प्रशासन की समझ विकसित हुई। उनका स्वभाव शांत, संयमी और विचारपूर्वक निर्णय लेने वाला था।
1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के समय वे द्वितीय राजपुत्र के रूप में उपस्थित थे। राजगढ़ किला और रायगढ़ किला के दरबार में उन्होंने प्रशासन, सैन्य योजना, कूटनीति और सुव्यवस्थित राज्य व्यवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। 1680 में शिवाजी महाराज के निधन के बाद सत्ता संघर्ष की स्थिति बनी, जिसमें कुछ लोगों ने उन्हें गद्दी पर बैठाने का प्रयास किया, लेकिन आगे चलकर छत्रपति संभाजी महाराज ने राज्य की बागडोर संभाली।
1689 का वर्ष स्वराज्य के लिए अत्यंत भयानक सिद्ध हुआ। छत्रपति संभाजी महाराज के बलिदान के बाद स्वराज्य चारों ओर से संकट में घिर गया। मुगल सम्राट औरंगजेब स्वयं दक्षिण भारत में उतर आया था और रायगढ़ किला मुगलों के घेराव में था।
ऐसी कठिन परिस्थिति में मात्र 19 वर्ष की आयु में राजाराम महाराज ने 12 फरवरी 1689 को छत्रपति पद संभाला। यह निर्णय सत्ता की महत्वाकांक्षा से अधिक स्वराज्य को बचाने के उद्देश्य से लिया गया था। जब रायगढ़ पर मुगलों का घेरा और कड़ा होता गया, तब उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया और दक्षिण की ओर प्रस्थान किया।
प्रतापगढ़ किला पर देवी भवानी के दर्शन कर उन्होंने स्वराज्य की रक्षा की प्रतिज्ञा ली और अंततः तमिलनाडु के प्रसिद्ध जिंजी किला पहुँचे। महाराष्ट्र से दूर स्थित जिंजी किले से उन्होंने राज्य संचालन जारी रखा। इस रणनीति के कारण औरंगजेब को अपनी सेना दक्षिण की ओर मोड़नी पड़ी, जिससे महाराष्ट्र में मराठा शक्ति को पुनः संगठित होने का अवसर मिला।
1690 से 1698 तक जिंजी किले का घेरा जारी रहा। मुगल सेनापति जुल्फिकार खान, असद खान और शहजादा कामबख्श ने किले को घेर रखा था। लगभग आठ वर्षों तक चले इस संघर्ष में राजाराम महाराज ने सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुए युद्ध को जीवित रखा।
उन्होंने रामचंद्रपंत अमात्य को “हुकूमतपनाह” का अधिकार दिया, जबकि वीर सेनापति संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव को स्वतंत्र सैन्य अभियान चलाने की अनुमति दी। संताजी घोरपड़े ने मुगल छावनियों पर साहसिक हमले कर भय का वातावरण बना दिया, जबकि धनाजी जाधव ने उत्तर भारत तक आक्रमण कर मुगल शक्ति को चुनौती दी।
गनिमी कावा (गुरिल्ला युद्ध) की रणनीति के कारण मुगल सेना परेशान हो गई और स्वराज्य की लड़ाई अधिक व्यापक रूप में फैल गई। राजाराम महाराज की दूरदर्शिता 4 जून 1691 की एक सनद में भी दिखाई देती है, जिसमें उन्होंने रायगढ़, बीजापुर, भागानगर और औरंगाबाद को जीतकर अंततः दिल्ली तक विजय प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की थी।
धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी उन्होंने परंपराओं का सम्मान बनाए रखा। समर्थ रामदास की परंपरा के प्रति आदर रखते हुए उन्होंने चाफल और सज्जनगढ़ किला स्थित देवस्थानों की व्यवस्था के लिए इनाम जारी रखने के आदेश दिए। साथ ही मोरगांव मंदिर स्थित श्री मोरेश्वर देवस्थान को भी सनद प्रदान की, जिससे वहां के उत्सव व्यवस्थित रूप से होते रहें।
उनके पत्राचार में “महाराष्ट्र राज्य देव और ब्राह्मणों का है” जैसी भावना भी स्पष्ट दिखाई देती है। स्वराज्य के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों के परिवारों की जिम्मेदारी उठाने की उनकी भावना भी अत्यंत प्रशंसनीय थी।
1698 में वे जिंजी से निकलकर पुनः महाराष्ट्र लौटे। लेकिन लगातार युद्ध और तनाव के कारण उनका स्वास्थ्य कमजोर हो गया। फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने राज्य संचालन जारी रखा। अंततः 3 मार्च 1700 को सिंहगढ़ किला पर मात्र 30 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
छत्रपति राजाराम महाराज का कार्य आक्रामक विस्तार से अधिक स्वराज्य के अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष था। उन्होंने पराजय की छाया में भी आशा का दीप जलाए रखा। उनकी स्थिर बुद्धि, संयम और दूरदर्शिता के कारण ही स्वराज्य सुरक्षित रह सका।
छत्रपति राजाराम महाराज को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन। 🙏🚩
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