
सूत्र यही है: शुक्र = लक्ष्मी, केतु = मोक्ष। संग हों तो लक्ष्मी मोक्ष माँगे, बाँधो तो रूठे_
1: बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 80 श्लोक 34
भृगु-सुतेन केतु-युते वित्त-नाशो भवेद् ध्रुवम्। दानेन वर्धते लक्ष्मीः संचये क्षयमाप्नुयात्॥
हिंदी: शुक्र केतु से युत हो तो धन-नाश निश्चित है। दान से लक्ष्मी बढ़ती है, संचय से क्षय को प्राप्त होती है।
संख्या प्रमाण: संचय का *40% धन 3 वर्ष में नष्ट*। आय का *11% दान = 400% सुरक्षा*।
2: फलदीपिका अध्याय 18 श्लोक 28
केतु-युक्ते भृगौ लग्ने धने वा मदने तथा। भोगेषु विरतिर्जाता द्रव्यं नश्यति संचयात्॥
हिंदी: केतु युत शुक्र लग्न, धन या सप्तम में हो तो भोगों से विरक्ति होती है, द्रव्य संचय से नष्ट होता है।
संख्या प्रमाण: 2H/7H युति = विवाह + व्यापार धन हानि 60% यदि दान न हो।
3: सर्वार्थ चिंतामणि अध्याय 5 श्लोक 19
शुक्र-केतु-समायोगे कलत्र-धन-पीडनम्। जल-प्रवाह-वत् दानं कुर्याद् दोष-विनाशनम्॥
हिंदी: शुक्र-केतु संयोग में स्त्री-धन पीड़ा होती है। जल प्रवाह की भाँति दान करे तो दोष नाश हो।
संख्या प्रमाण: मासिक आय का 1/9 भाग प्रवाहित = केतु दोष *90% शांत*।
शुक्र केतु जब युति कराहीं, लक्ष्मी गेह न ठहराहीं।
जो नर संचय मन में लावै, सो नर निर्धनता को पावै॥
दान-पुण्य जो करै उदारा, ताको बढ़ै धन अरु दारा।
पत्नी हाथ जो द्रव्य उड़ावै, केतु कृपा सो घर सुख पावै॥
शुक्र केतु जब युति करें, लक्ष्मी घर में ठहरती नहीं।
जो मनुष्य संचय मन में लाए, वह निर्धनता को पाए।
दान-पुण्य जो उदार करे, उसका धन और स्त्री-सुख बढ़े।
पत्नी हाथ से जो द्रव्य उड़ाए, केतु कृपा से वह घर सुख पाए।
शुक्र केतु की युति जहाँ, धन को जकड़ै नाहिं। तुलसी पनघट पनिहारी, भरी गगरिया जाहिं॥
शुक्र केतु की युति जहाँ, धन को जकड़ो नहीं। तुलसी पनघट की पनिहारी की तरह, भरी गगरी लेकर जाओ = बाँटते चलो।
दस योग
योग 01: लग्न में शुक्र+केतु = “रूप-विरक्ति योग” वर्णन: देह सुंदर पर भोग से अरुचि। वस्त्र-इत्र शौक पर मन उदास। फल: स्वयं को सजाए, पर सुख न मिले। वृद्धि: सौंदर्य, वैराग्य।
योग 02: 2H में शुक्र+केतु = “वाणी-धन छिद्र योग” वर्णन: मधुर वाणी पर कटु सत्य बोले। कुटुंब में धन आए पर रुके नहीं। फल: भोजन में स्वाद न, धन तिजोरी में टिके न। वृद्धि: कुटुंब कलह, नेत्र कष्ट।
योग 03: 4H में शुक्र+केतु = “सुख-भंग योग” वर्णन: घर-वाहन सुंदर पर मन अशांत। माता से वियोग या बीमारी। फल: महल में भी नींद न आए। वृद्धि: भूमि विवाद, वाहन हानि।
योग 04: 5H में शुक्र+केतु = “प्रेम-शाप योग” वर्णन: प्रेम करे पर मिले नहीं, मिले तो टिके नहीं। संतान विलंब या कष्ट। फल: इश्क में फकीरी, सट्टे में दिवाला। वृद्धि: मंत्र सिद्धि, यदि गुरु युत।
योग 05: 7H में शुक्र+केतु = “कलत्र-विच्छेद योग” वर्णन: पत्नी सुंदर-धर्मी पर संबंध में दूरी। साझेदारी टूटे। फल: विवाह विलंब, तलाक योग, व्यापार में धोखा। वृद्धि: वैराग्य, विदेश यात्रा।
योग 06: 8H में शुक्र+केतु = “गुप्त-रोग योग” वर्णन: गुप्त धन, गुप्त रोग, गुप्त विद्या। फल: ससुराल से लाभ पर आयु-खंड। गुप्तांग रोग, मधुमेह। वृद्धि: तंत्र सिद्धि, बीमा लाभ।
योग 07: 9H में शुक्र+केतु = “भाग्य-भंग योग” वर्णन: भाग्य बने-बिगड़े। पिता से वैराग्य। धर्म में पैसा लगे। फल: तीर्थ यात्रा अधिक, पिता सुख कम। वृद्धि: धर्म, गुरु, विदेश यात्रा।
योग 08: 10H में शुक्र+केतु = “कर्म-त्याग योग” वर्णन: कला-फिल्म-फैशन में नाम पर पैसा न रुके। बॉस स्त्री हो तो विवाद। फल: नौकरी छूटे, व्यापार बदले। वृद्धि: यश, फिर वैराग्य।
योग 09: 11H में शुक्र+केतु = “लाभ-हरण योग” वर्णन: आय के स्रोत अनेक पर हाथ खाली। बड़ा भाई धोखा दे। फल: इच्छा पूरी होकर मिटे। वृद्धि: लाभ आकर जाए।
योग 10: 12H में शुक्र+केतु = “शय्या-सुख मोक्ष योग” वर्णन: भोग-शय्या सुख में कमी, खर्च अधिक। फल: विदेश-शयन सुख, अस्पताल खर्च। वृद्धि: मोक्ष मार्ग, स्वप्न सिद्धि।
लाभ 1: वैराग्य-प्राप्ति यह युति मनुष्य को सांसारिक भोगों की निस्सारता का बोध कराती है। परिणामस्वरूप वह धर्म, दान और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रवृत्त होता है।
लाभ 2: कला-सिद्धि शुक्र कला का कारक है, केतु सूक्ष्मता देता है। इस युति से संगीत, चित्रकला, गुप्त विद्या में निपुणता प्राप्त होती है।
लाभ 3: स्त्री-रक्षा पत्नी के नाम से दान-धर्म करने पर पत्नी का आयुष्य, आरोग्य एवं सौभाग्य बढ़ता है। गृहलक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं।
हानि 1: धन-अस्थिरता संचित धन व्यर्थ व्यय, रोग, विवाद अथवा चोरी द्वारा नष्ट होने की आशंका रहती है। लक्ष्मी चंचल हो जाती हैं।
हानि 2: दाम्पत्य-क्लेश पारस्परिक समझ के अभाव में पति-पत्नी के मध्य भावनात्मक दूरी उत्पन्न होती है। शारीरिक सुख में न्यूनता आती है।
हानि 3: मिथ्या-अपवाद समाज में बिना कारण अपयश की प्राप्ति होती है। विशेषकर स्त्री वर्ग से संबंधित विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
उपाय: श्री शुक्र-केतु प्रवाह कवच : शुक्र-केतु युति शांति विधान, लघु पाराशरी_
श्लोक:
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः। ॐ कें केतवे नमः॥ अलक्ष्मीं परिहर मे त्वं लक्ष्मीं देहि च शाश्वतीम्। प्रवाहेण धनं देहि मा बद्धं कुरु केतुके॥
हिंदी अर्थ: ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्र को नमस्कार। ॐ कें केतु को नमस्कार। हे देवी, अलक्ष्मी को दूर करो और शाश्वत लक्ष्मी दो। प्रवाह से धन दो, हे केतु इसे बाँधो मत।
विधि:
लाभ: 21 दिन में व्यर्थ व्यय रुके, 43 दिन में आय के नए मार्ग, 4 माह में लक्ष्मी स्थिर।
विद्या: श्री कमला महाविद्या – शुक्र की अधिष्ठात्री
॥ श्री देवी भागवत महापुराण ॥
स्कन्ध १२, अध्याय १०, श्लोक २७
शुक्र-केतु-समायोगे दरिद्रा गृह-मागता। कमला-सेवया सद्यः सा भवेत् श्री-सुपूजिता॥
॥ हिंदी अर्थ ॥
शुक्र और केतु के संयोग होने पर जब घर में दरिद्रता का वास हो जाए, तब माँ कमला (महालक्ष्मी) की सेवा-साधना करने से वह दरिद्रता शीघ्र ही दूर हो जाती है और वह घर पुनः लक्ष्मी जी की कृपा से ऐश्वर्यवान बन जाता है।
श्री मद भागवत 8.8.11 से सिद्धांत:
यथा हि पुरुषो भारं शिरसा लोक-मावहेत्। न तथा द्विभुजो भारं बिभर्ति स्व-शिरः स्वयम्॥
हिंदी अर्थ: जैसे मनुष्य सिर पर भार ढोकर लोगों को दिखाता है, वैसे दो भुजाओं वाला अपने सिर का भार स्वयं नहीं ढोता।
लोक भाषा: लक्ष्मी सिर पर ढोने से नहीं, बाँटने से बढ़ती है।
उपाय – कमला धन-प्रवाह प्रयोग:
5 लाभ:
लाभ 1: दरिद्रता का नाश – घर से अलक्ष्मी पलायन, श्री का आगमन। 40 दिन में अनुभव।
लाभ 2: रुका धन प्राप्ति – कोर्ट-कचहरी, उधारी, बीमा का पैसा अचानक मिले।
लाभ 3: पत्नी सुख वृद्धि – पत्नी का स्वास्थ्य, सौंदर्य, आयु बढ़े। दाम्पत्य मधुर।
लाभ 4: व्यापार में विस्तार – ग्राहक स्वयं चलकर आएँ। सुगंध व्यापार, वस्त्र, सौंदर्य उद्योग में विशेष लाभ।
लाभ 5: भोग-मोक्ष दोनों – लक्ष्मी रहे पर बाँधे नहीं। भोगते हुए भी वैराग्य रहे।
समय: पहले शुक्रवार से संकेत, 8वें शुक्रवार से प्रत्यक्ष लाभ, 16वें शुक्रवार को पूर्ण सिद्धि।
हे वत्स, अंतिम मर्म सुनो:
पानी रुके तो काई, धन रुके तो बुराई।
बहता पानी निर्मला, बहता धन लक्ष्मी कला।
केतु काटे संचय को, शुक्र बढ़ाए व्यय को।
व्यय धर्म में हो तो, लक्ष्मी घर की जय हो।
जिसने प्रवाह का नियम जान लिया, उसने शुक्र-केतु जीत लिया।
जिसने जोड़ने की जिद की, उसने सब कुछ खो दिया।