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जब राजनीति विचारों से भटक गई

ओवैसी कहाँ का है???
तो हैदराबाद का…

क्या उसने यहाँ विकास किया???
क्या उसने कम से कम विकास की बातें ही कीं???
क्या उसने मुंबई तक जैसे चैनलों को पैसे दिए???
क्या वागले, विश्वंभर, सरोदे जैसे लोगों को पाला???
क्या उसके तेलुगु भाषी होने का किसी ने मुद्दा बनाया???

फिर भी उसे 125 नगरसेवक मिले!!!

यह बात पेट्रोल, प्याज, आरक्षण, भाषावाद, प्रांतवाद, लुंगी, पुंगी बजाने वाले हिंदुओं को सोचने पर मजबूर करती है।

क्या तुमने सोचना ही छोड़ दिया है???

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मेरी शिवसेना को तू कहाँ ले जाकर रख दिया?

उद्धव…मैं ऊपर से देख रहा हूँ… और मेरे शिवसैनिकों के चेहरों पर छाई निराशा
मुझे बेचैन कर रही है।
मैं ऊपर से देख रहा हूँ।
आज भी मेरी नज़र मुंबई पर है,
महाराष्ट्र पर है,
मेरे हिंदू समाज पर है,
और शिवसेना के भगवा झंडे पर है।
आज उस झंडे का रंग मुझे फीका लग रहा है।

चाहे मुंबई महानगरपालिका हो
या पूरे महाराष्ट्र की महानगरपालिका चुनाव,
शिवसेना की जो हार हुई है,
वह सिर्फ आँकड़ों की हार नहीं है,
वह तुम्हारे द्वारा किए गए
गलत अवसरवादी राजनीति का परिणाम है।

उद्धव…
तू सिर्फ चुनाव नहीं हारा,
तू मेरे द्वारा खड़ी की गई शिवसेना को ही हार गया।
कांग्रेस के साथ गठबंधन किया,
वहीं पहली गलती हुई।
जब समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया,
तब हिंदू समाज के मन में पहला सवाल उठा…
“क्या यही शिवसेना है?”

मुस्लिम वोटों का हिसाब लगाते हुए
तूने हिंदू मतदाता को अपने आप में गिन लिया।
यही सबसे बड़ा भ्रम तूने पाल लिया।

अरे उद्धव…
हिंदू कभी लाचार नहीं होता,
लेकिन जब उसे लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है,
तो वह चुपचाप दूर चला जाता है।
आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वालों को,
राष्ट्रविरोधी बयानों की पृष्ठभूमि वाले लोगों को
टिकट दिए गए,
तब पहली बार मैंने
मेरे शिवसैनिकों की आँखों में अपमान देखा।

मैंने शिवसेना बनाई थी
मराठी मानुष के लिए,
हिंदू अस्मिता के लिए,
और राष्ट्राभिमान के लिए।
तू उसे कहाँ ले जाकर रख दिया?

आज मुझे दुःख हो रहा है,
लेकिन वह दुःख
उद्धव ठाकरे के रूप में तुम्हें देखकर नहीं है,
मुझे दुःख हो रहा है
उन शिवसैनिकों को देखकर
जिन्होंने मेरे विचारों पर भरोसा करके
शिवसेना खड़ी करने के लिए
खून-पसीना बहाया।

मेरी एक पुकार पर
हिंदुओं की रक्षा के लिए
सड़कों पर उतर आने वाले
उन शिवसैनिकों के
निराश और हताश चेहरों को मैं देख रहा हूँ,
जिन्होंने मेरी एक आवाज़ पर
घर-बार छोड़ दिया था।
आज वे सैनिक पूछते हैं—
“साहेब, हम कहाँ चूक गए?”
नहीं,
उनकी कोई गलती नहीं है।

उद्धव…
गलती तुम्हारे नेतृत्व की है।
अगर नेतृत्व भ्रम में हो,
तो संगठन टूट जाता है।
अगर नेतृत्व विचार छोड़कर
स्वार्थी गणित लगाने लगे,
तो जनता फैसला सुना देती है।

हिंदू समाज को तुमसे अपेक्षा थी—
दृढ़ भूमिका,
निडर आवाज़,
हिंदुओं की रक्षा करने वाली,
उनकी बुलंद आवाज़ बनने वाली,
और किसी से न डरने वाला
बेधड़क नेतृत्व।

लेकिन तुम्हें सत्ता का शॉर्टकट चाहिए था।
मैंने कभी शॉर्टकट नहीं लिया।
मैंने दुश्मन से आमने-सामने लड़ाई लड़ी।
मेरी राजनीति साफ थी—
जो विरोध में है, वह विरोध में ही है।
जो राष्ट्रविरोधी है,
जो हिंदुओं का विरोधी है,
मैं उसका विरोधी ही रहा।

आज शिवसेना की पहचान ही मिटा दी गई है।

उद्धव,
या तो तुम्हें समझ नहीं आया,
या समझकर भी तुमने स्वीकार नहीं किया।
राजनीति कोई विरासत में मिला सिंहासन नहीं है,
उसे रोज़ जनता के विश्वास से कमाना पड़ता है।
आज शिवसेना हारी है,
क्योंकि उसने अपनी पहचान खो दी।
और याद रख—
इतिहास हार को माफ कर देता है,
लेकिन विश्वासघात को कभी माफ नहीं करता।

मैं ऊपर से देख रहा हूँ…
और आज भी कह रहा हूँ—
शिवसेना कभी सौदों के लिए नहीं थी,
वह संघर्ष के लिए थी।
जो अपने शाश्वत उद्देश्य को भूल जाता है,
और उस उद्देश्य की रक्षा का संघर्ष भूल जाता है,
उसे एक दिन
जनता भी भूल जाती है।

उद्धव,
इसके लिए मेरा शिवसैनिक जिम्मेदार नहीं है,
इसके लिए तुम्हारा सत्ता-लोभी नेतृत्व जिम्मेदार है।

 

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शिव सेना प्रमुख और पुल की ‘वो’ मुलाकात और वो तस्वीर जो आज तक कभी जारी नहीं हुई.

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