
आज पुन: यह पोष्ट अपलोड कररहा हुँ क्यों कि कुछ लोगौं में जो मान्सिक्ता देखरहाहुँ विश्वकर्मा ब्राह्मण के प्रति वह निश्चित ही बहुत समय लगेगा परिवर्तन होने में या कहिएतो उनलोगौं को समझमें हि नहि आता है । मै कहना चाहुङ्गा उनसे कृपया थोडा समय देकर ईसको पढिए ।
*शिल्पकर्म* की उत्पत्ति वेदांग कल्प के शुल्ब-सूत्र से हुई है और वास्तुकला की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष की संहिता स्कंध से हुई है। वेदांग ग्रंथों का अध्ययन करना ब्राह्मणो का प्रमुख कर्तव्य आदिकाल से रहा है। शुल्ब-सूत्र से यज्ञवेदी (यज्ञकुंड), यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञपात्र, मूर्ति आदि का निर्माण होता हैं। जो ब्राह्मण शुल्ब-सूत्र में निहित शिल्पकर्म नहीं जानता वो ये निर्माण नहीं कर सकता । जो ब्राह्मण शिल्पकर्म नहीं जानता उसे यज्ञ करने का अधिकार भी नहीं है क्योंकि आदिकाल से लेकर अब तक वैदिक यज्ञों में यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञवेदी, यज्ञपात्र आदि शिल्पकर्म से ब्राह्मण ही निर्मित करते आए हैं। इसलिए ब्राह्मणों के द्वारा किए जाने वाले शिल्पकर्म को ब्रह्मशिल्प कर्म भी कहा जाता है औऱ ऐसे ब्राह्मणों को ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण भी कहा जाता हैं। वास्तुकला से बड़े बड़े नगर, दुर्ग, किले, देवालय (मंदिर), महल, वापी, कूप, बावड़ी, तालाब,बड़े बड़े जलाशय आदि का निर्माण होता है। जिन ब्रह्मशिल्प कर्मो का निर्वहन आज भी विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मण पाँच प्रकार के शिल्पकर्मो के माध्यम से करते आ रहें है। पंचशिल्पकर्म निम्न है , लौह शिल्प – लौहकार ब्राह्मण (लोहार), काष्ठ शिल्प – काष्ठकार ब्राह्मण (बढ़ई) , ताम्र शिल्प – ताम्रकार ब्राह्मण, शिला शिल्प – शिल्पी ब्राह्मण , स्वर्ण शिल्प – स्वर्णकार ब्राह्मण (सोनार) करते है। ये सब कर्म शिल्पविज्ञान के अन्तर्गत आता है अतः इसके ज्ञाता वैज्ञानिक भी कहलाते हैं। लौह शिल्प औऱ काष्ठ शिल्प को करने वाले ब्राह्मण आज भी समस्त भारतवर्ष में पाए जाते हैं। उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में जो स्वर्णकार ,ताम्रकार है उनमें अधिकतर मेढ क्षत्रिय और हैहयवंशी क्षत्रिय हैं इनका विश्वकर्मा वंश के मूल ब्राह्मणों से कोई संबंध नहीं हैं। इन क्षेत्रों में कुछ लोग हों सकते हैं जो मूलरूप से विश्वकर्मा ब्राह्मण कुल के स्वर्णकार, ताम्रकर औऱ शिल्पकार हों परंतु, अधिकतर नहीं हैं। मूलरूप से विश्वकर्मा स्वर्णकार ब्राह्मण और विश्वकर्मा ताम्रकार ब्राह्मण आज भी महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के सभी राज्यों में पाए जाते हैं। जो मूल रूप से विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मणों की परंपराओं से आदिकाल से जुड़े हुए हैं। उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में जो कुछ शिल्पकार जाती हैं वो भी विश्वकर्मा वैदिक शिल्पी ब्राह्मणों के अंतर्गत नहीं आती हैं जिन्होंने व्यवसाय के अभाव में अपनी जीविका चलाने के लिए शिल्प को अपना लिया। मूलरूप से विश्वकर्मा शिल्पकार ब्राह्मण समाज जो पत्थर के शिल्प से जुड़ा है वह आज भी महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के सभी राज्यों में आज भी परंपराओं से पाए जाते है परंतु, कुछ इनमें भी अपवाद हो सकते हैं जो विश्वकर्मा कुल के पंचशिल्पी या ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण नहीं है। झारखंड और बिहार के कुछ भागों में लोहारा या लोहरा नाम से आदिवासी वनवासी जनजाति समुदाय है जिनका विश्वकर्मा कुल परंपरा के विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मण लोहार से कोई संबंध नहीं है। ऐसे ही घुमक्कड़ प्रकार की कुछ आदिवासी जनजाति जो जीविका के अभाव में लोहे का छोटा-मोटा कर्म करते हैं राजस्थान में उनको गाड़िया लोहार और महाराष्ट्र में भटक्या जमाती या गाड़िया लोहार बोला जाता है इनका भी विश्वकर्मा कुल के पांचाल ब्राह्मण लोहार से कोई संबंध नहीं है। शिल्प अपने आप में एक व्यापक शब्द है शिल्प करने का अधिकार शास्त्रों में तीन वर्णों को है ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य। परंतु, जो ब्राह्मण जाति ब्रह्मशिल्प कर्म के पांच प्रकार के शिल्प कर्म
(लौहशिल्प, काष्ठशिल्प, ताम्रशिल्प, शिलाशिल्प, स्वर्णशिल्प) से जुड़ी है वही विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण कहलाते हैं। वैदिक गुरुकुलों में अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद अर्थात शिल्पवेद का अध्ययन ब्राह्मणो के लिए ब्रह्म विद्या में श्रेष्ठता का प्रतीक होता है। संपूर्ण वेद सहित शिल्पवेद के साथ शास्त्रों के ज्ञाता को आचार्य पद प्राप्त होता है। वो ही यज्ञ के सर्वोच्च पद ‘ ब्रह्मा ‘ का अधिकारी होता है। इन्ही वैदिक ब्रह्मशिल्प कर्मो के धारण करने के कारण ये शिल्पी ब्रह्मशिल्पी भी कहलाते हैं। विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण भारत वर्ष के लगभग सभी राज्यों में पाए जाते हैं उनके मुख्य उपनाम इस प्रकार हैं – शर्मा ,आचार्य (आचारी ,चारी) , विश्वकर्मा , पांचाल , धीमान ,जांगीड़, ओझा , झा , मैथिल , मालवीय ,गौड़ , सुथार या सुतार , मिस्त्री , राणा , महाराणा, वेदपाठक , महामुनि, दीक्षित , धर्माधिकारी , पंडित आदि १०० से ज्यादा उपनाम प्रचलित एवं प्रयोग होते हैं इनमें से कुछ उपनाम अन्य ब्राह्मणों द्वारा भी प्रयोग होता है।
समस्त मनुष्य जाति देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित शिल्प कर्मों के निर्माणों द्वारा अपनी जीविका चलाती है जो आदिकाल से चला आ रहा हैं जिसके प्रमाण अनेकों शास्त्रों में है; महाभारत , शिवमहापुराण आदि का प्रमाण देते हैं और अन्य पुराणों एवं शास्त्रों में भी यही श्लोक लगभग कुछ शब्दों के बदल के साथ यथारूप से हैं;
*भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः।*
*यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकारह।।*
*मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः।*
*पूजयन्ति च यं नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम्।।*
अर्थात – सभी प्रकार के आभूषणों के कर्ता शिल्पियों में श्रेष्ठ देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने देवताओं के दिव्य विमानों का अपनी ब्रह्मशिल्प विद्या से निर्माण किया। जिस महात्मा विश्वकर्मा जी के शिल्पकर्म से संपूर्ण मनुष्य अपनी अपनी उपजीविका का निर्वहन करते हैं वे लोग प्रतिदिन उस अविनाशी विश्वकर्मा का पूजन करतें हैं।
(महाभारत-०१-आदिपर्व-६७/२९-३०)
(ब्रह्माण्डपुराण/मध्यभाग/अध्याय-५९ श्लोक -१९)
(ब्रह्मपुराण/अध्याय-३, श्लोक – ४६)
(शिवपुराण/संहिता ५(उमासंहिता)अध्याय-३१,श्लोक- ३४) (विष्णुपुराण/प्रथमांश/अध्याय- १५,श्लोक -१२०)
(वायुपुराण/उत्तरार्धम्/अध्याय-२२,श्लोक – १८)
(हरिवंशपुराण/पर्व १,/अध्याय- ३, श्लोक – ४८)
शास्त्रों में विज्ञान अर्थात शिल्प के संदर्भ में अनेकों उल्लेख है। वास्तुकला ज्योतिष का मुख्य विषय है औऱ ज्योतिषी तो ब्राह्मणों को ही कहा जाता है। जिसक़े प्रमाण निम्न है;
*वास्तुविद्यान्ग विद्यावायस विद्यानंतर..॥*
– (वाराही संहिता अ.२,श्लोक ६)
अर्थात – वास्तुकला ज्योतिष शास्त्र का विषय है।
वास्तुकला के अन्तर्गत घर , मकान , कुँवा, बावड़ी , पुल , नहर , किला , नगर, देवताओं के मंदिर आदि शिल्पादि पदार्थो की रचना की उत्तम विधि होती है।
*ब्राह्मणो के इष्टकर्म और पूर्तकर्म*
ब्राह्मणो के दो प्रकार के कर्मो से परिचय कराएंगे। एक है ‘ इस्ट ‘ कर्म और दूसरा है ‘ पूर्त ‘ कर्म। इस्ट कर्म से ब्राह्मणो को स्वर्गप्राप्ति होती है और पूर्त कर्मो से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अर्थात जो ब्राह्मण इस्ट कर्म ही सिर्फ करके पूर्त कर्म ना करें उसे मोक्ष नहीं मिल सकता है जो सनातन धर्म में मनुष्यों का अंतिम लक्ष्य है। इसके प्रमाण स्वरूप कुछ धर्मशास्त्र से प्रमाण निम्न है ,
*इस्टापूर्ते च कर्तव्यं ब्राह्मणेनैव यत्नत:।*
*इस्टेन लभते स्वर्ग पूर्ते मोक्षो विधियते॥*
– (अत्रि स्मृति)
– (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ – ६ – पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)
अर्थात – इष्टकर्म और पूर्तकर्म ये दोनों कर्म ब्राह्मणो के कर्तव्य है इसे बड़े ही यत्न से करना चाहिए है। ब्राह्मणो को इष्टकर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और पूर्तकर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसी प्रकार की व्याख्या यम ऋषि ने भी धर्मशास्त्र यमस्मृति में की है जो निम्न है ;
*इस्टापूर्ते तु कर्तव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नत:।*
*इस्टेन लभते स्वर्ग पूर्ते मोक्षं समश्नुते*
– (यमस्मृति)
– (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ १०६ – पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)
अब अत्रि ऋषि की अत्रि स्मृति नामक धर्मशास्त्र के आगे के श्लोक से इष्ट कर्म और पूर्त कर्मो के अन्तर्गत कौन से कर्म आते है उसकी व्याख्या निम्न है ;
*अग्निहोत्रं तप: सत्यं वेदानां चैव पालनम्।*
*आतिथ्यं वैश्यदेवश्य इष्टमित्यमिधियते॥* *वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च।*
*अन्नप्रदानमाराम: पूर्तमित्यमिधियते॥*
– (अत्रि स्मृति)
– (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ – ६ – पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)
अर्थात – ब्राह्मणो को अग्निहोत्र(हवन), तपस्या , सत्य में तत्परता , वेद की आज्ञा का पालन, अतिथियों का सत्कार और वश्वदेव ये सब इष्ट कर्म के अन्तर्गत आते है। ब्राह्मणो को बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि तालाबो का निर्माण, देवताओं के मंदिरों की प्रतिष्ठा जैसे शिल्पादि कर्म , अन्नदान और बगीचों को लगाना जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसे कर्म पूर्त कर्म है।
उपर्युक्त सभी अकाट्य प्रमाणो से ये सिद्ध होता है कि ब्राह्मणो के सिर्फ षटकर्म जैसे इष्टकर्म ही नहीं है अपितु शिल्पकर्म जैसे पूर्तकर्म भी है जिनमें बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि तालाबो का निर्माण, देवताओं के मंदिरों के निर्माण एवं प्रतिष्ठा जैसे कर्म शिल्पकर्म के अन्तर्गत आते है जिसके करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है जो सनातन धर्म का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है। पूर्तकर्म (शिल्पादि कर्म) का उल्लेख अथर्ववेद में भी आया है।
महर्षि पतंजलि ने शाब्दिक ज्ञान को मिथ्या कहा है। कल्प के व्यावहारिक ज्ञाता को ही ब्राह्मण कहा जाता है। क्योंकि उसी वेदांग कल्प के शुल्व सूत्र से शिल्पकर्म की उत्पत्ति हुई है। ब्रह्मा जी ये सृष्टि को अपनी सर्जना से कल्पित अर्थात निर्मित करते है उन्हीं ब्रह्मा जी की सृजनात्मक कल्पना शक्ति जिसमें होती है वहीं ब्राह्मण कहलाता है।
सर्जनात्मक विधा ही निर्माण अर्थात शिल्पकर्म कहलाती है।
ब्रह्मा जी का प्रमुख कर्म है सृजन अर्थात निर्माण इसी के कारण इनका पद ‘ब्रह्मा ‘ है। ब्रह्मा जी एक दिन और रात को ‘ कल्प ‘ कहते हैं। कल्प का अर्थ होता है यज्ञ। वेदांग कल्प के शुल्व सूत्र से शिल्पकर्म की उत्पत्ति हुई हैं। वेदांग कल्प से निर्मित होने के कारण शिल्पकर्म भी यज्ञ सिद्ध होता हैं। निर्माण से संदर्भ में यज्ञशाला या शाला का निर्माण का उल्लेख वेदो के साथ-साथ अन्य शास्त्रों में भी बहुत से स्थानों पर है हम आपके समझ अथर्ववेद का एक ऐसा ही उदाहरण देते हैं जिसमें शाला के निर्माण को ब्राह्मणों द्वारा बताया गया है ;
*ब्रह्मणा शालां निमितां कविभिर्निमितां मिताम् ।*
*इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः ॥*
– (अथर्ववेद कांड -९, सूक्त – ३, मंत्र – १९)
अर्थात – ब्रह्मशिल्प विद्या को जानने वाले ब्राह्मणों ने शाला का निर्माण किया और सह विद्वानों ने इस निर्माण के नापतोल में सहायता की हैं। सोमरस पीने के स्थान पर बैठे हुए इंद्रदेव और अग्नि देव इस शाला की रक्षा करें।
सभी को यह स्मरण रहे कि अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद अर्थात शिल्प वेद है उपर्युक्त मंत्र अथर्ववेद का है जिसमें अथर्ववेद को जानने वाले ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मणों ने शाला का निर्माण किया। अथर्ववेद के अनुसार
अंगिरस ब्राह्मण अर्थात अथर्ववेदीय ब्राह्मण परमात्मा के नेत्र समान है। अथर्ववेद के ज्ञाता को यज्ञ में सर्वोच्च पद ‘ब्रह्मा’ का प्राप्त है। ब्रह्मशिल्पी विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण कुल के ब्राह्मण अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद होने के कारण ‘अथर्ववेदीय विश्वकर्मा ब्राह्मण ‘ भी कहलाते हैं
वेदों में अथर्ववेदीय ब्राह्मणों की महिमा का अभूतपूर्व वर्णन है।
अथर्ववेद में विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मणों को यज्ञवेदियों (यज्ञकुण्डों) का निर्माण करके यज्ञ का विस्तार करने वाला अर्थात यज्ञकर्ता कहा गया है;
*यस्यां वेदिं परिगृहणन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माण:।*
*यस्यां मीयन्ते स्वरव: पृथिव्यामूर्ध्वा: शुक्रा आहुत्या: पुरस्तात् ॥*
*सा नो भूमीर्वर्धयद् वर्धमाना ॥*
– (अथर्ववेद कांड-१२ , सूक्त-१, मंत्र-१३)
अर्थात – जिस भूमि पर सभी ओर वेदिकाऍ (यज्ञकुण्डों) का निर्माण करके विश्वकर्मादि(शिल्पी ब्राह्मण) यज्ञ का विस्तार करके यज्ञ करते हैं। जहाँ शुक्र (स्वच्छ या उत्पादक) आहुतियों के पूर्व यज्ञीय आधार स्थापित किए जाते हैं तथा यज्ञीय उद्घोष होते हैं। वह वर्धमान भूमि हम सब का विकास करे।
उपर्युक्त सभी अथर्ववेद के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि निर्माण का कर्म ब्राह्मणों का है इसलिए शिल्प विद्या को ब्रह्मशिल्पी विद्या भी कहा जाता है। इन अकाट्य वैदिक प्रमाणों शिल्पकर्म ब्राह्मण कर्म सिद्ध होता है और इसको करने वाले ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण अथवा अथर्ववेदीय विश्वकर्मा ब्राह्मण कहलाते हैं।
पांच प्रकार के शिल्पकर्म में निपुण ब्राह्मणों को पंचशिल्पी या पांचाल ब्राह्मण कहा जाता हैं इसका एक संदर्भ वैदिक पांचाल महाजनपद से संबंधित ब्राह्मणों को पांचाल ब्राह्मण कहा जाता है। परंतु, मूल रूप से पंचशिल्प कर्मों में निपुण ब्राह्मणों को ही संपूर्ण भारतवर्ष में पांचाल ब्राह्मण कहा जाता है।
वराह महापुराण में कई श्लोकों में प्रत्यक्ष रूप से पांचाल के साथ ब्राह्मण शब्द प्रयोग हुआ हैं ;
*पंचानां तु कनिष्ठो यः पंचालो ब्राह्मणात्मजः ।।*
*वाणिज्यभाण्डमादाय समूहस्य प्रसंगतः ।।*
– (वराह महापुराण अध्याय – १७६, श्लोक – १)
अर्थात – जो ब्राह्मण का पुत्र पांचाल है वो पाँच पुत्रों में से कनिष्ठ पुत्र है , जिसने वाणिज्यकर्म में अपने आप को नियोजित किया है ।
*किं करोषि दिवारात्रौ ब्रूहि त्वं पृच्छतो मम ।।*
*पांचालो ब्राह्मणसुतो वाणिज्यं च समाश्रितः ।।*
– (वराह महापुराण अध्याय – १७६,श्लोक – १६)
अर्थात – (तीर्थ स्नान करने हेतु आए सुमंतु नामक एक आदमी पूछता है कि ) “रात दिन यही रहके आप क्या कर रहे है , आप कौन है ! तब पांचाल ने कहा मैं पांचाल ब्राह्मण का पुत्र हूँ और यहाँ पर अपना व्यापार करता हूँ ।
पद्मपुराण में पांचाल ब्राह्मणों को सर्व शास्त्रों का ज्ञाता कहा गया है ;
*पंचाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्॥*
(पद्मपुराण/खण्डः१(सृष्टिखण्ड)/अध्याय-१०,श्लोक – ११६)
अर्थात – पांचाल (पांचाल ब्राह्मण) जो इस लोक में सभी शास्त्रों के विद्वान के रूप में जाने जाते हैं।
उपर्युक्त, वराहपुराण के श्लोकों से ये प्रमाणित होता है कि वहाँ पर पांचाल शब्द ब्राह्मण बोधक है और पांचाल को पांचाल ब्राह्मण का पुत्र कहा गया है। साथ ही पद्मपुराण के प्रमाण से ये सिद्ध होता है कि पांचाल ब्राह्मण सभी शास्त्रों का ज्ञाता है। ब्राह्मणों के प्रसिद्ध ग्रंथ ब्राह्मणोंत्पत्तिमार्तंड एवं ब्राह्मणोंत्पत्ति दर्पण आदि ग्रंथों में पांचाल ब्राह्मणों का प्रामाणिक वर्णन हैं। इन्हीं पांचाल
ब्राह्मणों को विराट संदर्भ में विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण कहा जाता है।
देवशिल्पी त्वष्टा प्रजापति विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य हैं ऐसे अनेकों शास्त्रों में वर्णित है वायुपुराण एवं स्कंदपुराण में भी उनके ब्रह्मशिल्प वास्तु कर्मों को धारण करने वाले जो उनके पुत्र समान हैं उनको भी उन्हीं के समान आचार्य अर्थात ब्राह्मण माना गया है ;
*देवाचार्यस्य महतो विश्वकर्मस्य धीमतः।*
*विश्वकर्मात्मजश्चैव विश्वकर्ममयः स्मृतः॥*
– (वायुपुराण, अध्यायः २२, श्लोक – २०)
अर्थात – महान और धीमान अर्थात बुद्धिमान विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य (गुरु) हुए और उनके कर्मों को धारण करने वाले पुत्र भी उन्हीं के समान गुणों वाले हुए।
उपर्युक्त, वायुपुराण के प्रमाणों से भी से भी ब्रह्मशिल्प वास्तु को धारण करने वाले आचार्य ब्राह्मण सिद्ध होते हैं।
*देवाचार्यस्य तस्येयं दुहिता विश्वकर्मणः।*
*सुरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भामिनी ॥*
– (स्कन्दपुराण/खण्डः ७ (प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्यम्/अध्यायः ११/श्लोक – ७५)
अर्थात – देवताओं के आचार्य विश्वकर्मा की सुंदर पुत्री जो है वो तीनों लोकों में सुरेणु के नाम से प्रसिद्ध है।
*तस्मिन्नेव ततः काले शिल्पाचार्यो महामतिः ।*
*विश्वकर्मा सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य प्रमुखे स्थितः ।।*
-(हरिवंशपुराण/पर्व २(विष्णुपर्व)/अध्यायः ०५८,श्लोक -२२)
अर्थात – उसी क्षण देवताओं में श्रेष्ठ महान बुद्धिजीवी देवताओं के शिल्प के आचार्य विश्वकर्मा जी भगवान कृष्ण के समक्ष आ प्रकट हुए।
शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ १/७/१/५ स्पष्ट में कहा गया है कि
*यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म:*
अर्थात यज्ञ ही मनुष्यों का श्रेष्ठतम कर्म है।
अब हम आपको वाल्मीकि रामायण का एक श्लोक का उदाहरण देकर शिल्पियो द्वारा किये यज्ञकर्म अर्थात श्रेष्ठकर्म का वर्णन करेंगे ;
*न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि ।*
*यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा ॥*
*तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम् ।*
*ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन च ॥*
– (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग – १३, श्लोक -१५-१६)
अर्थात – जो मनुष्य यज्ञादि कर्मों में सावधान है ऐसे शिल्पकार (ब्रह्मशिल्पी) लोगों का काम, क्रोध, भय तथा किसी भी प्रकार से अपमान न करें अपितु , उनका धनादि पदार्थ व अनेक विधि भोजनादि से विशेषकर पूजन करें।
वाल्मीकि रामायण मे भी शिल्पकर्म को ब्राह्मण कर्म माना गया है ;
*इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।*
*चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शुल्बकर्मणि॥*
– (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग – १४,श्लोक -२८)
अर्थात – यज्ञ हेतु अग्निकुंड में ईंटें नियम और मानकों के अनुसार बनाई गई थीं। शुल्ब-सूत्र से उत्पन्न शिल्पकर्म मे निपुण ब्राह्मणों ने इन ईंटो से अग्निकुंड बनाकर अग्नि स्थापित की गईं।
*स चित्यो राजसिंहस्य संचितः कुशलैर्द्विजैः। *
*गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मकः ॥*
– (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग – १४, श्लोक – २९)
अर्थात – इस प्रकार राजसिंह महाराज दशरथ के यज्ञ मे कुशल ब्राह्मणों (शिल्पी ब्राह्मणों) ने स्वर्ण की ईंटों से पंख बना अठारह प्रस्तार का एक गरुण बनाया।
यद्यपि , यज्ञवेदी अर्थात यज्ञकुंड शिल्पकर्म से ही निर्मित होता है अतः इन यज्ञकुंडो को निर्मित करने वाले ब्राह्मणों अर्थात शिल्पियों को द्विज अर्थात ब्राह्मण ही कहा गया है।
सर्वप्रथम हमें ये ज्ञात होना चाहिए कि शिल्पकर्म विज्ञान के अंतर्गत ही आता है जो कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी माना है। उन्होंने शिल्पकर्म को यज्ञकर्म माना है। सत्यार्थ प्रकाश तृतीय समुल्लास में मनुस्मृति के २/२८ के श्लोक *महायज्ञैश्च यज्ञैश्च..* का अर्थ *शिल्पविद्या* किया है।
सत्यार्थप्रकाश नामक ग्रन्थ में तृतीयसमुल्लास में उन्होंने मनुस्मृति के अध्याय २, श्लोक ३ को उधृत करते हुए लिखा है कि ” सकल विद्या पढ़ने पढ़ाने , ब्रह्मचर्य , सत्यभाषणादि नियम पालने , अग्निहोत्रादि होम, सत्य का ग्रहण, असत्य का त्याग और सत्य विद्याओं का दान देने, वेदस्थ कर्मोपासना, ज्ञान , विद्या के ग्रहण , पक्षेष्ट्यादि करने , सुसन्तानोत्पत्ती , ब्रह्म , देव , पितृ , वैश्वदेव और अतिथियों के सेवनरूप पंच महायज्ञ और अग्निष्टोमादि तथा *शिल्पविद्याविज्ञानादिर यज्ञों* (शिल्पकर्म) के सेवन से इस शरीर को ब्राह्मी अर्थात वेद और परमेश्वर की भक्ति का आधार रूप *ब्राह्मण* का शरीर बनता है। इतने साधनों के बिना ब्राह्मण शरीर नहीं बन सकता। ” इस श्लोक के अर्थ में महर्षि दयानंद ने ये सिद्ध किया है कि शिल्प विज्ञान के धारण के बिना मनुष्य ब्राह्मण नहीं कहला सकता है।
भविष्य पुराण में शिल्पकर्म एवं वेदो के अध्ययन को ब्राह्मणों का लक्षण बताया गया है।
*आचारहीनान्न पुनंति वेदा यद्यप्यधीताः सह षद्भिरङ्गैः।*
*शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु।* -(भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व-१, अध्याय – ४१,श्लोक – ७)
अर्थात – वेदों का अध्ययन छ: अंगों द्वारा होते हुए भी सदाचार से रहित व्यक्ति को शुद्ध नहीं करता। शिल्पकर्म के लिये वेदों का अध्ययन द्विज रूपी ब्राह्मणों के कर्म एवं लक्षण हैं।
पुराणों में भी शिल्पकर्म को करने वाले को ब्राह्मण कहा गया। जिसका प्रमाण ब्रह्मवैवर्तपुराण में अंकित है जिसमें कारू (बढ़ई) कर्म अर्थात शिल्पकर्म को ब्राह्मण कर्म के रूप में वर्णन किया गया है;
*स एव ब्राह्मणो भूत्वा भुवि कारुर्बभूव ह ।*
*नृपाणां च गृहस्थानां नानाशिल्पं चकार ह ।।*
*शिल्पं च कारयामास सर्वेभ्यः सर्वतः सदा ।*
*विचित्रं विविधं शिल्पमाश्चर्य्यं सुमनोहरम् ।।*
– (ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः १ (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०,श्लोक – ६८-६९)
अर्थात – वह ब्राह्मण पृथ्वी पर कारू अर्थात बढ़ई बना।
उन्होंने राजाओं के घरों के लिए विभिन्न शिल्प भी बनाए।
उन्होंने हर स्थान पर सभी के लिए शिल्प भी बनाए। उसका शिल्प कौशल अद्भुत एवं रमणीय था।
वेद ज्ञान है उन्हीं वेदों के अंतर्गत आने वाला जो प्रमुख विषय हैं ‘ शिल्प ‘ वह विज्ञान है। शास्त्रों में अनेकों स्थानों पर शिल्प को विज्ञान शास्त्र कहा गया है। आदिकाल से ब्राह्मणों का मूल कर्म विज्ञान ही रहा है इसलिए ब्राह्मण वैज्ञानिक या ज्योतिषाचार्य भी कहलाते हैं। ज्योतिष भी सर्वोच्च विज्ञान ही है ज्योतिष की संहिता स्कंध से ही वास्तु विज्ञान की उत्पत्ति हुई है और वेदांग कल्प के शुल्व-सूत्र से शिल्प विज्ञान की उत्पत्ति हुई है।
शब्दकल्पद्रुम संस्कृत का आधुनिक युग का एक महाशब्दकोश है। जिसमें विज्ञान शब्द की व्याख्या करते हुए निम्न उल्लेख हैं ;
*मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्प-शास्त्रयोः।* (शब्दकल्पद्रुम)
अर्थात – मोक्ष अर्थात मुक्ति में बुद्धि ज्ञान है और कहीं ज्ञान शिल्प कौशल और शास्त्र का विज्ञान है।
बृहस्पति स्मृति में देवगुरु बृहस्पति ने शिल्प को उच्चतम विज्ञान कहा हैं यथा ;
*विज्ञानं उच्यते शिल्पं हेमरूप्यादिसंस्कृतिः।*
(बृहस्पति स्मृति – १,१५.७)
अर्थात – विज्ञान को शिल्प, सोना, चांदी और अन्य संस्कृतियां कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में ब्राह्मणो के कर्मो में विज्ञान अर्थात शिल्प बताया है जो निम्न है ,
आज कलयुग में लोग ज्ञान को विज्ञान से अलग समझने लगे है जबकि वेद ज्ञान है तो शिल्प विज्ञान है। बिना इन दोनों के कोई पूर्ण ब्राह्मण बन ही नहीँ सकता।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में ब्राह्मणों के लक्षण में ‘ विज्ञान ‘ (शिल्पादि कर्म) का वर्णन है जो निम्न है ;
*शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च |*
*ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||*
– (श्रीमद्भागवत गीता- अध्याय – १८, श्लोक – ४२)
अर्थात – मनका निग्रह करना इन्द्रियों को वशमें करना, धर्मपालन के लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराध को क्षमा करना, शरीर, मन आदि में सरलता रखना, वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान होना, विज्ञान अर्थात यज्ञविधि , शिल्पादि कर्म को व्यावहारिक रूप से करना और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना , ये सब-के-सब ब्राह्मण के स्वाभाविक लक्षण एवं कर्म हैं।
जगत प्रसिद्ध महाविद्वान आचार्यों , पंडितो एवं कुछ अन्य विदेशी लेखकों ने अपने ग्रंथो या पुस्तकों में भी विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मणों की महिमा एवं श्रेष्ठता का उल्लेख किया है। शिल्प को श्रेष्ठ कर्म और उन शिल्प कर्मों को करने वालों को ब्राह्मण भी स्वीकार किया गया है जिसके प्रमाण निम्न हैं ;
१)’ ब्राह्मणोत्पत्तीमार्तण्ड ‘ ग्रंथ जो ब्राह्मणों की जगत प्रसिद्ध पुस्तक है उसके लेखक पं.हरिकृष्ण शास्त्री जी थे। यह पुस्तक लगभग 100 वर्ष पुरानी है। जिसमें समस्त विश्व के मुख्य ब्राह्मणों का उल्लेख है उसमें पृष्ठ ५६२ – ५६८ तक विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मणों का उल्लेख ‘ अथ पांचालब्राह्मणोंत्पत्ती प्रकरण ‘ बताकर दिया गया है। जिसमें शिल्प कर्म करने वाली पांचों शिल्पी उपजातियों जिसमें लौहकार(लोहार) , काष्ठकार(बढ़ई), ताम्रकार, शिल्पकार औऱ स्वर्णकार को ब्राह्मण मानकर उन्हें ब्राह्मणों के प्रमुख कर्म षटकर्म एवं अन्य ब्राह् मणोचित कर्मों का अधिकारी बताया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि विश्वकर्मा शिल्पी समाज को प्राचीन काल से ही ब्राह्मणत्व एवं श्रेष्ठ शिल्प परंपरा का सम्मान प्राप्त रहा है।