
प्राचीन वास्तुशास्त्र के अनुसार संपूर्ण भूमि अथवा भवन को वास्तुपुरुष के शरीर के आधार पर 45 देवताओं के क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक देवता का स्थान और तत्व अलग-अलग होता है।
जैसे-जैसे भवन की ऊँचाई बढ़ती है, वह वास्तुपुरुष के विभिन्न अंगों से संबंधित होता जाता है, इसलिए उसके फल भी बदलते हैं। वास्तुशास्त्र का मुख्य उद्देश्य सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना और नकारात्मक ऊर्जा को कम करना है।
भूमि से ऊँचाई बदलने पर पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—का अनुपात भी बदल जाता है। निचली मंजिलों पर पृथ्वी तत्व का प्रभाव अधिक होता है, जबकि ऊपरी मंजिलों पर वायु और आकाश तत्व अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
ऋग्वेद (7.54.1) में कहा गया है—
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो भवानः।
यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥
अर्थात्—
हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं। हमारी प्रार्थना स्वीकार कर हमें रोग और कष्टों से मुक्त करें तथा हमारे घर में रहने वाले समस्त मनुष्यों और पशुओं का कल्याण करें।
इससे स्पष्ट होता है कि वास्तुदेव स्थान, दिशा और ऊँचाई के अनुसार भिन्न-भिन्न फल प्रदान करते हैं।
त्रेतायुग में अंधकासुर नामक राक्षस और भगवान शिव के बीच भीषण युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान भगवान शिव के मस्तक से पसीने की एक बूंद पृथ्वी पर गिरी।
उस बूंद से एक अत्यंत विशाल और विकराल पुरुष उत्पन्न हुआ। कालांतर में वही वास्तुपुरुष या वास्तुदेवता कहलाया।
उसे प्रसन्न करने के लिए ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की। जो व्यक्ति भवन निर्माण के समय इन नियमों का पालन करता है, उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं।
वास्तुशास्त्र दिशाओं पर आधारित विज्ञान है। प्रत्येक दिशा का अपना अलग महत्व है। उदाहरण के लिए, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) दिशा स्थिरता और भार प्रदान करती है, जबकि उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा को खुला रखना शुभ माना गया है।
विश्वकर्मा प्रकाश
यादृशी भूमि: तादृशं फलम्।
ऊर्ध्व गच्छतः भूमेः गुणाः परिवर्तन्ते॥
अर्थात—
जैसी भूमि, वैसा फल। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, भूमि के गुण भी परिवर्तित होते जाते हैं।
इस कारण एक ही भूखंड पर विभिन्न ऊँचाइयों पर बने भवनों के फल अलग-अलग माने गए हैं।
विश्वकर्मा प्रकाश के दूसरे अध्याय (श्लोक 103–162) में एक, दो और तीन मंजिला भवनों के भेद तथा उनके अलग-अलग फल बताए गए हैं।
ऊँचाई के अनुसार आय, व्यय, नक्षत्र तथा अंशों में भी परिवर्तन माना गया है।
समरांगण सूत्रधार ग्रंथ में भूमि परीक्षण और नगर नियोजन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
भूमेः ऊर्ध्व दशहस्तं यावत् पृथ्वीतत्त्वं प्रधानम्।
ततः ऊर्ध्वं वायव्यं आकाशं च वर्धते॥
अर्थात—
भूमि से लगभग दस हस्त ऊँचाई तक पृथ्वी तत्व प्रमुख रहता है। इसके बाद वायु और आकाश तत्व का प्रभाव बढ़ने लगता है।
इसलिए भूतल और बहुत ऊँची मंजिल (जैसे पंद्रहवीं मंजिल) के फल समान नहीं माने गए हैं।
अध्याय 37 में बहुमंजिला भवनों के लिए स्तंभ, द्वार, ऊँचाई आदि के अलग-अलग मानक भी दिए गए हैं।
दक्षिणात्य वास्तु ग्रंथों में एक मंजिल से लेकर बारह मंजिल तक के भवनों का वर्णन मिलता है।
तले तले भिन्नं फलं प्रोक्तं मुनिभिः।
अधस्तात् स्थैर्यम् ऊर्ध्वं चाञ्चल्यम्॥
अर्थात—
ऋषियों ने प्रत्येक मंजिल का फल अलग बताया है। निचली मंजिलों में स्थिरता अधिक होती है, जबकि ऊपरी मंजिलों में चंचलता का प्रभाव बढ़ जाता है।
मत्स्य पुराण (अध्याय 252–257) में गृह निर्माण और वास्तु का विस्तृत वर्णन मिलता है।
गृहं कुर्यात् समं नात्युच्चं न च नीचकम्।
मध्यमं शस्यते सर्वसिद्धिकरं नृणाम्॥
अर्थात—
घर समतल, सुंदर तथा न अत्यधिक ऊँचा और न अत्यधिक नीचा होना चाहिए। मध्यम ऊँचाई वाला भवन मनुष्यों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है।
इस दृष्टिकोण से अत्यधिक ऊँची मंजिलों को “अति-उच्च” श्रेणी में माना गया है।
वास्तुशास्त्र के एक अन्य श्लोक में कहा गया है—
प्रासादं कारयेत् विद्वान् भूमिभागं परीक्ष्य च।
ऊर्ध्व ऊर्ध्व गुणहीनं स्यात् यावत् गगनं स्पृशेत्॥
अर्थात—
विद्वान व्यक्ति को भूमि का परीक्षण करके ही भवन बनाना चाहिए। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भूमि के मूल गुण कम होते जाते हैं, यहाँ तक कि भवन आकाश को स्पर्श करने लगे।
इस मत के अनुसार अत्यधिक ऊँची मंजिलों पर पृथ्वी तत्व का प्रभाव अपेक्षाकृत कम माना गया है।
उपरोक्त वास्तु ग्रंथों और शास्त्रीय संदर्भों के अनुसार भवन की ऊँचाई बढ़ने के साथ पंचमहाभूतों का संतुलन, ऊर्जा का स्वरूप तथा वास्तु संबंधी फल बदलते हैं। निचली मंजिलों को पृथ्वी तत्व और स्थिरता से, जबकि ऊपरी मंजिलों को वायु एवं आकाश तत्व से अधिक संबंधित माना गया है। इसलिए विभिन्न मंजिलों के परिणाम समान न होकर अलग-अलग माने गए हैं।