
इंटरनेट पर एक तस्वीर देखी जिसमें जाने माने बॉक्सर मुहम्मद अली किसी दुबले पतले से बूढ़े को उठाने की कोशिश कर रहे हैं। वो इस पतले से बूढ़े को हिला भी नहीं पाए थे! नहीं, ये कोई सुनी सुनाई बात नहीं है। ये अच्छी खासी प्रसिद्ध घटना है क्योंकि ये बूढ़े जॉनी कुलोन अपनी इसी कला के लिए अच्छे खासे विख्यात खुद भी थे। अपनी जवानी के दौर में वो खुद भी बॉक्सर थे (बहुत कम वजन वाली श्रेणी में)। रिटायर होने के बाद से वो अपनी इस कला का प्रदर्शन किया करते थे।
भारतीय लोगों (हिन्दू) के लिए ये कोई बड़ा अनोखा किस्सा नहीं है। ऐसी एक कहानी उन्होंने बचपन से ही सुन रखी होती है। रामायण के एक पात्र थे अंगद, जो कि दूत के रूप में रावण के दरबार में गए थे। कथा और उसके फिल्मी रूपों में भी सभी ने देखा-सुना होता है कि अंगद अपना पैर जमीन पर जमा देते हैं। राक्षसों को वो अपना पैर हिला देने की चुनौती देते हैं। एक एक करके बलशाली राक्षस असफल होते जाते हैं। अंत में जब रावण स्वयं आगे बढ़ता है तो वो कहते हैं, जाने दो, राजा मेरे पैर छुए अच्छा नहीं लगेगा!
हो सकता है कुछ लोग इसे काव्य की अतिशयोक्ति की तरह ही लेते आये हों। मल्ल युद्ध की कलाओं का भारत से फिरंगी दौर में ही विनाश हो जाने और फिर शेखुलर सरकारों के दौर में भी मल्लखंभ से लेकर थांग टा जैसी युद्ध कलाओं का पुनः जागरण न होने के कारण ये कोई आश्चर्य की बात भी नहीं। फिर सवाल ये भी है कि जहाँ सरकारें श्री राम का अस्तित्व न होने का हलफ़नामा डालती हो, पुष्पक विमान कहकर मजाक उड़ाने का बुद्धिजीवियों का शगल हो, वहाँ ऐसी छोटी मोटी सी चीज के सच-झूठ होने पर कोई शोध क्यों होता?
जो भी हो, इस तकनीक में जॉनी खुद को उठाने आये व्यक्ति की कलाई के पल्स पॉइंट और कंधे के पास की आर्टरी को दबाते थे। ऐसा करने के बाद व्यक्ति कितना भी बलशाली हो, उनका करीब 60 किलो का वजन उठा नहीं पाता। बाकी रामायण के वास्तविक होने, या न होने पर आप अपनी सोच रखने के लिए स्वतंत्र हैं। उसमें हम (अंगद जैसा) टांग अड़ाने का कोई इरादा नहीं रखते!
खेलों में छिपा युद्धज्ञान
सन 1850 के दौर में जब अंग्रेजों को भयानक भारतीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा तो धीरे से उन्होंने एक आर्म्स एक्ट लागु कर दिया। इसका उन्हें फायदा ये हुआ कि भारतीय हथियार रखेंगे नहीं तो यहाँ कि शास्त्रों की परंपरा जाती रहेगी। फिर एक प्रशिक्षित सिपाही भी बिना प्रशिक्षण वाली सौ-दो सौ की भीड़ को रोक सकता था। इस तरह पिछले दो सौ सालों में शारीरिक श्रम की भारतीय परंपरा समाप्त हुई। युद्ध की जो विधाएं खेल में सिखा दी जाती थीं, धीरे धीरे उनका खात्मा हो गया।
भारत में इस मल्लखंभ का अभ्यास बहुत पुराना है। पुराने जमाने में इसका प्रयोग एक कसरत की तरह होता था। कुश्ती लड़ने का अभ्यास करने वाले पहलवानों को शुरू से ही मल्लखंभ पर अभ्यास करवाया जाता था। यहाँ मल्ल पहलवान के लिए और खंभ उस गड़े हुए खूंटे के लिए इस्तेमाल होता है जिसपर पहलवान अभ्यास करता है। अब ये एक अलग विधा भी है लेकिन शुरू में इसका उद्देश्य पहलवान की पकड़ और उसके शारीरिक नियंत्राण, एकाग्रता जैसी चीज़ों को बढ़ाने के लिए होता था। इसक पहला लिखित जिक्र हज़ार साल पहले (यानी 1135 सन् में) लिखी गई किताब मनासोल्लास में आता है। इसे सोमेश्वर चालुक्य ने लिखा था। धीरे धीरे बढती हुई ये विधा मराठा साम्राज्य के काल तक एक अलग ही विधा का रूप ले चुकी थी। मराठा काल आने तक इसमें खम्भे के अलावा बिना कहीं गाँठ लगी रस्सी का भी इस्तेमाल होने लगा था। पेशवा बाजीराव द्वित्तीय के काल में बलमभट्ट दादा ने इसमें खम्भे के अलावा रस्सी के इस्तेमाल को भली भांति लिपिबद्ध किया। उस दौर में बांस, लकड़ी की कमी की वजह से भी रस्सी का इस्तेमाल बढ़ने लगा था।
आज की तारिख में इसके तीन प्रकार होते हैं। एक सीधा मल्लखंभ पर, दूसरा थोड़े कम ऊँचे मल्लखंभ और कुछ झूलते हुए खम्भों पर और तीसरा रस्सी पर। एक खेल के तौर पर इसमें भाग लेने वाले खिलाड़ियों को चार श्रेणियों में बांटा जाता है रू
12 से कम आयुवर्ग
14 से कम आयुवर्ग
17/18 से कम आयुवर्ग
(17 स्त्रिायों के लिए और 18 पुरुषों के लिए)
17/18 से ऊपर का आयुवर्ग
विदेशी शासनों के दौरान काफी कुचले जाने के बाद भी ऐसे भारतीय खेल पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए। अखाड़ों में इसे अभी भी गुरु शिष्य परंपरा के जरिये आगे बढ़ाया जाता है। ख़ास तौर पर महाराष्ट्र और हैदराबाद के इलाकों में इसके कई प्रशिक्षण केंद्र हैं। मल्लखंभ की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं भी आयोजित होती हैं।
सन 2013 से ये मध्य प्रदेश का राजकीय खेल भी है। ये आम तौर पर देखा जाता है कि प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में खिलाड़ी 25 की आयु तक आते आते खेल से संन्यास ले लेते हैं। 10-12 की उम्र में शुरू करने पर बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक क्षमता भी बढ़ती है, 20 आते आते ये स्थायी और 25 के बाद तो घटती ही हैं। ऐसे में किसी भी खेल में प्रशिक्षण काफी कम उम्र में ही शुरू होता है। अगर विदेशी तरीके के जिमनास्ट को भी देखेंगे तो ओलंपिक के गोल्ड मैडल वाले खिलाड़ी अक्सर 15-18 आयु वर्ग के ही होते हैं।
लगभग सभी खेलों में प्रशिक्षण काफी कम उम्र यानि 18 से बहुत पहले शुरू हुआ रहता है। ऐसे में जब फिरंगियों के ज़माने के कानूनों पर चलने वाली अदालतें अपने तुगलकी फरमान में दही हांड़ी उत्सव में 18 से कम उम्र वालों के शामिल होने पर रोक लगाती हैं तो इसके नुकसान का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं है। मल्लखंभ के अखाड़ों के मानव पिरामिड के विरोध की ये नीति और कुछ नहीं बस उसी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचायक है।
अभी और बाकी है
मल्ल और व्यायाम विद्या
योग के अंग के रूप में आसन और प्राणायाम तो है ही, व्यायाम और मल्लसाजी भी रही है। यह कला “अखाड़ा” कहलाती है। इसके केंद्र रंगशाला भी कहे जाते। देश में पहलवानी, कुश्ती स्पर्धा सहित अच्छे मल्ल तैयार करने के केंद्र रहे हैं अखाड़े। कभी राजा तक अपने नाम के आगे मल्ल शब्द धारण करते थे : रायमल्ल, भूलोकमल्ल। इस विद्या पर मल्ल पुराण लिखा गया।
आज अखाड़ों का अर्थ ही बदल गया! व्यायामशाला वाले अखाड़े कहां हैं? नाथद्वारा, कांकरोली जैसे नगर में बीस बीस अखाड़े होते थे। और भी, सभी प्रमुख नगरों में अखाड़ा होते!
ज्ञान परम्परा क्या है? विदेशियों ही नहीं, भारतीयों के लिए भी यह जानना बड़ा रोचक है। नई शिक्षा नीति में ज्ञान परंपरा की आवश्यकता पर जोर है लेकिन लेकिन वह है क्या? पौराणिक ऋषि जिस ज्ञान की चर्चा करते हैं, वह विद्याधारित है और उसकी दो धाराएं हैं। अग्निपुराण का जिस तरह प्रारंभ हुआ है, वह अति प्राचीनतम पुरोहित अग्निदेव के उन वचनों से है जिसमें पुराणों के पांच लक्षणों के बाद विद्या के स्रोत बताए गए हैं। स्पष्टत: पुराण परा और अपरा जैसा विभाजन करता है। पहले अपरा की गणना की गई है क्योंकि वह लोक आवश्यकता है और सांसारिक यात्रा के लिए अपरिहार्य है। चारों वेदों के बाद छ: वेदांग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंदस, मीमांसा, धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, वैद्यक, गांधर्ववेद, धनुर्वेद और अर्थशास्त्र आदि को अपरा कहा है और ब्रह्मज्ञान करवाने वाली विद्या को परा। इसी आधार पर अग्निपुराण का विस्तार ज्ञानकोश के रूप में हुआ है। यह संयोजन विष्णुधर्मोत्तर, मत्स्य, गरुड और नारदीय पुराण जैसा है क्योंकि समाज को अपनी रीतियों और शिल्पादि के लिए जो ज्ञान अपेक्षित था, पुराणकारों ने उसका चयन कर पुराणों को भी कोश या संहिताओं का रूप दिया। संहिताओं और निबंधों के प्रणयन के मूल में यही विचार प्रेरक रहा है। ग्रंथों के लिखित रूप ( पाण्डुलिपियां ) से अधिक अलिखित, वाचिक और व्यावहारिक परंपरा में भी ज्ञान की धाराएं कम नहीं। कई विषय तो खोजों और अनुसंधानों के प्रेरक भी हैं!
भारत और यहां के धर्म, संप्रदाय, पंथ और उनके दर्शन का ज्ञानात्मक अवदान क्या कम है? हम गणित के कौतुक, तिलक, लीलावती को कितना जानते हैं? इच्छित ज्ञान के मानसोल्लास ही क्या, मेघशास्त्र, रत्न शास्त्र, लिपि, आयुध शास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद, ओरा ज्ञान, अंग विद्या, प्रश्न, गांधर्ववेद, आहारवेद, मल्ल क्रीड़ा, खदान और धातुशास्त्र, गुल्म वृक्षायुर्वेद, गणित, रेखागणित, शुल्ब सूत्र, मपित, समय, सामुद्रिक, नौकाशास्त्र, काम, अर्थ, नीति, शिल्प, यंत्र, चित्र, पशु, पक्षी, आखेट, चौर्य… को कितना जानते हैं? नाम भी नहीं सुने होंगे! विदेशी इनको देखकर आगे बढ़ रहे हैं वे इसके लिए पांव पर खड़े हैं और हम? हमें गर्व होगा कि इनमें से कई ज्ञान ग्रंथ हाल के वर्षों में हमारे हाथ में आए हैं और तभी यह जरूरी हो गया कि हम अपनी अज्ञात, विस्मृत और निक्षेपित निधि जैसी ज्ञान विरासत के संरक्षण, प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए अग्रसर हों।
व्यायाम पर पुराण
जीवन में व्यायाम उतना ही जरूरी है जितना खाना। व्यायाम के अंग है : कुश्ती, दाव पेच, दौड़ना, गदा, कर्कर जैसे आयुध घुमाना, गोणिका उठाना, श्रम करना, तैराकी आदि। व्यायाम से शरीर स्वस्थ रहता है और अंग प्रत्यंग कसे रहते हैं। मल्ल शाला या अखाड़ा जाना हमारे यहां परम्परा रही है। मल्ल या जेठी के मुकाबले देखने भीड़ उमड़ती रही।
आज जिम जाने, घूमने और योग के आसन, प्राणायाम आदि की जो महत्ता बताई और प्रचारित की जा रही है, उसके मूल में भारत की प्राचीन मल्ल विद्या रही है। योग और आयुर्वेद का अनूठा संगम, जिसका नाम अखाड़ा कौशल भी रहा है। दक्षिण एशिया में यह शब्द और विद्या के अनेक प्रसंग प्रचलित रहे हैं। धनुर्विद्या का विकास भी इसी का एक सोपान है।
इस विद्या पर आधारित है : मल्ल पुराण। यह पुराण न महापुराणों और न उप पुराणों में है लेकिन उन पुराणों में है जो जीवनोपयोगी कुंजियां लिए है। कंस के पठाए ज्येष्ठी मुष्टिक, चाणूर आदि का मल्ल विद्या से मर्दन करने वाले श्री कृष्ण ने सोमेश्वर को इस विद्या का जो उपदेश किया, वह 18 अध्यायों में “मल्ल पुराण” कहलाया। इसकी कुछ पांडुलिपियां मिली है, कुछ श्लोक बिखरे बिखरे पड़े हैं जिनके आधार पर करीब हजार श्लोकों का पाठ तैयार हुआ है।
मित्रवर श्री प्रमोद जी जेठी स्वयं इस विद्या के जानकार और संवाहक है। उन्होंने इस पुराण का पाठ मुझे इस आग्रह से भेजा कि इसका शोधपूर्ण अध्ययन हो और फिर अनुवाद सहित प्रकाशन हो…। काफी परिश्रम से मैंने यह सब किया… वृंदावन में ब्रज संस्कृति शोध संस्थान में पिछले दिनों इस पर मैंने पर्चा पढ़ा और फिर मन हुआ कि सब मित्र इस भारतीय ज्ञान विरासत से अवगत हों…।
संसार में भारत की भूमि, गगन, सरोवर, नदियां, तीर्थ, खेत, घर, परिवार … सब के सब ज्ञान के स्रोत हैं। संसार की समृद्ध सभ्यताओं और संस्कृतियों को इस बात की जानकारी थी और तभी यात्री और यात्रियों के समूह यहां परिक्रमा, पढ़ाई और पूजन के लिए आते थे। कैम्ब्रिज में मैक्समूलर ने जब भारत में प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन के लिए जाने वाले अधिकारियों को संबोधित किया तो बताया कि भारत उनको क्या – क्या सिखा सकता है? भारतीय ज्ञान कभी निराश नहीं करेगा बल्कि जीवन को ऐसी दिशा देगा जो इसकी मिट्टी के लिए कर्तव्य बोध से भर दे।
मेरा मत है कि भारत ने इष्ट और पूर्त रूप में जिन कर्तव्यों को निर्धारित किया, ज्ञान की ऐसी शाखाओं को भी प्राणवान किया जिनमें जहां रोपण किया जाए, वहां पल्लवन का सामर्थ्य रहा! तब कई रूपों में ज्ञान की पगडंडियां विकसित हुईं :
लोकोपकारक ज्ञान, राजोपकारक ज्ञान, बालकोपकारक ज्ञान, स्त्रियोपकारक ज्ञान, साधकोपकारक ज्ञान, स्थपत्योचित जान, व्यापारोपकारक ज्ञान, कर्मांत्रियोपकारक ज्ञान…
जैसे कई पथ हैं जिनके लिए एक नहीं, अनेकानेक ग्रंथों का प्रणयन और पुन: पुन: लेखन हुआ। ग्रंथों के लिखित रूप ( पाण्डुलिपियां) से अधिक अलिखित, वाचिक और व्यावहारिक परंपरा में भी ज्ञान की धाराएं कम नहीं। कई विषय तो खोजों और अनुसंधानों के प्रेरक भी हैं!
मेरे लिए ज्ञान का मतलब अध्यात्म और अनुष्ठान से नहीं, बल्कि व्यवहार, प्रयोग और अनुभव से अर्जित वे सूत्र, वे सूचनाएं हैं जो सार्वकालिक और सार्वदेशिक हो सकती हैं। इसीलिए संसारभर का ध्यान उन सूचनाओं पर रहता है, उनके कब्जे, उनके पेटेंट पर रहता है और तब हम कहकर रह जाते हैं : अरे! इसमें क्या है, ये तो हमारे अमुक शास्त्र में कहा है!… हमें हमारी जीवनोपयोगी ज्ञान विरासत पर गर्व होना चाहिए। हमारा ध्यान ज्ञान के ऐसे ही सूत्रों और सूचनाओं पर होना चाहिए!
हम गणित के लीलावती, इच्छित ज्ञान के मानसोल्लास ही क्या, मेघशास्त्र, रत्न शास्त्र, लिपि, आयुध शास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद, ओरा ज्ञान, अंग विद्या, प्रश्न, गांधर्ववेद, आहारवेद, मल्ल क्रीड़ा, खदान और धातुशास्त्र, गुल्म वृक्षायुर्वेद, गणित, सामुद्रिक, नौकाशास्त्र, अर्थ, नीति, शिल्प, यंत्र, चित्र, पशु, पक्षी, आखेट, चौर्य… को कितना जानते हैं? नाम भी नहीं सुने होंगे! विदेशी इनको देखकर आगे बढ़ रहे हैं और हम?
हमें गर्व होगा कि इनमें से कई ज्ञान ग्रंथ हाल के वर्षों में हमारे हाथ में आए हैं और तभी यह जरूरी हो गया कि हम अपनी अज्ञात, विस्मृत और निक्षेपित निधि जैसी ज्ञान विरासत के संरक्षण, प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए अग्रसर हों…।