
पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में “शिखर”, और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य जी ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी।
आदि शंकराचार्य जी के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो!
तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा।
तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।
इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में गंगा-गोमती संगम पर स्थित कैथी में आज जिसे मार्कण्डेय महादेव मंदिर कहा जाता है, वहीँ मार्कंडेय ऋषि उपासना करते थे। जब उनकी बारह वर्ष की आयु हुई तो यमदूत उन्हें शिवमंदिर से ले नहीं जा पाए और अंततः काल को स्वयं ही आना पड़ा। ऋषि मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटे थे तो उनके पाश में भगवान शिव ही आ गए! महामृत्युंजय मन्त्र शिव के रूद्र (सबसे उग्र रूपों में से एक) रूप का होता है। यमपाश में बंधे भगवान शिव जब प्रकट हुए तो काल को ऋषि मार्कंडेय को छोड़ना पड़ा। भगवान शिव को महाकाल या कालान्तक नाम से भी जानते हैं।
जब “काली” शब्द को देखेंगे तो स्पष्ट रूप से ये “काल” शब्द से ही आता है। थोड़ा और गौर से देखेंगे तो ध्यान जाएगा कि सृष्टि के विनाश को उद्दत देवी जब काली के रूप में होती हैं तो उन्हें रोकने का काम फिर से भगवान शिव के जिम्मे ही आता है। वो रोकने-टोकने की कोई कोशिश नहीं करते। संभवतः ललिता देवी के कामेश्वरी रूप से विवाह के लिए जो कामेश्वर रूप का वर था वो आड़े आ जाता है। विवाह इसी आधार पर हुआ था कि वो स्वतंत्र होंगी और उनके कुछ करने-बोलने पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। भगवान शिव भी रोकने के बदले रास्ते में लेट जाते हैं। उनपर पैर पड़ते ही देवी जब देखती हैं कि पैर कहाँ रख दिया, तब वो स्तंभित होती हैं!
जहाँ स्वयं भगवान शिव की ये स्थिति होती हो, वहां मनुष्यों की कैसी होती होगी? देवी के गले में जो आठ नरमुंड होते हैं वो बुद्धि को जकड़ने वाले आठ पाशों को दर्शाते हैं। ये काम (वासना), क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, भय और घृणा के पाश हैं। एक-एक करके इन पाशों को काटकर देवी अपने भक्तों को मुक्त करती हैं। रक्तबीज वध के प्रसंग में देवी का ऐसा ही रूप प्रदर्शित होता है। जैसे रक्तबीज के खून की बूँद जमीन पर गिरते ही बीज की तरह, उतना ही शक्तिशाली, दूसरा राक्षस उत्पन्न करती थी, इक्छाओं के साथ भी वैसा ही माना जाता है। एक इच्छा, बीज की तरह उतनी ही बलवती कोई दूसरी इच्छा को जन्म देती जाती है। देवी इन सभी को चट कर जाती है।
सृजन और पालन का ही नहीं, अंत का जिम्मा भी उनका ही है, इसलिए वो देवी के सबसे उग्र रूपों में से एक है। महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव कहते हैं कि सबकुछ लीलने वाले काल का तुम भक्षण करती हो इसलिए तुम्हारा नाम महाकाली है, और सब तुमसे शुरू भी होता है इसलिए तुम्हारा नाम आद्या है। अब जहाँ से हम लोगों ने शुरू किया था, उन्हीं मार्कंडेय ऋषि के पास वापस चलें तो वो भृगु वंश के ऋषि थे। पूरी महाभारत भृगुवंशी ऋषियों की ही कहानियां कहती रहती है इसलिए वो महाभारत में भी आते हैं। यानी काली भी महाभारत में आती हैं। अश्वत्थामा शिवभक्त था और जब वो पांडवों के पुत्रों की हत्या करता है, तब देवी की चर्चा आती है।
महाभारत में देवी के हाथ में पाश होता है, जिसमें वो जीवों को बांध लिए जाती हैं। आमतौर पर मूर्तियों में जब देवी को दर्शाते हैं तो उनके हाथ में कमल होता है पाश नहीं। कुछ लोग शिव में से “इ” की मात्रा हटाते हुए बताते हैं कि ऐसा करते ही शिव, शव हो जाते हैं। यहाँ “शव” का अर्थ द्रव्य हो जाता है और “इ” का अर्थ उर्जा है। बिना उर्जा के शिव भी कुछ नहीं कर सकते, यहाँ ऐसा भाव है। वैसे भौतिकी (फिजिक्स) की परिभाषा कहती है कि ये द्रव्य, उर्जा और उससे सम्बंधित नियमों का विज्ञान है। शिव-शक्ति की धर्मग्रंथों में चर्चा का कोई वैज्ञानिक आधार है या नहीं है, इस बारे में हम कुछ नहीं कहते।
बाकी देवी काली, सनातनी देवी-देवताओं में सभवतः एकमात्र पूज्य देवी हैं जिनका जन्म सीधे क्रोध से होता है। हर व्यक्ति को उनके रूप सहज लगें ऐसा आवश्यक नहीं और कोई जबरदस्ती भी नहीं है। वैष्णव जैसे (शाकाहारी प्रकार की) मनोवृति के हो तो दूर से हाथ जोड़कर भी आगे बढ़ सकते हैं।
ये तय करना लगभग नामुमकिन है कि एक चक्र (सर्किल) शुरू कहाँ से हुआ और ख़त्म कहाँ पर।
इस कारण शाक्त परम्पराओं को देखेंगे तो कठिनाई होगी। बरसों मैकले मॉडल की पढ़ाई और ईसाई नियमों पर बने कानूनों के कारण अवचेतन मन विविधता को स्वीकार करने में आनाकानी शुरू कर सकता है।
शाक्त परम्पराओं में कुछ आदि काल से चली आ रही लोक-परम्पराएं हैं, कुछ तांत्रिक मत से आती हैं, और कुछ सनातन वैदिक। देवी की उपासना भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे लम्बे समय से जीवित है। स्त्री भी देवी हो सकती है,
सबसे लम्बे समय तक परम्पराएं कैसे चलती हैं इसका उदाहरण आपको लोटे में दिख जाएगा। भारत के कई क्षेत्रों में पानी पीने या रखने के लिए जो लोटा होता है, उसके सबसे पुराने नमूने हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सिन्धु घाटी सभ्यता में मिलते हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने का जो तरीका सिन्धु घाटी सभ्यता में इस्तेमाल होता था, वही तरीका असम के माजुली द्वीप के निवासी आज भी प्रयोग करते हैं। सभ्यता के लगातार होने के प्रमाण अगर अभी तक ढूंढें नहीं जा सके हैं तो सभ्यता लगातार जीवित नहीं थी, इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं। पहले सरस्वती नदी का अस्तित्व था कहने पर मजाक उड़ाया जाता था, अब आक्रमणकारी, मानसिक नक्सलवादी, इसपर चुप्पी साधते भी दिख ही जायेंगे।
जाहिर है विदेशी चश्मे से देखने के कारण उनसे समझने में कई गलतियाँ हुई हैं। छोटी धारा में वो अनगढ़ प्रथाओं और अंधविश्वासों वाली अलिखित ग्रामीण परम्पराओं को रखते थे।
शाक्त परम्पराओं में देखने पर उनकी अवधारणा की कमियां और स्पष्ट दिखती हैं। ग्रामीण भक्ति भाव का प्रयोग वैदिक रीतियों में भी होगा और संस्कृत में लिखे वैदिक मन्त्रों का प्रयोग तांत्रिक रीतियों में भी स्पष्ट दिख जाता है। दुर्गा पूजा और नवरात्रि का महत्व इसमें भी है कि जरा सा ध्यान देते ही ये आपकी आँख से सेकुलरिज्म का टिन का चश्मा उतार देती है। यहाँ कर्म और वचन तक ही नियम शेष नहीं होते (बांग्ला में “शेष होना” मतलब ख़त्म होना होता है)। यहाँ नियम मन और विचारों पर भी लागू होते हैं। ये कुछ कुछ वैसा है, जैसा भारतीय कानूनों में होने लगा है।
अदालतों में मंदिर के देवी-देवता को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया जाता है, उसकी ओर से कोई मित्र-बान्धव बनकर मुकदमा लड़ता है। शास्त्रों में भी कुछ ऐसा ही कहा जाता है। विशेषकर भक्तियोग सम्बन्धी अवधारणाओं में ये निर्देश होते हैं कि किस देवी या देवता को क्या माना जा सकता है। जैसे श्री कृष्ण के लिए सखा भाव बिलकुल मान्य होगा, लेकिन देवी दुर्गा का उपासक कोई पुरुष, देवी को सखा नहीं मान सकता, वो माता के ही भाव में रहेंगी। ये किसी “बड़ी धारा” में ढूंढना जरूरी नहीं, ये साधारण ग्रामीण नियमों में भी दिख जाएगा। कई मंदिरों में पुरुषों के अकेले साड़ी-चूड़ी जैसी चीज़ें चढ़ाने के प्रयास को अजीब सी हेय दृष्टि का सामना करना पड़ सकता है।
आयातित विचारधारा ने एक राजा के दूसरे से युद्ध को शैव और वैष्णव या शाक्तों के वैमनस्य के रूप में भी दिखाने की कोशिश की है। मंदिरों में जाने और दुर्गा पूजा करने का एक फायदा ये भी है कि इस अवधारणा में भी दर्जनों छेद नजर आ जायेंगे। शैव मंदिर हों या राम मंदिर, शायद ही कोई ऐसी जगह होगी जहाँ एक देवी-देवता के मंदिर में दूसरे को स्थान न दिया गया हो। अजंता-एल्लोरा के चित्र हों, कैलाश मंदिर या शिव के अन्य रूपों के नाम से जाने जाने वाले मंदिर हों, या फिर हजार राम मंदिर, देवी दुर्गा हर जगह दिखती हैं। शारदीय नवरात्र कभी कभी अकाल बोधन के नाम से तो इसलिए ही जाना जाता है क्योंकि श्री राम ने रावण पर विजय पाने के लिए इसी समय देवी उपासना की थी।
पर्व-त्यौहार उनके तर्कों में कई छेद दिखा देते हैं, इसलिए भारत की विविधता पर हमला करने वालों को परम्पराओं से विशेष चिढ़ रहती है। नाम और हुलिए से धोखा देने और भेष बदलने में वो माहिर हैं, ऐसे में सवाल ये भी है कि उन्हें पहचानें कैसे? ये बहुत आसान है। वो आपमें बिना वजह अपराध-बोध पैदा करना चाहेंगे। जैसे बिहार में मौसम अति के करीब होता है। गर्मी में लगातार पसीना पोंछने की जरूरत होगी और ठण्ड में कान ढकना होगा। यहाँ बाढ़ की वजह से आद्रता भी रहती है इसलिए मोटा तौलिया इस्तेमाल करने पर वो सूखेगा नहीं। गरीबी की वजह से सभी मोटा फर वाला तौलिया खरीदने में भी समर्थ नहीं है।
इसलिए बिहारियों के गले में आपको अक्सर “गमछा” टंगा मिल जाएगा। आयातित विचारधारा वाला तुरंत इसे “प्रतीकवाद” घोषित करके आपको वैचारिक रूप से नीचा दिखाने लगेगा। खुद वो गले में कोई महंगा दुपट्टा (जिसका पसीना पोछने या कान बांधने में उपयोग न हो) लपेटे सकता है। उस स्थिति में वो बिना बोले ही आपकी गरीबी के लिए आपको नीचा दिखाना चाहता है। ये जो अकारण ही आपको अपराधी सिद्ध करने की कोशिश है इसमें आक्रमणकारी सबसे आसानी से पहचान में आता है। नाज़ी गोएबेल्स के “नेम कालिंग” से सीखकर उन्होंने इसके लिए नारीवाद, भक्त, ब्राह्मणवाद, दलित चिंतन, ट्रोल , ले कर रहेंगे आजादी, जैसे कई शब्द भी बना रखे हैं।
कहीं तीन महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में देवी दिखती हैं, तो कहीं नव दुर्गा में उनके नौ रूप हो जाते हैं। वो चौंसठ योगिनी के रूप में भी पूजी जाती हैं और ललिता सहस्त्रनाम के हज़ार नामों से भी। कोस कोस पर बदलते पानी और वाणी की ही तरह हर भक्त के लिए देवी का रूप भी बदल जाता है। उन्हें दस तरीके से पहनी जाने वाली साड़ी की विविधता जनता में तो क्या मूर्तियों में भी अच्छी नहीं लगती। उन्हें सब एक ही बोरे जैसे परिधान में चाहिए।
बाकी नवरात्रि दुष्टों के दलन का पर्व भी है। भारत की विविधता के शत्रुओं के दमन के पर्व के रूप में भी इसे मना ही सकते हैं।
भारत ने सन 1998 की शुरुआत में जब पोखरण में पांच परमाणु विस्फोट किये तो कई अख़बारों ने पोखरण का जिक्र “शक्ति पीठ” के रूप में किया। विश्व के लिए ये कई कारणों से घबराने वाली घटना थी। एक तो उनके अनुसार जिसके पास परमाणु शोध की क्षमता ही नहीं होनी चाहिए थी, उसके पास भला परमाणु बम क्यों थे? दूसरा कि शक्ति के इस रूप में उपासना की कोई पद्दति होगी, ऐसा वो सोच ही नहीं पाए थे। उनकी ओर जो व्यवस्था संस्कृति या मजहबी तौर पर चलती थी, उसमें “स्त्री” उपास्य नहीं थी। देवी तो क्या, उनके पास कोई देवदूत भी स्त्री नहीं थी!
शाक्त परम्पराओं के लिए देवी की शक्ति के रूप में उपासना एक आम पद्दति थी। शक्ति का अर्थ किसी का बल हो सकता है, किसी कार्य को करने की क्षमता भी हो सकती है। ये प्रकृति की सृजन और विनाश के रूप में स्वयं को जब दर्शाती है, तब ये शक्ति केवल शब्द नहीं देवी है। सामान्यतः दक्षिण भारत में ये श्री (लक्ष्मी) के रूप में और उत्तर भारत में चंडी (काली) के रूप में पूजित हैं। अपने अपने क्षेत्र की परम्पराओं के अनुसार इनकी उपासना के दो मुख्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं। ललिता सहस्त्रनाम जहाँ दक्षिण में अधिक पाया जाता है, उतर में दुर्गा सप्तशती (या चंडी पाठ) ज्यादा दिखता है।
शाक्त परम्पराएं वर्ष के 360 दिनों को नौ-नौ रात्रियों के चालीस हिस्सों में बाँट देती हैं। फिर करीब हर ऋतुसन्धी पर एक नवरात्र ज्यादा महत्व का हो जाता है। जैसे अश्विन या शारदीय नवरात्री की ही तरह कई लोग चैत्र में चैती दुर्गा पूजा (नवरात्रि) मनाते भी दिख जायेंगे। चैत्र ठीक फसल काटने के बाद का समय भी होता है इसलिए कृषि प्रधान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। असाढ़ यानि बरसात के समय पड़ने वाली नवरात्रि का त्यौहार हिमाचल के नैना देवी और चिंतपूर्णी मंदिरों में काफी धूम-धाम से मनाया जाता है। माघ नवरात्री का पांचवा दिन हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।
सरस्वती के रूप में उपासना के लिए दक्षिण में कई जगहों पर अष्टमी-नवमी तिथियों को किताबों की भी पूजा होती है। शस्त्र पूजा में भी उनका आह्वान होता है। बच्चों को लिखना-पढ़ना शुरू करवाने के लिए विजयदशमी का दिन शुभ माना जाता है और हमारी पीढ़ी तक के कई लोगों का इसी तिथि को विद्यारम्भ करवाया गया होगा। देवी जितनी वैदिक परम्पराओं की हैं, उतनी ही तांत्रिक पद्दतियों की भी हैं। डामर तंत्र में इस विषय में कहा गया है कि जैसे यज्ञों में अश्वमेघ है और देवों में हरी, वैसे ही स्तोत्रों में सप्तशती है।
तीन रूपों में सरस्वती, काली और लक्ष्मी देवियों की ही तरह सप्तशती भी तीन भागों में विभक्त है। प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र इसके तीन हिस्से हैं। मार्कंडेय पुराण के 81 वें से 93 वें अध्याय में दुर्गा सप्तशती होती है। इसके प्रथम चरित्र में मधु-कैटभ, मध्यम में महिषासुर और उत्तम में शुम्भ-निशुम्भ नाम के राक्षसों से संसार की मुक्ति का वर्णन है (ललिता सहस्त्रनाम में भंडासुर नाम के राक्षस से मुक्ति का वर्णन है)। तांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े होने के कारण इसकी प्रक्रियाएं गुप्त भी रखी जाती थीं। श्री भास्कराचार्य ने तो सप्तशती पर अपनी टीका का नाम ही ‘गुप्तवती’ रखा था।