
कल एक बेहद सुंदर जुगलबंदी देखने को मिली।
यह शब्दों की जुगलबंदी थी — डॉक्टर आनंद नाडकर्णी और मंगला खाडिलकर के बीच।
मौका था ‘सप्तसोपान’ नामक एक अनोखी पहल के उद्घाटन का।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य था — “वरिष्ठ” और “ज्येष्ठ” के बीच का अंतर समझाना।
सामने वाले के मन को खोलकर उससे सहजता से बात करवाने में ये दोनों मानो सचिन तेंदुलकर हों।
डॉ. आनंद नाडकर्णी ने शुरुआत में ही कहा —
हम सब यहाँ एक ही उद्देश्य से एकत्र हुए हैं —
“स्वस्थ वृद्धावस्था” (Healthy Aging)
अपने नियंत्रित रोगों की बहुत अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
आप सब उनकी देखभाल कर ही रहे होंगे।
असल प्रश्न है — अपनी बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का।
अब तक जीवन में जो करते आए हैं, उससे कुछ अलग करना शुरू कर दिया, तो आप वृद्धावस्था को भूलने लगेंगे।
जो हमने सीखा है, जो अब तक करते आए हैं, वह रास्ता हमारे मस्तिष्क को पूरी तरह परिचित है।
उसे बार-बार इस्तेमाल करते-करते वह थोड़ा ऊबड़-खाबड़ भी हो गया है।
अगर मस्तिष्क को नए रास्ते दिखाए जाएँ, तो वह फिर से उत्साहित होता है और अधिक कार्यक्षम बनता है।
इसीलिए यह ‘सप्तसोपान’ पहल शुरू की गई है।
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, सबसे पहले जो चीज़ महसूस होती है, वह हैं — रिश्ते।
दूसरों के साथ हमारा व्यवहार।
इस संदर्भ में डॉ. नाडकर्णी ने सौरमंडल का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा —
हम स्वयं सूर्य हैं और हमारे रिश्ते सौरमंडल के ग्रह।
हमें केवल इतना समझना है कि कौन-सा रिश्ता किस ग्रह जैसा है और उसके साथ कितनी दूरी बनाए रखनी है।
उम्र बढ़ने के साथ सबसे कम हो जाता है — नया सीखना।
और यही ‘सप्तसोपान’ में करना है।
हम जैसे लोगों ने जिन्होंने पूरी जिंदगी बैंक में बिताई है, उन्हें अब संख्याओं और अकाउंट्स से आगे बढ़कर कुछ नया सीखना चाहिए।
क्या सीखना चाहिए?
जैसे — गायन, ब्रिज या कोई अन्य शौक।
इसमें केवल सीखने का आनंद लेना है।
न कोई परीक्षा, न कोई दक्षता परीक्षण।
जैसे सब्जियों को ताज़ा रखने के लिए बीच-बीच में पानी छिड़का जाता है, वैसे ही मस्तिष्क को ताज़ा रखने के लिए नए सीखने के ये छींटे ज़रूरी हैं।
जब डॉक्टर यह सब समझा रहे थे, तब मंगला खाडिलकर ने इसे एक ही शब्द में समेट दिया —
“स्वानंद”
आगे मंगला ताई का एक वाक्य मुझे बहुत गहराई से छू गया —
“हर रिश्ते की एक शेल्फ लाइफ होती है।”
जैसे पदार्थों का स्वाद बदलता है, वैसे ही रिश्तों का भी।
इस वाक्य पर ज़ोरदार तालियाँ बजीं।
और तालियाँ थम भी नहीं पाई थीं कि डॉक्टर का अगला वाक्य आया —
“इसीलिए रिश्तों में व्यवहार रूपी preservatives डालते रहना चाहिए।”
फिर उतनी ही ज़ोरदार तालियाँ।
क्या शानदार जुगलबंदी थी!
एक और बात जो वरिष्ठ लोगों को ज्येष्ठता की ओर बढ़ते समय करनी चाहिए —
अनजाने में हमारे साथ चार चीजें होने लगती हैं —
छींक, खाँसी, हिचकी
और…
सलाह!
यह सलाह देना थोड़ा कम करना चाहिए।
उससे पहले सामने वाले की भावना समझनी चाहिए और फिर तय करना चाहिए कि सलाह देनी है या नहीं।
हमेशा यह वाक्य याद रखना चाहिए —
“You Mirror My Emotions”
अर्थात — “आप मेरी भावनाओं का प्रतिबिंब बनते हैं।”
डॉक्टर का अगला विचार भी बेहद महत्वपूर्ण था —
“नॉस्टैल्जिया बढ़ती उम्र का एक अविभाज्य हिस्सा है, लेकिन यह Nostalgia ऐसा होना चाहिए जो मन को प्रसन्न करे।”
कैसा नहीं होना चाहिए?
Toxic Nostalgia यानी ऐसा अतीत-प्रेम जिसकी शुरुआत ही इन वाक्यों से हो —
“हमारे ज़माने में…”
या
“तुम लोगों को क्या पता…”
ऐसा नहीं होना चाहिए।
संत ज्ञानेश्वर महाराज का एक शब्द हमेशा याद रखना चाहिए —
“सहनसिद्धि”
अर्थात सहनशीलता की सिद्धि।
इसी से ज्येष्ठता परिपक्व होती है और वृद्धावस्था गरिमामय बनती जाती है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. आनंद ने एक भारतीय दार्शनिक का कथन सुनाया —
“Only Body has DOB & DOD, otherwise it is all Legacy.”
अर्थात —
“जन्म और मृत्यु की तरीख केवल शरीर की होती है, बाकी सब विरासत बन जाता है।”
इसी भाव के साथ मंगला खाडिलकर ने शांता शेळके की कविता की कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाईं।
अब वे पंक्तियाँ याद रखने के लिए या तो मुझे मंगला ताई का फोन नंबर ढूँढ़ना पड़ेगा,
या फिर शांता शेळके की कविताओं का संग्रह।
यानी अब एक नया अध्ययन शुरू करना है।
आख़िर डॉक्टर की बात माननी ही चाहिए।
मुझे भी “वरिष्ठ नागरिक” से “ज्येष्ठ नागरिक” तक की यात्रा करते हुए सीखते रहना है।
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