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पुरुषार्थ करने वाले का भाग्य वृद्धि हो हे जाती है

आत्मविश्वास आपकी सर्वश्रेष्ठ पूँजी है। सत्य समझ लेना जब तक आप अपनी स्वयं की हार स्वीकार नहीं कर लेते। तब तक दुनियाँ की कोई भी ताकत आपको हरा नहीं सकती।

मैदान से हारा हुआ व्यक्ति जरूर फिर जीत सकता है, परंतु मन से हारा हुआ व्यक्ति कभी नहीं जीत सकता। संघर्ष का अर्थ आपके भीतर जगा हुआ वह आत्मविश्वास ही है, जो निरंतर प्रेरित करता हुआ कहता रहता है कि लक्ष्य थोड़ा सा कठिन जरूर है मगर मैं इसे अवश्य प्राप्त कर पाऊंगा।

 

जिस दिन आपका आत्मविश्वास टूट जायेगा उस दिन आप देखोगे कि आपके कदमों में आई हुई जीत भी आपकी न हुई। *मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत।*

सदैव प्रसन्न रहिये *जो प्राप्त है, पर्याप्त है….* बस इसी सोच के साथ अपना व अपने परिवार के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुये सदा हंसते-मुस्कुराते रहें और सदा चलते रहें जोश, जुनून और जज्बे के साथ ..

 

प्रथम विश्व युद्ध में बर्लिन शहर पर बम गिराने वाले भारतीय की कहानी

 

भारत के पहले विमान चालक (पायलट) दत्तात्रेय लक्ष्मण पटवर्धन का जन्म 10 जुलाई 1883 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उन्हें ‘दत्तू’ के नाम से जाना जाता था। उनकी पढ़ाई केवल पाँचवीं कक्षा तक ही हुई। उनके शरारती और जिद्दी स्वभाव के कारण उनके पिता लखूतात्या ने उन्हें घर से निकाल दिया।

दत्तू का नया नाम

दत्तू पैदल कोल्हापुर पहुँचे और वहाँ से बिना टिकट मुंबई आ गए। मुंबई में उन्होंने लगभग छह महीने तक मस्जिद बंदर रेलवे स्टेशन पर कुली का काम किया। इसके बाद वे माटुंगा रेलवे वर्कशॉप में वायरमैन बने और आगे चलकर इंजन ड्राइवर भी बने।

नौकरी पाने के लिए उन्होंने अपना नाम बदलकर एंग्लो-इंडियन शैली का डी. लैकमैन पैट (D. Lacman Pat)” रख लिया।

एक दिन वे मुंबई बंदरगाह पर खड़े जर्मन जहाज़ स्ट्रान्स फेल्स (Strance Fells)” पर चुपके से चढ़ गए और जाँच के समय कोयले की बोरियों में छिप गए। जहाज़ समुद्र में काफी दूर निकल जाने के बाद उन्होंने जर्मन कप्तान हेनरिक ज्योडेल को अपनी स्थिति बताई। कप्तान उनकी योग्यता से प्रभावित हुए और उन्हें वायरमैन तथा इंजन रखरखाव का काम दे दिया।

बिना पासपोर्ट के वे जर्मनी पहुँचे, जहाँ हैम्बर्ग में उन्होंने मरीन इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद वे स्कॉटलैंड गए और ओशन किंग (Ocean King)” जहाज़ पर मरीन इंजीनियर के रूप में कार्य करने लगे।

मरीन इंजीनियर से पायलट तक का सफर

1911 में यह जहाज़ लिवरपूल और न्यूयॉर्क के बीच नियमित रूप से चलता था। उनके उत्कृष्ट कार्य से प्रसन्न होकर 1912 में उन्हें तुकाराम” नामक जहाज़ में इंजन लगाने के लिए मुंबई भेजा गया।

1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, तब दत्तू ब्रिटेन के वॉर ऑफिस पहुँचे और एम्बुलेंस कोर में भर्ती हो गए। उनकी निष्ठा और ईमानदारी को देखते हुए उन्हें ससेक्स ब्रिगेड में सैनिक बना दिया गया। वहाँ उन्होंने आधुनिक हथियारों, बंदूकों और तोपों का प्रशिक्षण प्राप्त किया और बाद में उन्हें फ्रांस के युद्धक्षेत्र में भेजा गया।

इसके बाद उनका चयन रॉयल एयर फोर्स में हुआ। वहाँ उन्होंने मालवाहक और बॉम्बर विमान उड़ाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया और एक कुशल पायलट बन गए।

एक अभियान के दौरान उन्होंने घने कोहरे का लाभ उठाकर सीधे बर्लिन पर बमबारी की। दुश्मन की विमानभेदी तोपों से बचते हुए उन्होंने कैसर पैलेस पर भी बम गिराए।

कहा जाता है कि उन्हें बर्लिन पर बमबारी करने वाले दुनिया के पहले बॉम्बर पायलट के रूप में सम्मानित किया गया। ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम ने स्वयं उनके कोट पर सैन्य सम्मान और वीरता पदक लगाया तथा उन्हें स्वॉर्ड ऑफ मिलिटरी ऑनर” से सम्मानित किया।

दत्तू के जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण

सम्मान समारोह के बाद दत्तू ने राजा को बताया कि उनका वास्तविक नाम दत्तात्रेय लक्ष्मण पटवर्धन है और सेना में भर्ती होने के लिए उन्होंने डी. लैकमैन पैट नाम अपनाया था।

यह सुनकर राजा ने प्रसन्न होकर कहा—

हमारी वायुसेना में एक वीर मराठा युवक!”

उन्होंने गलत नाम अपनाने के कारण उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न करने का आदेश दिया।

यह घटना 24 अप्रैल 1919 की बताई जाती है। बाद में उनकी पदोन्नति लेफ्टिनेंट के पद पर हुई और उन्हें प्रतिमाह 1200 रुपये वेतन मिलने लगा।

उस समय दत्तू ने भावुक होकर कहा—

यह मेरे जीवन का सबसे भाग्यशाली क्षण है।”

1921 में भारत वापसी

1921 में मुंबई के ब्रिटिश गवर्नर ने उन्हें राजकीय अतिथि (Royal Guest) के रूप में आमंत्रित किया। बाद में वे रत्नागिरी लौटे और अमरावती की चंद्रताई शेवड़े से विवाह किया।

1930 में वे सेवानिवृत्त हो गए।

उनकी वीरता की जानकारी 25 मार्च 1919 को लंदन गजट में प्रकाशित हुई। 13 मई 1919 को लंदन के समाचार पत्रों तथा ग्राफिक पत्रिका ने उनका विस्तृत जीवनवृत्त प्रकाशित किया। मराठी दैनिक केसरी ने भी उसी दिन उनके पराक्रम का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया।

18 अक्टूबर 2003 को रत्नाकर शिवराम वाशीकर और अनंत लक्ष्मण मराठे द्वारा लिखित पुस्तक इंडियाज़ फर्स्ट पायलट” प्रकाशित हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध में योगदान

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर लंदन से आए आदेश के अनुसार उन्हें दिल्ली में ऑल इंडिया मिलिटरी, नेवल एंड एयर फोर्स अकादमी स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस अकादमी में उन्होंने अनेक भारतीय सैनिकों को प्रशिक्षण दिया।

कैंसर से निधन

18 अक्टूबर 1943 को कैंसर के कारण उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी और पुत्र बाद में नागपुर में बस गए। उनके पौत्र प्रभाकर पटवर्धन मुंबई के कांदिवली में अपना इंजीनियरिंग व्यवसाय चलाते हैं।

अक्सर Jehangir Ratanji Dadabhoy Tata को भारत का पहला पायलट कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने 1929 में भारत का पहला आधिकारिक पायलट लाइसेंस प्राप्त किया। जबकि इस लेख के अनुसार दत्तात्रेय पटवर्धन ने इससे पहले, 1914 में ही बॉम्बर पायलट के रूप में इतिहास रचा था। इसलिए लेखक का मत है कि उन्हें भारत का पहला पायलट माना जाना चाहिए।

यह प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

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