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जजिया यानि दो महीने की सारी कमाई लेते थे शहन्शाह-ए-हिन्दोस्तान

निकोलाओ मानुची (1639-1717) एक इतालवी यात्री और लेखक थे, जो 17वीं शताब्दी में मुगल काल के समय भारत (शाहजहाँ-औरंगज़ेब काल) में रहे और उन्होंने ‘स्टोरिया डो मोगोर’ (Storia do Mogor) नामक पुस्तक में तत्कालीन इतिहास व दरबार का विस्तृत आँखों देखा विवरण लिखा。वह दारा शिकोह की सेना में तोपची के रूप में रहे, बाद में एक चिकित्सक (physician) के रूप में कार्य किया।

निकोलाओ मानुची लिखते हैं कि जजिया कर न देने के कारण जो हिन्दू मुसलमान बनते थे, उन्हें देखकर बादशाह को आनन्द मिलता था। एक साधारण मजदूर को अपनी दो महीने की कमाई जजिया के रूप में शाही खजाने में जमा करानी पड़ती थी। और तीर्थयात्री कर तो और भी अधिक था। चार महीनों की कमाई के बराबर रकम चुकाओ, तब तीर्थयात्रा करने जाओ। यह तो अकेले जाने का हिसाब था और कहीं बूढ़े माता-पिता की अन्तिम इच्छा पूर्ण करने हेतु संकल्प ले लिया, तो पूरे एक वर्ष की कमाई जजिया कर के रूप में देनी पड़ती थी।

 

परिवार भूखों मरे, भीख माँगे या आत्महत्या करे, इससे बादशाह को कुछ लेना-देना नहीं था। वह न तो मीरा का भगत-बछल गोपाल था और न प्रजा का पिता। उसे तो बस फैलाना था अपना जिहादी इस्लाम और रखने थे पैरों तले पुराण तथा शीश पर कुराण। वाह रे शहन्शाह-ए-हिन्दोस्तान!

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