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शेषनाग और पृथ्वी: वैदिक विज्ञान की गहनत

शेषनाग का वैज्ञानिक अर्थ:👉 संस्कृत में “शेष” का अर्थ है अंतरिक्ष, अर्थात् वह जो पृथ्वी से परे है। “नाग” का तात्पर्य गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) और चुंबकीय बलों (मैग्नेटिक फोर्स) के संयुक्त प्रभाव से है। इस प्रकार, “शेषनाग पर टिकी पृथ्वी” का अर्थ है कि पृथ्वी अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय बलों के कारण संतुलित है। यह संतुलन पृथ्वी को गोलाकार या अंडाकार बनाता है, न कि चपटा, जैसा कि कुछ भ्रांतियां मानती हैं।

 

वैदिक साहित्य में शेषनाग को काल्पनिक रेखाओं के रूप में दर्शाया गया है, जो पृथ्वी को अंतरिक्ष में स्थिर रखती हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, ये काल्पनिक रेखाएं गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रतीक हैं, जो पृथ्वी को सूर्य और अन्य खगोलीय पिंडों के साथ संतुलन में रखती है। इस प्रकार, “पृथ्वी शेषनाग पर टिकी है” का अर्थ है कि पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय बलों के जटिल संतुलन के कारण अंतरिक्ष में स्थिर है।

यदि हम अपने धर्मग्रंथों को गहराई से समझें, तो हमें वैदिक विज्ञान की गहनता का पता चलता है। जो लोग अपने ग्रंथों को नहीं पढ़ते और धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, वे अनजाने में अपने ही वैज्ञानिक और दार्शनिक विरासत का उपहास उड़ाते हैं।

 

प्राचीन भारतीय ऋषियों की वैज्ञानिक उपलब्धियां 👇

 

भारत के प्राचीन ऋषि, जिन्हें पश्चिमी जगत ने “रिसर्चर” का नाम देकर उनकी नकल की, न केवल आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि महान वैज्ञानिक भी थे। उन्होंने हजारों वर्ष पूर्व ऐसी खोजें कीं, जो आधुनिक विज्ञान से बहुत आगे थीं। नीचे कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जो उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा को दर्शाते हैं:

 

गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (भास्कराचार्य): 👇

 

खोज: भास्कराचार्य ने अपनी रचना सिद्धांत शिरोमणि (12वीं शताब्दी) में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को समझाया। उन्होंने लिखा कि पृथ्वी में एक आकर्षण शक्ति है, जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। यह न्यूटन से लगभग 500 वर्ष पहले की खोज थी।

 

उदाहरण:👉 “सर्वं विश्वेन संनादति” अर्थात् पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से सभी वस्तुओं को अपने केंद्र की ओर खींचती है। यह आधुनिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का आधार है।

 

पृथ्वी का गोलाकार होना (आर्यभट्ट): 👇

 

खोज: आर्यभट्ट ने 5वीं शताब्दी में आर्यभट्टियम् में लिखा कि पृथ्वी गोलाकार है और अपने अक्ष पर घूमती है। यह खोज यूरोपीय वैज्ञानिकों से 1,000 वर्ष पहले की थी, जिन्होंने कोपरनिकस के समय तक पृथ्वी को चपटा माना।

 

उदाहरण:👉 आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि 39,968 किमी के करीब बताई, जो आधुनिक गणना (40,075 किमी) से बहुत निकट है।

 

सूर्यकेंद्रित मॉडल (आर्यभट्ट और याज्ञवल्क्य): 👇

 

खोज:👉 याज्ञवल्क्य ने शतपथ ब्राह्मण में और आर्यभट्ट ने आर्यभट्टियम् में सूर्यकेंद्रित मॉडल का उल्लेख किया, जिसमें ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह खोज कोपरनिकस से 1,000 वर्ष पहले की थी।

 

उदाहरण👉 आर्यभट्ट ने ग्रहमंडल की गति और सूर्य के चारों ओर ग्रहों की कक्षा का सटीक वर्णन किया।

 

शून्य और दशमलव प्रणाली (ब्रह्मगुप्त):👇

 

खोज:👉 ब्रह्मगुप्त ने 7वीं शताब्दी में ब्रह्मस्फुरसिद्धांत में शून्य को एक संख्या के रूप में स्थापित किया और दशमलव प्रणाली का विकास किया। यह आधुनिक गणित का आधार बना।

 

उदाहरण:👉 शून्य के बिना आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान और गणनाएं असंभव होतीं।

 

विमानशास्त्र (ऋषि भरद्वाज): 👇

 

खोज:👉 ऋषि भरद्वाज की रचना विमानशास्त्र में उड़ने वाले यानों का वर्णन है। इसमें यांत्रिक संरचनाएं, प्रणोदन प्रणाली, और उड़ान के सिद्धांत दिए गए हैं, जो आधुनिक विमानन से हजारों वर्ष पहले के हैं।

 

उदाहरण:👉 इसमें “रोहिणी” और “शकुना” जैसे यानों का उल्लेख है, जो विभिन्न ऊर्जा स्रोतों से संचालित थे।

 

चिकित्सा और शल्य चिकित्सा (सुश्रुत): 👇

 

खोज:👉 सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के सिद्धांत और तकनीकों का वर्णन किया, जिसमें प्लास्टिक सर्जरी और नेत्र शल्य चिकित्सा शामिल थी। यह 2,500 वर्ष पहले की खोज थी।

 

उदाहरण:👉 सुश्रुत ने नाक की प्लास्टिक सर्जरी (राइनोप्लास्टी) और 121 प्रकार के शल्य उपकरणों का वर्णन किया।

 

परमाणु सिद्धांत (कणाद): 👇

 

खोज:👉 ऋषि कणाद ने वैशेषिक सूत्र में परमाणु (एटम) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि विश्व सूक्ष्म कणों से बना है, जो अविभाज्य हैं। यह आधुनिक परमाणु सिद्धांत से 2,000 वर्ष पहले की खोज थी।

 

उदाहरण:👉 कणाद ने परमाणुओं की गति और संयोजन के नियमों का वर्णन किया, जो आधुनिक रसायन विज्ञान का आधार है।

 

निष्कर्ष👇

 

प्राचीन भारतीय ऋषियों ने विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में ऐसी खोजें कीं, जो आधुनिक विज्ञान से हजारों वर्ष पहले थीं। उनके ग्रंथों में निहित ज्ञान आज भी प्रासंगिक है। यदि हम अपने धर्मग्रंथों को गहराई से पढ़ें और समझें, तो हमें अपनी वैज्ञानिक विरासत पर गर्व होगा और हम दूसरों के सामने इसका उपहास नहीं होने देंगे।

 

रवि प्रदोष व्रत परिचय एवं विस्तृत विधि*

 

प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है।

 

ऐसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए।

 

यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है।

 

प्रदोष व्रत की महत्ता

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शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि ” एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा।

 

उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है।

 

व्रत से मिलने वाले फल

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अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है।

 

जैसे👉  सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है। सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है। जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है एवं बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है।

 

गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है। शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है। अंत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए। अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।

 

व्रत विधि

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सुबह स्नान के बाद भगवान शिव, पार्वती और नंदी को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। फिर गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग और इलायची चढ़ाएं। फिर शाम के समय भी स्नान करके इसी प्रकार से भगवान शिव की पूजा करें। फिर सभी चीजों को एक बार शिव को चढ़ाएं।और इसके बाद भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजन करें। बाद में भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। इसके बाद आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। जितनी बार आप जिस भी दिशा में दीपक रखेंगे, दीपक रखते समय प्रणाम जरूर करें। अंत में शिव की आरती करें और साथ ही शिव स्त्रोत, मंत्र जाप करें। रात में जागरण करें।

 

प्रदोष व्रत समापन पर उद्धापन

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इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

 

उद्धापन करने की विधि

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इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

 

इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. “ऊँ उमा सहित शिवाय नम:” मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है।

 

हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है। और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है।

 

रवि त्रयोदशी प्रदोष व्रत

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॥ दोहा ॥

आयु, बुद्धि, आरोग्यता, या चाहो सन्तान ।

शिव पूजन विधवत् करो, दुःख हरे भगवान ॥

 

किसी समय सभी प्राणियों के हितार्थ परम् पुनीत गंगा के तट पर ऋषि समाज द्वारा एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, जिसमें व्यास जी के परम् प्रिय शिष्य पुराणवेत्ता सूत जी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे। शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनिगण ने सूत जी को दण्डवत् प्रणाम किया। सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषिगण को आशीर्वाद दे अपना स्थान ग्रहण किया।ऋषिगण ने विनीत भाव से पूछा, “हे परम् दयालु! कलियुग में शंकर भगवान की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी? कलिकाल में जब मनुष्य पाप कर्म में लिप्त हो, वेद-शास्त्र से विमुख रहेंगे । दीनजन अनेक कष्टों से त्रस्त रहेंगे । हे मुनिश्रेष्ठ! कलिकाल में सत्कर्मं में किसी की रुचि न होगी, पुण्य क्षीण हो जाएंगे एवं मनुष्य स्वतः ही असत् कर्मों की ओर प्रेरित होगा । इस पृथ्वी पर तब ज्ञानी मनुष्य का यह कर्तव्य हो जाएगा कि वह पथ से विचलित मनुष्य का मार्गदर्शन करे, अतः हे महामुने! ऐसा कौन-सा उत्तम व्रत है जिसे करने से मनवांछित फल की प्राप्ति हो और कलिकाल के पाप शान्त हो जाएं?”सूत जी बोले- “हे शौनकादि ऋषिगण! आप धन्यवाद के पात्र हैं । आपके विचार प्रशंसनीय व जनकल्याणकारी हैं । आपके ह्रदय में सदा परहित की भावना रहती है, आप धन्य हैं । हे शौनकादि ऋषिगण! मैं उस व्रत का वर्णन करने जा रहा हूं जिसे करने से सब पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा जो धन वृद्धिकारक, सुख प्रदायक, सन्तान व मनवांछित फल प्रदान करने वाला है । इसे भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था।”सूत जी आगे बोले- “आयु वृद्धि व स्वास्थ्य लाभ हेतु रवि त्रयोदशी प्रदोष का व्रत करें । इसमें प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिव जी का मनन करें ।मन्दिर जाकर शिव आराधना करें । माथे पर त्रिपुण धारण कर बेल, धूप, दीप, अक्षत व ऋतु फल अर्पित करें । रुद्राक्ष की माला से सामर्थ्यानुसार, ॐ नमः शिवाय’ जपे । ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें, तत्पश्‍चात मौन व्रत धारण करें । संभव हो तो यज्ञ-हवन कराएं ।‘ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा’ मंत्र से यज्ञ-स्तुति दें । इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है । प्रदोष व्रत में व्रती एक बार भोजन करे और पृथ्वी पर शयन करे । इससे सर्व कार्य सिद्ध होते हैं । श्रावण मास में इस व्रत का विशेष महत्व है । सभी मनोरथ इस व्रत को करने से पूर्ण होते है । हे ऋषिगण! यह प्रदोष व्रत जिसका वृत्तांत मैंने सुनाया, किसी समय शंकर भगवान ने सती जी को और वेदव्यास मुनि ने मुझे सुनाया था ।”शौनकादि ऋषि बोले – “हे पूज्यवर! यह व्रत परम् गोपनीय, मंगलदायक और कष्ट हरता कहा गया है । कृपया बताएं कि यह व्रत किसने किया और उसे इससे क्या फल प्राप्त हुआ?”

 

तब श्री सुत जी कथा सुनाने लगे-

 

व्रत कथा

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“एक ग्राम में एक दीन-हीन ब्राह्मण रहता था । उसकी धर्मनिष्ठ पत्‍नी प्रदोष व्रत करती थी । उनके एक पुत्र था । एक बार वह पुत्र गंगा स्नान को गया । दुर्भाग्यवश मार्ग में उसे चोरों ने घेर लिया और डराकर उससे पूछने लगे कि उसके पिता का गुप्त धन कहां रखा है । बालक ने दीनतापूर्वक बताया कि वे अत्यन्त निर्धन और दुःखी हैं । उनके पास गुप्त धन कहां से आया । चोरों ने उसकी हालत पर तरस खाकर उसे छोड़ दिया । बालक अपनी राह हो लिया । चलते-चलते वह थककर चूर हो गया और बरगद के एक वृक्ष के नीचे सो गया । तभी उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उसी ओर आ निकले । उन्होंने ब्राह्मण-बालक को चोर समझकर बन्दी बना लिया और राजा के सामने उपस्थित किया । राजा ने उसकी बात सुने बगैर उसे कारावार में डलवा दिया । उधर बालक की माता प्रदोष व्रत कर रही थी । उसी रात्रि राजा को स्वप्न आया कि वह बालक निर्दोष है । यदि उसे नहीं छोड़ा गया तो तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा । सुबह जागते ही राजा ने बालक को बुलवाया । बालक ने राजा को सच्चाई बताई । राजा ने उसके माता-पिता को दरबार में बुलवाया । उन्हें भयभीत देख राजा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है । तुम्हारी दरिद्रता के कारण हम तुम्हें पांच गांव दान में देते हैं ।’ इस तरह ब्राह्मण आनन्द से रहने लगा । शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई।”

 

प्रदोषस्तोत्रम्

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।। श्री गणेशाय नमः।।

 

जय देव जगन्नाथ जय शङ्कर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥ १॥

 

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद ।

जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥ २॥

 

जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण ।

जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ॥ ३॥

 

जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय । जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ॥ ४॥

 

जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥ ५॥

 

प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः । सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥ ६॥

 

महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च । महाशोकनिविष्टस्य महारोगातुरस्य च ॥ ७॥

 

ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः । ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शङ्कर ॥ ८॥

 

दरिद्रः प्रार्थयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् । अर्थाढ्यो वाऽथ राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम् ॥ ९॥

 

दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः ।

ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ॥ १०॥

 

शत्रवः संक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम प्रजाः । नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ॥ ११॥

 

दुर्भिक्षमरिसन्तापाः शमं यान्तु महीतले । सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः ॥ १२॥

 

एवमाराधयेद्देवं पूजान्ते गिरिजापतिम् । ब्राह्मणान्भोजयेत् पश्चाद्दक्षिणाभिश्च पूजयेत् ॥ १३॥

 

सर्वपापक्षयकरी सर्वरोगनिवारणी । शिवपूजा मयाऽऽख्याता सर्वाभीष्टफलप्रदा ॥ १४॥

 

॥ इति प्रदोषस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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कथा एवं स्तोत्र पाठ के बाद महादेव जी की आरती करें

 

ताम्बूल, दक्षिणा, जल -आरती

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 तांबुल का मतलब पान है। यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। ताम्बूल के साथ में पुंगी फल (सुपारी), लौंग और इलायची भी डाली जाती है । दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। भगवान भाव के भूखे हैं। अत: उन्हें द्रव्य से कोई लेना-देना नहीं है। द्रव्य के रूप में रुपए, स्वर्ण, चांदी कुछ भी अर्पित किया जा सकता है।

 

आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है।

 

भगवान शिव जी की आरती

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ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव…॥

 

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।

तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।

चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।

जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठि दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।

पार्वती अर्धांगनी, शिवलहरी गंगा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।

 

पर्वत सौहे पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।

 

जटा में गंगा बहत है, गल मुंडल माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।

 

त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥

 

ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव।।

 

कर्पूर आरती

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कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि॥

 

मंगलम भगवान शंभू

मंगलम रिषीबध्वजा ।

मंगलम पार्वती नाथो

मंगलाय तनो हर ।।

 

मंत्र पुष्पांजलि

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मंत्र पुष्पांजली मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं।

 

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।

 

ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:

 

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम् कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु।

कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नम:

 

ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं

पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवा: सभासद इति।

 

ॐ विश्व दकचक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात संबाहू ध्यानधव धिसम्भत त्रैत्याव भूमी जनयंदेव एकः।

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि

तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

 

नाना सुगंध पुष्पांनी यथापादो भवानीच

पुष्पांजलीर्मयादत्तो रुहाण परमेश्वर

ॐ भूर्भुव: स्व: भगवते श्री सांबसदाशिवाय नमः। मंत्र पुष्पांजली समर्पयामि।।

 

प्रदक्षिणा

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नमस्कार, स्तुति -प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा। आरती के उपरांत भगवन की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा हमेशा क्लॉक वाइज (clock-wise) करनी चाहिए। स्तुति में क्षमा प्रार्थना करते हैं, क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें।

 

यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।

 

अर्थ: जाने अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए।

पृथ्वी दिवस – भारतीय परंपरा में पृथ्‍वी

श्री लक्ष्मण मन्दिर खजुराहो

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