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सनातन, भारतीय इतिहास और इसके विरुद्ध साजिशें : 2

पिछली पोस्ट में जैसा की मैं बता रहा था ये तो सभी मानते हैं की सनातन धर्म और वैदिक साहित्य के साथ छेड़छाड़ तो हुई है। 

 

पर यह शुरू कब हुई किसने की और कैसे की ज्यादातर लोग इससे अनभिज्ञ हैं।

 

जैसा की पहले पार्ट में बताया है इसकी शुरुआत #विलियम_जोंस ने की।  और कल इसका सुबूत मैंने #भविष्य_पुराण के एक पेज में किये गए फेरबदल से दिखाया। जोंस ने अपने साथियों के साथ करीब ५० साल की मेहनत के बाद पूरा प्रपंच रच दिया था। 

 

कैसे ?

 

चलिए अब आगे की कहानी देखते हैं।

 

आप अभी के किसी भी वामपंथी इतिहासकार को उठा कर देख लें वो हर ऐतिहासिक घटना का रिफरेन्स घुमा फिर कर तीन बातों से तुलना कर देते हैं।  गौतम बुद्ध का काल, चन्द्रगुप्त या मगथ वंश और तीसरा सम्राट अशोक के समयकाल की सहायता से। 

 

क्या हो कि अगर पूरा इतिहास छोड़ कर सिर्फ इन्ही तीनो के बारे में भ्रान्ति फैला दिया जाये तो?

 

गौतम बुद्ध की सहायता से आदि शंकराचार्य का जीवनकाल ही पूरा बदल दिया।  बुद्ध की सहायता से वैदिक साहित्यों का अपमान और लोगों में हीनभावना भर दिया।

 

चन्द्रगुप्त के काल में हेर फेर करके आर्यन और द्रविड़ नाम का मायाजाल फैला दिया 

 

चन्द्रगुप्त मौर्या के कालखंड को ३०० BC दिखाने के लिए जोंस ने खुद जोट तोड़ और जुगाड़ लगाया।  पहले अशोका का कालखंड बदला और उसी की सहायता से चन्द्रगुप्त का।

भारतीय इतिहास में  चन्द्रगुप्त नाम के २ राजा हुए थे जिनके नाम मिलते जुलते थे।

पहले थे मौर्या वंश के चन्द्रगुप्त और दुसरे थे गुप्त वंश में पैदा हुए चंद्रगुप्त।   

 

मौर्यवंश के चन्द्रगुप्त के परपोते जो पंद्रहवी शताब्दी ईसा पूर्व में हुए थे उनका नाम था अशोकवर्धन.

गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त के पोते का नाम था समुद्रगुप्त अशोकादित्य(प्रियदर्शी) या अशोका या अशोका द ग्रेट के नाम से भी जाना जाता है। इनके बौद्ध धर्म अपनाने के बाद से प्रियदर्शी ने नाम से भी जाना जाने लगा। 

 

इन दोनों राजाओ के नाम की समानता का फायदा उठाते हुए, जोंस और उसके साथियों ने समुद्रगुप्त अशोकदित्य को अशोकवर्धन से बदल डाला और अशोक को चंद्रगुप्त मौर्य के पोते के रूप में पेश किया। चन्द्रगुप्त मौर्य की अवधि पहले से ही जोन्स ने 1541 ईसा पूर्व से भ्रमित कर 312 ईसा पूर्व करवा दिया था। 

 

इस तरह अशोक ने नाम के हेरफेर के कारन चन्द्रगुप्त के बदले हुए कालखंड को और सत्यता मिल गयी। 

 

और तो और अशोक का नाम ही नहीं इस्तेमाल हुआ बल्कि तीसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व जो भी प्राचीन सिक्के, साहित्य  और अन्य सामग्री मिली उसको जोंस ने अशोकवर्धन (मौर्य) के साथ पैचिंग करने की कोशिश की, जो वास्तव में समुद्रगुप्त अशोकदित्य से संबंधित थे।

 

मज़ेदार बात ये हैं कि चद्रगुप्त मौर्या के पोते अशोकवर्धन का साम्राज्य बहुत छोटा था जो आज के बिहार तक सिकुड़ कर रह गया था जबकि अशोक का साम्राज्य बहुत विशाल था जो अखंड पंजाब या आज के पाकिस्तान तक फैला हुआ था।

 

और फिर उन्होंने इस तरह के रिकॉर्डों को गढ़ा और बनाया, जो कि पाणिनी, बौद्ध और शंकराचार्य आदि जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आंकड़ों की गलत ऐतिहासिक तिथियां दिखाती हैं। जोंस की इसी थ्योरी को बाद के यूरोपियन इतिहासकारों ने भी खूब इस्तेमाल किया। 

 

यूरोपियन इतिहासकार मेगस्थनीज़ जो अशोक के कालखंड चौथी शताब्दी ईसा पूर्व भारत आया था तो उसने अपना यात्रा वृतांत INDICA के नाम से लिखा था।  ऐसा कहा जाता है कि उनकी लिखी मूल किताब भी खो गयी।  अब ये खो गयी या जान बुझ कर गुम कर दी गयी ताकि अशोक और अशोकवर्धन की अदला बदली का सबूत ही ख़तम कर दिया जाये। 

 

और इस तरह जोंस और उसकी पाली हुई इतिहासकारो की टोली ने भारतीय धर्म और इतिहास के खिलाफ बहुत अधिक पक्षपाती साहित्य का निर्माण किया, जो आगे आने वाले सभी अन्य लेखकों के लिए भारत के बारे में नकारात्मक विचारों के प्रचार और प्रोपेगंडा फ़ैलाने का जरिया बन गया साथ ही हमारे शास्त्रीय गौरव की महिमा को हमेशा के लिए दबा दिया गया।

✍🏻

 

 

हिन्दू धर्म 1

 

**********

 

हिन्दू धर्म फ़ैल रहा है पुरे विश्व में  ।

 

रूस, अमेरिका, इजराइल, आॅस्ट्रेलिया, जर्मनी और यूरोप जैसे आधुनिक देशो में लोग हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता से काफी प्रभावित हैं और दिन प्रतिदिन लोगों का इस पर विश्वास बढता जा रहा है ।

 

वर्तमान में भारत के बाद यदि हिन्दू धर्म का कोई दूसरा केंद्र है तो अमेरिका ही है जिसका प्रमुख कारण अमेरिकन लोगों का तेजी से हिन्दू परंपराओं को अपनाना है ।

 

योग मेडिटेशन हो या फिर ॐ, गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप, पश्चिमी जगत से बडी मात्रा में लोग इसे सीखने भारत आ रहे हैं।

विज्ञान लोगो की पहुच में आ गया तो हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता समझ में आने लग गयी । गलती हो रही है तो अपने हिन्दू से अभी दूर हैं अपने धर्म से।

 

“जय जय नारायण नारायण हरि हरि, स्वामी नारायण नारायण हरि हरि। तेरी लीला सब से न्यारी न्यारी हरि हरि, तेरी महिमा प्रभु है प्यारी प्यारी हरि हरि॥

 

 

 

कल पूछा था की “शिवावतार श्रीमज्जगदगुरु आदि शंकराचार्य” की जन्म तिथि क्या है ?

 

सब ने बोला 788 AD किन ने बोला 500 BC जो की गलत है ।

 

गूगल करा फिर एक शब्द मिला Brit Mila जिस का मतलब होता है नामकरण संस्कार जो यहूदी प्रयोग करते हैं आगे एक शब्द मिला BARASALA गूगल सर्च किया तो मिला

 

Barasala (or) Namakarana Dolarohana (or) Naam Karan is a traditional ceremony of naming a newborn baby among Hindu communities of India. It was introduced by Adi Shankaracharya in 2000 B.C. Jews celebrate this ceremony in the name of Javed Habat or Brit Mila.  

 

आगे नहीं पड़ा इस लाइन पर अटक गया “It was introduced by Adi Shankaracharya in 2000 B.C.”

 

मतलब आदि शंकराचार्य 2000 B.C. में हुए उस के बाद इतने झूठ मिलते गए की लगा की अब ये धरती फट जाये और कम से कम दिल्ली उस के अन्दर समा जाये।

 

चलो छोड़ो झूठ की बात नहीं करते यहाँ आदि शंकराचार्य के सच की बात करते हैं मतलब अपने धर्म की बात करते हैं ।   

 

मैं जब भी कोई बात बोलता हूँ तो कुछ मित्र आ के बोलते हैं की फलाने पुराण में ये लिखा था गरुड़ पुराण शिव पुराण आदिपुराण मतलब हर बात में एक पुराण ले आते हैं ।

 

मेरा पहला प्रशन की पुराण होते क्या हैं ?

 

आसन भाषा में लिखता हूँ  विश्व की पहली पुस्तक है ऋग्वेद मतलब वेदो से शुरुवात हुयी। चार वेद ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद ये किस ने लिखे पता नहीं देव वाणी कहते हैं इस को उस के बाद इस को थोडा आसान बनाया 108 उपनिषद बना के ।

 

आगे लोगो उपनिषद को समझाने के लिए पुराण लिखे गए जिस को कहानियो के हिसाब से लोगो को समझया गया। ये बिलकूल वैसा ही है जैसे राजा के मुर्ख बेटे को पंचतंत्र की कहनिया सुना के सार बताया। वो ही पंचतंत्र आज जंगल बुक बन गयी।

 

अब आगे पुराण किस ने बनाये :-

ब्रह्मा जी ने ?

व्यास जी ने ?

या पाराशर जी ने?

 

कुछ क्लियर नहीं है।

 

पुराण और वेद में बहुत भेद है पुराण ही नहीं स्मृतियों और संहिताओं में भी भेद है । पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृतियां , संहिताएं आदि सभी धर्मग्रंथ नहीं है।

“धर्म ग्रंथ केवल वेद है या उपनिषद हैं”  

 

पुराणों की वजह से हिन्दू धर्म जितना बदनाम हो सकता था हुआ इस की कहानियो को लोग अन्धविश्वास समझने लगे। हाँ जिन को इन का सार समझ आ गया उन के लिए ठीक नहीं तो लोग कहानी के पात्र को पकड़ के बैठ जाते हैं फिर शुरू होता है मजाक बनाने का सिलसिला ।   

 

पुराण मतलब होता है “#प्राचीन_पुराना ” इस में हजारो ही नहीं लाखो साल का इतिहास या धर्म बताना होता है वैदिक ज्ञान को समेटना होता है कथा में लिखना होता है । जहाँ पर गलती होने के पुरे पुरे चांस होते हैं फिर अगला कोई आता है और संशोधन कर देता है फिर अगला कोई आता है अपना मतलब बता कर फिर संशोधन कर देता है। 

 

ये नाटक चालू हुआ जब येरुसलम जलने लगा था उस के बाद से हिन्दू वैदिक धर्म को बाँट दिया शैव पंथ , वैष्णव पंथ , शाक्त पंथ , एकेश्वरवादी लास्ट में कृष्ण भक्तों ने तो सत्यानाश ही कर दिया पुराणों का। एक हिन्दू धर्म मुझे आज तक नहीं पता की मैं कोन से पंथ से हूँ इतना पता है की हिन्दू हूँ त्रिदेव मेरे भगवान् है पिता हैं और त्रिशक्ति माता है।

 

सब पंथ का अलग अलग हिसाब सृष्टि उत्पत्ति, मानव इतिहास, परम्परा, धर्म और दर्शन आदि आदि। सब झोल झाल कर दिया। अब इस झोल झाल से केवल वेद या उपनिषद ही बहार निकाल सकते थे या हैं। आज धर्म के साथ विज्ञान को जोड़ना बहुत ज़रूरी है इसाई यहूदी हमारा वैदिक धर्म ले गए और हम को दे गए एक भ्रम पूर्ण धर्म जहाँ राधा मीरा कबीर दास सूरदास आ गए जो पुराण और ग्रन्थ कभी लिखे ही नहीं गए वो छप गए और हम पड़े जा रहे हैं। हमारे वेदों से दुनिया परमाणु सम्पन देश बन गए और हम लगे हुए हैं कबीरदास मीरा और सूरदास के लव जिहाद को पड़ने में ।

 

जरूरत है कि हम पुराण की कथाओं को समझें और उन्हें इतिहास अनुसार लिखें। कब तक पुराण की कथाओं को उसी रूप में सुनाया जाएगा जिस रूप में वे काल्पनिक लगती हैं। जरूरत है कि उसके आसपास जमी धूल को झाड़ा जाए।

 

इन 18 पुराणों और 24 उप पुराणों को भूलने का वक्त आ गया है और भक्ति काल के भक्तो से भी मोह त्याग दो ।

 

आदि शंकराचार्य जी ने वेदों और उपनिषदों की व्याख्या आज से 4000 वर्ष पूर्व की थी हिन्दू धर्म जो समझया था कण कण में भगवान और रजो तमो सतो के साथ शक्ति का स्वरूप भी समझाया था

 

,,,जो आगे और है

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