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सनातन, भारतीय इतिहास और इसके विरुद्ध साजिशें : 1

आज आधुनिक भारतीय इतिहासलेखन के लिए ब्रिटिश इतिहासकारों को श्रेय दिया जाता है –  जबकी वास्तविकता में ये बेहद निरंकुश और बर्बर प्रविर्ति के थे जिन्होंने इस उपमहाद्वीप में पाए गए हर उस चीज़ का नाश किया जो इसके गौरवशाली अतीत का प्रतिक था।

 

आज भारत के बारे में जो भी इतिहास पढ़ा या पढ़ाया जाता है वो ज्यादातर ब्रिटिश इतिहासकारों या फिर उनके पोषित और उनसे प्रभावित वामपंथियों द्वारा लिखा या रचा गया है। 

 

ब्रिटिशों द्वारा इतिहास लिखना एक जान बूझकर भारतीय मानस के मनोबल को तोड़ने और इसकी जड़ों से दूर करने का सफल प्रयास था।  अंग्रेजों ने इतिहास को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया ताकि यहाँ के सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक मनोबल को तोड़ कर इतना लाचार कर दिया जाये की विरोध काम या बिलकुल ख़तम हो जाये।

 

जिस समय अंग्रेजी साहित्य  नाटकों, शेक्सपियर के सांसारिक जीवन की त्रासदियों पर आधारित नाटकों में उलझा था, उसके बहुत पहले से यहाँ का संस्कृत साहित्य ज्ञान, विज्ञानं और जीवन के रहस्यों को सुलझा कर जीवन जीने का मार्ग प्रदर्शक था। 

अभी कुछ दिनों से Manoj Bhoj भाई ने सनातन और इसके साथ हुई छेड़छाड़ पर लिखना शुरू किया था तो बहुतों को ये कपोलकल्पित बात लग रही थी और वो ये मानने को तैयार नहीं थे की वेद पुराण सबसे छेड़ छाड़ हुई और पूरे भारत के इतिहास को पलट कर रख दिया गया। 

 

भारतीय पुरातन साहित्य या तो नष्ट कर दिया गया या अप्भ्रस्ट। जो भी मौलिक बचा भी है वो अंगरेज़ों और उसके पिट्ठुओं के पुस्तकलयों और संग्रहालयों में आम जनता की पहुँच से दूर है। 

 

क्या आप जानते हैं इस भारत के ब्रिटिश संस्करण इतिहास के लेखक कौन थे? वे मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी के सेना के अधिकारी और प्रशासकों थे।

 

16 दिसंबर, 1868 को लिखे गए एक पत्र में प्रसिद्ध इंडोलोजिस्ट मैक्स मुलर ने भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट ऑफ़ इंडिया के duke of argyll  को लिखा, ‘भारत को एक बार जीता गया है, लेकिन भारत को फिर से जीता जाना चाहिए और दुसरे विजय का माध्यम होना शिक्षा। 

 

प्रो। मैक्स मुलर सिर्फ एक दार्शनिक नहीं थे, वह भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) परीक्षा के लिए एक परीक्षक भी थे। गलत इतिहास के अध्यापन ने इस ‘दूसरे विजय’ में एक महान भूमिका निभाई।

 

भारतीय इतिहास का पहला ब्रिटिश विद्वान, जिसे सबसे महान भी माना जाता है आज के तथाकथित इतिहासकारों द्वारा वो था  सर विलियम जोन्स , जिसने एशियाटिक सोसाइटी की नींव रखी।  इस सोसाइटी का काम था – भारतीय ग्रंथों की खोज और अध्ययन।

जोन्स न केवल आधुनिक भारतीय कानून प्रणाली की एक प्रमुख स्तम्भ था, बल्कि ऐतिहासिक अध्ययनों के टाइटन्स, एडवर्ड गिब्बन, जिसने  ‘रोमन साम्राज्य की गिरावट और पतन’ लिखा था तथा  पूर्व भारतीय कंपनी मेजर जनरल चार्ल्स “हिंदू” स्टीवर्ट, जिसने सबसे पहले भारत में ईसाई धर्म के प्रचार का बीड़ा उठाया था उसका दोस्त भी था। 

 

इस सारे प्रपंच की शुरुआत को समझने की कोशिश कीजिये कि आखिर इन सब की शुरुआत कब और कैसे हुई?

 

इन विसंगतियों की शुरुआत भी बड़े ही शातिर तरीके से जोंस ने ही की थी। 

 

पुराणों के वंशविज्ञानी रिकॉर्डों का पुनर्निर्माण और विकृति इतने शातिराने तरीके से की थी कि इसने हर किसी को दिग्भ्रमित कर दिया था और है। 

 

जोन्स,  ने 1793 में अपने एशियाटिक सोसाइटी  के भाषण में, चंद्रगुप्त मौर्य की अवधि पर 312 ईसा पूर्व होने पर जोर दिया और उल्लेख किया कि चंद्रगुप्त की सेलेकस के साथ एक संधि थी।

 

39 साल बाद सन 1832 में H.H. Wilson, the President of the Asiatic Society of London ने उसके विष्णु पुराण पर दिए संवादों को छपवाया। इसमें जोंस ने बड़े विस्तार से चार पुराणों के राजवंश विसंगतियों का एक तुलनात्मक दृष्टिकोण बताया था।  वो चार पुराण थे विष्णु, मतस्य, वायु और भविष्य पुराण। 39 साल पुराणों का निर्माण और विकृति करने के लिए काफी था। 

 

उन दिनों, 19वीं सदी के अंत में, भारत में तीन प्रमुख प्रकाशन कम्पनियाँ थीं , श्री वेंकटेश्वर प्रेस ऑफ बॉम्बे (1871), निराना सागर प्रेस ऑफ बॉम्बे (1864) और वाराणसी के चौखंबा विद्याभवन (1892)। अधिकांश धार्मिक किताबें और शास्त्र मूल रूप से उनके द्वारा प्रकाशित किए गए थे।

 

सबसे पहला भविष्य पुराण श्री वेंकटेश्वर प्रेस ऑफ बॉम्बे द्वारा छपा गया था। उन्हें जो प्रतिलिपि छपने को मिली थी वो अंग्रेज़ों के ही संरक्षण में थी। 

 

उसके बाद अनेको प्रकाशकों ने उसकी भविष्य पुराण छपा पर वो सब श्री वेंकटेश्वर प्रेस की ही कॉपी थी।  आप सब भी चाहें तो भविष्य पुराण की कॉपी यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं। 

 

 

जैसा की कहा जाता है अपराध हमेशा कुछ सुराग छोड़ देता है, ठीक वैसा ही यहाँ भी है।

 

जिन पंडितों ने एशियाटिक सोसाइटी के लोगों के लिए यह काम किया था, शायद वो किसी तरह के सामाजिक या पारिवारिक दबाव में था  लेकिन उसकी अंतरात्मा के खिलाफ था। इसलिए उन्होंने नौकरी की और अंग्रेज़ों के कहे जैसा और उनके मनचाहे तारीखों के साथ छंदें बनाईं, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बौद्ध और चंद्रगुप्त के वंशावली वर्णन को गड़बड़ कर दिया।

आप इस भविष्य पुराण के पृष्ठ संख्या २४२ में दिए प्रतिसर्ग पर्व के प्रथम खंड के छठे अध्याय : “कश्यप के दस पुत्रों और मगध आदि राजवंशों का वर्णन” पढ़िए। 

 

इसके अनुसार ऋषि कश्यप के पुत्र थे गौतम।

ये ही गौतम बाद में बुध बने और बौद्ध धर्म की शुरुआत की तथा 10 वर्षों तक राज्य किया।

उनके बेटे शाक्य मुनी ने 20 साल तक शासन किया और उसके बाद उनके पुत्र शुधोधन ने 30 साल तक शासन किया।

शुद्घोधन का पुत्र शाक्य सिंह था, जो कलियुग के 2,700 वर्षों के उत्तरार्ध में पैदा हुआ था।यह राजा वैदिक धर्म का विनाशकारी था।

 

उन्होंने 60 वर्षों तक शासन किया और हर किसी को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया।

शाक्य सिंह के पुत्र बुद्ध सिंह थे जिन्होंने 30 साल तक शासन किया था।

बुद्ध सिंह के पुत्र चंद्रगुप्त थे जिन्होंने 60 साल तक शासन किया था। उनके बेटे बिन्दुसार ने 60 साल तक शासन किया और इसी बिन्दुसार का पुत्र अशोक था

 

यही प्रसंग सारे विनाश की गंगोत्री है। 

 

क्योंकि सच्चाई ये है की ये छंद अंग्रेजी लोगों द्वारा गढ़े गए थे।

 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि गौतम बुद्ध ने किसी भी राज्य पर शासन नहीं किया क्योंकि उन्होंने दुनिया को त्याग दिया था।

 

दूसरी बात यह है कि वह शुध्दोदन के पुत्र थे। लेकिन यहां शुद्धोदन को गौतम के पोते के रूप में दिखाया गया है।

 

1800 ईसा पूर्व में शिशुनाग वंश के राजा बिम्सर के समय गौतम बुद्ध थे।

 

लेकिन यहां बौद्ध का समय 462 ईसा पूर्व आता है।

 

कलियुग की शुरुआत 3102 BC माना जाता है और 2700 साल कलियुग के बीतने के बाद शुद्धोदन का जनम हुआ था 

 

[ 2,700 (-) 60 (10 + 20 + 30) वर्ष = 2,640 ]

 

अब 3102 BC से 2,640 साल घटाइए, यह 462 ईसा पूर्व आता है।  यही अंग्रेजी लोगों द्वारा मनचाहा आंकड़ा था। 

 

इस फेर बदल से ये तो भरोसा हो जाता है कि ब्रिटिश शासन के आज्ञाकारी कर्मचारियों, एशियाटिक सोसाइटी और ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों ने हमारे मूल अभिलेखों में महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों की ऐतिहासिक तिथियां तैयार की थी।

 

इस तरह से इन्होने मूल पांडुलिपि में ऐतिहासिक व्यक्तित्व की वांछित तारीख को गढ़ा और शामिल किया करते थे। 

फिर उनके प्रभाव वाले या उनके टुकड़ों पर पलने वाले कुशल विद्वानों को पूर्ण पृष्ठ या पूर्ण अध्याय लिखने के लिए लगाया, जो मूल के लेखन शैली की नकल करते हुए निर्माण किया करते थे।

 

इस तरह जब नकली पाण्डुलिपि उनके हिसाब से तैयार हो जाती थी, तब उन्होंने या तो Original पाण्डुलिपि को नष्ट कर दिया या गायब कर दिया।  और इस तरह अब एक original दिखने वाली पांडुलिपि परिसंचरण(circulation ) के लिए तैयार थी जो वास्तव में गढ़े हुए नकली होते थे।

 

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