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शिक्षक दिवस के मौके पर एक महान शिक्षक पंडित विष्णु शर्मा (पंचतंत्र के लेखक) पर

भारत की प्रसिद्ध कहानियों की किताब है पंचतंत्र. किसी जमाने में ये संस्कृत में लिखी गई थी. अगर धार्मिक किताबों को छोड़ दिया जाये तो ये सबसे ज्यादा बार अनुवाद की गई किताब होती है. *बगदाद में अल मंसूर यानि दूसरे अब्बासिद खलीफ़ा ने इसका अनुवाद करवाया तो कहा गया था कि लोकप्रियता में इस से ऊपर सिर्फ कुरआन है.*

ग्यारहवीं शताब्दी तक ये किताब यूरोप पहुँच चुकी थी. सोलहवीं शताब्दी में ये ग्रीक, लैटिन, स्पेनिश, इटालियन, जर्मन, पुरानी इंग्लिश, चेक जैसी अनगिनत भाषाओँ में पाई जाने लगी थी.

फ्रांस में देखेंगे तो कम से कम ग्यारह पंचतंत्र की कहानियां तो *Jean de La Fontaine* की रचनाओं में है. किताब के शुरू में ही बताया जाता है कि इसके रचियेता पंडित विष्णु शर्मा है. कोई और अलग किताब उसी काल के इस नाम के विद्वान् का जिक्र नहीं करती इसलिए उन्हें ही किताब का लेखक माना गया.

कहानी के हिसाब से वो महिलारोप्य नाम की राजधानी से राज्य करने वाले किसी सुदर्शन नाम के राजा के बेटों को पढ़ाते हैं. ये महिलारोप्य नाम की राजधानी भी अब नहीं मिलती.

राजा सुदर्शन के तीन बेटे थे, बाहुशक्ति, उग्रशक्ति, और अनंतशक्ति. राजा तो अच्छे थे लेकिन तीनों राजकुमार बड़े ही उज्जड किस्म के थे. परेशान राजा ने एक दिन दरबारियों से पूछा, किस तरह बच्चों को सही रास्ते पर लाया जाए? ऐसे तो ये नाश कर देंगे.

इस मुद्दे पर सब अपनी अपनी राय रखने लगे. आखिर सुमति नाम के एक विद्वान् ने कहा कि अलग अलग विषय पढ़ाने में बरसों लगेंगे. उनमें राजकुमारों की रूचि होगी या नहीं इसका भी पता नहीं. अगर कोई इन ग्रंथों का सार राजकुमारों को बता सके, वो भी गैर परंपरागत तरीकों से तो कोई बात बने.

राजा सुदर्शन को सलाह अच्छी लगी तो उन्होंने सौ ग्राम (गाँव) देने की कीमत पर *पंडित विष्णु शर्मा* को बुलाने का प्रयास किया. पंडित विष्णु शर्मा ने शिक्षा के बदले धन लेने से तो मना कर दिया लेकिन राजकुमारों को पढ़ाने के लिए तैयार हो गए. जो कहानियां उन्होंने राजकुमारों को सिखाई वही आज पंचतंत्र के नाम से जानी जाती हैं.

एक कहानी में ही गुंथी हुई दूसरी कथा के रूप में आज भी पंचतंत्र हमारे पास है. पंचतंत्र का नाम पंचतंत्र इसलिए है क्योंकि इसे पाँच तंत्रों (भागों) में बाँटा गया है:

*मित्रभेद* (मित्रों में मनमुटाव एवं अलगाव)

*मित्रलाभ* या मित्रसंप्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ)

*काकोलुकीयम्* (कौवे एवं उल्लुओं की कथा)

*लब्धप्रणाश* (हाथ लगी चीज (लब्ध) का हाथ से निकल जाना (हानि))

*अपरीक्षित कारक* (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; जल्दबाजी में कदम न उठायें)

पंचतन्त्र के कई संस्करण उपलब्ध है. कई शुरूआती अनुवाद जो कि सीरियन और अरबी अनुवादों से लिए गए हैं. क्षेमेन्द्र की लिखी *“बृहत्कथा मंजरी”* और सोमदेव लिखित ‘कथासरित्सागर’ उसी के अनुवाद हैं. तन्त्राख्यायिका एवं उससे सम्बद्ध जैन कथाओं का संग्रह है. ‘तन्त्राख्यायिका’ को सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है. इसका मूल स्थान कश्मीर है.

इस किताब की वजह से भी पंडित विष्णु शर्मा और महिलारोप्य को कश्मीर का माना जाता है. नेपाल के इलाकों के पंचतंत्र और हितोपदेश का एक रूप भी उपलब्ध होता है.

बिना मौजूद हुए भी पंडित विष्णु शर्मा के लिखे की वजह से हमने काफी सीखा. शायद इसलिए भी सिर्फ श्रुति की परम्पराओं में नहीं, काम की चीज़ों को लिखकर रखना चाहिए. हमने पंचतंत्र की कई कहानियां उठा उठा कर ताज़ा राजनैतिक मामलों पर चिपकाई हैं.

पंचतंत्र के नाम में “तंत्र” होने का एक कारण भी ये है कि ये राजनैतिक समझदारी सिखाती थी. आज शिक्षक दिवस है तो पंडित विष्णु शर्मा को भी नमन.

 

*वो शिक्षक जो “क्रांति” पढ़ाते थे!*

 

 

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को “अहिंसक” रंग देने के प्रयास में कई मामले दबा देने पड़ते हैं। मुजफ्फरपुर कांड (1908) सुनाई देता है क्योंकि उससे *खुदीराम बोस* और *प्रफुल्ल चाकी* जुड़े थे। उसके थोड़े समय बाद का दिल्ली कांड (1912) थोड़ा कम सुनाई देता है। इसमें बसंत कुमार बिस्वास, आमिर चंद और अवध बिहारी को फांसी की सजा हुई थी। इस काण्ड में रास बिहारी बोस ने बम फेंका था। ऐसे ही कई मामलों को एक साथ जोड़कर पेशावर कांड (1922-27) नाम दिया जाता है। एक मामला कानपुर बोल्शेविक कांड (1924) का भी था। ऐसे सभी मामलों के साथ एक ख़ास बात ये थी कि इन सभी में छात्र जुड़े हुए थे। अब सवाल है कि क्रन्तिकारी अगर छात्र थे तो उनका शिक्षक कौन था?

 

ये सवाल हमें फ़ौरन सचिन्द्र नाथ सान्याल पर ले आता है। ये वो व्यक्ति थे जो चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, जतिंद्र नाथ जैसे क्रांतिकारियों के गुरु थे। जन्तिन्द्र नाथ ने बम बनाना भी इन्हीं से सीखा था। इन्होने 1913 में पटना में “अनुशीलन समिति” की एक शाखा की स्थापना की। गदर काण्ड की योजना में शामिल होने का जब फिरंगियों को पता चला तो सचिन्द्र नाथ सान्याल को 1915 में फरार होना पड़ा। रास बिहारी बोस के जापान फरार होने के बाद वो भारत के क्रांतिकारियों में सबसे वरिष्ठ थे। उन्हें भी जब पकड़ा गया तो बाकी क्रांतिकारियों की ही तरह अंडमान की सेलुलर जेल में डाला गया था। इसी दौर में उन्होंने अपनी आत्मकथा *“बंदी जीवन”*(1922) लिखी थी। वो थोड़े समय के लिए जेल से छोड़े गए, मगर जब उनकी क्रन्तिकारी गतिविधियाँ जारी रहीं, तो उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया था और उनकी बनारस की संपत्ति भी जब्त कर ली गयी थी।

 

भारत में क्रांति का नाम लेते ही जिस संगठन का नाम याद आता है वो है *एचआरए (हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी)।* सन 1922 में जब असहयोग आन्दोलन असफल हो चुका था, तभी इस संगठन के बनने की नींव पड़ चुकी थी। अक्टूबर 1924 में राम प्रसाद बिस्मिल के साथ सचिन्द्र नाथ सान्याल ने एचआरए बनाया। 31 दिसम्बर 1924 को इस संगठन का मैनिफेस्टो कई बड़े शहरों में बांटा गया था। “द रेवोलुशनरी” नाम के इस मैनिफेस्टो के लेखक सचिन्द्र नाथ सान्याल ही थे। सान्याल को काकोरी कांड में शामिल होने के लिए नैनी जेल में डाला गया था जहाँ से वो 1937 में छूटे। वो उन गिने चुने क्रांतिकारियों में से हैं जिन्हें दो दो बार कालापानी की सजा दी गयी हो।

 

जेल में ही उन्हें टीबी हो गया था जिसकी वजह से उन्हें आखरी दिनों में गोरखपुर जेल भेज दिया गया था। सन 1942 में उनकी मृत्यु हुई। तकनिकी रूप से देखा जाए तो सचिन्द्र नाथ सान्याल किसी स्कूल-कॉलेज के शिक्षक तो नहीं थे। उनके विचारों, या उनके सिखाये हुए का असर देखा जाए तो सरदार भगत सिंह की लिखी प्रख्यात सी पुस्तिका “व्हाई आई एम एन एथीस्ट” में भी सान्याल के विचारों का जिक्र आता है। जो लोग ये मानते हैं कि गाँधी की कांग्रेस ऐसे क्रांतिकारियों से अलग थी, उन्हें भी बताते चलें कि गाँधी और सान्याल के बीच चली लम्बी बहस (चिट्ठियों/लेखों के रूप में) 1920-24 के दौरान यंग इंडिया में छपी थी। मौलाना शौकत अली और कृष्ण कान्त मालवीय जैसे कांग्रेसी भी उन्हें हथियार और पैसे मुहैया करवाते थे।

बाकी जब शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को याद करने की बात चले तो ऐसे शिक्षकों को भी याद किया जाना चाहिए। ये परंपरागत विषय नहीं, *क्रांति सिखाते थे और पढ़ाई पूरी करने पर डिग्री नहीं, जेल और फांसी मिलती थी।* अपने छात्रों को इतिहास पढ़ाने के बदले इतिहास बन जाना सिखा देने वाले शिक्षकों को भी याद किया ही जाना चाहिए!

✍🏻 आगे और बाकी है…

 

दस्युओं को भी स्वतंत्रता की मशाल थमाने वाले *#पण्डित_गेंदालाल_दीक्षित को “क्रांतिकारियों का #द्रोणाचार्य” कहा जाता था :*

 

#चाणक्य सीरियल का वह संवाद तो हमें स्मरण है ही कि “शिक्षक साधारण नहीं होता। प्रलय व निर्माण दोनों उसकी गोद में खेलते हैं।”

 स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इसका जीवंत उदाहरण हैं *”क्रांतिवीर पण्डित गेंदालाल दीक्षित”।* संयुक्त प्रान्त के क्रांतिकारियों के बीच मास्साब नाम से पहचाने जाने वाले इस क्रांतिवीर ने न सिर्फ सैकड़ों छात्रों और नवयुवकों को स्वतंत्रता की लड़ाई से जोड़ा बल्कि बीहड़ के दस्यु सरदारों में राष्ट्रीय भावना जगाकर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए जीवन सौंपने की शपथ दिलवाई। इतिहास में उनकी पहचान मैनपुरी षड्यंत्र केस के सूत्रधार, उस दौर के सबसे बड़े सशस्त्र संगठनों शिवाजी समिति व मातृवेदी के संस्थापक-कमांडर के रूप में होती है। संगठन में युवाओं व डाकुओं को जोड़ने के बाद उन्हें राष्ट्र प्रेम की दीक्षा और हथियार चलाने की शिक्षा देने के नाते उन्हें क्रांतिकारियों का द्रोणाचार्य कहा जाता है। महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को स्वतंत्रता आन्दोलन से जोड़ने व शस्त्र शिक्षा देने का श्रेय भी इन्हीं को है। उन्होंने अलग-अलग प्रान्तों में काम कर रहे क्रांतिक्रारी संगठनों को एकीकृत कर विप्लवी महानायक रास बिहारी बोस की सन 1915 की क्रांति योजना को भी सहयोग दिया था। 

पं. गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1890 को संयुक्त प्रांत के आगरा में बटेश्वर के पास मई गांव में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही हुई और आगे की पढ़ाई उन्होंने इटावा व आगरा में की। स्वतंत्रता के आन्दोलन से वे मिडिल पास करने के बाद ही जुड़ गये थे, जब 1905 में बंग-भंग के विरोध में देशव्यापी आन्दोलन शुरू हुआ था। इसी के चलते वह कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर आगरा से औरैया चले आये और वहां डीएवी स्कूल में पढ़ाने लगे। शुरुआत में उन्होंने शिक्षा सुधार का एक खाका बनाया और उसी पर काम करना शुरू किया। यह खाका आर्य समाज की शिक्षाओं से प्रेरित था।

गेंदालाल स्वयं ज्योतिष, संस्कृत और योग के अच्छे विद्वान थे। वह शिक्षा में सुधार के माध्यम से ही राष्ट्रीय भावना जगाना चाहते थे। इसके लिए डीएवी स्कूल के हेड मास्टर के रूप में काम करते हुए उन्होंने कई स्थानों की यात्रा की और नौजवानों को जोड़ा। गेंदालाल लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के कार्य और विचारों से बहुत प्रभावित थे। जब तिलक ने महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी की जयंती मनाने का आह्वान किया तो इससे प्रभावित होकर गेंदालाल ने शिवाजी समिति नाम की संस्था बनाई। संस्था से युवाओं व छात्रों को जोड़ा जाता था और उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए तैयार किया जाता था। समिति विस्तार के लिए गेंदालाल संयुक्त प्रान्त के कई इलाकों से लेकर सिंगापुर तक गए।

 

इसी बीच वह मथुरा के प्रसिद्ध विरजानंद पाठशाला पहुंचे। यह वही पाठशाला है जहां से आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने शिक्षा पाई थी। यहीं उनकी मुलाकात मजबूत कद काठी के युवा विद्वान लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी से हुई, जोकि उनसे प्रभावित होकर शिवाजी समिति से जुड़ गये। जब दीक्षित राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क साधने बम्बई चले गये तो लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी ने ही समिति का संचालन किया। वह सत्सगों व प्रवचनों के माध्यम से लोगों को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध उठ खड़े होने को प्रोत्साहित करते थे।

 

पुस्तक कमांडर-इन-चीफ गेंदालाल दीक्षित के लेखक शाह आलम बताते हैं कि, जब पहले विश्व युद्ध की आहट हुई। तो अधिकतर ब्रितानिया सेना सुदूर मोर्चों पर भेज दी गई। यह अन्य क्रांतिकारियों सहित गेंदालाल दीक्षित के लिए सुनहरा मौका था। उन्होंने प्रांत भर में दौरे शुरू किये। इसी दौरान शाहजहांपुर में उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। बिस्मिल उनसे प्रभावित हुए और संगठन से जुड़ गये। आगरा जनपद के अंतर्गत बाह तहसील के पिनाहट कस्बे के नजदीक चंबल घाटी के बीहड़ों में बिस्मिल को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद बिस्मिल गेंदालाल के सहायक कार्यकर्त्ता नियुक्त हुए और प्रांत के 40 जिलों में फैली 4000 से अधिक युवा सदस्यों वाली शिवाजी समिति के संचालन में सहयोग करने लगे। इसके सदस्यों को छोटे समूहों में हथियार चलाने की शिक्षा दी जाती थी।

 

ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि दीक्षित ने अंतर-प्रांतीय क्रांतिकारी संगठनों से तालमेल बिठाया था, इसी दौरान वह विप्लवी महानायक रासबिहारी बोस और महाराष्ट्र के विष्णु गणेश पिंगले के संपर्क में आये।

 

इन क्रांतिकारियों के संपर्कों के सहारे उन्होंने पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, राजपूताना और बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों को एक सूत्र में पिरोया। रासबिहारी बोस ने 21 फरवरी 1915 जिस महान क्रांति की तैयारी की थी, उसके लिए दीक्षित ने उन्हें 5000 लड़ाके देने का वादा किया था। हालांकि मुखबिरी के चलते वह क्रांति असफल रही और रासबिहारी को देश छोड़ना पड़ा। इसके बाद गेंदालाल सिंगापुर गए और गदर पार्टी के नेताओं से मिलकर तख्तापलट की रणनीति बनाई।

 

सिंगापुर से वापस आकर उन्होंने बिस्मिल सहित कई बड़े क्रांतिकारियों के साथ 1916 में मातृवेदी दल की स्थापना की। मातृवेदी के कमांडर स्वयं गेंदालाल दीक्षित थे, इसका अध्यक्ष दस्युराज पंचम सिंह को बनाया गया और संगठन की जिम्मेदारी लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी को दी गई। दल को चलाने के लिए 40 लोगों की केंद्रीय समिति बनी जिसमें 30 चंबल के बागी और 10 क्रांतिकारी शामिल थे। इन 10 क्रांतिकारियों में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और पत्रकार शिव चरण लाल शर्मा भी शामिल थे।

 

दल का गठन पूरी तरीके से गोपनीय रखा गया था और इसमें शामिल होने के लिए सैनिकों को मर मिटने की शपथ लेनी होती थी। यह शपथ हाथ में गंगाजल लेकर दीक्षित के सहयोगी क्रांतिकारी देवनारायण भारतीय दिलाते थे। उनका नारा था, भाइयों आगे बढ़ो फोर्ट विलियम छीन लो, जितने भी अंग्रेज सारे एक-एक कर बीन लो। मातृवेदी के इन मतवालों के उद्घोष से वीरान पड़े चंबल के बीहड़ गूंज उठे, लेकिन इसकी भनक ब्रितानी सत्ता तक न पहुंचने दी गई।

 

मातृवेदी दल के पास एक व्यवस्थित वर्दीधारी सेना थी, इसमें बड़ी संख्या में बीहड़ों के डाकू शामिल थे। सैनिकों को वेतन दिया जाता था। उस समय दल की सेना में 2000 पैदल सैनिक और 500 घुड़सवार शामिल थे। दल के पास करीब आठ लाख रूपये का कोष संग्रह था। दल को इतना व्यवस्थित किया गया था कि उसका अपना सूचना तंत्र, खुफिया तंत्र और प्रकाशन तंत्र भी था। इसका सैन्य मुख्यालय जालौन रखा गया।

 

उधर सन 1915 की क्रांति असफल होने के बाद हो रही तख्तापलट की तैयारियों की भनक ब्रितानी सरकार को लग गई। इस तैयारी के तार संयुक्त प्रान्त से जुड़े तो ब्रिटिश सरकार ने फैड्रिक यंग (जिसने बाद में सुल्ताना डाकू को पकड़ा था) नामक पुलिस कमिश्नर को विशेष रूप से मलाया से बुलाकर आगरा में विशेष अधीक्षक नियुक्त किया और क्रांतिकारियों के दल को कुचलने का आदेश दिया। उसकी धरपकड़ में कुछ क्रांतिकारी पकड़े गए।

गेंदालाल दीक्षित व उनके करीबी साथियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश शुरू होने से पहले गेंदालाल का प्रयास जापान पहुंचने का था। लेकिन असफल रहने पर वह बड़े भाई भगीरथ प्रसाद दीक्षित के पास कोटा चले गए। इस तरह से भूमिगत रहकर गेंदालाल ने क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा लेकिन जब वह वापस संयुक्त प्रांत लौटे तो मुखबिरी हो गई।

गेंदालाल और पंचम सिंह के 90 सदस्यों का दल दल भिंड जिले के मिहोना में घने जंगल में था तो 31 जनवरी 1918 को फैड्रिक यंग की अगुवाई में पुलिस की बड़ी टुकड़ी ने चारों तरफ से घेर कर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। यंग के जासूस ने खाने में जहर मिला दिया था, जिससे दल बेहोशी की हालत में था इसलिये जवाबी कार्रवाई न हो सकी। इस गोलीबारी में 36 क्रांतिकारी शहीद हुए। गेंदालाल दीक्षित को तीन और लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी को नौ गोली लगी, दोनों गिरफ्तार हुए। सभी घायल गिरफ्तार क्रांतिकारियों को ग्वालियर किले में मिलिट्री की निगरानी में बंद कर दिया गया। इस मामले का मुकदमा मैनपुरी षड्यंत्र केस के रूप में चलाया गया, क्योंकि दल के सदस्य दलपत सिंह ने मुखबिरी मैनपुरी जिलाधिकारी को ही की थी।

शाह आलम बताते हैं कि जब गेंदालाल को किले के बंदीगृह से निकालकर मैनपुरी में आईजी सामने लाया गया तो उन्होंने कहा, आपने इन बच्चों को व्यर्थ ही पकड़ रखा है। इस केस का तो मैं स्वयं जिम्मेदार हूं। पंजाब, बंगाल, बम्बई, गुजरात सहित विदेशों से मेरा कनेक्शन है, इन सबको आप छोड़ दीजिये। आईजी ने उनकी बात पर भरोसा कर लिया, और कई नौजवानों को छोड़ दिया। इसके बाद उन्हें कप्तान की कोठी पर ले जाकर मुखबिरों के साथ ही हवालात में बंद कर दिया गया। 

 

मैनपुरी में हवालात में बंद होने के दौरान उनके सहयोगी देवनारायण भारतीय ने उनतक फलों की टोकरी में रिवाल्वर व लोहा काटने की आरी पहुंचा दी, जिसकी मदद से गेंदालाल सलाखें काटकर फरार हो गये। इस दौरान कुछ समय उन्होंने ग्वालियर स्टेट के छोटे से गांव में मात्र राशन पर अध्यापन किया। लेकिन किले में कैद के समय हुआ क्षय रोग बढ़ता जा रहा था, वह हरिद्वार गये फिर दिल्ली होते हुए बीमारी की हालत में अपने वीरान पड़े गांव आए। उनकी हवेली काफी समय से खाली पड़ी थी, उनके सहयोगी वहीं रात में खाना-पानी और दवा पहुंचाते थे। उनके साथ परिवार भी न उलझ जाए यह सोचकर गेंदालाल फिर हरिद्वार चले गये। जब वह वापस दिल्ली लौटे तो पहाड़गंज के महावीर मंदिर में प्याऊ पर नौकरी कर ली। सरफरोशी की तमन्ना पुस्तक में मदनलाल वर्मा क्रांत लिखते हैं, प्याऊ पर नौकरी करने के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ता रहा और दिल्ली के एक अस्पताल में 21 दिसंबर 1920 को मात्र 30 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हो गया।

देश को आजाद कराने का सपना लेकर यमुना तट के एक छोटे से गांव में जन्मे गेंदालाल को फिर उसी यमुना तट ने प्रश्रय दी। पार्थिव को लावारिश समझकर मिट्टी के तेल से झुलसाकर यमुना तट पर फेंक दिया गया। इसके बाद इलाज करने वाले डाक्टर को उनके पास मिले पत्र से उनकी पहचान मालूम हुई। गेंदालाल की क्रांतिकारी गतिविधियों के साक्षी व उनकी सांगठनिक कुशलता के कायल रामप्रसाद बिस्मिल ने उनकी कहानी प्रताप पत्र में छपने को कानपुर भेजी। बिस्मिल की लिखी वह स्टोरी दीक्षित जी की संक्षिप्त जीवनी  के रूप में प्रभा नामक पत्रिका के सितंबर 1920 के अंक में मुख्य पृष्ठ पर गेंदालाल के चित्र के साथ 9 पन्नों में छापी गई। बिस्मिल ने अपने गुरु गेंदालाल की जीवनी भी लिखी थी, लेकिन काकोरी मामले में उनकी गिरफ़्तारी के बाद वह पाण्डुलिपि खो गई। सरकारी तंत्र में गेंदालाल को लेकर जो रिपोर्ट दी गई थी, उसके आधार पर पुलिस के लिए यह स्वीकार करना कठिन था कि इतने बड़े क्रान्तिकारी की ऐसी गुमनाम व सामान्य मृत्यु हो सकती है। इसलिए अगले 20 वर्षों तक पुलिस उनकी खोज करती रही और उनके परिवार पर नजर रखती रही। कई बार उनके घर के पास में सेना की टुकड़ियों ने पड़ाव भी डाला, परिजनों से पूछताछ भी हुई। युवाओं, छात्रों और दस्युओं के हृदय में राष्ट्रीयता के अरमान भरने और हाथ में स्वतंत्रता के लिए हथियार थमाने वाले इस द्रोणाचार्य के साथ न इतिहास लिखने वालों ने न्याय किया, न आजाद भारत की सरकार ने। स्वतंत्र भारत में उनकी विधवा पति व पुत्री के बिछोह में रो-रोकर अपने ही आंसुओं में घुल गईं, किसी ने उनकी सुधि न ली। जिन परमार्थ पथिकों ने उनके इतिहास से नई पीढ़ी का परिचय कराया, वह आज तक अदद सरकारी डाक जारी कराने की मांग लिए घूम रहे हैं, लेकिन मांग अब तक अनसुनी है। आज हम उनके शहादत की शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, *लेकिन उनकी पुण्यकीर्ति का सत्कार होना अब तक प्रतीक्षित है।*

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