
समस्त यूरोप शून्य देशांतर रेखा के पूर्व में है ।इंग्लैंड लगभग शून्य देशांतर रेखा पर ही स्थित है ।।
इस प्रकार वस्तुतः कोई भी यूरोपीय राष्ट्र पश्चिम नहीं कहा जा सकता ।।
जब ईसाइयों ने अर्थात ईसाई चर्चों ने आपस में बंटवारा किया तो वे जेरूसलम को केंद्र मानकर उसके पश्चिम वाले ईसाई देशों को पश्चिमी ईसाइयत के देश कहने लगे और शेष को पूर्वी ईसाइयत करने लगे। उसे ही संक्षेप में यानी short form में वह वेस्ट और ईस्ट कहने लगे ।
*जब आप यूरोप को पश्चिम कहते हैं तो आप ईसाइयों के अनुयाई होते हैं ।।*
अंग्रेजों के प्रभाव के दौर में इतनी जानकारी नहीं थी और उस समय स्वतंत्र जान सकने की स्थिति भी नहीं थी विश्व के विषय में ।
इसलिए बड़े-बड़े लोगों ने उसे पश्चिम कह दिया।
बड़े लोग श्रेष्ठ बातें करें तो उनका अनुसरण करना ही है। पर उस समय वातावरण के कारण कोई काम चलाऊ ढँग से यूरोप को पश्चिम
उन्होंने कह दिया और अगर वह सही नहीं है तो उसको रटे जाना और बड़े लोगों की ,पूर्वजों की अच्छी बातों को भुला देना,, यह तो अपनी ही कमी है।
*यूरोप को पश्चिम कहना मूढ़ता है।*
16वीं शताब्दी ईसवी तक यूरोप में जो भयंकर पैशाचिक जीवन रहा और दुष्टों ने कही अपने को ईसाई पादरी कहकर ,कहीं ईसाइयत का भक्त राजा कहकर जो अत्याचार किए और करवाए थे कि संपूर्ण यूरोप के लोग अब उसे अपना अंधकार युग कहते हैं।
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक यूरोप में ईसाई लोगों ने यह प्रचार कर रखा था कि स्त्रियों के आत्मा होती ही नहीं।।
आत्मा केवल पुरुष के होती है और इसीलिए वोट देने का अधिकार भी केवल पुरुषों को है और उसमें भी जो हमारे पंथ के ईसाई हैं ,,केवल उन्हें वोट देने का अधिकार है ।।
हर जगह यही विचार था।
भारत राष्ट्र बहुत बड़ा है। रूस के अतिरिक्त शेष समस्त यूरोप के बराबर है भारत ।और यूरोप में भी ऐसा कोई नेता नहीं है जो यूरोप के सभी क्षेत्रों के सभी महत्वपूर्ण विषयों के विषय में पर्याप्त जानकारी रखता हो और बोलता हो।
ऐसे में भारत के नेताओं में यह सामर्थ्य आ ही कहां से सकती है जबकि अभी तक उनका रोल मॉडल यूरोप के नेता लोग ही हैं ?
क्या आप जानते हैं कि यूरोप के पास 5000 तो क्या डेढ़ हजार वर्ष पूर्व का भी एक भी इतिहास ग्रंथ नहीं है और लिखित इतिहास का 4 पन्ना भी नहीं है।
भारत के आधुनिक तथाकथित इतिहासकार नामधारी विद्वानों का या तो अज्ञान या दुष्टता या मूढ़ता इस से भी प्रमाणित है कि यूरोप आदि के इतिहास के लिए वे यूरोप के तनिक से साहित्य ,जो कुछ पन्ने मात्र होते हैं ,प्रायः फटे पन्ने या उनका कोई शताब्दियों बाद किया गया उल्लेख . को ही प्रमाण मान लेते हैं पर महाभारत सहित अत्यंत विशालकाय भारतीय इतिहास ग्रंथों को काल्पनिक कहकर उड़ाते हैं . वस्तुतः तो वे दंडनीय हैं पर अभी उपहास योग्य मान लें और संतोष करें किन्तु विद्वान तो ये किसी भी कसौटी पर नहीं है ,इनकी तुलना में यूरोपीय विद्वान हाल में ही विकसित इतिहास विधा के लिए अत्यंत परिश्रम कर रहे है अतः प्रशंसा के पात्र हैं
यूरोप में इतिहास विधा का विकास २० वीं शताब्दी ईस्वी में ही हुआ है .
अज्ञानी मूर्ख कृपा कर इस विषय में ,जो स्वयं यूरोप में निर्विवाद मान्य है , प्रलाप ना करें . जो बक बक करनी है ,अपने पास करें
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय विचार नाम की तो कोई चीज ही नहीं है। 100 वर्षों पहले तो यूरोप नामक कोई सत्ता ही नहीं थी ।
अलग अलग इलाके थे। उनके अलग-अलग नाम और प्रत्येक के अलग-अलग विचार थे और वहां भी हर 200या 400 वर्ष में लगातार विचार बदलते रहे ।
वहां तो कोई परंपरा की निरंतरता है ही नहीं ।
इसलिए भारत बनाम यूरोप आदि अज्ञान और मूर्खता से उपजे मुहावरेहैं।
मित्र गण प्रायः पूछते हैं कि उपाय बताइए पर मैं तो ४० वर्षों से उपाय ही बता रहा हूँ और यथा शक्ति कर्म भी कर रहा हूँ
सर्वप्रथम तो हिन्दू समाज की किसी भी स्तर पर निंदा बंद कर दीजिये . ७० वर्षों से हिन्दू समाज को वर्तमान नेताओं और अफसरों तथा उनके सेवकों ने मिलकर अधिकार विहीन और ज्ञान विहीन बना रखा है तथा देश और दुनिया के विषय में गलत जानकारियां फैला रहे हैं
१५० वर्ष पूर्व यूरोप का हर वर्तमान राष्ट्र राज्य भयंकर गरीबी , अंधविश्वास. अज्ञान, रोग, महामारियों और अत्याचारों से जर्जरित बेहाल था , विद्वानों और सत्यनिष्ठों को मृत्यु दंड या अन्य यातनाएं देना , श्रेष्ठ स्त्रियों पर बर्बर घृणित अत्याचार पादरियों द्वारा किये जाना , नस्ल भेद ,भयंकर ऊंच नीच , विषमता , गुलामों को बेच कर जीवन चलाना , घर के नौकरों को जरा ज़रा सी बात पर कोड़े बरसाना , पत्नी को अंगूठे बराबर मोटे कोड़ों से मारने को पति का अधिकार मानना आदि चलन था . प्रबुद्ध नर नारियों ने शांत स्वरों में निरंतर बात रखी और क्रमशः वे एक सभ्य नेशन बन गए . उंच नीच वहां आज भी है पर पहले से बहुत कम , पहले केवल पादरियों को पढने का अधिकार था. आज सब शिक्षित हैं .
वहा की तुलना में हमारे यहाँ बहुत कम बुराइयाँ हैं अतः निंदा और विलाप बंद कर धैर्य से कमियों को दूर करने के उपाय कीजिये . उपाय हर विषय में स्वयम न बताने लगिए ,सम्बंधित विषय के अधिकारी विद्वान से पूछिए .
1 यूरोप मे 19 वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व कभी भी कोई राष्ट्र राज्य नहीं थे ।
2 यूरोप के किसी भी राष्ट्र राज्य को साम्राज्य संचालन का कोई अनुभव 2000 वर्षों मे एक बार भी नहीं था । पहली बार 19 वीं शतब्दी ईस्वी मे ही इसका अनुभव हुआ । इसीलिए उनका कोई भी साम्राज्य 150 -200 वर्षों से अधिक टिका ही नहीं ।
3 भारत मे सैकड़ों साम्राज्य शताब्दियों से रहे हैं और एक एक कुल को 600 से 1000 वर्षों तक साम्राज्य संचालन का अनुभव रहा है ।
4 18 वीं शतब्दी के आरंभ मे इंग्लैंड 20 राज्यों मे बंटा था ।
5 बड़े राज्य पहली बार अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय राज्यों ने भारत मे ही देखे । यूरोप के राज्य 18 वीं -19वीं शतब्दी मे स्वयम आपस मे वैज्ञानिक जानकारियों की चोरियाँ करते थे ,इस पर अनेक पुस्तकें हैं जिनमे अभिलेखीय साक्ष्य हैं । परस्पर कड़ाई से गोपनीयता बरतते थे ।
7 इसलिए उन्होने भारत से जो सीखा उसका उल्लेख नहीं किया क्योंकि ईसाइयत कृतज्ञता नहीं सिखाती ।
7 16 वीं शतब्दी ईस्वी मे सैकड़ों यूरोपीय लोग भारत के राजाओं के यहाँ सिपाही की नौकरी के लिए आए थे । वास्कोडिगामा जब भारत आय तो उसने देखा कि अलग अलग राजाओं के यहाँ सैकड़ों यूरोपीय सिपाही नौकरी कर रहे हैं और बहुत सुखी हैं । ये लोग यूरोप मे अपने अपने देश जाके यहाँ सीखी शस्त्र विद्या सिखाते थे ।
8 भारत से अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें ले जायी गईं । लूट के माल से साधन होने पर उन पर बड़ी मेहनत और तपस्या से कार्य हुआ । जर्मनी और इंग्लैंड फ़्रांस ने इन का खूब इस्तेमाल किया ।
9 ईसाइयों को भारत से मिली जानकारी के बाद बड़े राज्य की लिप्सा जागी । पहले उन्हे परस्पर खूनी लड़ाइयों का ही अभ्यास था , उनके मेधावी लोगों ने राज्य कौशल सीखा ।
10 भारत के नीचतम लोगों से ( यह इंग्लैंड की संसद के शब्द हैं ) ईस्ट इंडिया कंपनी ने छल कपट के साथ आपसी फूट का लाभ उठाना सीखा । उस से इंग्लैंड के लोग पहले घृणा करते थे पर जब यहाँ से खूब धन गया तो लोभ जागा । एडम स्मिथ ने The wealth of Nations पुस्तक लिखकर लूट को ईश्वरीय इच्छा बताया और उचित ठहराया । वह अर्थशास्त्र की मूल पुस्तक वहाँ हुयी ।
11 फिर भी उनके प्रबुद्ध लोगों ने भारत से बहुत कुछ सीखा और राज्यशास्त्र सीखा । इसीलिए 90 वर्ष टिके । जब भारतीयों ने उनका खेल समझा तो उखाड़ फेंका । इसमे सशस्त्र और शांतिपूर्ण दोनों मार्ग कुशलता से अपनाए गए ।
12 उन्होने शिक्षा का महत्व भारत से सीखा और फिर भारत की शिक्षा को जड़ मूल से नष्ट कर अपनी शिक्षा आरोपित की ।
13 इस से उन्हे बहुत लाभ हुआ । उनके अनेक शिष्य तैयार हुये । उनमे सबसे वफादार पर अपने सिर का भार अपनी शर्तों पर डाल कर वे गए ।
14 उनके शिष्यों मे सबसे होशियार और कुटिल जवाहर लाल नेहरू थे । उन्होने उनसे गद्दी तो ली पर फिर सोवियट संघ से सीख कर भयंकर आततायी तंत्र रचने की दिशा मे होशियारी से चले । इसीलिए वे मारे नहीं गए
15 उनकी चालाकी को पहचान कर सोवियट संघ ने अपने एजेंट यहाँ भर दिये ।
16 इस दुर्बल शासक समूह को देखकर यूरोप अमेरिका की अनेक शक्तियाँ यहाँ सक्रिय हो गईं ।
17 इस बीच भारतीयों का सबसे अनैतिक और चालाक वर्ग राजनीति मे छा गया और हर दल मे पैठ बना ली ।
17 वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार लंदन के व्यापारियों का एक नौकर अकबर के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचा।
वह साथ में 29घोड़ों का नजराना भी लिया था जो उसने पड़ोस में ईरान से ही खरीदा था ।
अकबर ने व्यापार की इजाजत देने की हामी तो भर दी पर प्रक्रिया में विलंब हुआ और इस बीच अकबर मर गया।
बाद में जहांगीर के समय उसने प्रयास किया ।जहांगीर उसे इंग्लिश खां रहता था और अपने साथ रखता था और एक तरह से गिलमें की तरह से व्यवहार करने का प्रयास करता था जिस पर हाकिन्स ने बहुत रोना रोया है।
बाद मेंपाल कैनिंग आदि आए। इसमें से तामस रो ने जहांगीर की इजाजत किसी तरह ले ली और सूरत में तंबाकू का व्यापार बढ़ाने की कोशिश करने लगे क्योंकि तंबाकू भी नहीं होती थीइंग्लैंड में। और भारत से पहली बार उन्होंने तंबाकू के विषय में जाना और तभी से सिगार और चुरुट आदि उनके अभिजात वर्ग में चला।
इतिहासकार मथुरा लाल शर्मा ने अपनी किताब मुगल साम्राज्य का उदय और वैभव में बताया है कि अंग्रेजों को (जो स्वयं को व्यापारी कहते थे ,)भारत के लोग बिल्कुल भी महत्व नहीं देते थे ।
यहां के व्यापारियों के चौकीदार भी उन्हें भगाते रहते थे और थप्पड़ भी मार देते थे।।
सामान्य बदमाश उन्हें रास्ते में लूट लेते
उनकी गलत हरकतों पर अक्सर उन्हें राजकीय अधिकारी बेंत के सोंटे लगाया करते थे ।
बाद में जब किसी तरह कंपनी मजबूत हो गई तो वह भारत में पिंडारियों का हल्ला मचा के रोना रोने लगी और अपना एक सुरक्षा बल तैयार करने लगी। इसी पर उसने विशेष ध्यान दिया ।
शुरू में डच फ्रेंच और अंग्रेज आपस में खूब लड़े ।
भारतीय राजा और बड़े व्यापारी उनकी लड़ाई को तमाशे की तरह लेते थे जैसे दो पठान या छोटे पटरी और खोमचे वाले लोग लड़ें और शेष लोग तमाशा देखें।
भारत में व्यापार इतना बढ़ा हुआ था और इतना अधिक वैभव था कि लोगों की नज़र में इन मामूली मुलाज़िमों की कोई गिनती ही नहीं थी।यह तक पता ही नहीं था कंपनी के कर्मचारियों को कि भारत में व्यापार किन-किन चीजों का होता है और कितना अधिक ।
उनके लिए यह सब बिल्कुल तिलिस्मी था,,एक जादू था,, एक चमत्कार था ।
जिसे चाटुकार लोग प्लासी की लड़ाई कहते हैं वस्तुतः यह अय्याश नबाब से नाराज जगत सेठ द्वारा कलाइव को भाड़े का सैनिक बनाकर उसके प्रतिस्पर्धी नवाब की सहायता करने कहा गया था औरक्लाइव बहुत डर रहा था तो जगत सेठ ने वचन दिया कि हम उस नवाब की फौज को तुम्हारे पक्ष वाले नवाब की तरफ मोड़ देंगे और यही हुआ।
प्लासी के युद्ध में कुल 3 या 4 सैनिक मारे गए।
शेष ने पाला बदल लिया। इसको दुनिया में कहीं भी महत्वपूर्ण युद्ध नहीं कहा जाता और इतने से जो लोग भारत को गुलाम बता रहे हैं ,,उन्हें मैं बार-बार दण्डनीय अपराधी ही कहूंगा।
कुछ तथ्य देखिये
२५.सिंधिया की सेना में हनोवर का अन्थोनी पोहिमन्न एक सैन्य अधिकारी था जिसके अधीन फिरंगी रेजिमेंट थी .वे सिंधिया की सेवा में थे. आदिलशाह की सेवा में पुर्तगाल का फर्नाओ लोप्स था . भोपाल का नवाब वस्तुतः गोंड राजा का अफगान सेवक था और इनाम में भोपाल जागीर पाया था . उसकी सेवा में ज्यां फिलिपे द बोर्बोन था एक सैन्य अधिकारी के नाते यानी गोंडों के सेवक के सेवक फ्रंच और पुर्तगाली थे .निज़ाम के यहाँ वाल्टर रेन्हार्ट समब्रे था . सिख सेना में आयरिश और फ्रेंच सैनिक थे . अनेक अंग्रेज महाराजा रणजीत के अधीन सैन्य सेवा में थे . अनेक ..जॉन बैप्टिस्ट वेंचर ,ज्यां फ्रांकुआ अलार्ड ,जॉन होक्स ,ऐसी लम्बी सूची है . वे सब ईस्ट इंडिया कंपनी के जमने के बहुत पहले से भारत में सैन्य प्रशिक्षण ले रहे थे .
२६ . नेपोलियन ने १९ वीं शताब्दि ईस्वी के प्रारंभ में जब यूरोप में लडाई लड़ी तो मुख्यतः तलवार से और धनुष बाण से लडाई हुयी . बंदूकें अंतिम चरण में गिनी चुनी थीं .मेरा अनुमान है कि वे सब भारत से गयी थीं .शोध की आवश्यकता है .
२७ इस प्रकार विज्ञानं ,शिक्षा , सम्पदा , सैन्य बल सब में भारत बहुत आगे था और समृद्धि में तो अद्वितीय था .
२८ १८ वीं शताब्दी तक यूरोप में कोई राष्ट्र नहीं था . राजा होते थे और परस्पर लड़ते थे .उस समय के राज्यों का आज नामो निशान मिट चूका है : प्रशा ,आस्ट्रिया साम्राज्य , रोम (राम )., निमि(बाद में आर्ष देश कहा गया फिर जिन्हें बोलना नहीं आता , उन मृध्र वाक् लोगों ने आरिषीया कहना शुरू किया . ), कृति (जिसे मृध्र वाक् क्रेटे कहते हैं ), उस्मानी साम्राज्य , एरिन , सिमरु ,सैक्सनी ,हनोवर केत्लोनिया :सब कहाँ हैं आज ?
२९. १९१४ से १९५० के बीच कितने नए राष्ट्र बने ,यह भी अधिकांश भारतीयों को ज्ञात ही नहीं . और अभी अभी कुछ वर्षों पूर्व कितने नए राष्ट्र बने ?
३० जब १८ वीं शताब्दी में इंग्लैंड एक राष्ट्र था ही नहीं और भारत भी एक राष्ट्र होकर भी अनेक राज्यों में सुविभक्त था तो भारत के राजा मुट्ठी भर अंग्रेजों को अपने राज्य के लिए क्या ख़तरा मानते ? कालप्रवाह वश जो घटित हुआ ,उसके विश्लेषण के नाम पर सयाने बनकर अपने वीर और बुद्धिमान लोगों के दोष ढूँढना कितना छोटापन है ,यह आधुनिक सुख भोग रहे हिन्दू नव शिक्षित समझ नहीं पाते . जबकि अभी किसी भी परीक्षा और कसौटी पर कोई बड़ा पुरुषार्थ करके दिखाया नहीं है इन्होने .
३१. भारत की मुख्य समस्या धर्मांतरण थी और है ,यह जो नहीं जानते ,वे राजनैतिक विश्लेषण के नाम पर निरर्थक अटकल बाजियां करते हैं .
३२ भारत के कतिपय कायर या लोभी या कामुक और लिप्सा ग्रस्त हिन्दू ही भारतीय मुसलमान बने और फिर सामान्य मुस्लिम तो पहले जैसा रहा पर राजनैतिक योजना वालों ने तबलीग का अभियान चला कर उन्हें हिन्दुओं से एकदम अलग और शत्रु बनाया . दुराचार पापाचार की अति की ,अपने ही पूर्वजों को गाली देने लगे और देवताओं एवं मंदिरों को भी गालियां देने तथा विध्वंस करने लगे इस से सर्व सामान्य हिन्दू अत्यधिक क्रुद्ध क्षुब्ध और आक्रोश में रहने लगे मुस्लिम अत्याचार के प्रति . अतः अंग्रेजों का सहारा लेकर कई जगह उन पापी मुसलमानों को पीटने की भी युक्तियाँ निकलने लगे और सामान्य मुस्लमान से भाईचारा भी जरूरी समझ वह भी बनाते निभाते रहे ..उधर ईसाइयों के विषय में मुसलमानों को अधिक तरकीबें पता थीं तो वे अपने ढंग से पटाने लगे . इसे अन्य तरह से देखना सर्वथा अनुचित और असत्य है क्योंकि हिन्दू मुस्लिम की मूल वंश भूमि एक है पर केवल शरीर के स्तर तक . आस्था और चरित्र में उनमे स्थायी विरोध है और इसलिए सजग हिन्दू कभी भी तबलीगी मुसलमान पर भरोसा नहीं कर सकता ,हाँ ,शक्ति और स्थिति के आधार पर व्यवहार कर सकता है .
३३ अधिक अतीत अनुसन्धान करें तब तो समस्त यूरोपीय (और अंग्रेज भी जाहिर है ) जन मूलतः भारतवंशी ही हैं .इन दिनों वहां इस पर अनुसंधान चल भी रहे हैं (देखिये :people of Europe seriesकी अनेक पुस्तकें जो युरप अमेरिका से छप रही हैं )परन्तु इस कारण अतीत का संघर्ष तो असत्य नहीं हो जायेगा जो ईसाई बनकर इन्होने विगत वर्षों में भारत आकर किया ,इसी प्रकार भारतीय मुसलमान हिन्दू ही हैं ,यह तथ्य होते हुए भी युद्ध या संघर्ष या टकराव टल नहीं सकता , जब तक मुसलमान भारत को मुस्लिम बनाने की घोषणा त्यागते नहीं ,जो भी इस सत्य को छिपाता है ,ऐसा हर हिन्दू वस्तुतः हिन्दू द्रोही है .
३४ तो अपनी अपनी चाल में दोनों पक्षों ने अंग्रेजों को साथ लिया ,इस सत्य को छिपाना सत्य से विमुख होना है और असत्य के सहारे कोई बड़े लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकते .
३५ जो अंग्रेज धन की लालसा से भारत व्यापारी बनकर आये ,वे अलग लोग हैं और जिन राजपुरुषों ने बाद में भारतीय राजाओं से दोस्ती कर कंपनी को भी धता बता कर ब्रिटिश राज्य का कब्ज़ा आधे भारत में कर लिया ,वे अलग लोग हैं ,..सबको एक कहना राष्ट्र के नाम पर मूर्खता को स्थापित करना है .जिन अंग्रेज व्यापारियों का राज्यकर्ता अंग्रेजों ने सब कुछ एक झटके में ,चुपके से भारतीय राजाओं से संधिकर हड़प लिया ,उनकी व्यथा तो उनके वंशधर अंग्रेज ही बताते हैं , हिन्दुओं की नयी पीढ़ी तो हिन्दुओं में भेदभाव ढूँढने और दुनिया के भेदभाव को ढंकने की हीनता में डूबी आत्म ग्लानि , आत्म दैन्य और आत्म हनन के पथ पर दौड़ती चली जा रही है ,चली जा रही है ,रोकिये मत ,बहुत काम है ,देश को ठीक करना है ,समाज को ठीक कर देना है ,हटिये हटिये , फालतू की बातों का वक्त नहीं है ,सत्य वत्य छोडिये जी ,देश सर्वोपरि है ,उसे ठीक करना है ,भले देश क्या है,,यह स्पष्ट न हो .अभी देश को ठीक कर लें भाई साहब ,फिर समझ भी लेंगे कि देश है क्या ,अभी तो आप हटिये रस्ते से :राहुल को ठीक करना है ,नहीं नहीं मोदी को ठीक करना है ,बहुत काम है ,भाई साब आप कुछ समझते तो हैं नहीं ,इतिहास लिए बैठे हैं ,हटिये
३६ न अंग्रेजों की कभी भारत विजय की हैसियत थी ,न है . भारत के भांति भांति के लोगों से दोस्ती गांठ कर वे थोड़े समय भारतीयों को साझीदार बनाकर आधे भारत में शासक रहे (अर्ध भोक्ता रहे ),इसे न तो कोई साम्राज्य वाद कहा जाता ,न ही सहभागियों को गुलाम कहा जाता . इन शब्दों के विश्व में जो अर्थ हैं ,उनके सन्दर्भ में भारत न तो कभी गुलाम था , न ही अंग्रेज कभी भारत के एक क्षत्र शासक थे ,.