
दक्षिण भारत में शक्तिशाली तमिल चोल साम्राज्य का इतिहास 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक मिलता है। चोल साम्राज्य के 20 राजाओं ने दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से पर लगभग 400 साल तक शासन किया।
मेगस्थनीज की इंडिका और अशोक के अभिलेख में भी चोलों का उल्लेख किया गया है कहते हैं कि चोल शासकों ने अपनी विजय यात्रा में आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल और दक्षिण एशिया में पूरा हिंद महासागर व श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया में अंडमान-निकोबार, मलेशिया, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया तक को विजय किया था।
आइये, चोल सम्राज्य के गौरवशाली इतिहास के कुछ पहलुओं को जानने का प्रयत्न करते हैं–
कांची के पल्लवों के सामंत विजयालय चोल ने सन 850 ईस्वी में तंजौर पर कब्जा कर चोल साम्राज्य की नींव रखी। नौवीं शताब्दी के अंत तक चोलों ने पूरे पल्लव साम्राज्य को हराकर पूरी तरह से तमिल राज्य पर अपना कब्जा कर लिया।
इसी कड़ी में आगे 985 ईस्वी में शक्तिशाली चोल राजा अरुमोलीवर्मन ने अपने आपको राजराजा प्रथम घोषित किया, जो आगे चलकर चोल शक्ति को चरमोत्कर्ष पर ले गया। चोल वंश के पहले प्रतापी राजा राजराजा ने अपने 30 के शासन में चोल साम्राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था।
राजाराज ने पांड्या और केरल राज्यों के राजाओं को हराकर अपनी विजय की शुरुआत की उन्होंने पश्चिमी तट, दक्षिणी तट और अपनी शक्तिशाली नौसेना की सहायता से श्रीलंका के उत्तरी राज्य सिंहल द्वीप पर कब्जा किया शायद इसलिए ही कहा जाता है कि राजराजा के शासन काल में चोल दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना। वह पांड्य, केरल व श्रीलंका के राजाओं का मजबूत संघ नष्ट कर अपने अंत समय में मालदीव और मैसूर के कई हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहा।
राजराजा प्रथम ने लौह और रक्त की नीति का पालन करते हुए श्रीलंका के शासक महिंद पंचम को पराजित कर मामुण्डी चोल मण्डलम नामक नए प्रांत को स्थापित किया साथ ही उसकी राजधानी जनजाथमंगलम बनाई।
इसके अलावा 1012 ईस्वी में राजराजा ने कंबोडिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर अंकोरवाट को बनवाने वाले राजा सूर्य वर्मन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। राजराजा ने 1010 ईस्वी में थंजावुर में भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
यह दक्षिण भारतीय शैली में वास्तुकला का उल्लेखनीय नमूना माना जाता है। चोलों के विस्तार की बात आती है, तो राजेंद्र प्रथम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
1012 ईस्वी के आसपास चोल साम्राज्य के उत्तराधिकारी बनने के बाद उन्होंने अपने पिता राजराजा की विस्तारवादी विजय नीतियों को आगे बढ़ाया। पिता से भी आगे बढ़कर राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण भारत में अपने वंश की महानता का डंका बजाया। राजेंद्र प्रथम ने चोल साम्राज्य की सीमा का विस्तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया, दक्षिणी थाईलैंड और इंडोनेशिया तक कर लिया।
प्राचीन समय में व्यापार मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से होता था। मालों से लदे जहाज हिंद महासागर होकर चीन-जापान व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक माल ले जाया करते थे। अपने व्यापार को बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा के लिए राजेंद्र प्रथम समुद्र जीतने निकल पड़ा। इसने अपने नौसेना बेड़े को मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों व छोटे गश्ती जहाजों की टोली बनाकर राज्यों की समुद्री सीमाओं पर तैनात कर दिया। देखते ही देखते समूचे हिंद महासागर और मालदीव, बंगाल की खाड़ी और मलक्का तक पूरे समुद्र को चोल राजाओं ने जीत लिया और उस पर अपना एकछत्र राज कायम किया।
उसने अपने व्यापार को इस रास्ते चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक पहुंचाने के साथ-साथ वहां से गुजरने वाले अन्य जहाजों को भी सुरक्षित किया और उन्हें सुरक्षा प्रदान की हालांकि, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से चाेलाें के अच्छे संबंध थे, फिर भी वहां के सैनिक हर राेज चोलों की नावों को लूट लेते थे।
इन्हें सबक सिखाने के लिए राजेंद्र प्रथम ने सन् 1025 ईस्वी में गंगा सागर पार कर जावा और सुमात्रा द्वीप पर अधिकार किया। वहीं चोल नौसेना ने इसके बाद मलेशिया पर आक्रमण कर उसके प्रमुख बंदरगाह कंडारम पर अपना कब्जा कर लिया। इन सब के बाद दक्षिण का समुद्री व्यापार मार्ग पूरी तरह से चोलों के कब्जे में था।
उनके बाद उनका बेटा राजाधिराज प्रथम 1044 ईस्वी में गद्दी पर बैठा। उसने सीलोन में शत्रुतापूर्ण ताकतों को उखाड़ फेंका और इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। कोप्पम में चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय के साथ लड़ाई में इनकी मौत हो गई।
इस कारण आगे उनके भाई राजेंद्र द्वितीय ने राजगद्दी संभाली. चोल-वंश के कालखंड में चोल-नौसेना को सबसे शक्तिशाली नौ-सेनाओं में से एक माना जाता था कहते हैं कि नौसेना के दम पर ही अपने चोल अपने सम्राज्य का विस्तार कर पाए। सही मायने में उनकी नौसेना ही उनकी असल ताकत थी।
चोल-नेवी की मुहिम, खोज-यात्राओं के कई उदाहरण संगम-साहित्य में आज भी उपलब्ध हैं दरअसल विश्व में ज्यादातर नौ-सेनाओं ने बहुत देर के बाद युद्ध-पोतों पर महिलाओं को जाने के लिए मंजूरी दी थी खास बात तो यह है कि चोल-नौसेना में बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं काम करती थी।
वहां उनकी भूमिका अहम होती थी जरूरत पड़ने पर वह युद्ध में भी शामिल होती। इसके साथ-साथ चोल-शासकों के पास युद्ध पोतों के निर्माण के बारे में एक समृद्ध ज्ञान था, जिसका प्रयोग करते हुए वह दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर करते रहे। चोल-नौसेना के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि सदियों बाद भी उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है।
यहां तक कि नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम मन की बात की बात में इसका गुणगान किया था। 7 मध्ययुग के कई तमिल कवियों ने भी अपनी कविताओं में चोल राजाओं की विजयों का वर्णन किया है।
चोलों के समय महमूद गजनवी जैसे कई आक्रांताओं ने भारत पर लूट के मकसद से आक्रमण कर दिया था। ऐसे में लुटते उत्तर भारत को देखते हुए राजेंद्र चोल ने सैन्य विस्तार पर ज्यादा बल दिया और अपने सम्राज्य को मजबूत किया हालांकि, उस समय उसके सामने चुनौतियां कम न थीं वहां राज्यों पर कब्जा करने और वर्चस्व की लड़ाई जारी थी, फिर भी उसने अपनी सेना को मजबूत किया और समुद्र से सुरक्षा के लिए एक नौसेनिक बेड़े की स्थापना की।
अपने विशाल समुद्री बेड़े से चोल साम्राज्य ने कई दक्षिण एशियाई शासकों-प्रायद्वीपों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी और उनमें विजयश्री हासिल की। बारहवीं सदी तक चोल साम्राज्य में सबकुछ ठीक-ठाक रहा और वह निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे, किन्तु आगे वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगे। उन्हें चालुक्यों व होयसलों की शत्रुता का सामना करना पड़ा।
– ✍🏻आगे और पढ़े
पृथ्वी पर सबसे दक्षिण के द्वीप को अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिक) कहते थे।
अतः भारत दक्षिण भाग का स्थान तिरु (श्री) अनन्त-पुरम् है। मूल या चेर नीचे होता है।
नक्शे में दक्षिण दिशा नीचे है, अतः दक्षिण का राज्य चेर हुआ। चेर हे केर या केरल हो सकता है। समुद्र क्षेत्र के राजा समुद्री डाकुओं को रोकते थे।
इसके लिए उनका तरीका अपनाना पड़ता है।
अतः उनको चोल (चोर) या वंचि (वंचक = ठग) कहते थे।
अन्य मत है कि पश्चिमी तट के पहाड़ से घिरा केरल करेला के आकार का है।
केरल से करेला हुआ या उलटा हुआ, यह कहना कठिन है।
भारतीय वैदिक साहित्य में नागों का विशेष उल्लेख है।
जितने भी वैदिक साहित्य हैं, उनमे कहीं न कहीं नागों का उल्लेख अवश्य मिलेगा।
नवनाग श्लोक में 9 प्रमुख नागों का उल्लेख किया गया है –
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलं
शन्खपालं ध्रूतराष्ट्रं च तक्षकं कालियं।
इसमें प्रथम नाम है – अनंत, और इन्ही अनंत पर मेरे आराध्य प्रभु विष्णु शयन करतें हैं। तिरुवनंतपुरम का नाम इन्ही अनंत नाग के नाम पर पड़ा है, और पद्मनाभ स्वामी के गर्भगृह में शयन करते विष्णु इसे साक्षात विष्णुलोक बना देते हैं।
कहा जाता है कि श्री पद्मनाभ मंदिर को 6वीं शताब्दी में त्रावणकोर के राजाओं ने बनवाया था।
लेकिन इसका उल्लेख प्राचीन वैदिक साहित्य में भी मिलता है, जो बताता है कि पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है।
महाभारत में एक उल्लेख आता है कि बलराम इस मंदिर में आए थे और यहाँ पूजा की थी। जनश्रुति है कि इसका निर्माण कलयुग के प्रथम दिन किया गया था, परंपरागत जनश्रुति के अनुसार यह मंदिर अतिप्राचीन है।
इस मंदिर से संबंधित कई किंवदन्तियाँ हैं।
उनमें से एक के अनुसार, जिसकी पुष्टि मंदिर में सुरक्षित ताड़-पत्रों पर किये गये अभिलेखों से भी होती है, कि इस मंदिर की मूर्ति-प्रतिष्ठा का श्रेय दिवाकर मुनि नामक तुलु ब्राह्मण को जाता है।
उस समय के मौजूदा शासक को जब दिवाकर मुनि ने पद्मनाभ महात्म्य बताया तो उन्होंने खुद को ईश्वर को समर्पित कर दिया और वो #पद्मनाभ_दास कहलाए, आज भी इस वंश के लोगों को पद्मनाभ दास ही कहा जाता है।।
चेरा वंश के गौरवशाली राजा #अनीयम_तिरुनाल मार्तान्ड वर्मा ने 1750 में खुद को भगवान का सेवक यानी ‘पद्मनाभ दास’ बताते हुए अपना जीवन और संपत्ति उन्हें सौंप दी। उन्होंने भगवान को ही राजा घोषित कर दिया और पद्मनाभस्वामी के मंदिर को पुनर्जीवित किया उसका पुनर्निर्माण करवाया।
चूँकि जितनी पद्मनाभस्वामी के लिए त्रावणकोर रॉयल फैमिली पूर्णतया समर्पित है, उतनी ही हिंदुत्व के लिए भी।
इसलिए हिंदुत्व के प्रचार प्रसार के लिए हर कदम उठाती आयी है।
और यही कारण है कि ये हमेशा विधर्मियों के निशाने पर रहती है।त्रावणकोर के राजपरिवार के विषय में प्रसिद्ध है कि पद्मनाभ मंदिर में पूजा पाठ के बाद बाहर निकलते समय अपने कपड़े और हाथ पैर पूरी तरह से झाड़ते थे, ताकि मिट्टी का एक कण भी मंदिर से बाहर न जाए।
उनके अनुसार मंदिर का एक-एक कण भगवान पद्मनाभ का है।
ऐसे राजपरिवार पर मंदिर की संपत्ति के दुरुपयोग का लाँछन लगाया गया… याचिकाएं डाली गई।
भारत एकीकरण के दौरान त्रावणकोर कोचिन के शाही परिवार और भारत सरकार के बीच 1949 में एक अनुबंध पत्र साइन किया गया था।
इसके तहत इस बात पर सहमति बनाई गई थी कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का प्रशासन ‘त्रावणकोर के शासक’ के पास रहेगा।
इसमें त्रावणकोर कोचिन #हिंदू_रिलीजियस_इंस्टिट्यूशंस_एक्ट के सेक्शन 18(2) के तहत मंदिर का प्रबंधन त्रावणकोर के शासक के नेतृत्व वाले ट्रस्ट के हाथ में रहा जो त्रावणकोर के अंतिम शासक के निधन 20 जुलाई 1991 तक चला, तदुपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी के नक्शे कदम पर चलते हुए जैसे उसने वारिस न होने पर अधिग्रहण का नियम बनाकर भारत के राज्यों को अधिग्रहित किया था; वही पद्मनाभस्वामी मंदिर के साथ ही हुआ।
1991 में त्रावणकोर के अंतिम महाराजा बलराम वर्मा की मौत हो गई।
2007 में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी सुंदरराजन ने एक याचिका कोर्ट में दाखिल कर राज परिवार के अधिकार को चुनौती दी।
उसके बाद राजा की मृत्यु के बाद मौके की तलाश में बैठे ईसाई मिशनरियों ने सिविल कोर्ट मे याचिकाओं का अंबार लगा दिया कि त्रावणकोर के शाही परिवार को मंदिर की संपत्ति का बेजां इस्तेमाल की अनुमति न दी जाए।
राजा के वारिस के तौर पर उत्राटम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा यानी कि रिश्ते में सगे भाई ने अपना पक्ष रखा कि राजपरिवार के सदस्य के तौर पर वो पद्मनाभस्वामी की सेवा के लिए प्रस्तुत हैं, और वो इस मामले में हाईकोर्ट गए और वहाँ इससे जुड़ी सभी याचिकाओँ पर एक साथ सुनवाई हुई।
तब हाईकोर्ट के सामने प्रश्न था कि क्या त्रावणकोर के आखिरी शासक के छोटे भाई के तौर पर वर्मा को 1950 के त्रावणकोर-कोचिन हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट के सेक्शन 18(2) के तहत श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर पर मालिकाना हक, नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार है या नहीं?????
इस प्रश्न का जवाब देते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि “शासक’ ऐसा दर्जा नहीं है जिसे उत्तराधिकारी के तौर पर हासिल किया जा सके।
इस वजह से 1991 में अंतिम शासक की मौत के बाद पूर्व स्टेट ऑफ त्रावणकोर का कोई शासक जीवित नहीं है, अतः उन्हें राजवंश के उत्तराधिकारी मानने से ही इनकार कर दिया और कहा गया कि उत्राटम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा त्रावणकोर के पूर्व शासक के तौर पर मंदिर के प्रशासन पर दावा नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि मंदिर के तहखानों में रखे खजाने को सार्वजनिक किया जाए।
उसे एक म्युजियम में प्रदर्शित किया जाए और उससे व चढ़ावे में मिलने वाले पैसे से मंदिर का रखरखाव किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट में 8 साल से अधिक समय तक मामले की सुनवाई हुई।
केरल हाईकोर्ट ने 2011 के फैसले में राज्य सरकार को पद्मनाभस्वामी मंदिर की तमाम संपत्तियों और मैनेजमेंट पर नियंत्रण लेने का आदेश दिया था।
इस आदेश को त्रावणकोर शाही परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जिसपर सुप्रीम कोर्ट में 8 साल से ज्यादा समय तक सुनवाई हुई।
जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच ने पिछले साल अप्रैल में इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। और कल सोमवार को इसका फैसला आया इस फैसले में कहा कि त्रावणकोर शाही परिवार के आखिरी राजा का निधन होने का मतलब ये नहीं है कि मंदिर का मैनेजमेंट सरकार के हाथ में चला जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केरल के तिरुअनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर (Padmanabhaswamy Temple) के प्रबंधन में त्रावणकोर के राजपरिवार के अधिकार को मान्यता दे दी है। तिरुअनंतपुरम के जिला जज की अध्यक्षता वाली कमेटी फिलहाल मंदिर की व्यवस्था देखेगी, कोर्ट ने राजपरिवार के सेवादार के हक को तो बरकरार रखा है, लेकिन देवता की पूजा के तरीके से लेकर, मंदिर की सम्पत्तियों के रखरखाव, श्रद्धालुओं को सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसे तमाम काम का अधिकार कोर्ट ने 5 सदस्यीय प्रशासनिक कमेटी और 3 सदस्य एडवाइजरी कमेटी को सौंप दिया है।
विशेष – प्राचीन दक्षिण भारत में आयोजित तीन संगम थे, जिन्हें लोकप्रिय रूप से Muchchangam कहा जाता था।
इन संगमों का विकास मदुराई के पांड्या राजाओं के शाही संरक्षण के तहत हुआ।
संगम युग के दौरान प्रमुख तीन राजवंशों ने शासन किया, जिनमें चेर, चोल और पाण्ड्य राजवंश थे।
इन राज्यों के साक्ष्य के मुख्य स्रोतों को संगम अवधि के साहित्यों में उल्लेख मिलता है। पद्मनाभस्वामी मंदिर का निर्माण इन्हीं में से एक चेर शासकों ने किया।
चेर राजवंश का आधुनिक केरल के प्रमुख भागों पर शासन रहा। उस समय चेर की राजधानी वंची थी और चेर राजवंश का प्रतीक ‘धनुष और तीर’ है।
इस अवधि में तोंडी और मुसीरी महत्वपूर्ण बंदरगाह थे, जिनसे होकर भारतीय मसालों ने एक कीर्तिमान स्थापित किया।
चेर वंश का #महाकाव्य #शिलप्पदिकारम में विस्तृत उल्लेख मिलता है।
चेर राजवंश के शासकों ने हिमालय के लिए एक अभियान किया, जिसके दौरान उन्होंने कई उत्तरी भारतीय शासकों को हराया था।
दक्षिण भारत से चीन में तक राजदूत भेजने वाले पहले भारतीय शासक यही रहे।।