
ललिता पंचमी का दिन—कन्या पूजन की तिथि,
घर-घर में निमंत्रण.. नन्हीं कन्याओं की मौज थी।
मुहल्ले की सुहागिनों ने कन्याओं को ढूंढना शुरू किया,
पर शाम तक उन्हें एक भी बच्ची न मिली।
हर घर में जल रहा था चकाचौंध करता दीया,
मंद दीयों का उजाला भला किसे चाहिए था?
तभी किसी ने कहा—उस जगह रहता है न वो एक ड्राइवर..
सुना है, उसके पास दर्जन भर बेटियां हैं!
ईश.. अरे.. क्या कहा?.. बारह..?
मन ही मन मुस्कुराईं वे सब औरतें..
बारह बेटियों तक शायद बेटे का इंतजार किया होगा?
फिर दीयों वाली वे औरतें अपनी ठसक दिखाने लगीं!!
अनपढ़ कहीं के—इन्हें कितना भी सिखाओ—कोई फायदा नहीं!
गाड़ी चलाकर भला बारह-बारह का पेट कैसे पालेगा?
“जाने दो—हमें क्या? पूजा के लिए मिल गईं, इतना काफी है ना?”
यही सोचकर मैं निकल पड़ी उन बारह बच्चियों को ढूंढने—
उनका घर ढूंढना ज्यादा मुश्किल नहीं हुआ,
बारह बेटियों के घेरे के बीच ही उसने घर का दरवाजा खोला—
“आज कन्या पूजन है—क्या बच्चियों को मेरे घर भेजेंगे..?
उनकी मां को भी साथ भेज देना.. उन्हीं के साथ लौट आएंगी—”
इस बात पर सब हंस पड़े.. ड्राइवर बड़ी विनम्रता से बोला—
“लगता है आपको कोई गलतफहमी हुई है..
किसकी पत्नी की बात कर रही हैं? और किसकी मां?
मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है..”
उसकी बात सुनकर मैं तो अचरज में पड़ गई,
फिर बोलते-बोलते वह अपनी कहानी सुनाने लगा..
“आपने बात छेड़ ही दी है, तो बताना तो पड़ेगा ही—
कैसे बताऊं कि ये मेरे पास कैसे और कहां से आई हैं? ..
इनके मां-बाप तो शैतान ही थे, जिन्होंने सारी हदें पार कर दीं,
मंदिर-मस्जिद के दरवाजों पर चुपचाप छोड़कर रफूचक्कर हो गए..
उधर वे दोनों जो हाथ में हाथ डाले बैठी हैं ना,
एक सुबह पेट्रोल पंप के पास वाले कूड़ेदान में मिली थीं..
वह नन्ही सी बच्ची मुझे श्मशान के कुंड के पास मिली,
उसका जीवन-सफर ही शुरू हुआ था उस चिर शांति के पास..
वह घाघरा-चोली वाली नन्हीं गुड़िया, जो ज़रा लंगड़ा कर चल रही है ना—
वह मिली थी मुझे पास के गांव के तालाब के किनारे..
तालाब के पास से गुजरते हुए मुझे कीचड़ में एक पेटी मिली,
बिल्कुल नई पेटी देखकर मुझे भी लालच आ गया..
जल्दबाजी में पेटी उठाई.. कि आखिर इसके अंदर क्या होगा?
खोलकर देखा, तो मेरी आंखें आंसुओं से छलक उठीं..
बच्ची को पेटी में ठूंसते हुए उसकी गठरी बना दी गई थी—
पैर मरोड़कर मोड़ने के चक्कर में मासूम बच्ची अपाहिज हो गई थी..
—और उधर उस कोने में बैठी उस किशोरी को देखा आपने?
बस ऐसे ही खोई-खोई अकेली रहती है वह अपनी ही दुनिया में..
एक बार नींद में चौंककर रोते-रोते बोली थी—
सपने में जो भयानक दरिंदा दिखा था.. वह उसका अपना बाप था..”
मैं तो सन्न रह गई, अवाक होकर उस ड्राइवर का संसार देख रही थी,
सीने पर पत्थर रखकर एक-एक कहानी सुन रही थी..
ड्राइवर के भीतर की “मां” को देखकर मैं हैरान थी—
और अपने भीतर की मां को बार-बार संभाल रही थी..
उन बारह बच्चियों को बड़े आदर के साथ अपने घर लाई,
फिर तो मुहल्ले के हर घर में खूब चर्चाएं हुईं..
उन मुड़े-सिकुड़े नन्हे हाथों पर मैंने धीरे से चंदन-केसर लगाया,
और टूटे हुए नन्हे-नन्हे कदमों पर एक सुंदर स्वास्तिक सजाया।
अपने घर में बेटी को ठुकरा कर, क्या पूजा-पाठ का फल मिलता है?
दूसरों की बेटियों की पूजा करने से, क्या सच में पुण्य मिलता है?
सच बताना—’बेटी पैदा हो’ यह तमन्ना तो रहती है, पर दूसरों के घर में—
मेरे घर में तो बेटा ही चाहिए, क्या यही सोच हर किसी के मन में नहीं होती?
*ललिता पंचमी …*