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वास्तु की उत्पति कैसे हुई और भगवान शंकर का एक पसीने के बूंद का क्या हुआ?

सनन्दन जी ने बताया कि पौराणिक काल में अंधकासुर और भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। उस युद्ध के समय भगवान शिव के ललाट से स्वेद-बिंदु (पसीने की बूँद) पृथ्वी पर गिरी, जिससे एक विशालकाय महापुरुष प्रकट हुआ वह महापुरुष अत्यंत भूखा था और त्रिलोक को ग्रसने लगा इससे भयभीत होकर ब्रह्मा जी और समस्त देवताओं ने उस पुरुष को भूमि पर अधोमुख (पेट के बल, मुँह नीचे करके) लिटा दिया और उसके विभिन्न अंगों पर स्वयं विराजमान हो गए देवताओं द्वारा दबाए जाने के कारण उसने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया:

 

आज से तुम्हारा नाम *’वास्तु-पुरुष’* होगा। जो मनुष्य गृह, नगर, कूप, या मंदिर के निर्माण से पूर्व तुम्हारा पूजन नहीं करेगा, *पदों के अनुसार निर्माण कार्य नहीं करेगा उसका कार्य निष्फल होगा और उस भवन में दुख का वास रहेगा।*

 सनन्दन जी ने भूखंड को ४५ पदों (वर्गों) में विभाजित करके विभिन्न देवताओं के स्थानों का निरूपण किया:

 

ईशान कोण (उत्तर-पूर्व): यह स्थान जल और ‘ईश’ (शिव) का है। यहाँ पूजा-घर या जल-स्थान होना चाहिए।

 

आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व): यह स्थान ‘अग्नि देव’ का है। यहाँ रसोईघर (पाकशाला) बनाना शुभ होता है।

 

नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम): यह स्थान ‘नैरृत’ (राक्षस/स्थायित्व) का है। यहाँ मुख्य शयनकक्ष  या भारी वस्तुएँ रखनी चाहिए।

 

वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम): यह स्थान ‘वायु देव’ का है। यहाँ अतिथि गृह, वाहन या भंडार गृह होना चाहिए।

 

ब्रह्मस्थान (केंद्र): भवन का ठीक मध्य भाग ‘ब्रह्मा’ का स्थान है। इसे सदैव खुला, स्वच्छ और भार-रहित (हल्का) रखना अनिवार्य है।

 

गृह-निर्माण से पूर्व भूमि पर शुद्ध पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण दिशा ज्ञात करने की वैज्ञानिक विधि (शंकु-साधन) समझाई:

 

समतल भूमि पर एक १२ अंगुल लंबा शंकु (लकड़ी का खूँटा) गाड़कर उसके चारों ओर एक वृत्त (सर्कल) खींच दिया जाता है।

प्रातःकाल और सायंकाल में शंकु की छाया जहाँ उस वृत्त को स्पर्श करती है, उन दो बिंदुओं को मिलाने से शुद्ध पूर्व और पश्चिम दिशा की रेखा प्राप्त होती है। इस रेखा पर समकोण (९० डिग्री) बनाकर उत्तर-दक्षिण दिशा निकाली जाती है।

 

सनन्दन जी ने बताया कि भवन में मुख्य द्वार (मुख्य दरवाजा) सही स्थान पर होना अत्यंत आवश्यक है:

 

शुभ द्वार: पूर्व और उत्तर दिशा के मुख्य द्वार शुभ, धन-धान्यप्रद और वंश-वृद्धि करने वाले होते हैं।

 

वर्जित द्वार: दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) दिशा में मुख्य द्वार बनाने से गृहस्वामी को रोग, धन-हानि और अकाल मृत्यु का भय रहता है।

 

गृह-प्रवेश विधि: नए घर में प्रवेश करने से पूर्व वास्तु-शांति, नवग्रह-होम, और ब्राह्मण-भोजन कराकर ही जल भरे कलश के साथ गृह-प्रवेश करना चाहिए।

इंद्रदेव को कब बदलकर दूसरा इन्द्र मिलता है आइए जानते है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जब देवर्षि नारद जी के मन में ज्योतिषाशास्त्र (काल-ज्ञान) के गणितीय सिद्धान्तों और ब्रह्मांडीय काल-चक्र को और अधिक गहराई से समझने की लालसा उत्पन्न हुई।

नारद जी ने महर्षि सनन्दन जी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके पूछा:

 

“हे ब्रह्मर्षि! आपने ज्योतिष शास्त्र को वेदों के नेत्र बताकर उसकी महिमा गाई। अब कृपा करके मुझे काल (समय) की सबसे सूक्ष्म इकाई से लेकर सबसे विशाल इकाई का मान बताइए। सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की गति से निर्मित होने वाले ‘काल-चक्र’ युगों की अवधि और ब्रह्मा जी की आयु का क्या गणितीय विधान है?

 

सनन्दन जी ने बताया कि काल असीम है, लेकिन मनुष्यों और देवताओं के समझ के लिए शास्त्रों में काल का बहुत ही सटीक विभाजन किया गया है:

 

आँख की पलक झपकने का जो सबसे छोटा हिस्सा होता है, उसे ‘त्रुटि’ और ‘लव’ कहते हैं।

 

 १५ निमेष की एक ‘काष्ठा’ होती है, और ३० काष्ठा की एक ‘कला’ बनती है।

 

 ३० कला का एक ‘मुहूर्त’ (लगभग ४८ मिनट) होता है, और ३० मुहूर्त का एक मनुष्य का ‘अहोरात्र’ (एक पूरा दिन और रात) बनता है।

 

सनन्दन जी ने बताया कि जैसे-जैसे हम अलग-अलग लोकों में ऊपर जाते हैं, काल की गति और अवधि बदल जाती है।

 

पितरों का दिन-रात: मनुष्य का एक ‘मास’ (महीना) पितरों का एक दिन-रात होता है। कृष्ण पक्ष उनका दिन और शुक्ल पक्ष उनकी रात होती है।

 

 मनुष्य का एक ‘वर्ष’ देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात होती है।

चारों युगों का मान (दिव्य वर्ष):

 

सत्ययुग: ४,८०० दिव्य वर्ष (१७,२८,००० सौर वर्ष)

त्रेतायुग: ३,६०० दिव्य वर्ष (१२,९६,००० सौर वर्ष)

द्वापरयुग: २,४०० दिव्य वर्ष (८,६४,००० सौर वर्ष)

कलि युग: १,२०० दिव्य वर्ष (४,३२,००० सौर वर्ष)

चारों युगों को मिलाकर एक ‘महायुग’ (चतुर्युगी) बनता है, जिसकी अवधि ४३ लाख २० हजार मनुष्य वर्ष होती है।

 

सनन्दन जी ने आगे ब्रह्मा जी की आयु की विशाल काल-गणना समझाई:

 

 ७१ महायुगों का एक ‘मन्वंतर’ होता है। प्रत्येक मन्वंतर में एक मनु, सप्तर्षि और इंद्र बदलते हैं  ऐसे १४ मन्वंतरों को मिलाकर ब्रह्मा जी का ‘एक दिन’ (कल्प) बनता है। यानी एक कल्प में १,००० महायुग बीतते हैं।

 

 जितनी लंबी ब्रह्मा जी की दिन की अवधि होती है, उतनी ही लंबी उनकी ‘रात’ भी होती है, जिसे ‘नैमित्तिक प्रलय’ कहते हैं। उस समय तीनों लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक) जलमग्न हो जाते हैं और भगवान श्रीहरि शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं।

 

ब्रह्मा जी का सौ वर्ष का जीवन (परम आयु) पूरा होने पर संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल प्रकृति में लय हो जाता है, जिसे ‘प्राकृतिक प्रलय’ कहा जाता है।

 

 सनन्दन जी ने खगोलीय सिद्धांतों  के आधार पर बताया कि:

 

सूर्य संपूर्ण सौरमंडल का आधार और आत्मा है। सूर्य की गति से ही ऋतुएँ, अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन), मास और दिन बनते हैं।

राशि चक्र में १२ राशियाँ (मेष से मीन तक) और २७ नक्षत्र (अश्विनी से रेवती तक) स्थित हैं जब ग्रह इन नक्षत्रों और राशियों में भ्रमण करते हैं, तो वे काल-चक्र के अनुसार जीवों को उनके कर्मों का शुभ और अशुभ फल प्रदान करते हैं।

 

देवर्षि नारद जी के मन में वेदांगों के अंतिम दो अंगों—’छन्द’ और ‘ज्योतिष’ को जानने की तीव्र उत्कंठा हुई।नारद जी ने महर्षि सनन्दन जी के चरणों में सादर प्रणाम करके पूछा:

“हे ऋषिश्रेष्ठ! आपने मुझे व्याकरण और निरुक्त का अति पवित्र ज्ञान दिया। अब कृपा करके मुझे ‘छन्द’ और ‘ज्योतिष’ वेदांगों का स्वरूप विस्तार से समझाइए। मंत्रों की संगीतात्मकता और अनुष्ठानों के लिए शुभ काल के निर्धारण में इन दो वेदांगों का क्या महत्व है?

 

सनन्दन जी ने बताया कि *”पादौ तु वेदस्य मुखं च छन्दः”* अर्थात छन्द-शास्त्र वेद रूपी पुरुष के दोनों चरण हैं। जिस प्रकार बिना पैरों के कोई मनुष्य चल नहीं सकता, उसी प्रकार बिना छन्द के वैदिक मंत्रों का गायन और उनका प्रवाह संभव नहीं है।

 

 ‘छन्द’ शब्द की उत्पत्ति ‘छदि’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ‘आच्छादित करना’ या ‘प्रसन्न करना’। छन्द मंत्रों को एक निश्चित मर्यादा और लयबद्धता में ढँककर रखता है।

 

गायत्री छन्द: २४ अक्षरों (८-८-८ के तीन पाद) से युक्त, जिसे छन्दों की माता माना गया है २८ अक्षरों वाला छन्द ३२ अक्षरों (८-८-८-८ के चार पाद) वाला छन्द, जिसमें अधिकांश पौराणिक श्लोक रचे गए हैं बृहती (३६ अक्षर), पंक्ति (४० अक्षर), त्रिष्टुप् (४४ अक्षर) और जगती (४८ अक्षर)।

 

सनन्दन जी ने कहा कि जो व्यक्ति बिना छन्द जाने किसी मंत्र का जप या अनुष्ठान करता है, उसका जप निष्फल हो जाता है। छन्द से ही मंत्र में गति और संगीतात्मक ऊर्जा आती है।

 

छन्द-शास्त्र के उपरांत सनन्दन जी ने वेदांगों के छठे और अंतिम अंग ‘ज्योतिष’ का वर्णन किया। ज्योतिष को वेद-पुरुष के ‘नेत्र’ (आँखें) माना गया है।

 

“जैसे आँखों के बिना सुंदर शरीर भी अंधकार में रहता है, वैसे ही ज्योतिष शास्त्र के बिना यह ज्ञान अधूरा है कि कौन-सा धार्मिक कर्म या यज्ञ किस समय करने पर फलदायी होगा।

 

महर्षि सनन्दन जी ने ज्योतिष शास्त्र को तीन मुख्य भागों (त्रिस्कन्ध) में विभाजित करके समझाया:

 

इसमें ग्रहों, नक्षत्रों, सूर्य और चंद्रमा की गति, स्थिति, दूरी, ग्रहण (सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण) तथा काल-गणना (युग, वर्ष, अयन, मास, तिथि) का गणितीय विवेचन होता है।

 

इसमें ब्रह्मांडीय घटनाओं का पृथ्वी, वर्षा, ऋतुओं, कृषि, प्राकृतिक आपदाओं और संपूर्ण संसार पर पड़ने वाले सामूहिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

 

इसमें किसी जीव के जन्मकाल के समय ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर उसके भूत, वर्तमान और भविष्य के कर्मफल (दशा और गोचर) का विचार किया जाता है सनन्दन जी ने ज्योतिष की महत्ता बताते हुए एक अत्यंत दार्शनिक बात भी कही:

 

सूर्य, चंद्र और समस्त नक्षत्र भगवान श्रीहरि की आज्ञा और नियम (काल-चक्र) में बँधकर ही निरंतर भ्रमण करते हैं ज्योतिष हमें यह सिखाता है कि किस समय कौन-सा कर्म (जैसे यज्ञ, विवाह, गर्भाधान, नामकरण आदि) करने से ब्रह्मांडीय ऊर्जाएँ हमारे अनुकूल होती हैं।

  

 

    इंद्रदेव को कब बदलकर दूसरा इन्द्र मिलता है आइए जानते है।

 

 

अब देवर्षि नारद जी के मन में ज्योतिषाशास्त्र (काल-ज्ञान) के गणितीय सिद्धान्तों और ब्रह्मांडीय काल-चक्र को और अधिक गहराई से समझने की लालसा उत्पन्न हुई।

नारद जी ने महर्षि सनन्दन जी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके पूछा:

 

“हे ब्रह्मर्षि! आपने ज्योतिष शास्त्र को वेदों के नेत्र बताकर उसकी महिमा गाई। अब कृपा करके मुझे काल (समय) की सबसे सूक्ष्म इकाई से लेकर सबसे विशाल इकाई का मान बताइए। सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की गति से निर्मित होने वाले ‘काल-चक्र’ युगों की अवधि और ब्रह्मा जी की आयु का क्या गणितीय विधान है?

 

सनन्दन जी ने बताया कि काल असीम है, लेकिन मनुष्यों और देवताओं के समझ के लिए शास्त्रों में काल का बहुत ही सटीक विभाजन किया गया है:

 

आँख की पलक झपकने का जो सबसे छोटा हिस्सा होता है, उसे ‘त्रुटि’ और ‘लव’ कहते हैं।

 

 १५ निमेष की एक ‘काष्ठा’ होती है, और ३० काष्ठा की एक ‘कला’ बनती है।

 

 ३० कला का एक ‘मुहूर्त’ (लगभग ४८ मिनट) होता है, और ३० मुहूर्त का एक मनुष्य का ‘अहोरात्र’ (एक पूरा दिन और रात) बनता है।

 

सनन्दन जी ने बताया कि जैसे-जैसे हम अलग-अलग लोकों में ऊपर जाते हैं, काल की गति और अवधि बदल जाती है।

 

पितरों का दिन-रात: मनुष्य का एक ‘मास’ (महीना) पितरों का एक दिन-रात होता है। कृष्ण पक्ष उनका दिन और शुक्ल पक्ष उनकी रात होती है।

 

 मनुष्य का एक ‘वर्ष’ देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात होती है।

चारों युगों का मान (दिव्य वर्ष):

 

सत्ययुग: ४,८०० दिव्य वर्ष (१७,२८,००० सौर वर्ष)

त्रेतायुग: ३,६०० दिव्य वर्ष (१२,९६,००० सौर वर्ष)

द्वापरयुग: २,४०० दिव्य वर्ष (८,६४,००० सौर वर्ष)

कलि युग: १,२०० दिव्य वर्ष (४,३२,००० सौर वर्ष)

चारों युगों को मिलाकर एक ‘महायुग’ (चतुर्युगी) बनता है, जिसकी अवधि ४३ लाख २० हजार मनुष्य वर्ष होती है।

 

सनन्दन जी ने आगे ब्रह्मा जी की आयु की विशाल काल-गणना समझाई:

 

 ७१ महायुगों का एक ‘मन्वंतर’ होता है। प्रत्येक मन्वंतर में एक मनु, सप्तर्षि और इंद्र बदलते हैं  ऐसे १४ मन्वंतरों को मिलाकर ब्रह्मा जी का ‘एक दिन’ (कल्प) बनता है। यानी एक कल्प में १,००० महायुग बीतते हैं।

 

 जितनी लंबी ब्रह्मा जी की दिन की अवधि होती है, उतनी ही लंबी उनकी ‘रात’ भी होती है, जिसे ‘नैमित्तिक प्रलय’ कहते हैं। उस समय तीनों लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक) जलमग्न हो जाते हैं और भगवान श्रीहरि शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं।

 

ब्रह्मा जी का सौ वर्ष का जीवन (परम आयु) पूरा होने पर संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल प्रकृति में लय हो जाता है, जिसे ‘प्राकृतिक प्रलय’ कहा जाता है।

 

 सनन्दन जी ने खगोलीय सिद्धांतों  के आधार पर बताया कि:

 

सूर्य संपूर्ण सौरमंडल का आधार और आत्मा है। सूर्य की गति से ही ऋतुएँ, अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन), मास और दिन बनते हैं।

राशि चक्र में १२ राशियाँ (मेष से मीन तक) और २७ नक्षत्र (अश्विनी से रेवती तक) स्थित हैं जब ग्रह इन नक्षत्रों और राशियों में भ्रमण करते हैं, तो वे काल-चक्र के अनुसार जीवों को उनके कर्मों का शुभ और अशुभ फल प्रदान करते हैं।

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