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गुरु की महादशा में अन्य ग्रहों की अंतर्दशा का अनुभव आधारित फल

गुरु ग्रह की महादशा के उपरोक्त फल गुरु की अन्तर्दशा में प्राप्त हो सकते हैं। परन्तु

निम्न फल अन्य ग्रह की अन्तर्दशा में ही प्राप्त होते हैं। इन फलों का निर्धारण भी आप गुरु के साथ जिस भी ग्रह की अन्तर्दशा हो, उसके बल, उस पर अन्य ग्रह

की युति या दृष्टि तथा उस ग्रह का शुभाशुभ देख कर करें।

 

गुरु में गुरु की अन्तर्दशा👉 मेरे अनुभव में इस दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसमें यदि किसी उच्च, मूलात्रकोण, लग्नेश अथवा शुभ ग्रह से द्रष्ट या युत हो तो शुभ

फल में वृद्धि होती है। समाज में प्रतिष्ठा वृद्धि, परिवार में मांगलिक कार्य, सर्व सुविधा युक्त निवास की प्राप्ति, वाहन-आभूषण की प्राप्ति, प्रत्येक क्षेत्र में मान सम्मान होता जातक के आन्तरिक गुणों की वृद्धि होती है। आचार्यों से मेल-मिलाप अधिक होता है तथा मन की इच्छाओं की पूर्ति होती है। इसमें गुरु यदि कर्मेश अथवा भाग्येश या सुखेश के प्रभाव में हो तो जातक को संतान सुख के साथ आर्थिक लाभ की प्राप्ति भी होती है। गुरु यदि नीच का हो अथवा किसी दुःस्थान में बैठा हो तो अवश्य संतान अथवा जीवनसाथी की हानि, मान-सम्मान में कमी, सभी क्षेत्रों में दुःख व कष्ट तथा

व्यापार अथवा कर्म क्षेत्र में हानि होती है।

 

गुरु में शनि की अन्तर्दशा👉  इस दशा में कोई ग्रह यदि उच्च, मूलत्रिकोण

अथवा शुभ ग्रह के प्रभाव में हो तो व्यक्ति को कर्मक्षेत्र में उन्नति, भूमि-भवन व वाहन

लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा तथा अपने से उच्च लोगों से मेल-मिलाप अधिक होता

है। इसके अतिरिक्त कोई ग्रह नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री अथवा किसी त्रिक भाव में हो तो

जातक में अवगुणों की वृद्धि होती है जिसमें लिंग अनुसार अवगुण आते हैं जैसे जातक

पुरुष है तो शराब का सेवन आरम्भ कर देता है, वेश्यागमन करता है और स्त्री जातक होने पर परिवार में अलगाव, बुजुर्गों का अपमान जैसे कार्य करती है। इसके अतिरिक्त जातक को आर्थिक हानि, मानसिक कष्ट, जीवनसाथी को कष्ट, परिवार में किसी को पीडा, पशुओं को कष्ट, व्ययों में वृद्धि, नेत्र रोग अथवा संतान कष्ट के साथ सभी प्रकार के कष्ट प्राप्त होते हैं।

 

गुरु में बुध की अन्तर्दशा👉  इस दशा में दैवज्ञों के विचारों में भिन्नता है। एक वर्ग इस दशा को पूर्णतः शुभ बताता है तो दूसरा वर्ग इस दशा को बहुत ही अशुभ बताता है। यहां पर मैं अपने अनुभव के आधार पर इस दशा की चर्चा कर रहा है। किसी भी ग्रह के उच्च, मूलत्रिकोणी, मित्र क्षेत्री अथवा एक दूसरे से नवपंचम अथवा केन्द्र योग निर्मित करने पर व्यक्ति को चुनाव के माध्यम से किसी सभा की सदस्यता प्राप्त होती है, आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। संतान अथवा उच्च विद्या प्राप्ति, व्यक्ति का देव पूजन के साथ धर्म में मन लगना तथा कर्मक्षेत्र में लाभ प्राप्त होता है। किसी ग्रह के नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री अथवा षडाष्टक योग निर्मित होने पर व्यक्ति को आर्थिक रूप

से संकट में मद्यपान में रुचि, वेश्यागमन, जीवनसाथी मरण, कई प्रकार के रोग, समाज में सम्मान में कमी और किसी ग्रह के मारकेश होने पर मृत्युतुल्य कष्ट अथवा मरण होता है। यहां मैंने एक बात देखी है कि इसमें ग्रहों के अशुभ होने पर व्यक्ति की भाषा कुछ गन्दी हो जाती है। वह अपशब्दों का प्रयोग अधिक करता है।

गुरु में केतू की अन्तर्दशा👉  इस दशा में जातक को मिश्रित फलों की प्राप्ति

होती है। गुरु अथवा केतू के शुभ, उच्च, मूलत्रिकोणी अथवा मित्रक्षेत्री होने पर जातक को धर्म के प्रति अत्यधिक रुचि, मन में शुभ विचार तथा अच्छे कार्यों से समाज में मान अधिक होता है। किसी ग्रह के त्रिक भावस्थ होने पर, नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री अथवा ग्रह की अन्य राशि में किसी पाप ग्रह का प्रभाव होने पर जातक के शरीर । अथवा शल्यक्रिया से कोई चिन्ह, कारावास भय, आर्थिक हानि, पारिवारिक सदस्यों को कष्ट, किसी गुरु समान व्यक्ति अथवा वृद्ध से विछोह होता है। गुरु लग्न में व केतू के नवम भाव में होने पर जातक का मन सन्यास की ओर होता है। गुरु से केतु के केन्द्र अथवा त्रिकोण में होने पर जातक को आर्थिक लाभ व व्यवसाय में उन्नति होती है। किसी का मारकेश होने पर मृत्यु भी सम्भव है।

 

गुरु में शुक्र की अन्तर्दशा👉  इस दशा में जातक को मिश्रित फल की प्राप्ति

होती है, क्योंकि यह दोनों ही ग्रह शत्रु हैं। इस दशा में दोनों में से कोई भी ग्रह उच्च,

मूलत्रिकोणी अथवा शुभ भाव में होने पर जातक को पारिवारिक सुख की प्राप्ति,

आर्थिक लाभ, भौतिक सुख प्राप्त होते हैं। जातक तालाब, कुआँ आदि का निर्माण

करवाता है, इसमें भी यदि कोई ग्रह किसी शुभ केन्द्रेश से युत हो तो जातक को और

भी अधिक शुभ फल मिलते हैं। जातक को उच्च वाहन प्राप्ति, आभूषण व रत्नों की

प्राप्ति होती है। जातक सात्विक जीवन व्यतीत करता है। किसी ग्रह के नीच, अस्त,

शत्रुक्षेत्री, पाप प्रभाव, दुःस्थान में अथवा षडाष्टक योग निर्मित होने पर आर्थिक हानि, शारीरिक कष्ट, किसी भी प्रकार का बन्धन भय, भौतिक वस्तुओं की हानि, वैवाहिक जीवन से मन उच्चाटन परन्तु घर से बाहर सुख तलाशना जैसे फल प्राप्त होते हैं। यदि कोई ग्रह मारकेश हो तथा काल भी मारक हो तो जातक की नृत्यु भी सम्भव है।

 

गुरु में सर्य की अन्तर्दशा👉 इस दशाकाल में जातक को शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। ग्रह का उच्च, मूलत्रिकोणी, मित्रक्षेत्री अथवा शुभ भाव में होने पर जातक को

उच्च पद की प्राप्ति, समाज में सम्मान वृद्धि, अचानक लाभ, वाहन प्राप्ति, सरकारी नौकरी, पुत्र प्राप्ति किसी महानगर में सर्वसुविधा सम्पन्न निवास प्राप्ति तथा शत्रु परास्त के साथ सभी जातक की इच्छानुसार कार्य करते हैं। किसी ग्रह के नीच, अशुभ भावस्थ अधिक पाप प्रभाव में अथवा षडाष्टक योग होने पर जातक का प्रत्येक क्षेत्र में अपमान शिरोरोग पाप कर्म में लीन, आत्म सम्मान की कमी, मन में घबराहट के साथ ज्वर बिगड जाना जैसे फल प्राप्त होते हैं। मारकेश होने पर मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त होते हैं।

 

गुरु में चन्द्र की अन्तर्दशा👉 यह दशा जातक की अच्छी व्यतीत होती है। यदि

कोई ग्रह उच्च, मूलत्रिकोणी, मित्रक्षेत्री अथवा शुभभाव या शुभ ग्रह के प्रभाव में हो अथवा दोनों का केन्द्र में होने पर जातक सत्यकार्य में लीन, आर्थिक लाभ, यश में वृद्धि, शत्रु हानि, परिवार वृद्धि अथवा कारोबार में लाभ व उन्नति होती है। किसी ग्रह का अशुभ प्रभाव में, नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री, किसी अशुभ भाव अथवा पाप प्रभाव में अथवा षडाष्टक योग होने पर जातक के मन में उदासीनता, अपमान, स्थान परिवर्तन, माता की मृत्यु अथवा कष्ट जैसे फल प्राप्त होते हैं।

 

गुरु में मंगल की अन्तर्दशा👉 मेरे अनुभव में यह दशा भी जातक की अच्छी जाती है। यदि इनमें कोई ग्रह उच्च, मलत्रिकोणी, एक दुसरे से केन्द्र में, शुभ भाव, शुभ ग्रह के प्रभाव में होने पर जातक को भूमि-भवन लाभ, तीर्थयात्रा, नये कार्यो से यश प्राप्ति जैसे फल प्राप्त होते हैं, लेकिन इनमें किसी ग्रह के नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री, त्रिक भाव में अथवा अधिक पाप प्रभाव में होने पर जातक को भाई से विरोध अथवा वियोग,

कोई दुर्घटना अथवा शल्य क्रिया, रक्तविकार, अचानक झगड़े, भूमि-भवन नाश, नेत्र रोग, अचानक शल्यक्रिया अथवा गुरु की मृत्यु सम्भव है। मंगल अथवा गुरु का मारकेश होने पर जातक को मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त होते हैं।

 

गुरु में राहू की अन्तर्दशा👉 इस दशा में राहू यदि 3-6-11 अथवा 10वें भाव

में हो अथवा दोनों में से कोई भी उच्च, शुभ प्रभाव में हो तो जातक को राज्य सम्मान

परन्तु इनमें से किसी ग्रह अचानक धन लाभ विदेश यात्रा, व्यापार में बढ़ोत्तरी होती है। परन्तु इसमे से किसी ग्रह का नीच, शत्रु क्षेत्री, पाप प्रभाव में अथवा षडाष्टक योग निर्मित करे तो व्यक्ति को शिरोरोग रोग अथवा पीडा, रोग से शरीर कमजोर होना, अचानक हानि, जेल यात्रा, विद्युत भय, अग्नि भय, सम्मान में हानि अथवा पद मुक्ति जैसे फल प्राप्त होते हैं।

 

क्रमशः…अगले लेखो के माध्यम से हम गुरु कृत पीड़ा से मुक्ति के विभिन्न उपायों के विषय मे चर्चा करेंगे।

एकादश भाव का स्वामी छठे भाव में – जीवन में संघर्ष के बाद लाभ

देवगुरु बृहस्पति = “ईश्वर-कृपा योग” = लग्न, धन, पंचम, नवम भाव

चतुर्थ भाव  घर, भूमि, माता और गृह-सुख का रहस्य

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