
धर्मसिन्धु, परिच्छेद 2, एकादशी निर्णय श्लोक 9
एकादश्यां यदा वृद्धिर्द्विदिनव्यापिनी भवेत्। परैवोपोषणीया स्यात् पूर्वा नक्तं समाचरेत्॥
हिंदी भावार्थ: जब एकादशी तिथि साठ घड़ी की मर्यादा लांघ कर दो सूर्योदयों तक फैल जाती है, तब शास्त्र उसे वृद्धि तिथि कहता है। ऐसे संयोग में व्रत का सच्चा अधिकार सदा दूसरी एकादशी को मिलता है। पहली एकादशी को पूरे दिन सात्विक संयम रखो, और यदि आवश्यकता हो तो रात्रि में केवल एक बार अन्न-रहित फलाहार ग्रहण कर सकते हो।
अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते। नोपोष्या सा तिथिर्विद्वन् द्वादश्यां पारणं भवेत्॥
हिंदी भावार्थ: अरुणोदय वह पवित्र बेला है जो सूर्योदय से एक घंटा छत्तीस मिनट पहले आती है। यदि उस समय आकाश में दशमी का स्पर्श बना रहे तो वह एकादशी विद्धा मानी जाती है, अर्थात दूषित। गृहस्थ हो या वैरागी, दोनों के लिए शुद्ध दूसरी एकादशी ही वरणीय है। और पारण का विधान भी सदा द्वादशी में ही पूर्ण करना चाहिए।
असमर्थः शरीरे च व्रते चैव नराधिप। वर्जयेदन्नमेवात्र फलं प्राप्नोति पुष्कलम्॥
हिंदी भावार्थ: जो वृद्ध हैं, रोग से दुर्बल हैं, गर्भवती माताएं हैं या छोटे बालक हैं, और जो निर्जला व्रत नहीं साध सकते, उनके लिए शास्त्र ने करुणा का द्वार खोला है। यह छूट केवल कठोर उपवास से है, अन्न त्याग से नहीं। चावल, गेहूं, दाल, प्याज-लहसुन का त्याग तो व्रत की आत्मा है। इतना भी निष्ठा से कर लो तो संपूर्ण एकादशी का फल सहज ही प्राप्त हो जाता है।
शास्त्र: ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड अध्याय 26, श्लोक 42
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि। वनस्थो यतिधर्मोऽयं गृहस्थोऽपि समाचरेत्॥
हिंदी भावार्थ: महाराज अम्बरीष ने पूरे एक वर्ष तक अखंड एकादशी व्रत का पालन किया। पारण की घड़ी आई तो महर्षि दुर्वासा द्वार पर पधारे। द्वादशी समाप्त होने को थी। धर्म संकट में अम्बरीष ने केवल तुलसी-जल से पारण किया। दुर्वासा के क्रोध से उत्पन्न कृत्या को स्वयं सुदर्शन चक्र ने रोका और भक्त की रक्षा की। कथा सिखाती है कि एकादशी का व्रत और पारण दोनों समय के अधीन हैं। वृद्धि तिथि में तो यह घड़ी और भी सूक्ष्म हो जाती है। गलत मुहूर्त में किया गया पारण पूरे व्रत को निष्फल कर देता है।
दशमी-विद्धा दोष: पहले दिन दशमी से युक्त एकादशी को व्रत करने से संतान और धन संबंधी कष्ट का योग बनता है। परिहार यही है कि दूसरी शुद्ध एकादशी को व्रत करो।
पारण लोप दोष: यदि द्वादशी में पारण छूट जाए तो व्रत भंग योग बनता है, और शास्त्र कहता है कि सारा पुण्य राक्षसी शक्तियां हर लेती हैं। परिहार के लिए द्वादशी में तुलसी दल के साथ जल ग्रहण कर पारण अवश्य करो।
अन्न-दोष योग: रोगवश भी यदि अन्न ग्रहण हो जाए तो चांडाल योग लगता है। परिहार स्वरूप तीन दिन तक प्रातः गौमूत्र मिश्रित गंगाजल ग्रहण करो और विष्णु सहस्रनाम के तीन पाठ करो।
शंका योग: जब दो दिन एकादशी होने से मन में संदेह उत्पन्न हो, तो वह संदेह योग है। शास्त्र का वचन है “संदेहे सर्वं त्यजेत्”। परिहार के लिए दोनों ही दिन अन्न का त्याग कर दो।
01 वैदिक उपाय: पुरुष सूक्त हवन
शास्त्र: ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 90, मंत्र 16
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥
विधि: एकादशी विष्णु का दिन है, इसलिए द्वादशी को घी और काले तिल से पुरुष सूक्त की एक सौ आठ आहुतियां दो। सांख्य: 108 आहुति।
02 दसमहाविद्या उपाय: माँ कमला
शास्त्र: विश्वसार तंत्र, पटल 7, श्लोक 34
एकादश्यां तु संपूज्या कमला विष्णुवल्लभा। अन्नदोषहरा देवी सर्वसम्पत्प्रदायिनी॥
विधि: कमला माता लक्ष्मी का तांत्रिक स्वरूप हैं, जो वृद्धि तिथि के भ्रम को हरती हैं। कमल गट्टे की माला से मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” का जप करो। सांख्य: 1008 जप।
03 स्तोत्र उपाय: द्वादशी स्तोत्र
शास्त्र: नारद पुराण, पूर्व भाग अध्याय 28, श्लोक 22
द्वादश्यां पारणं कुर्यात् व्रतसिद्ध्यै न संशयः। अन्यथा निष्फलं सर्वं व्रतं दानं तपो जपः॥
विधि: पारण से पूर्व इस स्तोत्र को पढ़ो: “द्वादशीं तिथिमासाद्य पारणं तु समाचरेत्। अज्ञानादथवा ज्ञानाद्व्रतं सम्पूर्णतां व्रजेत्॥” सांख्य: 3 पाठ।