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विवाह विच्छेद योग व पुनर्विवाह योग :

तेरी तो सोच बदली, मेरी तो जिंदगी ही बदल गयी…एक कुम्हार माटी से चिलम बनाने जा रहा था..।उसने चिलम का आकार दिया..।थोड़ी देर में उसने चिलम को बिगाड़ दिया…lमाटी ने पूछा -: अरे कुम्हार, तुमने चिलम अच्छी बनाई फिर बिगाड़ क्यों दिया.?कुम्हार ने कहा कि -: अरे माटी, पहले मैं चिलमबनाने की सोच रहा था, किन्तु मेरी सोच (दिमाग) बदली और अब मैं सुराही (पानी का मटका) बनाऊंगा…।ये सुनकर माटी बोली -: अरे कुम्हार, मुझे खुशी है कि, तेरी तो सोच बदली, मेरी तो जिंदगी ही बदल गयी…lचिलम बनती तो स्वयं भी जलती और दूसरों को भी जलाती ,,, अब सुराही बनूँगी तो स्वयं भी शीतल रहूँगी …और दूसरों को भी शीतल रखूंगी…lभावार्थ -:अगर हम अपनी सोच को Negative से positive मे बदलते है तो इससे आप पर तो प्रभाव पड़ेगा ही साथ मे दुसरो पर भी पड़ेगा । वे सोचने पर मजबूर हो जाएंगे की कल कैसा था और आज कितना बदल गया है और आपके साथ सब अच्छी तरह व्यवहार रखेंगे !!!!क्योंकि सभी जानते की शीतल जल मे कितना गर्मजल मिलाओ वह शीतल ही हो जाएंगे ।।”यदि जीवन में हम सभी सही फैसला लें…तो हम स्वयं भी खुश रहेंगे.., एवं दूसरों को भी खुशियाँ दे सकेंगे।सोच बदलो दुनिया बदलेगीनित्य जो प्रभु गुण गाता हैवह धरती पर ही श्वर्ग के सुखपाता है।

 

ईश्वर “टूटी” हुई चीज़ों का इस्तेमाल कितनी ख़ूबसूरती से करता है ..,, जैसे …. बादल टूटने पर पानी की फुहार आती है …… मिट्टी टूटने पर खेत का रुप लेती है…. फल के टूटने पर बीज अंकुरित हो जाता है ….. और बीज टूटने पर एक नये पौधे की संरचना होती है …. इसीलिये जब आप ख़ुद को टूटा हुआ महसूस करे तो समझ लिजिये ईश्वर आपका इस्तेमाल किसी बड़ी उपयोगिता के लिये करना चाहता है ।

इसीलिए सदैव प्रसन्न रहें और हँसते रहें ।।

 

 

आज से कुछ दशक पहले हिन्दू युगल में विवाह विच्छेद या तलाक होना बहुत ही आश्चर्य की बात मानी जाती थी, लेकिन वर्तमान युग की बात की जाय तो यह स्थिति बहुत ही सामान्य बात हो गयी है ! इसका प्रमुख कारण है विवाह के पूर्व सही कुण्डली का न मिलाया जाना ! आज कल तो लोग कंप्यूटर सॉफ्टवेयर से स्वयं जन्मतिथि के अनुसार गुण मिलाकर विवाह सम्पन्न करा देते हैं ! मेरे सामने बहुत सारे ऐसे लोग है जिनके 30 या 32 गुण मिलने पर विवाह हुआ था, परन्तु आज वह तलाक की स्थिति पैदा होने पर परेशान हैं ! केवल कुण्डली से गुण मिलान ही विवाह के लिये पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि वर वधू की कुण्डली  में ग्रहों की स्थिति, वैधव्य योग, तलाक योग, निःसंतान योग, काक वंध्या योग, षडाष्टक, नवपंचम भेद, चन्द्रबल, सूर्यबल, ताराबल, गण, ग्रहमैत्री, नाड़ी दोष मांगलिक दोष भी देखा जाता है ओर दोनों से मिलान भी कराया जाता है ! फिर भी यदि कोई दिक्कत शेष रह गयी हो तो ग्रह शान्ति का उपाय भी कराया जाता है !

 

 हम यहाँ तलाक व पुनर्विवाह योग के बारे में जानेगे :

 

ज्योतिषशास्त्र में बृहस्पति एवं शुक्र को श्रेष्ठ शुभ फलदायक माना गया है ! मानसागरी ग्रंथ के अनुसार बृहस्पति या शुक्र केंद्र या त्रिकोण में हो, तो सभी अरिष्टों का नाश हो जाता है ! “गुरुः यदि शुभम् भवेति किं करोति सर्वे ग्रहः !” दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने में भी बृहस्पति एवं शुक्र का सप्तम भाव सप्तमेश पर शुभ प्रभाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है !

 

स्त्री की जन्म कुण्डली में  बृहस्पति (पुरुष ग्रह) पति सुख का कारक तथा पुरुष की कुण्डली में  शुक्र (स्त्री ग्रह) पत्नी सुख का कारक होता है ! यदि सप्तम भाव, सप्तमेश एवं पति-पत्नी के कारक ग्रहों (शुक्र एवं बृहस्पति) की कुण्डली में शुभ  स्थिति हो, तो सुखमय दाम्पत्य जीवन का संकेत देता है ! सप्तम भाव, सप्तमेश एवं कारक ग्रहों का पापी ग्रहों से युति या दृष्टि संबंध निश्चित तौर पर दाम्पत्य जीवन में कटुता को जन्म देने वाला होता है ! सूर्य, शनि, मंगल एवं राहु (पापी ग्रह) दाम्पत्य जीवन में अलगाव लाने का प्रभाव रखते हैं क्योंकि पापी ग्रहों को पृथकता कारक ग्रह माना गया है ! यदि सप्तम भाव इन पापी ग्रहों से पीड़ित अथवा पाप प्रभाव में हो, तो वैवाहिक जीवन कष्टदायक एवं दुखमय होता है ! बृहस्पति के बारे में एक मान्यता है कि वह कुछ स्थितियों में जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव का भला नहीं करता !

 

सूत्र –

 शनि क्षेत्रे यदा जीवः , जीव क्षेत्रे यदा शनिः !

स्थानहानि करोतिजीवः, स्थानवृद्धिःकरोतिशनिः !

 

अतः बृहस्पति पति सुख का कारक होकर यदि सप्तम भाव में स्थित हो, तो उस फल की हानि करेगा यदि वहाँ मकर या कुम्भ राशि हो, अर्थात् जातिका के दामपत्य सुख में कमी उतपन्न होगी ! शुक्र की भी  सप्तम भाव में स्थिति मारक होने के कारण अच्छी नहीं मानी गई है ! जातक पारिजात ग्रंथ के अनुसार —

 ‘शुक्रे मन्मथराशिगे बलवति, स्त्रीणाम् बहुनां पतिः !

अर्थात सप्तम भाव में बलवान शुक्र के स्थित होने पर जातिका के कई पति हो सकते हैं ! सप्तम भाव के दोनों ओर पापकर्तरी योग (पापी ग्रह) के स्थित होने पर वैवाहिक जीवन कष्टमय होता है ! कभी-कभी एक दूसरे के प्रति क्रूर व्यवहार के कारण तलाक की स्थिति भी बन सकती है !

 

बृहस्पति_व_शुक्र_का_दाम्पत्य_जीवन_पर_प्रभाव

 

बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं ! मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं !

 

सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है ! इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है ! पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है, और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति ! ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है !

 

ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है, और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं ! जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है ! पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है !

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दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है ! जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है ! इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है !

 

शुक्र भी बृहस्पति के समान ही सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है ! सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की सम्भावना प्रबल रहती है ! विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक  जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट हो जाता है ! बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं तब इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद रहता है ! लग्न में बृहस्पति यदि पापकर्तरी योग से पीड़ित होता है तब सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं पड़ता है ! ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की सम्भावना कम रहती है !

 

तलाक के ज्योतिषीय_कारण :

 

वर्तमान समय में जब स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हों वहाँ अब तलाक शब्द ज्यादा सुनाई देने लगा है ! इसका एक कारण सहनशीलता का अभाव भी है ! इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में सभी मशीन बन गये हैं ! काम की अधिकता ने सहनशक्ति में भी कमी कर दी है ! लड़कियाँ अपने पैरों पर खड़े होने लगी हैं और उन्हें भी लगता है कि वह आजीविका में बराबर की हिस्सेदार हैं तो वह अपने साथी के सामने क्यों झुकें ! हालांकि यह एक तरह से अहंकार है और कुछ नहीं ! बहुत बार पुरुष की मनमानी से तंग होकर घर में क्लेश बढ़ जाते हैं ! बहुत से कारण बन जाते हैं तलाक के, जिन्हें अलग रहना हो वह कोई ना कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं !

 

तलाक के कारणों का आज हम ज्योतिषीय आधार पर विश्लेषण करते हैं !

 कुण्डली के ऎसे योग जिनके कारण तलाक हो जाता है, या पति-पत्नी अलग रहते हैं :

 

1 – जन्म कुण्डली में लग्नेश व चंद्रमा से सप्तम भाव के स्वामी ग्रह, शुक्र की स्थिति से प्रतिकूल स्थिति में हों !

 

2 – कुण्डली में चतुर्थ भाव का स्वामी छठे भाव में स्थित हो या छठे भाव का स्वामी चतुर्थ भाव में स्थित हो तब यह अदालती तलाक दर्शाता है ! अर्थात पति-पत्नी का तलाक कोर्ट केस के माध्यम से होता है !

 

3 –  यदि कुण्डली के बारहवें भाव के स्वामी की चतुर्थ भाव के स्वामी से युति हो रही हो और चतुर्थेश कुण्डली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हों तब पति-पत्नी का अलगाव हो जाता है !

 

4 – अलगाव देने वाले ग्रह शनि, सूर्य तथा राहु का सातवें भाव, सप्तमेश और शुक्र पर प्रभाव पड़ रहा हो या सातवें व आठवें भावों पर एक साथ प्रभाव पड़ रहा हो !

जन्म कुंडली में सप्तमेश की युति द्वादशेश के साथ सातवें भाव या बारहवें भाव में हो रही हो !

 

5 – सप्तमेश व द्वादशेश का आपस में राशि परिवर्तन हो रहा हो और इनमें से किसी की भी राहु के साथ हो रही हो !

सप्तमेश व द्वादशेश जन्म कुंडली के दशम भाव में राहु/केतु के साथ स्थित हों !

जन्म लग्न में मंगल या शनि की राशि हो और उसमें शुक्र लग्न में ही स्थित हो, सातवें भाव में सूर्य, शनि या राहु स्थित हो तब भी अलगाव की संभावना बनती है !

जन्म कुंडली में शनि या शुक्र के साथ राहु लग्न में स्थित हो ! जन्म कुंडली में सूर्य, राहु, शनि व द्वादशेश चतुर्थ भाव में स्थित हो !

जन्म कुंडली में शुक्र आर्द्रा, मूल, कृत्तिका या ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित हो तब भी दांपत्य जीवन में अलगाव के योग बनते हैं !

 

6 – कुंडली के लग्न या सातवें भाव में राहु व शनि स्थित हो और चतुर्थ भाव अत्यधिक पीड़ित हो या अशुभ प्रभाव में हो तब तब भी अलग होने के योग बनते हैं !

शुक्र से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पापी ग्रह स्थित हों और कुंडली का चतुर्थ भाव पीड़ित अवस्था में हो !

 

षष्ठेश एक अलगाववादी ग्रह हो और वह दूसरे, चतुर्थ, सप्तम व बारहवें भाव में स्थित हों तब भी अलगाव होने की संभावना बनती है !

जन्म कुंडली में लग्नेश व सप्तमेश षडाष्टक अथवा द्विद्वार्दश स्थितियों में हों तब पति-पत्नी के अलग होने की संभावना बनती है !

 

बुध केतु भी डालते हैं रिश्तों में दरार :

 

बुध (Mercury) बुद्धिमत्ता का ग्रह है , वाणी, संवाद, लेखन, तर्क शक्ति और व्यवसायिक चातुर्य भी बुध के ही अधिपत्य में आते हैं ! व्यक्ति अगर बुद्धि चातुर्य के साथ साथ अच्छा लेखक है, बहुत अच्छा वक्ता है और साथ ही उसकी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ है, तो वो अपनी इन क्षमताओं का उपयोग अच्छे व्यक्तिगत और व्यवसायिक सम्बन्ध बनाने में कर सकता है ! बुध प्रधान व्यक्ति हाजिर जवाब होने के साथ साथ अच्छा मित्र भी होता है क्योंकि वो सम्बन्धो को निभाना जानता है !

 

केतु एक विभाजित करने वाला ग्रह है, एक संत की तरह जो अकेले रहता है, सुख सुविधाओं और भोग -विलास से पूर्णतः दूर, रिश्तों और उनमे संवाद की जंहा कोई आवश्यकता नहीं होती है ! केतु का स्वभाव बुध से पूर्णतः विपरीत है, केतु जब भी किसी ग्रह के साथ होता है तो उसे उसके फल देने से भटकाता है ,बुध का प्रमुख फल बुद्धि (मति) प्रदान करना है, इसलिए बुद्ध – केतु योग को मतिभ्रम योग कहते हैं ! केतु और बुध की युति का भी फल इसी प्रकार बुद्धि को भ्रमित करने वाला होता है , हालांकि किस राशि और कुंडली के किस भाव में ये योग बना है इस बात पर भी फल निर्भर करता है !

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इस योग में बुध के प्रभाव दूषित हो जाते हैं, जैसे बुध की प्रबल होने की परिस्थिति में कोई व्यक्ति बहुत अच्छा वक्ता है तो केतु के साथ आने की परिस्थिति में अर्थ हीन, डींगे हांकने वाला और आवश्यकता से अधिक बोलने वाला हो सकता है, कई बार उसके वक्तव्य उसी के लिए परेशानी खड़ी करने वाले हो सकते हैं (वाणी पर नियंत्रण होना), यही हाल उसकी वाणिज्यिक योजनाओं का हो सकता है, उसके समीकरण और योजनाएं सत्य से परे हो सकते हैं जो उसके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं, या कहे बुद्धि की भ्रमित होने की परिस्थिति का निर्मित होना ! उदहारण के लिए आर्थिक परिस्थिति को जांचे बिना व्यापारिक योजना बनाना और आर्थिक स्थिति का ध्वस्त हो जाना ! विचारधारा का संकुचित होना पर सोच का अत्यधिक संवेदनशील होना, हमेशा अज्ञात भय रहना और वाणी पर नियंत्रण न होना !

 

बुध केतु योग में बुध बहुत कमजोर हो तो व्यक्ति कम बोलने वाला, संकोची और अपने पक्ष या मन की बात को स्पष्ट रूप से नहीं रख पाने वाला होगा ! ऐसे लोग बड़े एकाकी होते हैं, आपसी रिश्तों में संवाद की कमी के चलते और संकोच के कारण अपनी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर पाते साथ ही व्यापारिक का क्रियान्वयन भी नहीं हो पाता है ! रिश्तों में कई बार धोखा होने की सम्भावना बनी रहती है, विशेषकर व्यवसायिक !

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बुध – केतु योग में आर्थिक उतार- चढाव बहुत बार देखा गया है, जिसका कारण बिना परिस्थितियों को समझे निवेश या खर्च करना होता है और व्यापारिक दृष्टिकोण का आभाव ! कई बार ये लोग मितव्ययी और कई बार अतिव्ययी हो जाते हैं, बहुत सी परिस्थितियों में जब बुद्ध अत्यन्त ही कमजोर और दुःस्थान में हों तब ये योग गम्भीर एकाकीपन, गम्भीर मानसिक अवसाद, जेल योग या लम्बे समय तक हास्पिटल /सुधार ग्रह तक में रहने की नौबत ला देता है ! इस योग की वजह से व्यक्ति दूसरों की बात और सलाह को स्वीकार करने या समझने की परिस्थिति से अत्यन्त दूर होता है जो उसकी आर्थिक परेशानी और एकाकीपन का कारण भी बनता है !

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इस दुर्योग से बचने के बहुत से तरीके हो सकते हैं परन्तु मेरी सोच में सबसे सटीक उपाय हैं, अधिक से अधिक सामाजिक होने की चेष्टा करना और दूसरों की सलाह ले कर आगे बढ़ना, साथ ही धन के निवेश या कोई भी योजना बनते समय सतर्क रहना !

 

बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश की आराधना इस दुर्योग से बचाने का कार्य करती है, अतः विघ्नहर्ता बुद्धि के दाता श्रीगणेश की आराधना करते रहें ! ऐसे योग में हाथीदाँत से निर्मित सिल्वर रिंग को धारण करने से बुद्ध केतु के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है !

 

 तलाक सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य  उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत हैं :

 

1- कुण्डली में यदि द्वितीय भाव में स्थित सप्तमेश बृहस्पति, राहु से पीड़ित होकर गुरु चाण्डाल योग बना रहा है,  तब तलाक हो सकता है ! अथवा

2 – सप्तम भाव पर मंगल की पाप दृष्टि हो !

3 – मंगल तृतीय एवं अष्टमेश होकर चतुर्थ भाव में स्थित होकर गृह व सुख में कमी ला रहा हो !

4 – शुक्र पर शनि की तृतीय दृष्टि होने पर !

इस प्रकार सप्तम भाव, सप्तमेेश तथा कारक शुक्र तीनों के पाप प्रभाव में होने के कारण जातक के पारिवारिक जीवन में हमेशा तनाव रहेगा और इससे तलाक की स्थिति पैदा होगी !

 

कुण्डली – 2, में बुध व शुक्र  की युति सातवें भाव में नीच के सूर्य के साथ है और शुक्र अस्त है तथा दशमेश शनि से दृष्ट है, बुध छठे भाव का स्वामी है, जो रोग तथा शत्रु का भाव है ! बुध तथा शुक्र अत्यंत नजदीक अंशों पर होने से ग्रह युद्ध की स्थिति में भी हैं ! बृहस्पति पति का कारक है जो शनि तथा केतु के साथ एवं राहु से दृष्ट है ! इस कुंडली में भी सप्तम भाव, सप्तमेश तथा कारक बृहस्पति तीनों पीड़ित हैं, अतः जातिका को शुक्र की महादशा में राहु के अंतर आने पर पति से तलाक लेना पड़ सकता है, तथा शुक्र की दशा एवं शनि की अंतर्दशा में दूसरी शादी करनी पड़ सकती है ! अथवा पति-पत्नी के साथ-साथ रहते हुए भी दोनों के बीच रोज लड़ाई-झगड़े की स्थिति बनी रह सकती है ! इस जन्मांक में अष्टमेश मंगल की द्वितीय और तृतीय भाव पर दृष्टि भी दाम्पत्य सुख में कमी का द्योतक है !

 

कुण्डली – 3, में सप्तम भाव  पर राहु की दृष्टि है ! शुक्र तृतीयेश होकर तृतीय भाव में राहु से पीड़ित है ! द्वितीय भाव में स्थित मंगल तथा बृहस्पति अस्त हैं ! भाग्येश तथा चतुर्थेश अस्त हैं ! चतुर्थ भाव में शत्रुक्षेत्री सप्तमेश तथा षष्ठेश शनि नीचस्थ चंद्र के साथ स्थित हैं ! सप्तम से अष्टम भाव में द्विस्वभाव राशि में स्थित मंगल पत्नी विछोह योग बना रहा है ! इस कुण्डली में सप्तम भाव,  सप्तमेश तथा कारक तीनों पीड़ित हैं, अतः बुध की महादशा एवं राहु की अंतर्दशा में पत्नी की मृत्यु हो सकती है तथा शनि की अंतर्दशा आने पर दूसरी शादी का योग बनता है !           उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भाव, भावेश तथा कारक तीनों के पीड़ित होने पर उस भाव का फल दूषित हो जाता है ! सप्तम भाव में यही स्थिति दाम्पत्य सुख में कमी तथा तलाक या पुनर्विवाह की स्थिति उत्पन्न करती है !

 

पुनर्विवाह के योग:

 

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार दूसरे विवाह को देखने के लिए सप्तम, नवम तथा सप्तम से छठे अर्थात द्वादश भावों पर विशेष विचार करना चाहिए।

 

यदि लग्न, सप्तम स्थान और चंद्र लग्न द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह हो सकते हैं !

 

इसी प्रकार लग्नेश, सप्तमेश तथा शुक्र द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह हो सकते हैं !

 

यदि सप्तम और अष्टम में पापी ग्रह हों और मंगल द्वादश स्थान में हो, तो जातक के दो विवाह हो सकते हैं !

 

सप्तम स्थान का कारक यदि पापी ग्रह से युत अथवा नीच नवांश अथवा शत्रु नवांश अथवा अष्टमेश के नवांश में हो, तो भी जातक के दो विवाह हो सकते हैं !

 

 यदि सप्तमेश और एकादशेश साथ हों अथवा एक दूसरे पर दृष्टि रखते हों, तो जातक के कई विवाह हो सकते हैं !

 

 प्रेम संबंध के योग:

 

 प्रेम संबंध पंचम भाव से देखा जाता है :

 

लग्नेश एवं पंचमेश का संबंध (चतुर्विध) प्रेम संबंध का द्योतक होता है !

 

पंचमेश तथा सप्तमेश की एकादश भाव में युति भी प्रेम संबंध को बढ़ावा देती है !

 

पंचमेश भाव में शुभकर्तरी तथा सप्तम भाव का पापी प्रभाव में होना एवं लग्नेश की पंचम भाव पर दृष्टि यह सारी ग्रह स्थितियाँ प्रेम संबंध को बढ़ावा देती हैं !

 

विवाह विच्छेद के बाद सन्तान किसके पास रहेंगी।

विवाह विच्छेद केस चल रहा है कब तक हो जाएगा।

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