
चितले काका हमारी बिल्डिंग की शान थे। उम्र लगभग सत्तर के आसपास रही होगी, लेकिन जोश आज भी किसी जवान से कम नहीं था। बालों को डाई करके काला रखा था। गोरा रंग, हल्की भूरी आंखें और लंबा, छरहरा शरीर, जिसे उन्होंने रोज योग करके बेहतरीन तरीके से संभाल रखा था। मुस्कुराते समय उनके दाहिने गाल पर पड़ने वाला गहरा डिंपल उन्हें और आकर्षक बना देता था, शायद इसलिए उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।
घर में वे शॉर्ट्स और सफेद मलमल का कुर्ता पहनते, लेकिन बाहर निकलते तो पूरा स्टाइल बदल जाता। जींस, लीवाइस, यू.एस. पोलो या रोडस्टर जैसी किसी ब्रांड की टी-शर्ट, रेड टेप के जूते, रे-बैन का चश्मा—सब कुछ एकदम सलीके से। मोहल्ले के कोने से हरी मिर्च और धनिया लेने भी जाते तो अपनी पल्सर बाइक निकालकर।
सच कहूं तो जब भी उन्हें पल्सर पर कहीं जाते देखता, मुझे वेस्टर्न फिल्मों के घोड़े पर सवार क्लिंट ईस्टवुड की याद आ जाती।
वे रंगीन मिजाज जरूर थे, लेकिन बेहद सुसंस्कृत इंसान थे। हम अविवाहित लड़के-लड़कियों के बीच बैठना उन्हें बहुत पसंद था। शायद हमारी ऊर्जा ही उनके हमेशा जवान बने रहने का राज थी। लेकिन लड़कियों या महिलाओं के बारे में उन्होंने कभी कोई फूहड़ टिप्पणी नहीं की। शायद इसी वजह से लड़के हों या लड़कियां, सभी उनके साथ सहज महसूस करते थे।
इसके बिल्कुल उलट थीं चितले काकू।
लगभग पैंसठ वर्ष की उम्र। पूरे सिर के बाल सफेद हो चुके थे, जिन्हें वे ढीले से पोनीटेल में बांधती थीं। वे भी अपने मायके की तरह गोरी और हल्की भूरी आंखों वाली थीं। माथे पर बड़ा-सा सिंदूर, तन पर हमेशा साधारण सूती साड़ी।
घर हो या बाहर, बस वही सादगी। बाहर निकलतीं तो साड़ी का पल्लू दोनों कंधों पर कसकर लपेट लेतीं और उसका सिरा हाथ में पकड़े रहतीं। पैरों में साधारण चप्पल और हाथ में हमेशा एक बड़ा थैला—जाते समय खाली और लौटते समय सामान से भरा हुआ।
हमने उन्हें कभी चितले काका की बाइक पर बैठा हुआ भी नहीं देखा था।
वे किसी से ज्यादा घुलती-मिलती भी नहीं थीं। बस अपनी उम्र की तीन-चार महिलाओं तक ही उनका दायरा सीमित था, जिनमें मेरी मां भी थीं। इसलिए आते-जाते वे बस मुझे देखकर मुस्कुरा देतीं।
हम सबकी यही राय थी कि इतने स्टाइलिश चितले काका को जैसे बिल्कुल बूढ़ी सोच वाली पत्नी मिली थी।
उनकी दुनिया बस घर, मंदिर और फिर घर तक सीमित थी।
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि चितले काका ने कभी अपनी पत्नी के बारे में शिकायत का एक शब्द भी नहीं कहा। दोनों चार कमरों के अपने छोटे-से संसार में बेहद संतुलित जीवन जी रहे थे। काका हमेशा की तरह खुशमिजाज ही दिखाई देते।
एक रात हमारी बिल्डिंग की सातवीं मंजिल के कॉमन एरिया में पार्टी चल रही थी। बिल्डिंग के ही एक लड़के की सगाई तय हुई थी।
करीब बीस लड़के-लड़कियां थे और हमेशा की तरह चितले काका भी मौजूद थे।
पिज्जा, पावभाजी, सॉफ्ट ड्रिंक… और हम चार-पांच लड़कों के लिए बीयर का एक क्रेट भी था।
मस्ती अपने पूरे शबाब पर थी।
काका ने किशोर कुमार के दो गाने गाए और खूब तालियां बटोरीं। फिर कुर्सी पर बैठकर पावभाजी खाने लगे।
अचानक…
वे छाती पकड़कर नीचे गिर पड़े।
दर्द से तड़पने लगे।
हम सबके होश उड़ गए।
किसी ने भागकर काकू को बुलाया।
वे उसी तरह दोनों कंधों पर पल्लू लपेटे हुए तेजी से ऊपर आईं।
तब तक काका लगभग बेहोश हो चुके थे।
और फिर…
जो हमने देखा, वह हमारी कल्पना से भी परे था।
काकू ने बिना एक पल गंवाए उनके सिर के नीचे हाथ रखा और उन्हें सीधा लिटाया।
घुटनों के बल बैठकर उन्होंने उनके ब्रांडेड शर्ट के बटन लगभग तोड़ डाले।
दोनों हाथों की उंगलियां आपस में फंसाईं और पूरी ताकत से सीपीआर (Chest Compressions) देना शुरू किया।
तीस बार दबाव देने के बाद उन्होंने उन्हें रेस्क्यू ब्रीदिंग दी।
वे दूसरा सेट शुरू ही करने वाली थीं कि…
अचानक…
काका ने लंबी सांस ली।
और होश में आ गए।
काकू तुरंत खड़ी हुईं।
अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछा।
मेरी तरफ देखकर बोलीं—
“गाड़ी निकालोगे?”
मैं इतना घबरा चुका था कि मेरे पैर कांपने लगे।
उन्होंने मेरी हालत समझ ली।
शांत स्वर में बोलीं—
“चाबी दो।”
मैंने बिना कुछ कहे कांपते हाथों से चाबी उनके हाथ में रख दी।
उन्होंने कंधे से पल्लू हटाकर कमर में खोंस लिया।
बाल खोलकर कसकर बांधे।
फिर पूरे अधिकार के साथ बोलीं—
“लेट्स मूव।”
हम पांच-छह लोगों ने मिलकर काका को नीचे लाकर मेरी कार की पिछली सीट पर लिटाया।
एक लड़का उनका सिर गोद में लेकर बैठ गया।
मैं ड्राइविंग सीट की ओर बढ़ा तो काकू ने आंखों से ही इशारा किया—
“आराम से… तुम बगल में बैठो।”
ड्राइविंग सीट पर खुद बैठीं।
इतने आत्मविश्वास और सहजता से उन्होंने कार चलाई कि विश्वास ही नहीं होता था।
रास्ते में एक हाथ से स्टीयरिंग संभालते हुए अस्पताल फोन किया—
“स्ट्रेचर तैयार रखिए।”
फिर फैमिली डॉक्टर को फोन करके अस्पताल बुला लिया।
अस्पताल पहुंचकर कार बिल्कुल सही जगह पार्क की।
काका को तुरंत भर्ती कराया।
इलाज शुरू करवाया।
सब कुछ व्यवस्थित होने के बाद वे अस्पताल की लॉबी में हमारे पास आईं।
मेरे हाथ में कार की चाबी रखी।
स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरा।
हम दोनों के गाल थपथपाए।
हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“डॉक्टर ने कहा है कि अब चिंता की कोई बात नहीं। वे खतरे से बाहर हैं। तुम लोगों ने जो मदद की, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। अब तुम लोग घर जाओ। मैं हूं यहां।”
फिर उन्होंने कमर में खोंसा हुआ पल्लू निकालकर दोबारा दोनों कंधों पर वैसे ही लपेट लिया।
बालों की कसी हुई गांठ खोली।
उन्हें फिर उसी पुराने ढीले से पोनीटेल में बांध लिया।
उसी क्षण…
मुझे पहली बार महसूस हुआ कि चितले काकू का सहज स्वीकार किया हुआ बुढ़ापा, चितले काका की हर हाल में जवान दिखने की कोशिश से कहीं अधिक विशाल और प्रभावशाली था।
यौवन से प्रेम तो हर कोई करता है—यहां तक कि चितले काका जैसे बुजुर्ग भी।
लेकिन अपने बुढ़ापे को भी बिना किसी दिखावे, बिना किसी बनावट के इतनी गरिमा (डिग्निटी) के साथ जीना…
यह हर किसी के बस की बात नहीं।
वे मुस्कुराईं।
हमारी ओर पीठ करके धीरे-धीरे काका के कमरे की ओर चल पड़ीं।
उन्हें जाते हुए देखकर अचानक मुझे याद आया…
एक बार काका ने उनका नाम बताया था—
“सावित्री।”
सचमुच…
अपने जीवनसाथी को नया जीवन देकर…
उन्होंने अपने नाम को सार्थक कर दिया था।
और मेरी नम आंखों के सामने…
वे धीरे-धीरे धुंधली होती चली गईं।