यह उत्सव ही तो है, हमारे दिवंगत पूर्वजों के आगमन का जो देह त्याग के बाद पितृलोक के वासी हैं और पितृ पक्ष में हमारी श्रद्धा से तृप्त होने, हमारे श्राद्ध का तर्पण गृहण करने हमारे घर, अपने वंशजों के पास आते हैं। यह दिवंगत पूर्वजों से जुड़ा पर्व है, कदाचित इसीलिए जाने-अनजाने शोक और अशुभ मान लिया गया, लेकिन इससे अद्भुत,इससे शुभ कोई पर्व नहीं।
यह अपनी समूची पितृ परंपरा की वंदना का व्रत है। यह कृतज्ञता और आभार के कीर्तन का काल है। यह अदृश्य अतिथियों के आगमन का उत्सव है, जो इसी बहाने जीवन की आपाधापी में जुटे हमारे अपने कुटुंबीजनों को एक पंगत में ले आता है। यह श्रद्धा भाव से पितरों को तृप्त करने का कर्म है। इसीलिए यह श्राद्ध है क्योंकि इसमें उनके प्रति श्रद्धा है जिनसे हम हैं। यह तृप्त करने का कर्म है इसलिए तर्पण है। यह एक तरह से वृक्ष के शिखर पर गगनचुंबी पत्तों द्वारा अपनी जड़ों का अभिषेक है।
यह सोलह दिन का होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार। हिंदू पंचांग में अंग्रेजी केलेंडर सरीखे 12 मास ही हैं। लेकिन एक मास में 1 से 30 तक तिथि न होकर 1 से 15 और फिर 1 से 15 के दो पक्ष होते हैं। मास के प्रारंभ में कृष्ण पक्ष और फिर शुक्ल पक्ष। शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा अर्थात पूर्णमासी है। श्राद्ध पक्ष भाद्र मास की पूर्णिमा से शुरु होकर आश्विन मास की अमावस को समाप्त होता है। स्वभावत: हमारे परिजन इन्ही सोलह तिथियों में से किसी एक तिथि पर देह त्याग करते हैं। जिस तिथि को वे देह त्यागते हैं, उसी दिन उनके श्राद्ध का विधान है। हमारे पितृ इस पक्ष में तय तिथि पर पधारते हैं और मंगल दान कर हमें धन्य करते हैं। वे जब सशरीर होते हैं तब भी सदा हमें देते हैं, कृपा करते हैं। शास्त्र कहते हैं देह त्याग के बाद भी वे पितृलोक के वासी होकर तर्पण के बहाने हमारा शुभ करने ही पधारते हैं। वे केवल हमारी प्रसन्नता से प्रसन्न होते हैं। हमारी श्रद्धा से तृप्त होते हैं।
संसार में उनसे अधिक धनी, शक्ति संपन्न और सौभाग्यशाली कोई नहीं है, जिनके माता-पिता सशरीर हैं, साथ हैं, प्रसन्न हैं और श्रद्धा से तृप्त हो रहे हैं। सच मानिये जिसके सिर पर माता-पिता का हाथ है वह ईश्वर से भी अड़ जाए, यमराज से भी लड़ जाए तो विजय उसी की होगी, क्योंकि उसके पास माता-पिता हैं। माता-पिता घर में है तो हर दिन उत्सव है। यदि नहीं है तो श्राद्ध पक्ष महालय बनकर आता है। आपकी श्रद्धा से तृप्त माता-पिता का आशीष बाकी दिनों को उत्सव ही कर जाता है।
✍️बृहत्तर भारत को जोड़ने वाली अद्भुत परंपरा: श्राद्ध
जब मैं बृहत्तर भारत की बात करता हूँ उसमें केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश नहीं आता| उसमें आता है अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कम्बोडिया, वियतनाम से मलेशिया, इंडोनेशिया तक.. और यह सब मैं केवल कल्पना के आधार पर नहीं मानता बल्कि इसलिए मानता हूँ क्योंकि इतिहास के पन्नों के इस बृहत्तर हिन्दूराष्ट्र अखण्ड भारत की सांस्कृतिक चेतना आज तक भी पूरी तरह नहीं सोई है|
और इस सांस्कृतिक एकात्मता की एक अद्वितीय पहचान है
*“श्राद्ध”*
श्राद्ध सनातन धर्म और सनातन धर्म की शाखा, बौद्ध धर्म का भी आज तक एक अमिट अंग है| उपर बताए गये सभी देशों और जहाँ तक सनातन धर्म का प्रभाव रहा वहां आज तक पूर्वजों की तृप्ति के लिए लगभग समान रीतियों से श्राद्ध किया जाता है, जिसमें खासकर बौद्ध देशों को देखकर तो मैं बहुत ज्यादा विस्मित और गर्वित हो जाता हूँ वहीं चिंतित भी कि नवबौद्धवाद के नामपर आज हिन्दुओं के ही शूद्र वर्ग को श्राद्ध के खिलाफ भड़काया जाता है, यह उनका दुर्भाग्य है|
चीन, ताइवान : चीनी कैलेंडर के सातवें महीने के 15 दिन पितृपक्ष की भांति मनाए जाते हैं| चीन के बौद्ध और ताओ अपने पूर्वजों के लिए कुर्सियां खाली छोडकर शाकाहारी भोजन निवेदित करते हैं| ईसापूर्व 1500 के शांग साम्राज्य से ही यह परंपरा चीन में चली आ रही है| लोग अपने 7 पीढ़ी तक के पूर्वजों का स्मरण करते हैं और बौद्ध भिक्षुओं को चावल भेंट करते हैं| माना जाता है सारे पितृ नर्क, स्वर्ग से धरती पर 15 दिन को आते हैं| अंतिम दिन घोस्ट डे के रूप में मनाया जाता है, उस दिन वे अपने घरों के सामने अगरबत्ती जलाते हैं और नदियों में दीपक प्रवाहित करते हैं ताकि पितरों को विदा कर सकें| महायान
बौद्ध ग्रन्थ के उल्लंबन सूत्र के अनुसार मुद्गलयायन को बुद्ध ने उपदेश दिया था कि चावल के पिंड अर्पित करके तुम अपनी माँ को प्रेतयोनि से मुक्त करो|
इंडोनेशिया/सिंगापुर/मलेशिया/वियतनाम : यहाँ भी श्राद्ध घोस्ट फेस्टिवल के रूप में साल के सातवें महीने में मनाया जाता है और लोग बौद्ध मन्दिरों में जाकर पितरों के लिए दान करते हैं| वियतनाम में तेतत्रुंग न्गुयेन नाम के इस पर्व पर लोग पितरो के लिए पक्षियों, मछलियों और गरीबों को भोजन कराते हैं|
जापान : जापान में साल के सातवें महीने के पन्द्रहवें दिन चुगेन नाम का पर्व मनाया जाता है जिस दिन जापानी लोग पितरों को उपहार अर्पित करते थे परन्तु अब इस दिन लोग सभी वरिष्ठों को उपहार देते हैं| कुछ जापानी समुदाय बॉन पर्व मनाते हैं जिस दिन लोग अपने पितरों के निवास पर जाकर श्रद्धांजली अर्पित करते हैं|
कम्बोडिया/लाओस: पितृपर्व या पिक्म बेन नाम का पर्व कम्बोडिया में सितम्बर अक्तूबर में पड़ता है और तीन दिन की छुट्टी होती है| कम्बोडिया में मान्यता है कि राजा यम प्रेतों के लिए यम का द्वार खोल देते हैं, उनमें कुछ मुक्त हो जाते हैं कुछ वापिस नर्क आ जाते हैं| कम्बोडियाई लोग बौद्ध भिक्षुओं को भोज कराते हैं और चावल के पिण्डों का दान करते हैं| सात पीढ़ियों तक के पितरों की तृप्ति के लिए बौद्ध भिक्षु पाली के सुत्तों (हमारे संस्कृत भाषा में सूक्त) के अखण्डपाठ करते हैं|
श्रीलंका/ म्यांमार: श्रीलंका में पितृपक्ष मटकादान्य नाम से मनाया जाता है और श्राद्ध तर्पण को उल्लंबन या सेगाकी कहते हैं जिसमें चावल के पिण्ड और जल प्रेत आत्माओं के लिए अर्पित करते हैं| बाकि परंपरा कम्बोडिया जैसे होती है|
अफगानिस्तान –बुद्ध ऑफ बामियान क्षेत्र मे यहां के लोग — बुत परस्ती को न मान ने वाले ,अपने पूर्वजों के यात्रा के लिए यहां इकट्ठे होते थे..
अपना इतिहास , अपना नींव देखने समझने मे असमर्थ लोगों ने मार्च २००१ मे वहां कि मूर्ति को भ्रष्ट करना चाहा।
थाईलैंड: थाईलैंड में भी कम्बोडिया की तरह पितृपक्ष मनाया जाता है और अंतिम दिन सतथाई नाम से जाना जाता है जिसके अगले दिन से 9 दिवसीय शरद पर्व आता है| इसमें नवरात्र की तरह पूर्ण शाकाहारी रहना होता है|
जैसे हमारे यहाँ साल के सातवें महीने अश्विन में पितृपक्ष पड़ता है वैसे ही इन अधिकांश देशों में पितृपक्ष या पितृ सम्बन्धित ये पर्व साल के सातवें महीने में पड़ते हैं| और देखिये पितृपर्व सम्बन्धी ज्यादातर मान्यताएं और परम्पराएं भी लगभग समान हैं| इन देशों में अन्य पर्व भी हिन्दू त्यौहारों से समानता रखते हैं|
कौन नहीं मानेगा कि यह सब देश एक सांस्कृतिक सूत्र में जुड़े रहे हैं और वह सूत्र है *”सनातन”*| अंत में एक और बात बताता चलूँ आज चाहे इनमें से अधिकांश बौद्ध हैं पर इतिहास में यह सारे देश एक रहे हैं…
✍ फिर मिलते है…