
सबसे अधिक खेती का विकास मिथिला में हुआ, अतः वहां के शासक को जनक (उत्पादक, पिता) कहते थे। वह स्वयं भी खेती करते थे। वहां केवल खेती थी, वन नहीं था। खेती में सभी वृक्ष घास या दर्भ हैं, अतः इस क्षेत्र को दर्भङ्गा कहते हैं। भूमि से उत्पादित वस्तु सीता है, अतः जनक की पुत्री को भूमि-सुता तथा सीता कहा गया। इसका भाग लेकर इन्द्र (राजा) प्रजा का पालन तथा रक्षण करता है। इसका विस्तृत वर्णन अथर्ववेद के कृषि (३/१७) तथा दर्भ (१९/२८-३०,३२-३३) सूक्तों में है-
अथर्व (३/१७)-इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरमुत्तरां समाम्॥४॥
शुनं सुफाला वितुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनुयन्तु वाहान्।
शुनासीरा (इन्द्र) हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै॥५॥
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भवः॥८॥
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमतामरुद्भिः।
सा नः सीता पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत्पिन्वमाना॥९॥
अथर्व (१९/२८)-घर्म (घाम = धूप) इवाभि तपन्दर्भ द्विषतो नितपन्मणे।
अथर्व (१९/२८)-तीक्ष्णो राजा विषासही रक्षोहा विश्व चर्षणिः॥४॥
= राजा रक्षा तथा चर्षण (चास = खेती) करता है।
✍🏻..agey aur padhey
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव |
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ||
{अथर्वसंहिता}
अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा।
यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि॥
{ऋग्वेदसंहिता}
सीता मैया की जय
उद्भव-स्थिति-संहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् ॥
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ॥
कथा है विदेह में पानी नहीं बरसा, सीरध्वज खेत में हल चलाने लगे…..
साल में वह कौन सी ऋतु होती है जब पानी बरसता है? वर्षा ऋतु , बरसात ।
जैसे आजकल के समय में जुलाई , जुलाई में धान की रोपाई की जाती है। आषाढ से वर्षा का आरम्भ होता है और सावन भादों जमकर पानी गिरने का समय होता है।
अब आप लोग कह रहे हैं कि आज जानकी जयन्ती या सीता नवमी है । क्या यह माना जाना ठीक होगा कि जब सीता जी का प्राकट्य वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था, वह वर्षा ऋतु का काल था?
कहीं पर यह मान्यता है कि फाल्गुन माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को जानकी जी का प्राकट्य हुआ था।
जो भी माह हो फाल्गुन या वैशाख, इन मासों से वर्षा ऋतु कोसों दूर है।
इसका कारण था ऋतु विचलन और पञ्चाङ्ग शोधन, जिसपर किसी अन्य पोस्ट में विस्तार से चर्चा होगी…
✍🏻Agey aur baki he
भगवती सीता जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ
(क्या भगवती सीता हल चलाने से पैदा हुई थीं?)
एक चिन्तन!!
भगवती सीता जी के सम्बंध में लौकिक कथा बचपन से सुनी जाती है कि राजा जनक खेत मे हल चला रहे तभी उस हल के नोक के द्वारा पृथ्वी से एक कन्या उत्पन्न हुई जो सीता कहलाईं।
परन्तु यदि वाल्मीकीय रामायण में देखें तो पता चलता है कि वे जनक की पुत्री थीं।
बालकांड सर्ग25/7 की जगदीश्वरानन्द टीका देखें जिसमे कहा गया है–
योगिन्यास्तनयां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्।।
अर्थात् योगिनी के गर्भ से उत्पन्न सीता नाम से प्रसिद्ध।
सीताजी ने उर्मिला को अनुजा कहकर संबोधित किया है जिसका अर्थ है उर्मिला सीताजी से छोटी थीं,
अनुसूया जी से संवाद के समय सीताजी ने कहा— देखें-
मम चैवानुजा साध्वी उर्मिला शुभदर्शना।।
(अयोध्याकांड 118/53)
शिव पुराण में भी सीताजी की माता का नाम योगिनी ही कहा गया है और इसमें साफ तौर पर योगिनी को जनक की द्वितीय भार्या कहा गया —
धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च।
तस्या कन्या महालक्ष्मीर्नाम्ना सीता भविष्यति।।
(शिवपुराण पार्वती खण्ड 2/29)
जनक जी की दूसरी पत्नी योगिनी धन्य हैं जिसकी कन्या स्वयं महालक्ष्मी सीता नाम से प्रसिद्ध होगी
इस श्लोक से सीधे यह सिद्ध होता है कि जनक की दूसरी पत्नी योगिनी थीं और उन्ही की पुत्री सीता जी थीं।
सुंदरकांड सर्ग 20/5 के अनुसार-
कुलं संप्राप्तया पुण्यं कुले महति जातया।
सीताजी स्वयं कह रही हैं कि मैं महान कुल में उत्पन्न हुई और विवाह संस्कार के बाद पवित्र कुल में आई हूँ।
आदि कवि ने सीताजी के लिए सुजाता शब्द का प्रयोग किया है
सा सुजाता सुजातानि
अयोध्याकांड सर्ग 32/19
उत्तम कुल में जन्मी भगवती सीता।
इन सभी प्रमाणों पर यदि विचार करें तो यह सिद्ध होता है कि भगवती सीता हल के नोक से नही बल्कि जनक जी की द्वितीय भार्या योगिनी की पुत्री थीं।
अस्तु भगवत्यै सीतायै नमः
जनकात्मजायै नमः।
✍🏻Agey aur padhe
तनया प्रफुल्ल गड़करी द्वारा ‘सियाराम का जन’ से संबंध का भावभीना विवरण–
“नाना के घर आए हो, खाली हाथ कैसे जाओगे?”
ये शब्द महज़ स्नेह या लोक व्यवहार नहीं हैं! ये समाजशास्त्र या मानसशास्त्र को साधने की कला का उदाहरण भी नहीं हैं!
ये शब्द धर्म का प्राण हैं। भारत की आत्मा हैं!
आज से साढ़े पाँच वर्ष पहले सुने थे, तब से ओस की बूंदें बनकर हृदय को सींचते आए हैं… ये शब्द!
2012 की सर्दियाँ थीं। नई दिल्ली में आयोजित IBTL भारत संवाद प्रारंभ हुआ। (आदरणीय): श्रीमति निर्मला सीतारमण, डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी, श्री महेश गिरी, श्री शेषाद्रि चारी, श्रीमति मीनाक्षी लेखी इत्यादि नामों से पहले एक अपरिचित सज्जन मंच पर आए…
*रामअवतार शर्मा जी।*
साइकल से सीता-राम-लक्ष्मण के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अयोध्या से रामेश्वरम् और जनकपुर तक यात्रा कर आए थे।
उन्होंने गाथा बताई.. कैसे राह भर के वनवासी श्री राम के विषय में यूँ बात करते मानों कुछ समय पहले ही राम वहाँ से होकर गए हों!
जनकपुर के विषय में एक सुंदर घटना कही। उन्हीं के शब्दों में:
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“जनकपुर का जो मंदिर है.. उसके महंत जी के पास मैं गया। उन्होंने मुझे रिश्तेदार की तरह रखा। अनजान आदमी को! जब मैं चलने लगा, उन्होंने मुझे एक लिफाफा दिया। मैंने सोचा, बाबा ने भभूत दी होगी! फिर मैंने बेईमानी से खोलकर देखा तो उसमें 100 रुपए का नोट था !!!
मैंने पूछा: बाबा मैं तो गृहस्थ हूँ, मेरी दाल रोटी चल रही है.. आप महात्मा होकर मुझे पैसे क्यों देते हैं?
बाबा बोले- सीता को क्या मानते हो?
मैंने कहा- सीता हमारी माँ है।
तो वो बड़े गर्व से बोले-सीता मेरी बेटी है। और तुम नाना के घर आए हो, खाली हाथ जाओगे क्या? “
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मुझे याद है… यह सुनकर सबकी आँखें जगमगा उठी थीं। भावों ने अश्रुओं का रूप धर लिया था!
अक्सर बाऊ ‘जन दर्शन’ कराते हुए कहते थे… “लोक इतनी श्रद्धा और ऊर्जा कहाँ से पाता है? यह जीवट कहाँ से आता है? वह शक्ति क्या है? उस स्रोत को खोजो!”
लगा कि जैसे ‘स्रोत’ का पता मिल गया है! मैंने पलटकर बाऊ को देखा.. उनकी भी आँखें नम थीं।
यही शक्ति है जो सनातन को सनातन रखे हुए है। सुबह सकारे कॉलोनी में झाड़ू देती, कचरा उठाती काकी को यदि मेरा ” राम-राम सा। कैसे हैं ?” सुनाई ना दे तो फट से ताना मिल जाता है। उन्हें और मुझे मेरा राम जोड़ता है। सीताराम का चित्र अपने गल्ले पर लगाकर जूते सिलते बाऊजी सनातन को संबल देते हैं। सीताराम के नाम पर बड़े-बड़े धनिक श्रेष्ठी , जातरुओं की सेवा को नंगे पाँव दौड़ जाते हैं। उनमें और जातरुओं में धन, जाति, पद, परिचय का संबंध नहीं है.. पर सब सीताराम के बेटे-बेटी हैं।
आदरणीय गिरधारी लाल गोयल जी जब नमो को उलाहना देते हैं : “चार साल से पापाजी का तो मुंह तक नहीं देखा ,अब जेब खर्च के लिए नानी की गुल्लक पर निगाह गढ़ा के चल दिए ननसाल? हुँह!” तब मुझे यही सम्बन्ध सूत्र नज़र आता है। 🙂
इसका एक और उदाहरण राम अवतार जी ने दिया था। 1947 से पहले तक जनकपुर से अयोध्या प्रशासन को कुछ राशि भेजी जाती थी जो राजा जनक द्वारा अयोध्या को उपहार में दी भूमि से मिलती थी। सहस्त्राब्दियों की इस परंपरा को 47 के बाद बंद कर दिया भारत सरकार ने। दो देशों के मध्य रिश्तेदारी का मान खत्म कर दिया!
जब कम्युनिस्ट चीन उत्तर-पूर्वी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बौद्ध प्रतीकों को अस्त्र बना रहा था, हम अपने रक्त संबंध भुलाकर ‘सेक्युलर स्टेट’ होने का प्रदर्शन कर अपनों को खो रहे थे।
मध्यांतर में खोया वह सम्बन्ध सूत्र आज पुनः मिला है।
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री को संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण पूर्व व महासागरीय देशों जैसे कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर इत्यादि को जोड़ने वाले इस धागे का पता है।
जब वह नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली को ‘मेरे भाईसाहब’ कहते हैं तो सम्बंध केवल संयोग से भौगोलिक पड़ोसी होने का नहीं रह जाता, ‘नाना का घर’ और ‘बेटी का ससुराल’ वाला हो जाता है।
इसी से सनातन भारत का अस्तित्व अखंड है । बाकी विदेश मंत्रालयों के मध्य खींचातानी का क्या है,वह तो चलती रहती है। इंसानों की खींची लकीरें बनती और मिटती रहती हैं।
श्री सीताराम नाम सेतु है। जो समझ गया सो जुड़ जाएगा, जोड़ लेगा।
✍🏻Agey aur he
निमि_वंश(Nimivanshi rajputs)
माता सीता का वंश
क्षत्रिय समाज में भगवान राम के वंशजो से सभी परिचित हैं। लेकिन बहुत कम लोगो को निमि वंश के बारे में जानकारी है जिसमे माता सीता का जन्म हुआ था। निमि वंश के क्षत्रिय राजपूत आज भी बिहार राज्य के मिथिला और उसके आसपास के क्षेत्र में मिलते हैं।
गौत्र- वशिष्ठ, कश्यप, वत्स
प्रवर- वशिष्ठ, अत्रि, सांकृति
वेद- यजुर्वेद
कुलदेवी- चंडिका
नदी- कोसी
प्राचीन गद्दी- मिथिला
निमिवंश वैवस्वत मनु की एक संतान निमि के वंशज हैं। महाराजा निमि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम मिथि था। मिथि ने अपने नाम से मिथिला नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। मिथि पराक्रमी शासक होने के साथ साथ बहुत बड़े विद्वान् भी थे। इस वजह से उनकी उपाधि जनक पड़ी और उनके बाद मिथिला के सभी शासको की उपाधि जनक हो गई। मिथिला को जनकपुरी भी कहते हैँ जो अब नेपाल में पड़ता है। महाराज निमि नेपाल के भी शाशक थे। कहा जाता है इसीलिए पहले नेपाल को निमिपाल कहते थे, जो कालांतर में नेपाल हो गया।
निमि की 49वीं पीढ़ी में सीरध्वज नामक राजा हुए। मिथि के सारे वंशज जनक कहलाते हैं इसलिये सीरध्वज को भी जनक कहते हैं। इनकी दो पुत्रियां थी- सीता और उर्मिला जिनका विवाह क्रमशः भगवान राम और लक्ष्मण से हुआ था। उनके भाई का नाम कुशध्वज था जिनकी पुत्री मांडवी और श्रुति कीर्ति का विवाह क्रमशः भरत और शत्रुघ्नजी से हुआ।
निमि वंश के क्षत्रिय राजपूत आज भी बिहार प्रान्त के मिथिला प्रदेश और उसके आसपास के क्षेत्र में मिलते हैं।
निमि वंश की शाखाएँ-
निमुड़ी वंश- महाराज निमि के ज्येष्ठ पुत्र मिथि के वंशज निमि कहलाते हैं जबकि उनके छोटे भाई के वंशज निमूड़ी कहलाते हैं। इनका गोत्र कश्यप और कुलदेवी प्रभावती और नदी कोसी है। निमुड़ी वंश के क्षत्रिय भी बिहार प्रान्त में मिलते हैं।
निशान वंश- इस वंश के क्षत्रिय भी आज बिहार के मुजफ्फरपुर, गया, पटना, शाहाबाद आदि क्षेत्रो में मिलते हैँ।इनका गोत्र वत्स और कुलदेवी भगवती हैं।
संदर्भ—–1-देवीसिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 323-324