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सीता माता जी का जन्मदिन सीता नवमी

माता सीता पौराणिक कथाओं में उन सशक्त स्त्रियों में गिनी जाती हैं, जिन्होंने हर मुसीबत में न केवल अपने पति का साथ दिया बल्कि विपरीत समय में अपने चरित्र और सम्मान की रक्षा भी की। उनकी महिमा के कारण ही भगवान् राम से पहले उनका नाम लिया जाता है। जिस प्रकार भगवान् राम को कई शुभ अवसर समर्पित हैं, उसी प्रकार माता सीता को भी एक ख़ास दिन समर्पित है और उस दिन को उत्सव की तरह मनाया जाता है और वह है सीता नवमी। भगवान् राम के जन्मदिन को सभी हिन्दू रामनवमी के त्योहार के रूप में सेलिब्रेट करते हैं, उसी तरह माता सीता के जन्मदिन को सीता नवमी के तौर पर मनाया जाता है।

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 16 मई को सुबह 06 बजकर 22 मिनट से होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 17 मई को सुबह 08 बजकर 48 मिनट पर होगा। ऐसे में सीता नवमी का पर्व 16 मई को मनाया जाएगा।

 

मान्यता है कि सीता नवमी पर माता सीता की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। महिलाएं माता सीता को सहनशीलता, प्रतिव्रता और पवित्रता के प्रतीक के रूप में देखते हुए और उन्हें आदर्श मानते हुए इस दिन पति की दीर्घायु के लिए व्रत भी करती हैं। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से भी विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि इस दिन माता सीता व भगवान् राम की पूजा करने से 16 महान दानों का फल, पृथ्वी दान का फल और समस्त तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। माँ सीता की पूजा में सुहाग और शृंगार का सामान चढ़ाया जाता है। पूजा करते समय ‘ॐ श्रीसीताये नमः’ मंत्र का जाप भी किया जाता है।

सीताजी राजा जनक की पुत्री थीं, ये तो सभी जानते हैं लेकिन बेहद कम लोग ये जानते हैं कि उनकी माँ का क्या नाम था। वैसे, माता सीता ने अपने माता-पिता के कोख से जन्म नहीं किया था बल्कि प्रकट हुई थीं लेकिन इससे उनके पालन-पोषण करने वाली माता-पिता का महत्व कभी भी पौराणिक कथाओं में कम नहीं रहा बल्कि जनक की पुत्री होने के कारण उन्हें जानकी, जनकात्मजा अथवा जनकसुता भी कहते थे। मिथिला की राजकुमारी होने के कारण वो मैथिली नाम से भी प्रसिद्ध रहीं और भूमि में पाये जाने के कारण इन्हे भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है।

 

वाल्मीकि रामायण के कथा के अनुसार, एक बार महाराजा जनक के राज्य जनकपुर में भयंकर अकाल पड़ा और अकाल से मुक्ति पाने के लिए एक ऋषि ने उन्हें यज्ञ करने को कहा। राजा जनक ने स्वयं बैलों को जोत करके धरती पर हल चलाया और उसी समय उनका हल एक संदूक से टकराया। जब राजा जनक ने उसे संदूक को निकाल कर देखा, तो उसके अन्दर उन्हें शिशु रूप में एक कन्या मिली। यह माता सीता थीं।

 

माता सीता के मिलते ही मिथिला राज्य के सभी संकट दूर हो गए। राजा जन्म उस कन्या को अपनी पत्नी सुनयना के पास ले गए। सुनयना अत्यंत सीधी-सादी, धर्म परायण और उदार महिला थीं। महर्षि याज्ञवल्क्य के सलाह और विधि-विधान के बाद राजा जनक और रानी सुनयना ने माता सीता को अपनी पुत्री के रूप में गोद ले लिया और उसका भरण-पोषण करने लगे।

 

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