
को संस्कृत में व्याधिघात, नृपद्रुम, आरग्वध, कर्णिकार कहते हैं,
इसका फूल आयुर्वेद में “कफ नाशक” माना जाता है,
आयुर्वेद में इसके पञ्चाङ्ग यानी फल, फूल, छाल, जड़, काष्ठ के अनेक रोगों हेतु अनेक प्रयोग हैं …
कर्णिकार को कोई-कोई कनेर भी मानते,
भगवान श्रीकृष्ण इसे एक कान में झुमके जैसे डाल कर इतनी तेजी से घूमते कि लगता दोनों कानों में पीले- पीले सोने का बाला पहने हैं –
अहा, मेरे आत्मीय अमलतास!
कर्णिकार पुष्प की महिमा इतनी अद्भुत और अद्वितीय है कि भगवती पार्वती भी इसे अपनी अलकों में सजाकर इठलाती हैं!
उस दिन शिवजी योग समाधि से जागे थे और अरसे से उन्हें पति रूप में पाने के लिए आराधना कर रही गिरिजा नन्दिनी दो वन देवी सखियों के साथ उनका आशीर्वाद लेने पहुँची थी। अपने काव्य कुमारसम्भवम् में महाकवि कालिदास लिखते हैं उस मुहूर्त देवी ने वसन्त पुष्पों से ही शृंगार किया था। कण्ठ में केसर की माला थी और नीले केशों में सुवर्ण की कांति-सा कर्णिकार पुष्प सजाया हुआ था!
वह कर्णिकार का पुष्प ही था जो *’पर्याप्त पुष्पस्तबक से झुकी पल्लवपूर्ण संचारिणी लता-सी’* पार्वती की अलकों से खिसककर उनके ह्रदय देवता के चरणों में स्वतः निरायास समर्पित हो गया था।
विश्वास न हो तो देख लीजिए-
अर्थात पार्वती ने जब भगवान शिव को सिर झुकाकर प्रणाम किया तब उनके नील केशों से नव कर्णिकार खिसका और कान में लगा पल्लव गिर पड़ा।
सोचता हूँ फूलों से लकदक लता-सी पार्वती ने अपनी पावन देह पर इतने सारे फूल सजा रखे थे लेकिन गिरा तो केवल कर्णिकार ही!
न अशोक गिरा,
न सिंदुवार
और न ही केसर।
केश से खिसका तो बस इकलौता सुनहरा कर्णिकार!
इसलिए कि वृक्ष कुल में केवल कर्णिकार हैं जो सबसे अलग, सबसे अधिक कांतिमय हैं। तभी तो उसके वृक्ष को कञ्चनवृक्ष कहा गया हैं। लोक लाख उसे अमलतास के नाम से पुकारता हों पर उसके स्वर्ण-सम पुष्पों पर रीझे शब्द पण्डितों ने तो उसे जी खोलकर स्वर्णङ्ग, स्वर्णफल, स्वर्णवृक्ष, सुवर्णक जैसे स्वर्ण आधारित नामों से सम्मानित किया हैं।
थोड़ा इतिहास और शास्त्र का अध्ययन करेंगे या किसी ज्योतिष वास्तु जानकार से इसका उपयोग समझेंगे तो आप अपने घर,ग्राम को त्रिविध ताप से बचा पाएंगे। वास्तु 45 देवता रहस्यम् – Sshree Astro Vastu
अपने ही देश की क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों में उसे सुनारी, सोनारू, सोनाली, सोनुलू या धनबहेड़ा कहते हैं तो अंग्रेजी में उसका नाम गोल्डन ट्री या गोल्डन शॉवर हैं।
यानी एशिया से यूरोप तक, सुदूर अतीत से अद्यतन वर्तमान तक सारे आशिकों को वह ‘सोने का ही झाड़’ ही नज़र आया है। वैशाख और जेठ की गर्मी में जो तपकर निखरता हैं और श्रावण तक सोने के अजस्र झरने सरीखा अपने पीले-पीले पंच-पँखुड़िये फूलों को जन-मन से लेकर वसुंधरा के दामन पर बरसाता रहता हैं।
मानो कर्णिकार के जादू से प्रेम के दोनों ही पक्ष संयोग और वियोग न बच पाए हों। पार्वती के मस्तक से शिव के चरणों में गिर उसने उमा को महेश से मिलवाया है तो पम्पासर के तट पर रघुनाथ को दिख उन्हें जानकी की याद में डुबोया हैं।
अमलतास हैं ही ऐसा कि देखते ही मन लुट जाए! इसके फूलों का रंग पीला और इतना चमकदार होता है कि बहुत भाव में भरकर निहारो तो आँखें चौंधिया-सी जाती हैं। लगभग 20 से 40 सेमी लम्बाई वाले ये फूलों के गुच्छे इसे उस पीताभ गरिमा से गौरवान्वित करते हैं कि मन करता है ‘राजा बनना हैं तो इन स्वर्ण-सुमनों के छत्र तले विराज जाओ!
कर्णिकार के प्यारे-न्यारे नयनाभिराम फूल नारियों को परम प्रिय हैं। किंवदंती यह भी है कि नारी के निकट आने पर यह अधिक लाड़ में आकर झूम उठता हैं। मानो प्रेम के लिए लालायित, श्रृंगार के लिए उत्सुक प्रेयसियों को कृतार्थ करना चाह रहा हो!
मानो संकेत कर रहा हों कि स्वयं की पहचान खोकर ही प्रेम प्राप्त होता हैं, प्रभु मिलते हैं। इसलिए गर्मी के आते ही जब वृक्ष कुल के अधिकांश सदस्य ‘पानी माँग जाते हैं, अमलतास अपने स्वर्ण पुष्प मण्डित मुकुट को मस्तक पर सजाए ‘प्रेम-योगी’-सा वन-उपवन, गली-राह धूनी रमाए डटा दिख जाता है।
✍️अहा मेरे आत्मीय अमलतास! वाह मेरे प्रिय कर्णिकार! तुम यूँ ही खिलो कि तुम्हें देखकर हम भी प्रेम करने का सलीका सीख सकें!
प्रकृति के प्रेमी बन सके…
‘हरसिंगार’ फूलने लगे हैं. इसे देख मन मगन है. चित्त पुलकित. बांछें खिली हुई हैं (श्रीलाल जी के शब्दों में शरीर में जहां भी होती हैं). यह मदमाता, शर्मीला और नशीला फूल आधी रात चुपके से फूलता है. और फूलते ही झड़ने लगता है. जब भैरवी अपने आरोह पर होती है. आसावरी पूरे उठान पर होती है. तो इसका सौंदर्य चरम पर होता है. चिरैया बोलती है. धरती जल्दी जग जाती है. तभी हरसिंगार की टहनियां मन की गांठ की तरह खुलती हैं. और उसके फूल टहनियों के बंधन से मुक्त हो पेड़ से झड़ने लगते हैं. धरती श्वेत-सिंदूरी फूल की चादर ओढ़ लेती है. केसरिया रंग रति का और सफेद यौवन का प्रतीक है. सवेरा होते-होते हरसिंगार शांत और स्थिर हो जाता है. वातावरण उसकी भीनी गंध से उच्छ्वासित होता है.
जैसे जहाज का पंछी जहाज पर लौटता है. पखेरू शाम ढलते घोंसलों की तरफ लौटते हैं. चींटियां लौटती हैं अपने बिलों में. वैसे ही मेरा मन इस मौसम में बार-बार हरसिंगार की तरफ लौटता है. मुझे जिन फूलों से (अंग्रेजी वाले नहीं) बहुत प्यार है उसमें एक ‘पारिजात’ भी है. हरसिंगार को ही ‘पारिजात’, ‘शेफाली’, या ‘शेवली’ भी कहते हैं. ये सभी शारदीय सौंदर्य के एक ही नाम है. उनके रूप, गंध, सौंदर्य, रंग-संयोजन सब एक ही है. नाम चाहे जो बोलिए, किसी नाम से पुकारिए, रूप और गंध नहीं बदलते हैं. हरसिंगार का फूलना ही शरद के अस्तित्व का ऐलान है.
मेरे मोहल्ले में शरद के आने की मुनादी ‘हरसिंगार’ कर रहा है. नवरात्र का श्रृंगार है ‘पारिजात’. यह देवी का पसंदीदा फूल है. हरसिंगार बड़ा शर्मिला होता है. रात में चुपके से खिलता है और सुबह होने से पहले झड़ जाता है. फूलने और झड़ने की यह क्रिया कोई देख न ले, इसके लिए वह छुपता, शर्माता और लजाता है. क्योंकि यह ऋतु बहकने की है. हरसिंगार की मादक गंध मन में विचलन पैदा करती है.।
चित्त उल्लासित होता है. इसकी गंध से गहरे नींद में सोए देवता भी उठ जाते हैं. तो फिर मनई की क्या बिसात. मचलती प्रकृति. और बहकता मन शरद की मूल प्रकृति है. हरसिंगार शरद को अगोरता है. बादलों की धमाचौकड़ी रुकने का इंतजार करता है. गुलाबी ठंड में इसके सौंदर्य का पर्दा चुपके से उठता है. सूरज की किरणों का हल्का ताप भी इसके फूल बर्दाश्त नहीं कर पाते. शरद की सुबह इसकी ताजगी से लबालब होती है.
सड़क पर सुबह टहलने के मेरे आनंद को हरसिंगार के लाल डंठलवाले झड़े फूलों की चादर दोगुना करती है. पं. विद्यानिवास मिश्र कहते हैं, “शेफाली झर रही है,
ऐसे झरना ही उसका सौंदर्य है।
हरसिंगार का झरना उसके धैर्य की अंतिम सीमा है.
मन का पहला उकसान है. प्रणय वेदना की सबसे भीतरी परत है”. इस एक वाक्य में हरसिंगार से कहीं अधिक जीवन छिपा है. हम सुंदरता को प्रायः उसके खिलने में खोजते हैं, उसके झड़ने में नहीं. हमें लगता है कि जो बचा रहे वही सुंदर है, जो टिका रहे वही मूल्यवान है. लेकिन हरसिंगार इस धारणा को चुपचाप उलट देता है. उसका सौंदर्य शाख पर खिलने में जितना है, धरती पर बिखरने में भी उतना ही या उससे अधिक है. शायद इसलिए कि पूर्णता का एक अर्थ अपने को छोड़ देना भी है.
बसंत से जो रिश्ता बेला का है, हरसिंगार से वही रिश्ता शरद का है. शरद मानसून की उत्तरकथा है. बारिश प्रकृति का स्नान पर्व है. प्रकृति और निखर जाती है. कुदरत के कैनवास पर नीला, साफ, ताजा आकाश, खिलती रात, शरद यानि हरसिंगार, कमल और कुमुदिनी के खिलने का मौसम. ये फूल प्रकृति के उल्लास और आनंद की सूचना देते हैं. हरसिंगार गंदलेपन से मुक्ति का प्रतीक भी है. बारिश के बाद जैसे प्रकृति अपने चेहरे से धूल पोंछ लेती है, वैसे ही शरद में आकाश अपने भीतर की पारदर्शिता वापस पा लेता है. चीजें वही रहती हैं, लेकिन देखने की दृष्टि बदल जाती है. शरद का सौंदर्य इसी में है कि वह दुनिया को नया नहीं बनाता, बस उसकी धुंध हटा देता है.
विद्या निवास जी कहते हैं, हरसिंगार बरसात के उत्तरार्द्ध का फूल है. जब बादलों को अपना बचा-खुचा सर्वस्व लुटा देने की चिंता होती है. जब मघा और पूर्वा में झड़ी लगाने की होड़ लगती है. हरसिंगार के फूलों की झड़ी भी निशीथ के गजर के साथ ही शुरू होती है और शुरू होकर तभी थमती है जब पेड़ में एक भी वृंत नहीं रह जाता. सबेरा होते-होते हरसिंगार शांत और स्थिर हो जाता है, उसके नीचे की जमीन फूलों से फूलकर बहुत ही झीनी गंध से उच्छवासित हो उठती है. हरसिंगार चुपचाप बिना किसी साज-बाज के अपना पुष्पदान करता है, किसी चातक की पुकार की वह प्रतीक्षा नहीं करता, किसी झिल्ली की झंकार की वह याचना नहीं करता और किसी चपला के आलिंगन का वह इंतजार नहीं करता. वह देता चला जाता है… जब तक उसकी टहनियों में एक भी फूल बचा रहता है. हरसिंगार की पूरी फिलॉसफी इन्हीं चार शब्दों में है. प्रकृति में कोई चीज अपने होने की घोषणा नहीं करती. नदी बहती है, पेड़ छाया देता है, फूल गंध देता है. किसी का धन्यवाद लेने के लिए रुकता नहीं. शायद देना तभी तक दान है, जब तक उसमें पाने की प्रतीक्षा न हो.
प्राकृत भाषा के ग्रंथ *‘गाथासप्तशती’* की यह पंक्तियां भी शेफाली के मादक सौंदर्य और गंध को बताती हैं. इसमें रात का तीसरा पहर बीत जाने पर सखियां नायिका से सोने के लिए कहती हैं. तो नायिका कहती है हरसिंगार/शेफालिका की मादक सुगंध उसे सोने नहीं दे रही. उसके विरह को यह फूल और विस्तार दे रहा है. सातवाहन वंश के राजा ‘हाल’ की इन पंक्तियों का रचनाकाल पहली शती से तीसरी शती के बीच का है.
हरसिंगार का जिक्र अमरकोश में भी है-
इसके अनुसार स्वर्ग के पांच दिव्य वृक्ष हैं उनमें ‘मन्दार’, ‘पारिजात’, ‘सन्तान’, ‘कल्पवृक्ष’, और ‘हरिचन्दन’ हैं. पारिजात या हरसिंगार को देवताओं का फूल माना जाता है. ‘पारिजात’ शब्द का अर्थ है ‘स्वर्ग से अवतरित’. यह फूल रात में खिलते हैं और सूर्योदय की पहली किरण के साथ वृक्ष की शाखाओं से नीचे गिर जाते हैं, इसलिए इसे रात में खिलने वाली ‘चमेली’ भी कहते है.
हिन्दी में इस फूल को हरसिंगार या परिजात, संस्कृत में पारिजात और शेफालिका, मराठी में पारिजातक. गुजराती में हरशणगार. बंगला में शेफालिका, शिउली. तेलुगू में पारिजातमु या पगडमल्लै. तमिल में पवलमल्लिकै, मज्जपु. मलयालम में पारिजातकोय, पविझमल्लि. कन्नड़ में पारिजात. उर्दू में गुलजाफरी. अंग्रेज़ी मे नाइट जेस्मिन और लैटिन में निक्टेन्थेस आर्बर-ट्रिस्टिस कहते हैं. हरसिंगार का पेड़ सिर्फ 10 से 15 फीट ऊंचा होकर ही आपका मन मोह लेता है. इस पेड़ के फूल, पत्ते और छाल औषधि के तौर पर भी काम आते है. वैसे तो पूरे भारत में यह पेड़ पाया जाता है. पर पश्चिम बंगाल में इसे राजकीय पुष्प का दर्जा है. मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयां इसे ज्यादा प्रिय हैं. आयुर्वेद से सभी निघन्टू इसे हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक बताते है. आयुर्वेद में ‘सायटिका रोग’ की यह दवा है।
हरसिंगार का रासाय
निक संघटन भी गजब है. इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है. रंगीन पुष्प नलिका में ‘निक्टैन्थीन’ नामक रंग द्रव्य ‘ग्लूकोसाइड’ के रूप में होता है जो केसर में स्थित ‘ए-क्रोसेटिन’ जैसा होता है. बीज मज्जा से पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है. पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिल-सेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड मैनिटाल एक राल, कुछ उड़नशील तेल, विटामिन ‘सी’ और ‘ए’ पाया जाता है. यह दैवीय पौधा कई आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर है. आयुर्वेद के अनुसार पारिजात के 15 से 20 फूलों के रस का सेवन करने से हृदय संबंधित परेशानियों से राहत मिलती है. कहते हैं कि इसकी पत्तियों को पीसकर पीने से इम्युनिटी भी मजबूत होती है. हरसिंगार का पेड़ दक्षिण एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया का मूल निवासी है. यह भारत, नेपाल, बांग्लादेश, थाईलैंड और इंडोनेशिया में व्यापक रूप से उगाया जाता है. हरसिंगार उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु को पसंद करता है.
पारिजात वृक्ष की पौराणिक कथा रोचक है. हरिवंश पुराण में पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान बताई जाती है. पारिजात समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक है. यह देवताओं को मिला था. स्वर्ग में इंद्र ने इसे अपने ‘नंदनकानन’ वाटिका में रोपा. यानी यह स्वर्ग का वृक्ष है. समुद्र मंथन से निकलने के बाद पारिजात वृक्ष स्वर्ग से धरती तक कैसे पहुंचा? इसकी भी कहानी दिलचस्प है. एक बार श्रीकृष्ण अपनी ‘पटरानी’ रूक्मिणी के ‘व्रतोद्यापन-समारोह’ में रैवतक-पर्वत गये. उस उत्सव की समाप्ति पर देवर्षि नारद भी वहां आ गये. नारद जी पारिजात फूल लिये हुए थे. उन्होंने वह फूल कृष्ण को भेंट किया. कृष्ण ने उसे रूक्मिणी को दे दिया. रूक्मिणी ने उस फूल को अपने बालों में लगा लिया. इससे उनकी कान्ति और सुन्दरता द्विगुणित हो गयी. यह देख नारद उनकी प्रशंसा करते हुए यह कह गए कि इस पुष्प के कारण रूक्मिणी अपनी पटरानियों से हजार गुना सुन्दर लग रही हैं.
वहां सत्यभामा की दासियां भी खड़ी थीं. उन्होंने द्वारका लौटकर सत्यभामा को नारद का कहा बता दिया. इस बात से सत्यभामा नाराज हो कोप भवन में पहुंच गईं. जब कृष्ण सत्यभामा के महल पहुंचे तो उन्हें कोप भवन में देखकर चिंतित हुए. उन्होंने सत्यभामा के रोष का कारण जाना और उन्हें पारिजात वृक्ष लाकर देने का वचन भी दिया. कृष्ण ने इस काम के लिए नारद को याद किया. नारद आए. कृष्ण ने नारद को अपना दूत बनाकर इन्द्र के पास भेजा. ताकि देवराज कृष्ण को अपना अनुज मानकर सत्यभामा की प्रसन्नता के लिए पारिजात वृक्ष भिजवा दें.
नारद से यह प्रस्ताव सुन देवराज इन्द्र ने कृष्ण को जबाब भिजवाया कि पारिजात वृक्ष देवताओं के उपयोग की वस्तु है, उसे मानव लोक में भेज देने पर मनुष्यों को अनायास ही स्वर्ग के सुख प्राप्त होने लगेंगे. *फिर वे धर्म का त्याग कर देंगे और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए भी सत्कर्म नहीं करेंगे.* इंद्र के इस तर्क से कृष्ण सहमत नहीं हुए. उन्होंने पारिजात वृक्ष को बल पूर्वक लेने की धमकी दी. तब नारद ने दोबारा जाकर इन्द्र को समझाया. इन्द्र ने भी पारिजात न देने की ज़िद पकड़ ली. फिर कृष्ण ने अमरावती पर आक्रमण करने का एलान किया. इन्द्र देवगुरू बृहस्पति के पास पहुंचे. उनसे सलाह ली. बृहस्पति ने क्षीरसागर के तट पर पहुंचकर इन्द्र के पिता कश्यप को सारी बातें बताई. कश्यप ने इस समस्या का हल निकालने के लिए महादेव का आवाहन किया. महादेव शंकर ने युद्ध को अवश्यंभावी देखते हुए सलाह दी कि कश्यप और अदिति स्वयं जाकर युद्ध को रोकें. कृष्ण ने गरूड़ पर सवार होकर अमरावती पर आक्रमण कर दिया. इन्द्र और कृष्ण में घोर युद्ध हुआ. अन्त में अदिति और कश्यप ने पहुंचकर दोनों का समझाया और युद्ध रुकवाया. साथ ही शची से सत्यभामा को ‘पारिजात’ वृक्ष उपहार में दिलवा दिया.
जिस वक्त कृष्ण जबरन पारिजात वृक्ष को धरती पर ला रहे थे तभी कुपित देवराज इंद्र ने इस पौधे को श्राप दिया कि इस पेड़ के फूल सिर्फ रात में ही खिलेंगे और इस पेड़ पर कभी फल नहीं आएगा. पारिजात की एक पौराणिक कथा यह भी है कि जब यह वृक्ष पृथ्वी पर आया, तब कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी उसके फूल के लिए अड़ गयीं. उस समय कृष्ण ने इस वृक्ष को यह वरदान दिया कि यह पेड़ भले ही सत्यभामा के बगीचे में है, लेकिन इसके फूल रुक्मिणी के बगीचे में गिरेंगे.
एक दूसरी कथा बताती है- पाण्डवों की माता कुन्ती, शिव भक्त थीं. हर रोज शिवोपासना करती थीं. एकबार जब अर्जुन दिव्यास्त्रों तथा नृत्य एवं संगीत की शिक्षा के लिए इन्द्रलोक गए तब इन्द्र ने अर्जुन को एक पारिजात का वृक्ष माता कुन्ती के लिए दिया. ताकि वह शिवोपासना में पारिजात के दिव्य फूलों का इस्तेमाल कर सकें. इन्द्र से मिले उस वृक्ष को अर्जुन ने जिस जगह पर लगाया था उसका नाम अर्जुन की माता कुन्ती के नाम से ‘किन्तूर’ पड़ा. यह किन्तूर गांव उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में है. अर्जुन के द्वारा स्थापित वह पारिजात का वृक्ष आज भी किन्तूर गांव में है. लोग उसकी पूजा करते है.
पारिजात को *’संगीताश्रयी द्रुम’* भी कहा गया है. उसके आश्रय में सदा उत्सव और संगीत रमता था. वहां गन्धर्व राज ‘चित्ररथ’ अपने बेटे के साथ देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वाद्ययंत्र बजाते थे. इसका उल्लेख भी है कि ऊर्णायु, चित्रसेन, हाहा, हूहू, डुम्बर, तुम्बुरु तथा अन्य गन्धर्वगण छह गुणों से युक्त गीतों का गान करते थे. उर्वशी, विप्रचित्ति, हेमा, रम्भा, हेमदन्ता, घृताची और सहजन्या आदि अप्सराएँ इसी वृक्ष की छाया में अपने नृत्य व गीत कला का प्रदर्शन करती थीं .
महाकवि कालिदास भी पारिजात पर मोहित हैं. हरसिंगार के सौन्दर्य का वर्णन कालिदास से भवभूति और तुलसीदास से यश मालवीय तक कर गए हैं. कालिदास के साहित्य में जो देवतरू दर्ज है उनमें से पारिजात प्रमुख है. उनके यहां पारिजात का अर्थ- ‘समुद्र से उत्पन्न’ है. महाकवि का कहना है- “कल्पवृक्षों में सबसे सुन्दर पारिजात ही है.” कालिदास का मानना है कि इसकी “मादक सुगन्ध, चिन्ता और थकान को दूर करने वाली है.” यह वृक्ष इन्द्र पत्नी देवी सची को सदैव प्रिय है.
महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओं, छंद में पारिजात का उल्लेख नौ जगह पर किया है-
सब मानते है कि यह फूल चमत्कारी है, इसके छूने मात्र से थकान दूर हो जाती है.
इसे घर के प्रांगण में जरूर लगाना चाहिए.
योग्य ज्योतिष वास्तुकार के सुझाव से विशिष्ट दिशा में पारिजात वृक्ष का संवर्धन, विशिष्ट तिथि को पूजन करने से उस वास्तु में चित्रसेन,गंधर्वों के राजा का आशीर्वाद चिरायु काल तक रहता है।
बहुत से अंग्रेजी किताबों को ढोने वाले सज्जनों को यह बता दे कि
जिस पर चित्रसेन प्रसन्न हो जाए..वो सप्तक सिद्ध हो जाते हैं।
भारत में ऐसे एक दो संगीत के साधक है जिन्होंने इस वृक्ष का दिव्य अनुभव किया हे। इस विषय पर कभी और अवश्य लिखेंगे…Nakshatra Rahasyam – Sshree Astro Vastu
हमारे पूर्वज भले ABCD और A for Apple ,
An apple for day
keeps an doctor away
की रट नहीं लगाते थे..
पर घर में कौन से दिशा में, कौनसे तिथि में आमला का वृक्ष लगाने से, पूरा कुल खान दान रोगो से मुक्त होगा जानता था…तब हर एक घर में,गांव में नंदनवन खिलता था..सभी चिंजो की भरमार थी..
हमारा दुर्भाग्य…हम सीखना तो दूर …पूछना भूल गए..
हम कुंजी हीन हो गये
पारिजात के फूलों का खासतौर पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है. शास्त्रों में इसे अत्यंत पवित्र माना गया है.
हरसिंगार को देखकर लगता है कि शरद केवल एक ऋतु नहीं है. वह प्रकृति का वह क्षण है जब बहुत कुछ बीत जाने के बाद चीजें अपने असली रूप में दिखाई देने लगती हैं. बारिश जा चुकी है. आकाश साफ है. रात उजली है. और देहरी पर हरसिंगार के फूल बिखरे हैं. हरसिंगार लौटती हुई स्मृति का फूल है. वह बहुत देर तक टिकता नहीं. लेकिन जितनी देर रहता है, उतनी देर में शरद को पहचान दिला देता है. और फिर झड़ जाता है.
सुंदरता का काम हमेशा टिके रहना नहीं होता. कभी-कभी उसका काम केवल इतना होता है कि वह हमारे भीतर कोई गांठ खोल दे, कोई पुरानी स्मृति जगा दे और हमें याद दिला दे कि जीवन में जो सबसे मूल्यवान है, वह हमेशा हमारे हाथ में रहने के लिए नहीं आता. वेद भी कहते हैं कि पूर्णता ही परमानंद है. मनुष्य पारिजात को तब पाता है जब यह पुष्प पूर्णता को प्राप्त कर लेता है. इसकी पूर्णता इसे एक बंधन से मुक्त करती है. क्रम टूटता है. और पारिजात सबका हो जाता है. प्रकृति का, धरती का, हवाओं का, जीवों और मनुष्य का. शरद आ गया है. हरसिंगार फिर खिल रहा है. और सुबह की सड़क पर उसके झड़े हुए फूलों को देखकर लगता है… कुछ चीजें टूटकर ही पूरी होती हैं.
✍🏻आवो फिर से भारत को नंदनवन बनाये…