*हे देवराज! आप त्रिलोकी के राजा हैं, रक्षक हैं। अपनी दृष्टि नीचे कीजिए। आपके एक चरण के नीचे हमारी पूरी बस्ती उजड़ रही है। कल्पवृक्ष सबकी शरण है, तनिक अपने चरण पीछे हटा लीजिए।”*
*इंद्र ने नीचे देखा और जोर से अट्टहास कर उठे:*
*रे तुच्छ कीट! तुम धूल में रेंगने वाले कीड़े, स्वर्ग के सम्राट को मार्ग सिखाओगे? यह कल्पवृक्ष देवताओं का विलास-स्थल है। तुम्हारे जैसे लाखों जीव मेरे एक डग के नीचे नित्य मरते और जीते हैं। तुम्हारा अस्तित्व ही क्या है?इंद्र ने जानबूझकर अपना पैर और जोर से दबाया, जिससे चींटियों का बिल पूरी तरह ध्वस्त हो गया।*
*उसी क्षण उस घायल चींटी के भीतर से एक आर्तनाद निकला:*
*”हे कल्पवृक्ष! यदि तू वास्तव में धर्म और निष्पक्ष न्याय का प्रतीक है, तो जिस छाया में एक निर्बल का संहार हो, वह छाया किसी अभिमानी का सुख कभी न बन सके!चींटी का यह आर्तनाद कोई साधारण वाणी नहीं थी; वह एक मूक, असहाय जीव का सत्य-संकल्प था अगले ही पल एक भयानक घटना घटी।*
*स्वर्ण और मणियों से लदा हुआ वह कल्पवृक्ष थर-थर कांपने लगा। उसकी हरी पत्तियां झुलसने लगीं, उसके दिव्य पुष्प गंध हीन होकर राख बनने लगे, और तने से अमृत की जगह काला गाढ़ा रस रिसने लगा। देखते ही देखते कल्पवृक्ष सूखकर एक जले हुए ठूंठ जैसा हो गया उसकी छाया लुप्त हो गई और इंद्र के सिर पर स्वर्ग की तीखी, असह्य धूप पड़ने लगी।*
*कल्पवृक्ष को निर्जीव देखकर इंद्र के होश उड़ गए। कल्पवृक्ष के बिना स्वर्ग का सारा वैभव अधूरा था इंद्र भयभीत होकर सीधे भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और रोते हुए बोले:*
*पितामह! नंदन वन का कल्पवृक्ष अचानक भस्म हो गया है। क्या किसी दैत्य ने तंत्र-प्रयोग किया है या कोई भयंकर अमंगल होने वाला है?ब्रह्मा जी ने आंखे मूंदकर ध्यान लगाया और मुस्कुराकर बोले:*
*इंद्र! कोई दैत्य स्वर्ग में नहीं आया। तुमने अपने पद के मद में उस सत्ता का अपमान किया है जो परमात्मा के सबसे करीब होती है—’एक निर्बल और मूक जीव कल्पवृक्ष इच्छाएं पूरी करता है, परंतु वह वृक्ष प्रकृति का अंग है। जब तुमने उस नन्हे जीव के घर को अहंकार से रौंदा, तो कल्पवृक्ष ने तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करने से मना कर दिया इंद्र ने कांपते हुए पूछा—”प्रभु! इसका प्रायश्चित क्या है?ब्रह्मा जी ने कहा:स्वर्ग का सिंहासन छोड़ो, अपने मुकुट और आभूषण उतारो, और उसी मिट्टी में बैठकर नंगे हाथों से उन चींटियों का नया घर बनाओ। जब तक वे तुम्हें क्षमा नहीं करेंगी, कल्पवृक्ष में एक भी हरी पत्ती नहीं फूटेगी।*
*देवराज इंद्र लज्जित होकर नंदन वन लौटे। उन्होंने अपने राजसी वस्त्र त्यागे, घुटनों के बल मिट्टी में बैठे, और मीठे कण तथा अक्षत लेकर उन चींटियों के बिल के पास रखे इंद्र ने हाथ जोड़कर उस धूल में रेंगने वाले जीवों से क्षमा मांगी:*
_*हे नन्हे प्राणियों! मुझे क्षमा करो। सत्ता ने मुझे अंधा कर दिया था। आज मुझे बोध हुआ कि जीवन की सांस हर जीव में एक समान ही धड़कती है चींटियों ने वह अन्न स्वीकार किया और धीरे-धीरे अपने नए बिल में जाने लगीं जैसे ही अंतिम चींटी ने इंद्र के दिए अन्न का कण उठाया, उस सूखे हुए कल्पवृक्ष में अचानक हरियाली की लहर दौड़ गई। मणियों जैसे फूल पुनः खिल उठे और शीतल, सुगंधित हवा पूरे नंदन वन में बहने लगी।*_
सार:
*दुर्बल को न सताइए,*
*जाकी मोटी हाय।*
*मुई खाल की स्वांस सो,*
*सार भस्म है जाय।।*