
साधारण लक्ष्मी-पूजन से बहुत ऊपर है अघोर गजलक्ष्मी अनुष्ठान।
यह कोमल-सौम्य माँ की उपासना नहीं, बल्कि प्रचंड भैरवी स्वरूपा गजलक्ष्मी की उग्र साधना है। अघोर परंपरा में धन को केवल नोटों का पुलिंदा नहीं माना जाता; धन ऊर्जा है, शक्ति है, सत्ता है। और यह ऊर्जा वहीं प्रवाहित होती है जहाँ साहस है, जहाँ अधिकार की चेतना है, जहाँ निर्णय लेने की प्रचंडता है।
इस अनुष्ठान का लक्ष्य केवल घर में धन लाना नहीं है।
लक्ष्य है साधक को ऐसा व्यक्तित्व प्रदान करना कि जहाँ कदम पड़े, वहाँ सम्मान झुके। उसकी वाणी में वज्र हो, उसकी उपस्थिति में तेज हो, उसकी दृष्टि में आज्ञा हो।
गजलक्ष्मी के दोनों ओर खड़े हाथी कोई सजावटी प्रतीक नहीं हैं। वे शक्ति के द्वारपाल हैं। उनके घड़े से जल नहीं, ऐश्वर्य, सिद्धि और अनुकम्पा का अमृत बरसता है। अघोर साधक जानता है – यदि देवी की कृपा केवल मुद्रा बनकर आए तो वह सीमित है, पर यदि वह ऊर्जा बनकर आए तो पूरा जीवन बदल जाता है। परिस्थितियाँ साधक के इशारे पर नाचने लगती हैं। भाग्य का पहिया उसके पक्ष में घूमने लगता है।
जो व्यक्ति वर्षों से संघर्ष, परिश्रम, दुर्भाग्य और शत्रुओं के जाल में फँसा हो,
जिसके पास धन आता हो पर टिकता न हो,
जिसे अवसर दिखते हों पर फल न मिलता हो,
जिसका भाग्य बार-बार टूटता हो,
उसके लिए अघोर गजलक्ष्मी अनुष्ठान नया जन्म है।
इस साधना से छिपे हुए दरवाजे खुलते हैं, अटके कार्य स्वतः सिद्ध होते हैं, शत्रु स्वयं पीछे हटते हैं, और समाज अनायास ही साधक को स्वीकार करने लगता है। यही है “लक्ष्मी-तेज” – वह प्रचंड ऊर्जा जो सोच को स्पष्ट, व्यवहार को प्रभावशाली और निर्णय को अचूक बना देती है।
अघोर साधक देवी को भय से नहीं, सम्पूर्ण समर्पण से प्राप्त करता है। वह अपने भीतर का सारा डर, सारी दुर्बलता, सारे अवरोध अग्नि में होम देता है और प्रचंड आत्मशक्ति को जन्म देता है।
कई साधक यह अनुष्ठान केवल स्वयं के लिए नहीं, अपितु कुल, घराने और आने वाली पीढ़ियों की उन्नति के लिए करते हैं। जहाँ अघोर गजलक्ष्मी का आवाहन होता है, वहाँ नेगेटिविटी, अभिशाप, दरिद्रता और शत्रुता टिक नहीं पाती। धन आता है, अवसर आता है, पर उससे कहीं अधिक “शक्ति” आती है।
अनुष्ठान का मूल मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै भैरवी नमः
जप : १०८ बार (या अधिक माला)
समय : रात्रि में पूर्ण मौन के साथ
सामग्री : शुद्ध घी का दीप, गजलक्ष्मी यंत्र, काले आसन पर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके करें।
बिना गुरू आज्ञा नहीं करें।