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नाग देवता का रहस्यमयी मन्नारसला श्रीनागराज मंदिर

मैं नागों में अनंत (शेष नाग) हूं।श्रीकृष्ण
 

भारत में नाग देवता की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। नाग नाम की एक प्राचीन प्रजाती हुआ करती थी जिसके वंशज आज भी भारत में विद्यमान है। एक समय था जबकि धरती पर आधे मानव और आधे पशु के समान लोग रहते थे। पुराणों में सर्पमानव के होने का उल्लेख मिलता है। जिस तरह सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और अग्निवंशी माने गए हैं उसी तरह नागवंशियों की भी प्राचीन परंपरा रही है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे। विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था। कुछ विद्वान मानते हैं कि शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी। अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को ‘नागभाषा’ कहते हैं। 

3000 ईसा पूर्व आर्य काल में भारत में नागवंशियों के कबीले रहा करते थे, जो सर्प की पूजा करते थे। उनके देवता सर्प थे। पुराणों अनुसार कैस्पियन सागर से लेकर कश्मीर तक ऋषि कश्यप के कुल के लोगों का राज फैला हुआ था। कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें आठ पुत्र मिले जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं- 1. अनंत (शेष), 2. वासुकी, 3. तक्षक, 4. कर्कोटक, 5. पद्म, 6. महापद्म, 7. शंख और 8. कुलिक। कश्मीर का अनंतनाग इलाका अनंतनाग समुदायों का गढ़ था उसी तरह कश्मीर के बहुत सारे अन्य इलाके भी दूसरे पुत्रों के अधीन थे।

 

नाग वंशावलियों में ‘शेष नाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेष नाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था। उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।

 

अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। नागों का पृथक नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असम, नागालैंड, मणिपुर, केरल और आंध्रप्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है।

 

भारत में उपरोक्त आठों के कुल का ही क्रमश: विस्तार हुआ जिनमें निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।

 

नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स। नाग पूजा संबंधित देशभर में कई प्राचीनकालीन मंदिर विद्यमान है। उज्जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर के उपर नागराज का एक मंदिर है जो प्रतिवर्ष नागपंचमी के दिन ही खुलता है। इसी तरह का एक रहस्यमयी मंदिर है मन्नारसला मंदिर (Mannarasala Temple)।

 

 

मन्नारसला श्रीनागराज मंदिर केरल के अलप्पुझा जिले के हरीपद गांव में स्थित है। मन्नारसला मंदिर के रास्ते और पेड़ों पर लगभग 30,000 से अधिक सांपों के चित्र बनाए गए हैं। 16 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह मंदिर हरे-भरे घने जंगलों से घिरा हुआ है। नागराज को समर्पित इस मंदिर में नागराज तथा उनकी जीवन संगिनी नागयक्षी देवी की प्रतिमा स्थित है।

इस मंदिर में उरुली कमजाहथाल (Uruli Kamazhthal) नामक विशेष पूजा की जाती है जो बच्चे की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए फलदायी मानी जाती है। एक कथा के अनुसार, नागराज की पूजा का का संबंध भगवान परशुराम से है जिन्हें केरल का निर्माता माना जाता है। मन्नारसला मंदिर का यह इतिहास ‘मंडरा सलोद्यम’ (Mandara Salodyam) नामक एक संस्कृत कविता में लिखा गया है। इस कविता के लेखक मन्नरसला एम.जी नारायणन हैं।

 

कहा जाता है कि पुराणों में वर्णित प्रसिद्ध नाग शेष, तक्षक और कर्कोटक ने इस स्थान पर भगवान् शिव की तपस्या की थी। इस मंदिर में शिव की पूजा नागेश्वर के रूप में की जाती है। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने दर्शन दिए और इन सर्पों की इच्छा पूरी की। इस मंदिर के पास राहू का भी स्थान है। राहू को सर्पों का देवता माना जाता है।

 

इस मंदिर के बारे में कथा प्रचलित है कि जब परशुराम हैययवंशियों की हत्या करने के पाप से छुटकारा पाना चाहते थे तो वे केरल में एक स्थान पर गए जहां की इस भूमि को उन्होंने दान कर दिया। इस बात से प्रसन्न होकर नागराजा ने परशुराम की इच्छा पर इसी स्थान पर निवास करने का निर्णय लिया।  

भुजंग नाग मंदिर भुज : गुजरात के भुज नामक क्षेत्र में भुजंग नामक एक नाग मंदिर है। कच्छ जिले के एक गांव में भुज्या नामक पहाड़ पर एक नाग मंदिर है। इस नाग मंदिर में भुजंग नामक नाग देवता की पूजा की जाती है। भुजंग के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम भुज पड़ा है।

अनंतनाग (कश्मीर) : जैसा कि नाम से पता चलता है कि इस जगह का नाग से जरूर कोई विशेष संबंध है। इस जगह का नाम भी अनंतनाग सांपों की वजह से ही पड़ा है। कथाओं के अनुसार जब भगवन शिव पार्वती से मिलने के लिए अमरनाथ की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो इस स्थान पर शिव ने अपने शरीर से सभी नाग उतार दिए थे। शिव के शरीर से उतरे नाग इस स्थान पर ही रहने लगे और यह क्षेत्र नागों का गढ़ बन गया था। शेषनाग को ही अनंतनाग कहते हैं। शेषनाग भगवान विष्णु की शैया बने हुए हैं तो वासुकी शिव के गले में लिपटे हुए हैं।

 

नागचंद्रेश्वर में मंदिर (उज्जैन) : मध्यप्रदेश के उज्जैन में भगवान महाकाल के मंदिर में सबसे उपर का मंदिर नाग महाराज को समर्पित है। यह वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही खुलता है। यह भी प्राचीन मंदिर है। 11वीं शताब्दी के इस मंदिर में शिव पार्वती नाग पर आसीन परमारकालीन सुन्दर प्रतिमा है और छत्र के रूप में नाग का फन फैला हुआ है।

 

वासुकि नाग मंदिर (डोडा जम्मू: यह भद्रेवाह का सबसे पुराना मंदिर है जो 11वीं सदी में बना था। हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार, वासुकि नागों के राजा हुआ करते थे जिनके माथे पर नागमणि लगी थी। मंदिर में वासुकि भगवान की मूर्ति लगी हुई है जो एक बड़े से पत्‍थर से बनाई गई है। कैलाश यात्रा से पहले यहां विशेष पूजा को करने का प्रावधान है।

 

नाग मंदिर : नाग (कोबरा) मंदिर कश्मीर के पटनीटॉप का एक प्रमुख देखने योग्य स्थान है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है तथा सभी ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। एक विश्वास के अनुसार इस मंदिर में यात्री केवल दिन में ही प्रवेश कर सकते हैं। यह स्थान हमेशा कोहरे में डूबा रहता है और एक मात्र 10 फीट की दूरी तक ही देखा जा सकता है।

 

मनसा देवी : मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। इनके पति जगत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है, प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है। पुराणों अनुसार यह ऋषि कश्यप की पुत्री थीं। यह मूलत: आदिवासियों की देवी हैं। कहते हैं कि इनके सात नामों के जाप से सर्प का भय नहीं रहता। ये नाम इस प्रकार है जरत्कारू, जगतगौरी, मनसा, सियोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जगतकारुप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी।

 

तक्षक नाग मंदिर (खरगोन) : मध्यप्रदेष के निमाड़ांचल के खरगोन में एक पौराणिक मंदिर है। तक्षक नाग का यह मंदिर देश में एकमात्र होकर पौराणिक व धार्मिक महत्व भी रखता है। खंडवा रोड पर स्थित ग्राम बिलाली से कुछ ही दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत दसनावल में यह अतिप्राचीन मंदिर है। 

 

जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर दसनावल में आज भी वट वृक्ष मौजूद है जिसके साथ मान्यता जुड़ी है। यहां के पुजारी अनुसार यही वह स्थल है जहां तक्षक नाग ने धनवंतरी को डसा था। नाग ने यह उस चमत्कार के बाद किया जब यहां मौजूद एक वृक्ष को फूंफकार कर सुखा दिया गया था। इस सूखे पेड़ को ऋषि धनवंतरी ने पुनः हरा भरा कर दिया था। तक्षक नाग को आशंका थी कि वे राजा परीक्षित को पुनः जीवित कर सकते हैं। इस दौरान उनकी दो शिष्या सगुरा व भगुरा को भी भ्रम में रखकर तीर्थजल नहीं लाने दिया। तत्पश्चात तक्षक नाग ने न केवल परीक्षित को डसा बल्कि सात दिनों बाद उनकी मृत्यु हुई थी।

 

उल्लेखनीय है कि शमिक ऋषि पर तपस्या के दौरान राजा परीक्षित ने उनके गले में मृत सर्प डाल दिया था। इस कृत्य से क्रोधित शमिक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि उन्हें सातवें दिन तक्षक नाग डसेगा।

 

हिमाचल के नाग मंदिरजम्मू-कश्मीर के बाद हिमाचल में कई नाग मंदिर है। वासुकि नाग का एक मंदिर कांगड़ा में मैकलोड गंज के पास है। चंबा क्षेत्र में भी कई नाग मंदिर हैं। इन नाग मंदिरों में प्रमुख है जम्मू नाग मंदिर। चंबा से 14 किलोमीटर दूर झुमार में चंबा के नाग मंदिरों की श्रंखला में जम्मू नाग का मंदिर स्थित है। जम्मू नाग खज्जिनाग के बड़े भाई बताए जाते हैं। वे चार भाइयों में दूसरे नंबर पर आते हैं। जम्मू नाग मंदिर 7000 फीट यानी 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

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