Sshree Astro Vastu

लगभग 300 वर्ष पहले समृद्धि का पैमाना गाय हुआ करती थी।

एक जोड़ी बैल, छह तोला सोने में आती थी, आप कल्पना कर सकते हैं।

बैल, घोड़ा, ऊंट के मूल्य में बहुत कम अंतर था।

तब सुथार एक गिन्नी में बैलगाड़ी  बनाते थे। सबकुछ शिल्प आधारित था।

कुम्हार, चर्मकार, नापित, घसियारा, पानी लाने वाला, पशु चराने वाला, पशुओं के उपकरण, बधियाकरण, प्रशिक्षण, जैसे अनेक कार्य थे।

उदाहरण के लिए एक कुम्हार को लगभग 100 घरों के लिए वर्ष पर्यंत बर्तन सप्लाई के बदले वर्ष में दो बार एक-एक चांदी का सिक्का मिलता था। यानि 200 तोला चाँदी प्रतिवर्ष, साथ ही अन्न फ्री, सुरक्षा फ्री, मिट्टी पानी अपनी मर्जी से और अपने धंधे का स्वामी।

सोना, चांदी, घी और अन्न से विनिमय होता था। सौ सेर तिल्ली के तेल के बदले 50 सेर घी।

फल फूल तो लगभग मुफ्त थे, सूखे मेवे, मसाले, नारियल और पंसारी का सामान हाट में बिकता था।

विगत 200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।

कहीं कहीं अब भी उसके अवशेष विद्यमान हैं, *धर्मपाल साहित्य* का अध्ययन कर वस्तुस्थिति जान सकते हैं। मेरी जानकारी का स्रोत भी धर्मपाल जी का साहित्य ही है, यह दस खण्डों में प्रकाशित है, आप पढ़ सकते हैं।

 

गड़बड़ हुई अंग्रेजों के हस्तक्षेप से, उदाहरण के लिए नील की जबरन खेती से अन्न का कृत्रिम अभाव या ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट देने अथवा विदर्भ के इस्पात कारखानों को बंद करने के एवज में घर बैठे धन देना, जैसी क्रूर कुटिल बातों से यह सारा अर्थतन्त्र जो अन्योन्याश्रित और सुदृढ़ था, नष्ट हो गया। भुखमरी, विद्वेष, रोजगार का संकट और जातीय विभेद भी बढ़ा,  और भारतीय समाज अत्यंत दीन हीन स्थिति को पहुँच गया।

*प्रेमचंद के भारत में जिस अभागे भारत का वर्णन है, वह मरणासन्न भारतीय अर्थव्यवस्था का शोकगीत है।* बिल्कुल लुटा पिटा, भूखा नंगा, हालांकि नेहरू परिवार तब भी सोने के बटन से सज्जित अचकन पहन कर अधिवेशन से एक दिन पहले होने वाले जुलूस में बग्घी पर सवार होकर ही शामिल होता था!!

भूखा नँगा भारत, हमें मिला 1947 में, तबतक सबकुछ तबाह हो गया था केवल ऊपरी वर्ग में हुंडी और सेहनाणी परम्परा विद्यमान थी, शिल्प आधारित समस्त औद्योगिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी, जिसमें वामपंथी तिकड़म की फसल की अपार सम्भावना थी और यही छल हम आज तक भुगत रहे हैं।

*आधुनिक तकनीक के सहारे #हिन्दू_अर्थतन्त्र की पुनर्स्थापना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।*

 

 अभी त्यौहार शुरू हैं।

पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है। शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।

एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे, *ढूंढिए कि आज वे किस स्थिति में है?*

 और धनतेरस तक, किसी को कोई रियायत नहीं। इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।

विचार कीजिए! हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।

✍🏻 आगे और है

 

कुछ साल पहले तक बंगाल और उत्तर भारत में

*पटनिया मिर्च* की धूम थी।

पटनिया यानि पटना मण्डी

जहां बिहार भर के किसानों का माल बिकता था।

काफी धन कमाते थे तब बिहार के किसान।

आज गुंटूर मिर्च में राज कर रहा है

पटनिया मिर्च लापता सा हो चुका है।

किसने किया बरबाद इनको ?

कौन सा वाद जिम्मेदार है इसके लिए ?

पटनिया मिर्च के बीजों का वजूद भी बचा है,  या नहीं

पता नहीं ?

बिहार के मित्र रौशनी डालें इस पर।

महाज्ञानी दलित चिंतक भी समझ दे सकते हेँ ।

 

वह भी एक दौर था जब बिहार के सीवान की काली *मिटटी के बर्तन रोम साम्राज्य में इतराते थे।* रोम के सम्राट और रानियां बावले थे

सीवान की काली मिट्टी के बर्तनों के!

वह दौर चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य का युग था।

बीच में सिवान एक दुर्नाम बाहुबली के लिए जाना जाता था।

“सन 1852 अल्बर्ट पेकाक की लिखी किताब *”मगध इन ग्रीस”* से मिली जानकारी।

*आप मित्रों का सहयोग चाहिए।*

शायद बिहार निवासी भी अपनी इस वैश्विक हड़क से अभी तक अनजान हों ?

*बाकि भारत की बात क्या करूँ ?*

.

उत्तर प्रदेश और …

बिहार का किसान..

इनमें एक विशेषता है..

.क्या  ?

.

बिहार और यूपी के किसान…

कर्जा लेकर खेती नहीं करते

और ज्यादातर किसानों के पास..

गाय और भैंस है…

बहुतायत कम में सँतुष्ट

और आड़े वक्त में

गाय और भैंस सँकट से…

उबार लेती है..

दूध से ..

गोबर से…

.

शहरी लोगो को मजाक लगै मैरी बात..

पर जो गाँवों जानते है..

समझेंगे मेरी बात

फिर भी कुछ लोग गोबर, गोमूत्र का उपहास कर रहे हे

 

स्वर्णिम_भारत_का_एक_दृश्य :

 

तेवेर्निर बंजारा समुदाय का वर्णन 350 साल पूर्व वर्णन किया है ।

350 साल पूर्व उसने यातायात के लिए बंजारों का वर्णन किया है जो चार तरह के होते थे जो सिर्फ एक ही वस्तु का ट्रांसपोर्ट एक स्थान से दूसरे स्थान पर करते थे, और जीवन भर सिर्फ यही व्यवसाय करते थे। इन चार वस्तुओं में ज्वार बाजरा मक्का , चावल, दलहन, और नमक को देश के अंदर और बाहर भेजने के लिए करते थे ।

एक कारवां में 10,000 से 12,000 तक बैलगाड़ियां होते थे। उनके नायकों को राजकुमार कहा जाता था जो गले में मोतियों की माला पहनते थे ।

इन बैलगाड़ियों का कारवाँ गुजरता था तो तेवेर्निर जैसे यात्रियों को कभी कभी रास्ता में पास पाने हेतु 2-2 या 3-3 दिन का इंतजार करना होता था।

कभी कभी इन कारवां के नायकों में , किसका कारवां पहले गुजरेगा , इस बात को लेकर खुनी जंग भी हो जाती थी । ऐसी स्थिति में इन नायकों को मोघल बादशाह व्यापर के सुचारु रूप से चलाने हेतु अपने पास मिलने हेतु बुलाता था और दोनों को समझाकर और भविष्य में झगड़ा न करने का आश्वासन लेकर उनको एक एक लाख रूपये और मोतियों की माला देकर विदा करता था

व्यक्तिगत रूप से बैलगाड़ी के लिए उसको 600 रुपये उस समय देने पड़े 60 दिन की यात्रा के लिए।

 

अनुवादक ने बताया कि इनको अब भी देखा जा सकता है लेकिन रेलवे ने इनको इस कार्य से कार्यमुक्त कर बेरोजगार कर चुका है।

Ref: Travels in India : Tevernier; P. 40-41 Volume-l

 

1442 AD मे मध्यकालीन भारत का वैभव और समाज का वर्णन एक अरेबिक यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत से

 

मध्यकालीन भारत का वैभव और समाज का वर्णन एक अरेबिक यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत से

अब इसी पुस्तक से एक अन्य यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत के बारे में ।

( पेज 107 ऑफ़ 254)

साल 845 ( 1442 AD) , इस यात्रा वृत्तांत का लेखक Abd-er- razzak , Ishak का पुत्र सार्वभौमिक नरेश के आदेश के पालन हेतु Omurz प्रान्त से समुद्र तट की ओर चल देता है ।

अंततः 18 दिनों की यात्रा के उपरांत , वहां के राजा और शासक की मदद से हमारी नौका कालीकट में जा खड़ी हुई ।अब इस विनम्र दास इस देश के वैभव और परम्पर और संस्कृति की चर्चा सुनें।

कालीकट एक सुरक्षित बंदरगाह है जहा Omurz की तरह हर देश और शहर से व्यापारी अपना सामान ले आते हैं ।यहाँ पर मूल्यवान वस्तुओं का भंडार है जो कि Abyssinia Zirbad (दक्कन) Zanguebar से आते हैं। समय समय पर अल्लाह के घर (मक्का) से जहाज आते रहते हैं ।इस कस्बे में काफ़िर (infidels) रहते हैं।जोकि इस hostile समुद्री तट के किनारे बसे हुए हैं।

यहाँ पर्याप्त मात्रा में मुसलमान भी रहते हैं जिन्होंने यहाँ दो मस्जिद बना रखी है और जिसमे हर शुक्रवार को वो नमाज पढ़ने जाते हैं । यहाँ एक क़ाजी है जो Schfei समुदाय का है।

इस कसबे में सुरक्षा और न्याय इस तरह से स्थापित है कि अन्य देशो से सबसे धनी व्यापारी जब समुद्री मार्ग से अपना सामान ले आते है तो जहाज से सामान उतरवाकर सीधे बिना किसी हिचकिचाहट के सामन सीधे बाजार में भेज देते है ; यहाँ तक कि उसका हिसाब किताब रखने की या उस पर निगाह रखने की आवाश्याकता भी महसूस नहीं करते। कस्टम हाउस के अधिकारी स्वयं इन समानो की देख रेख का इंतजाम करते हैं जो इन पर 24 घण्टे निगाह रखते हैं।जब सामन बिक जाता है तो सामान की कीमत 1/40 वां One fortieth हिस्सा ड्यूटी के रूप में देना पड़ता है।जो सामान नहीं बिकता उस पर कोई टैक्स नहीं लगता।

( N । B । याद रखें कि उस समयकाल में कालीकट में हिन्दू राजाओ का राज्य था।अब दूसरे बंदरगाहों का क्या हाल था ?)

दूसरे बंदरगाहों में अजीब सी रिवायत है।जैसे ही कोई जहाज दुर्योग से हवा की रुख के कारन वहां पहुचता है , वहां के निवासी उसको लूट लेते हैं।लेकिन कालीकट में ऐसा नहीं है , हर जहाज चाहे वो जहाँ से भी आई हो और कही भी उतरती हो , जब भी बंदरगाह पर लगती है तो उससे एक सा ही व्योहार किया जाता है , और किसी को कोई समस्या नहीं होती।

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इस देश के काले लोग सर्वथा नंगे रहते हैं, मात्र शरीर के मध्यभाग में एक कपड़ा लपेटे रहते हैं जिसको लंगोटा (Lankautah) कहते हैं जो नाभि से घुटने तक लटकता है।उनके एक हाँथ में भारतीय तलवार (Poignard) होती है जो एक पानी की बूँद की तरह चमकदार होती है; और दूसरे हाँथ में एक ढाल (Buckler of oxide) होती है ।ये परंपरा राजा से लेकर रंक तक सब के लिए एक सामान है। This custom is common to the king and beggar.

जहाँ तक मुसलमानों की बात है वे अरबों की तरह  (Apparel ) और हर बात में बैभव (Luxury) का प्रदर्शन करते हैं।

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कुछ समय अवधि के बाद जब मेरे पास पर्याप्त काफिरों और मुसलमानों को देखने का अनुभव हो गया , और पर्याप्त सुविधा से मेरे आवास की व्यवस्था हो गयी और तीन दिनों के उपरांत राजा से मिलने का अवसर प्राप्त हुवा तो मैंने बाकी ऊपर वर्णित हिंदुओं की वेश – भूसा वाले नंगे बदन के जिस व्यक्ति को देखा उसे समरी ‘(Sameri) के राजा ‘ के नाम से जाना जाता था।जब इसकी मृत्यु होगी तो इसके बहन के लड़कों को इसका उत्तराधिकार मिलेगा ; न कि इसके बेटों या भाइयों को या अन्य किसी रिष्तेदार को उत्तराधिकार मिलेगा। ताकत के दम पर ( जोर जबरदस्ती ) कोई सिंहासनारूढ़ नहीं हो सकता।

यहाँ काफ़िर काफी गुटों में बंटे हुए है जैसे Bramins (ब्राम्हण) Djogis (जोगी) व अन्य। यद्यपि सारे लोग बहुदेवबाद और मूर्तिपूजा के मूलभूत सिद्धांतों से सहमत हैं लेकिन सब समुदायों के अपने विशेष रीति रिवाज हैं।

(Forbes की हिंदुस्तानी डिक्शनरी के अनुसार Djoghis हिन्दू Ascetics ( संत) हैं : ये हिन्दूओं की एक जाति है जो मुख्यतः बुनकर हैं ) 

नोट — इस तर्क पर कबीर को समझें। उनका समयकाल भी लगभग इसी के आस पास का है ।

जब मैं राजकुमार से मिलने गया तो पूरा हाल दो या तीन हजार हिन्दुओ से भरा हुवा था , जिनकी वेश भूषा ठीक वैसे ही थी जिसका पूर्व में जिक्र किया जा चूका है ; मुस्लमाओं के भी प्रमुख लोग वहां थे।

अब्देररज्जाक को जब विजयनगर के राजा का आमन्त्रण मिलता है तो , वो बतलाता है कि यद्यपि सामरी (कालीकट का राजा ) जिसके राज्य में कालीकट जैसे 300 बंदरगाह थे और जिसके राज्य का पूरा चक्कर लगाने में 3 महीना गुजर जाय विजयनगर के राजा के अधीन नहीं था लेकिन वो उनका बहुत सम्मान करता था और उनके डर ( सम्मान होना चाहिए क्योंकि एक अरब सिर्फ ताकत की जुबां ही जानता है ) से खड़ा हो जाता है।

कालीकट से जहाज लगातार मक्का जाते रहते हैं जिसमे मुख्यतः काली मिर्च भरा होता था।

कालीकट के निवासी बहुत साहसी सामुद्रिक नाविक हैं जिनको Techini – betechegan (चीनी के पुत्र ) के नाम से जाना जाता है और समुद्री लुटेरों की हिम्मत इनके जहाजों पर आक्रमण करने की नहीं पडती है।

इस बंदरगाह पर हर इच्छित चीज उपलब्ध है । सिर्फ एक ही चीज की मनाही है और वह है गोबध और उसका मांस भक्षण : यदि ऐसे किसी व्यक्ति का पता चल जाय कि किसी ने गाय का वध किया है या उसका मांस खाया है तो उसको तुरंत मृत्यदंड दी जाती है। यहाँ पर गायों का इतना सम्मान है कि लोग गाय के सूखे गोबर का तिलक लगातेहैं । पेज -123

इसके बाद जब रज्जाक बेलूर (Belour) पहुँचता है तो उसका भी वर्णन करता है –” यहाँ के घर पैलेस की तरह विशाल हैं और यहाँ की औरतों ने मुझे हूरों की खूबसूरती की याद दिला दी । अगर मैं इन भवनों के बारे में वर्णन करूँगा तो लोग मुझ पर अतिशयोक्ति का आरोप लगाएंगे। लेकिन एक सामान्य खाका खींचना उचित होगा । कस्बे के मध्य में एक 10 घेज़ (Ghez) का खुला मैदान है जिसकी तुलना जन्नत के बाग़ से की जा सकती है। पेज – 126

इस कसबे में दो तीन दिन बिताकर अप्रैल के अंत में हम विजयनगर शहर पहुँचते है।राजा अपने अनुचरों को हम लोगों से मिलने के लिए भेजता है और हमारे निवास की खूबसूरत व्यवस्था करता है।

अब्दुर्रज़्ज़ाक ने विजयनगर का भी वर्णन किया है।उसने एक विशाल जनसंख्या वाली जगह देखी जिसका राजा महान और विशाल राज्य का स्वामी था जो सेरेंडिब से kalbergah तक फैला हुवा था। बंगाल के सीमान्त से मालाबार तक एक हजार Parasang ( ये दुरी की पर्शियन इकाई है जसका अर्थ 3.5 मील या 5.6 किलोमीटर होता है ) से ज्यादा विशाल साम्राज्य है

इसकी जमीन उपजाऊ है और ये उत्तम कृषि वाला देश है , जिसके अंतर्गत लगभग 300 बंदरगाह हैं। यहाँ 1000 से ज्यादा विशालकाय हांथी हैं जो दैत्य जैसे भयानक और पहाड़ जैसे विशालकाय हैं।यहाँ की सेना में 11 लाख सैनिक हैं । पेज – 127

पूरे हिंदुस्तान में राय (राजाओं) का एकाधिकार है । इस देश के राजा क़ी टाइटल भी राय है ।इसके बाद दूसरा नंबर ब्राम्हणो का है जो सामाजिक रूप से बाकियो से श्रेष्ठ माने जाते हैं ।

kalilah और dimna (कालिदास और वेद ??) की पुस्तकें , विद्वता के साहित्य की उत्क्रिस्ट कृतिया हैं जो पर्शियन भाषा में भी उपलब्ध है।

विजयनगर एक ऐसा शहर है जिसकी बराबरी विश्व में कोई भी नहीं कर सकता है और ऐसा शहर न लोगों ने न अपनी आँखों से देखा होगा न कानों से सुना होगा। पेज – 127

इस साम्राज्य में इतनी विशाल जनसंख्या निवास करती है कि इसकी विस्तृत व्याख्या किये बगैर इसके बारे में बताना असंभव है। राजा के महल में अनेक कोठरियां हैं जो धन दौलत से भरी पड़ी हैं।

इस देश के सभी निवासी ( All inhabitants of this country) , चाहे वो ऊचें राजपद पर हों या नीचे राजपद पर हों , या फिर बाजार के अर्टिसन ( down to the artisan of the Bazar) , सबके सब अपने कानों में मोती या अन्य महगें पथरो से मढ़ी हुई बालियां , हार अगुंठिया बाजूबंद अपने कानों गले उँगलियों और भुजाओं में धारण करते हैं।

All the inhabitants of the country , both those of exalted rank and of the inferior class down to the artizans of Bazaar , wear pearls , or rings adorned with precious stones , in their ear , on their arms , on upper part of the hand and on the fingers. पेज — 130।

India in the fifteenth century .

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being a collection of

“Narratives of Voyages of India”

By – R. H. Major Esq., F.S.A. से उद्धृत

✍🏻 आगे और बाकी है

 

और अंत में एक और दृष्टांत –

 

आपने कहीं न कहीं पुराने जमाने के बड़े #कड़ाह देखे होंगे।

ये लोहे के बने होते हैं। इन्हें बनाने वाले स्थानीय कारीगर ही हुआ करते थे। इनको बनाने के लिए लोहे की छोटी छोटी आयताकार चद्दरों को जोड़कर पहले एक रिंगनुमा कड़ा बनाया जाता था। फिर एक के ऊपर दूसरी रिंग जोड़कर उन्हें कड़ाह का आकार दिया जाता था। ये छोटे टुकड़े हस्तनिर्मित कीलों से जोड़े जाते थे जिन्हें मेख कहा जाता है। हाल ही तक, ऐसे कारीगर उपलब्ध थे जो घी चढ़े हुए तपते कड़ाह में भी उखड़ी मेख को वापिस लगा सकते थे।

इन कड़ाहों का उपयोग बड़े आयोजनों में मिठाई रांधने के लिए किया जाता था। सात कड़े वाले कड़ाह का अर्थ था, उसमें सात रिंग्स होते थे। बीस से तीस कड़ों वाले भी कड़ाह होते थे। इनमें तीन से चार मण (एक मण 40 kg का होता है) गेहूँ की लापसी या हलवा पकाया जाता था। ऐसे कड़ाह भी थे जिनमें नौ मण तक दलिया या आटा सेका जाता था। इन विशाल कड़ाहों में चार चार बलिष्ठ व्यक्ति खुरपा घुमाते थे। चार से पांच गज के खुरपे बलपूर्वक जब फिसलते थे तो उनकी घमक तीन कोस तक सुनाई देती थी। इन खुरपों को चाठुआ कहा जाता है, इन्हें एक विशेष लय से घुमाना होता था। ये आगे से लोहे के बने होते थे। कड़ाह के कड़े इस प्रकार से फिक्स होते थे कि वे जाते समय ठीक से फिसल सकें और किसी मेख को #क्षतिग्रस्त न करें।

यूँ तो हलवा शब्द से ही हलवाई बना है, लेकिन उस समय प्रायः सामान्य जन ही यह कार्य करते थे।

                    यह हलवा अथवा लापसी, शुद्ध घी और गुड़ से बना होता था, जिसे जीमने के लिए पूरी न्यात बुलाई जाती थी। जैसा ठोस आहार होता था वैसे ही जीमने वाले भी होते थे। पांच सेर लापसी खाने वाले लोग भी थे, एक बार खा लिया तो पांच दिन बिना खाए भी रह जाते थे।

लौह तत्व रक्तवृद्धि के लिए उत्तम रहता है। कई बार उसमें से घी झरता रहता था। वह घी भी वास्तव में घी था, वह बल भी बल ही था। शुद्ध खान पान का ही असर था कि ऐसे आयोजन में गांव के गांव, दल बल सहित आठ कोस तक पैदल चलकर खाने के लिए पहुँचते थे।

हलवा या लापसी के साथ कई बार चना-चावल भी बनते थे। खडीनों के चने और सिंध के चावल की बात ही कुछ और थी। उन मसालों की महक भी अब तो कहीं खो सी गई है।

आज हर दिन कोई न कोई जीमण होता है पर खाने वाले पता नहीं क्या खा रहे हैं,,,,!!! भव्य चकाचौंध में शक्कर और तेलीय पदार्थों की भरमार सी रहती है। एक एक आइटम भी खा लिया तो दो दिन तक उन्हें पचाना ही भारी पड़ जाता है। अनेक नाम वाले व्यंजनों में स्वाद और सुगंध में कहीं न कहीं बहुत खालीपन रहता है। आडम्बर, प्रदर्शन और भौंडापन के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा यहाँ।

अनेक निमंत्रण होते हुए भी व्यक्ति खाना ही नहीं चाहता। आज का मानव 25% तो स्वयं के लिए खाता है और 75% इसलिए खाता है ताकि डॉक्टर की दुकान चलती रहे। गले तक ठूंस कर खाने के बाद सारी ताकत उसे पचाने में व्यय हो जाती है।

इधर रिफाइंड आयल के नए खुलासे से तो ऐसा लगता है कि हृदय रोग के इलाज में लगी कम्पनियों और तेल के विज्ञापनों में कोई भारी सांठ गांठ है।

आप कब तक बचोगे?

जहाँ जाओगे वहाँ यही तेल घी और मिठाइयां आपका पीछा नहीं छोड़ने वाली।

आप चाहे साउथ इंडियन खाओ या चाइनीज,,,, दस सीढियां चढ़ते ही हांफना आपकी नियति बन गई है।

आप जितना भारत को भूलोगे उतना ही गर्त में जाओगे।

यह शरीर बार बार नहीं मिलता। इसको कचरापात्र बनने से रोकिये। बलशाली बनिए। जिस भाव भी मिले, यदि शुद्ध मिलता है तो उसका उपयोग कीजिए।

गली के नुक्कड़ पर उपेक्षा से औंधे पड़े प्राचीन कड़ाह तिल तिल होकर जंग खा रहे हैं। वे धीरे धीरे मर जाएंगे पर मानव जाति उससे भी तीव्र गति से अपनी बर्बादी की योजना खुद बना रही है।

✍🏼फिर मिलते हैं….

देशी गाय का घी : धरती का अमृत

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