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छलावरण

वैसे तो बड़ा विचित्र शब्द लगता है, लेकिन आप इससे परिचित हैं। अंग्रेजी में इसे *“कैमोफ्लाज”* कहते हैं। गिरगिट का रंग बदलना, या दूसरे कई पशु-पक्षियों का वैसा ही रूप धारण कर लेना, जैसा उनका वातावरण है, छलावरण कहलाता है। शरीर पर लम्बी धारियों की वजह से बाघ-लकड़बग्घे जैसे शिकारी पशु आसानी से घास में छुप जाते हैं। ऐसे ही तोता हरे रंग का होने के कारण कई बार वृक्ष की पत्तियों में ऐसा घुल-मिल जायेगा कि उसे अलग पहचानना मुश्किल होता है। तोते के इसी “कैमोफ्लाज” के उदाहरण को कभी कभी भारतीय दर्शन की विधाओं के बारे में समझाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। जिस हिस्से को वेदांत कहते हैं, उसे समझने के लिए भी दर्शन कि अलग-अलग शाखाएं हैं। जो आज सबसे प्रचलित है, उसे *अद्वैत वेदांत”* कहते हैं।

इस अद्वैत वेदांत के हिसाब से जब यही तोते और पेड़ का उदाहरण समझाया जाए तो कहा जायेगा कि कई बातों में अंतर होने पर भी हरा रंग तोते और पेड़ की पत्तियों में एक ही है। ये जो अलग होते हुए भी एक होना है, वो अद्वैत हुआ। शारीरिक संरचना, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, देश-काल आदि में अंतर होने पर भी सभी शरीर आत्मा के स्तर पर बराबर हैं, ये अद्वैत वेदांत का मत है। थोड़ा इधर उधर अगर देखें तो हमें वेदांत दर्शन में विशिष्टाद्वैत दिखेगा। ये कहता है पेड़ पर बैठा हुआ तोता भले पेड़ का हिस्सा ही लगे, लेकिन आवश्यकता होते ही वो अलग भी उड़ कर जा सकता है। एकरूपता होने पर भी गुणों में ये अंतर विशिष्टाद्वैत हो जायेगा।

वेदांत दर्शन को समझने की एक विधि को द्वैत कहते हैं। द्वैत कहेगा कि देखने में भले पेड़ और तोता एक लग रहे हों, लेकिन चेतना के स्तर पर दोनों में अंतर है। किसी संकट में, भूख इत्यादि के कारण, तोता कभी भी उड़ सकता है। पेड़ बिलकुल जड़ है, भले बाढ़ आये और उसमें पेड़ के डूब जाने की स्थिति बन जाये, किन्तु वो हिलेगा भी नहीं। फिर घूमकर अद्वैत पर आएंगे तो कहा जायेगा कि पेड़ के फल अगर तोता खा ले, तो उससे तोते को पोषण मिलेगा। पेड़ का फल, तोते के शरीर में, मांस-पंख इत्यादि बनकर मिल जायेगा। अब आप उसे अलग नहीं कर सकते।
इसका उल्टा जब तोता मरेगा और मिट्टी में मिल जायेगा तो उसी मिट्टी से पोषण लेकर पेड़ बड़ा होगा। अब पेड़ तोते से बना है! इसलिए दोनों अलग ही हैं ऐसा नहीं कहा जा सकता – *अद्वैत!*

ये गोल गोल घूमते तर्क इसलिए चलते हैं क्योंकि आत्मा-परमात्मा का प्रश्न हमेशा से हिन्दुओं के सामने रहा है। ऋग्वेद (1.164.20-22),
मुण्डक उपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद से ही हमें पेड़ पर आकर बैठे पक्षी(तोते) के उदाहरण मिलने लगते हैं। वहाँ जीव और परमात्मा का सम्बन्ध बताने के लिए दो पक्षियों के पेड़ पर आकर बैठने की बात होती है। दोनों में एक पक्षी पेड़ के फल खाता है और दूसरा पक्षी केवल उसे फल खाता देखता रहता है। जो खा रहा है (कर्मफल भोग रहा है), उससे जीव का, और जो केवल दृष्टा है, उससे परमात्मा का सम्बन्ध बताया जाता है। हमलोग आज अद्वैत से अधिक परिचित इसलिए हैं क्योंकि हिन्दुओं के जो बड़े वेदांती हुए हैं, वो स्वामी विवेकानंद थे। स्वामी विवेकानंद अद्वैत मत के प्रवर्तक थे, इसलिए उनका प्रभाव दिखता है।

उनसे पहले स्वामी विद्यारण्य और परंपरा में थोड़ा पीछे जाएँ तो आदि शंकराचार्य भी अद्वैत मत के प्रवर्तक थे। सिर्फ भगवद्गीता पर की गयी टीकाएँ ढूँढने निकलें तो दिख जायेगा कि अद्वैत मत की टीकाएँ थोड़े प्रयास से मिल जाएँगी, लेकिन विशिष्टाद्वैत के आचार्य रामानुजाचार्य की, या द्वैत मत के मध्वाचार्य की टीकाएँ उतनी सरलता से नहीं मिलेंगी। आदि शंकराचार्य से बाद के समय में अद्वैत मत भी दो शाखाओं में विभक्त रहा है – विवरण और भामती।
यानि कि हिन्दुओं के षड्दर्शन – सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के बाद आप वेदान्त की कई शाखाओं तक पहुंचेंगे। वेदान्त की अद्वैत शाखा में भी फिर विवरण-भामती जैसी शाखाएँ होंगी!

बाकि आपको आत्मा-परमात्मा या ईश्वर-जीव संबंधों के बारे में सीखना है या नहीं, अगर सीखना भी है तो कितना सीखना है, ये महत्वपूर्ण प्रश्न होते हैं। हाँ, बुढ़ापे में सीखना शुरू करने बैठेंगे तो इतना सीख पाएंगे, या बचपन-यौवन में ही सीखना शुरू करना चाहिए, इस प्रश्न का उत्तर तो इतने पर मिल गया होगा।

एक कथा है ऋषि शमीक की, जो कहीं से अपने आश्रम की ओर लौटते हुए कुरुक्षेत्र के मार्ग से अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे। ये तब की घटना थी जब महाभारत का युद्ध बीते कुछ ही समय हुआ था। ऋषि को वहीँ कहीं से पक्षियों के चहकने की ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने इधर उधर देखा, क्योंकि आस पास कोई पेड़ या ऐसा कुछ नहीं था जिसपर घोंसला होने और छोटे पक्षियों के होने की संभावना होती। सामने एक हाथी के गले में टांगने वाला बड़ा सा घंटा धरती में धंसा सा पड़ा था। ऋषि शमीक ने उसे उखाड़ा तो पाया कि उसके अन्दर चार छोटे-छोटे पक्षी के बच्चे हैं और वही चहचहा रहे थे!

वो घंटे के अन्दर कैसे पहुंचे? महाभारत के युद्ध में अर्जुन जब भगदत्त से लड़ रहे थे उसी वक्त एक चिड़िया उधर से उड़कर जा रही थी। अर्जुन का एक बाण चिड़िया का पेट चीरता हुआ निकल गया। चिड़िया तो मारी गयी किन्तु उसके अंडे जमीन पर आ गिरे। हाथियों-रथों से अंडे कुचले जाते, मगर भाग्य से एक हाथी का घंटा किसी प्रहार से टूटा और जब वो गिरा तो अण्डों को ढकता हुआ भूमि में थोड़ा धंस गया। धातु धूप से गर्म होती तो अण्डों को भी गर्मी मिल जाती, इस तरह अंडे फूटे और उसमें से चिड़िया के बच्चे निकल आये थे!
ऋषि पक्षी शावकों को साथ ले गए और अपने शिष्यों से उनकी देखभाल करने कहा क्योंकि उनका मानना था कि *संसार में दैव का ऐसा अनुकूल होना भी पूर्व जन्म के पुण्यों का फल होगा।*

इन पक्षियों के पूर्व जन्म की कथा भी उतनी ही विचित्र है। ये किसी तपस्वी की संतान थे जिनकी परीक्षा लेने इंद्र एक वृद्ध पक्षी का रूप धारण करके आये। उन्होंने तपस्वी से कहा कि उन्हें भूख लगी है। जब तपस्वी ने उन्हें भोजन देना स्वीकार लिया, तब पक्षी ने कहा कि उसे तो मानव मांस प्रिय है! अब तपस्वी ने अपने चारों पुत्रों को बुलाकर अपने मांस से पक्षी को तृप्त करने कहा। जब चारों ऐसे कठिन कार्य के लिए तैयार नहीं हुए तो तपस्वी ने अपने पुत्रों को अगले जन्म में पक्षी होने का शाप दिया और स्वयं अपना मांस देने प्रस्तुत हुआ। तपस्वी के वो चारों पुत्र ही ये पक्षी थे! थोड़े बड़े होते ही पक्षी मनुष्यों की भांति बात करने लगे फिर ऋषि शमीक से आज्ञा लेकर *विन्ध्यगिरी पर्वत* पर निवास करने चले गए।

ये वो कथा है जिससे मार्कंडेय पुराण की करीब-करीब शुरुआत होती है। करीब-करीब शुरुआत इसलिए क्योंकि इन पक्षियों की कथा मार्कंडेय जी महर्षि जैमिनी को सुना रहे होते हैं। महाभारत से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर लेने के लिए मार्कंडेय जी ने महर्षि जैमिनी को इन्हीं पक्षियों के पास भेजा था। मार्कंडेय पुराण की बात क्यों? ऐसा सोच सकते हैं कि शायद दुर्गा पूजा नजदीक ही है। उस दौरान जिस दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है, वो मार्कंडेय पुराण का हिस्सा है, शायद इसलिए। ये पूरा सच नहीं होगा। ये पुराण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि *ऋतध्वज और उनकी पत्नी मदालसा* का आख्यान आता है। मदालसा ने अपने चौथे पुत्र अलर्क को राजनीति, धर्म और अध्यात्म का जो उपदेश दिया था वो *अलर्कोपख्यान* के नाम से प्रसिद्ध है।

जो पहली लोरी थी, वो भी संभवतः संस्कृत की ही रही होगी। मदालसा का ये भाग “स्त्री को देवी मत बनाओ”, “स्त्री को स्त्री ही रहने दो”, वाले तथाकथित नैरेटिव को भी तोड़ देता है।

सामान्य स्थिति में वो कैसे गुरु भी होती है, या कहिये कि पहली गुरु स्त्री ही होगी, इस हिन्दू सत्य को स्थापित करने में ये काम आ सकता है। दुर्गा सप्तशती मार्कंडेय पुराण के सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत आती है। यानि मन्वंतरों और 14 मनुओं की बात इस पुराण में होगी, इतना तो समझ में आता है। जब दूसरे मनु औत्तम की बात हो रही होती है तब ये बात होती है पत्नी-त्याग अपराध है। जिस प्रकार पत्नी अपने पति का त्याग नहीं कर सकती उसी प्रकार पति भी पत्नी का त्याग नहीं कर सकता।

आज एक *“विवाह-विच्छेद”* के आयोजन के पोस्टर पर हंगामा रहा।
शुरू में कुछ लोग समर्थन में दिखे, उसके बाद कुछ लोगों ने कहा कि जिनकी विवाह -कॉन्ट्रैक्ट भर है, वो कॉन्ट्रैक्ट टूटने की खुशियाँ मनाएं। इसे “विवाह-विच्छेद” का उत्सव क्यों बनाना? शादी टूटने का, मैरिज टूटने, तलाक का डाइवोर्स का बनाओ उत्सव। फिर पता चला आयोजक *समुदाय विशेष* के हैं। अब हो सकता है कि कुछ लोग सवाल करें। कोई धूप में बाल पकाए बैठे कूढ़मगज चीर-युवा जबरन सवाल करे, या कुछ सचमुच के युवा अपनी जिज्ञासा में पूछें कि बताओ कहाँ लिखा है कि हिन्दुओं को पति का या पत्नी का त्याग नहीं करना चाहिए? ऐसी स्थितियों के लिए याद रखियेगा।

जैसे मार्कंडेय पुराण में *सावर्णि* नाम के मनु की कथा में दुर्गा सप्तशती आती है, वैसे ही औत्तम नाम के मनु की कथा में पति-पत्नी के त्याग को अपराध बताया गया है।

एक बात और –
*’सत्यमेव जयते’* मूलतः मुण्डक-उपनिषद का सर्वज्ञात मंत्र 3.1.6 है। पूर्ण मंत्र इस प्रकार है:

*सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पंथा विततो देवयानः।*
*येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत् सत्यस्य परमम् निधानम्।।*

अर्थात अंततः सत्य की ही जय होती है न कि असत्य की। यही वह मार्ग है जिससे होकर आप्तकाम (जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों) मानव जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।

‘सत्यमेव जयते’ को राष्ट्रपटल पर लाने और उसका प्रचार करने में *मदन मोहन मालवीय* (विशेषतः कांग्रेस के सभापति के रूप में उनके द्वितीय कार्यकाल (१९१८) में) की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

चेक गणराज्य और इसके पूर्ववर्ती चेकोस्लोवाकिया का आदर्श वाक्य “प्रावदा वितेजी” (“सत्य जीतता है”) का भी समान अर्थ है।
✍🏻फिर मिलते है….

विवाह विच्छेद योग व पुनर्विवाह योग :

विवाह विच्छेद के बाद सन्तान किसके पास रहेंगी।

विवाह विच्छेद केस चल रहा है कब तक हो जाएगा।

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