
*तत्व – आकाश*
पाँच तत्वों में आकाश सबसे बड़ा है। जिसका गुरु अच्छा होता है उसका दिल और सोच भी आकाश जैसी बड़ी होती है। ऐसा व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में नहीं उलझता। परिवार को जोड़कर रखता है।
*रंग – पीला, वस्त्र – पीला*
गुरु का रंग पीला है। पीला रंग ज्ञान, पवित्रता और समृद्धि का रंग है। इसीलिए बृहस्पतिवार को पीला पहनना, पीले फल – केला, आम, पीले फूल, हल्दी – इन सबका संबंध गुरु से है। पीले वस्त्र का दान करने से गुरु प्रसन्न होते हैं।
*लिंग – पुल्लिंग*
गुरु पुरुष ग्रह हैं। इन्हें जीव कहा जाता है। जीव यानी जीवन देने वाला। पिता तुल्य, गुरु तुल्य, मार्गदर्शन करने वाला।
*धातु – सोना*
सोना गुरु की धातु है। सोना घर में टिके तो समझिए गुरु बलवान है। शुभ गुरु वाला व्यक्ति सोना जोड़ता है, सोने में निवेश करता है और उसकी चमक चेहरे पर भी रहती है।
*स्वाद – मीठा*
मीठा स्वाद गुरु का है। घी, खीर, बेसन के लड्डू, शहद। जिसका गुरु शुभ होता है उसे मीठा पसंद होता है और वह दूसरों को भी मीठा खिलाकर खुश होता है।
*ऋतु – हेमंत और शिशिर*
ठंड की ऋतु – नवंबर, दिसंबर, जनवरी। इस समय में ज्ञान की बातें ज्यादा याद रहती हैं, फसल पकती है, संचय होता है। गुरु इसी संचय का कारक है।
*वेद – ऋग्वेद*
चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन। गुरु ऋग्वेद के स्वामी हैं। इसलिए वेद मंत्र, पूजा-पाठ, शास्त्र ज्ञान, शिक्षा – सब गुरु के अधीन है।
*दिशा – ईशान, उत्तर-पूर्व*
ईशान कोण देवताओं का कोना है। घर का मंदिर इसी कोने में बनता है। ईशान साफ और पवित्र रहेगा तो गुरु अच्छा फल देगा। वहीं दोष होगा तो गुरु कमजोर हो जाता है।
*रत्न – पुखराज*
पीला पुखराज गुरु का रत्न है। पर रत्न हमेशा कुंडली देखकर ही धारण करना चाहिए। यदि गुरु नीच, अस्त या मृत अवस्था में हो तो पुखराज के बजाय हल्दी की गांठ, केसर का तिलक और पीले धागे से ज्यादा लाभ मिलता है।
*राशि – धनु और मीन*
धनु धर्म, भाग्य और तीर्थ की राशि है और मीन मोक्ष, दया और दान की। दोनों ही गुरु की अपनी राशियाँ हैं। धनु में गुरु धर्म की राह दिखाता है और मीन में माया से मुक्ति दिलाता है।
*उच्च राशि – कर्क, नीच राशि – मकर*
कर्क में गुरु उच्च का होता है। कर्क चंद्रमा की राशि है। चंद्रमा मन है और गुरु ज्ञान – मन में ज्ञान आ जाए तो व्यक्ति परम ज्ञानी। वहीं मकर शनि की राशि है, वहाँ गुरु नीच का हो जाता है। मकर में कर्म प्रधानता है, वहाँ ज्ञान की कदर कम होती है।
*नक्षत्र – पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद*
ये तीनों गुरु के अपने नक्षत्र हैं। इनमें जन्मा व्यक्ति –
पुनर्वसु – बार-बार उठकर फिर से शुरू करने की ताकत, सम्पत्ति को फिर से पाने वाला।
विशाखा – लक्ष्य भेदी, अपने उद्देश्य पर अडिग।
पूर्वाभाद्रपद – गूढ़ ज्ञान, रहस्य को समझने वाला।
*मित्र ग्रह – सूर्य, चंद्र, मंगल*
सूर्य आत्मा है, चंद्र मन है, मंगल हिम्मत है। ये तीनों गुरु के मित्र हैं। आत्मा में ज्ञान, मन में ज्ञान और हिम्मत में ज्ञान आ जाए तो जीवन सफल। सूर्य-गुरु का योग राजयोग बनाता है, चंद्र-गुरु का योग गजकेसरी।
*शत्रु ग्रह – बुध, शुक्र*
बुध व्यापारिक बुद्धि है और शुक्र भौतिक सुख। गुरु ज्ञान और त्याग है। इसीलिए इनकी आपस में नहीं बनती। बुध-गुरु साथ हो तो व्यक्ति दुविधा में रहता है – व्यापार करे या ज्ञान बाँटे। शुक्र-गुरु साथ हो तो भोग और धर्म में खिंचाव।
*सम ग्रह – शनि, राहु, केतु*
ये न मित्र हैं न शत्रु। पर एक पुराना नियम है – गुरु शनि के घर में हानि करता है और शनि गुरु के घर में वृद्धि। इसीलिए गुरु की स्थिति देखकर ही उसके फल का अंदाजा लगता है।
*भाव कारक – द्वितीय, पंचम, नवम, दशम, एकादश*
गुरु पाँच भावों का कारक है, यानी इनका सुख-दुख गुरु तय करता है –
द्वितीय – धन और वाणी। गुरु शुभ तो वाणी में मिठास और धन में बचत।
पंचम – बुद्धि और संतान। गुरु शुभ तो संतान सुख उत्तम और निर्णय सही।
नवम – भाग्य और धर्म। गुरु शुभ तो भाग्य साथ देता है, तीर्थ यात्रा होती है।
दशम – कर्म और पिता। गुरु शुभ तो पिता का सुख और कर्म में इज्जत।
एकादश – लाभ। गुरु शुभ तो लाभ कई स्रोतों से।
*आराध्य देव – ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र*
ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता, विष्णु पालनकर्ता, इंद्र स्वर्ग के राजा। गुरु इन्हीं तीनों के समान पूज्य है। बिना गुरु के न तो ज्ञान मिलता है न ही यज्ञ सफल होता है। पुराणों में कहा है कि महर्षि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति ने प्रभास तीर्थ में शिव की कठिन तपस्या करके देवगुरु का पद पाया।
*शुभ गुरु का लाभ -*
धन टिकता है, वाणी में वजन होता है, लोग बात मानते हैं, संतान आज्ञाकारी होती है, भाग्य अचानक मदद करता है, शादी समय पर और संतान सुख समय पर। शरीर में लिवर, पाचन अच्छा। घर में सोना, पीतल के बर्तन बढ़ते हैं।
*कमजोर गुरु की हानि -*
पैसा आता है पर टिकता नहीं, फिजूलखर्ची। व्यक्ति ज्ञान तो देता है पर खुद उलझा रहता है। शादी में देरी, संतान में देरी या चिंता। मोटापा, लिवर, शुगर, गठिया की परेशानी। सोना गिरवी या बिक जाना। दूसरों के लिए किया गया भला याद नहीं रहता।
उपाय के लिए सबसे सरल – गुरुवार को केले के पेड़ में जल, पीले वस्त्र, बेसन का दान, माथे पर केसर या हल्दी का तिलक, और विष्णु जी का नाम। इससे गुरु धीरे-धीरे बलवान होकर शुभ लाभ देना शुरू कर देता है।
गुरु ग्रह का ये जो वर्णन है, इसका एक-एक लाइन का गहरा अर्थ है –
*1. स्कंद पुराण की कथा -*
बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। अंगिरा सप्त ऋषियों में से एक। उनके पुत्र ने प्रभास तीर्थ – जो आज का सोमनाथ, गुजरात का तट है – वहाँ जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
तपस्या से खुश होकर शिव जी ने उन्हें दो वरदान दिए –
पहला – देवताओं के गुरु का पद, यानी देवगुरु बृहस्पति।
दूसरा – आकाश में नवग्रहों में स्थान।
इसीलिए गुरु को सिर्फ ग्रह नहीं, गुरु कहा जाता है। अपने ज्ञान के बल पर ये देवताओं को यज्ञ का भाग दिलाते हैं। मतलब जब भी देवता यज्ञ करते हैं, बिना गुरु के ज्ञान के यज्ञ पूरा नहीं होता। जीवन में भी ऐसा ही है – बिना गुरु के ज्ञान के कोई भी काम पूरा नहीं होता।
*2. गुरु को आकाश तत्व माना गया है -*
5 तत्व हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। गुरु आकाश है।
आकाश का गुण क्या है? विशालता, विकास, विस्तार।
जिसकी कुंडली में गुरु अच्छा होता है, उसका जीवन भी विस्तार लेता है –
सोच बड़ी, दिल बड़ा, घर बड़ा, परिवार बड़ा, व्यापार का फैलाव बड़ा।
गुरु जिस भाव में बैठता है, उस भाव का विस्तार करता है। जैसे धन भाव में तो धन का विस्तार, संतान भाव में तो संतान सुख का विस्तार।
और जिसका गुरु कमजोर होता है, उसका जीवन सिकुड़ जाता है – सोच छोटी, पैसा टिकता नहीं, मन में डर।
*3. गुरु शिक्षण, शिक्षा और ज्ञान के प्रसार से जुड़ा है -*
गुरु सिर्फ पढ़ाने वाला नहीं, सही राह दिखाने वाला है। शास्त्र में लिखा है – गुरु दयालु है।
दयालु का अर्थ – शिष्य गलती करे भी तो क्षमा करके फिर से ज्ञान देना।
गुरु भक्तों को बुद्धि देता है, अंधेरे से निकालकर सद्मार्ग – अच्छे मार्ग पर ले जाता है।
सद्मार्ग पर जाएगा तो दो चीजें अपने आप मिलेंगी – सुख और सम्मान।
इसीलिए जिसका गुरु शुभ होता है, उसे समाज में इज्जत मिलती है। लोग उसकी बात मानते हैं। शिक्षक, वकील, जज, पंडित, प्रोफेसर – इन सबके पीछे गुरु का बल होता है।
*4. नवग्रहों में सबसे बड़ा और शुभ -*
आकार में भी बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है और प्रभाव में भी।
ज्योतिष में गुरु को 100% शुभ ग्रह माना गया है। अकेला गुरु पूरी कुंडली को संभाल लेता है। कहा जाता है – एक गुरु हजार दोषों को नष्ट करता है।
गुरु 4 चीजों का दाता है –
*शुभता -* जीवन में मांगलिक काम होना, शादी, मुंडन, गृह प्रवेश।
*सत्यता -* व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, सत्य पर टिकता है।
*न्याय -* सही-गलत का फैसला कर पाता है, किसी का हक नहीं मारता।
*सद्गुण व सुख -* अंदर अच्छे गुण आना और बाहर सुखी जीवन।
*5. गुरु को जीव और ब्रह्मा की उपाधि -*
जीव का अर्थ – जीवन देने वाला। शरीर में जीव नहीं तो शरीर मृत। कुंडली में गुरु नहीं तो कुंडली मृत।
ब्रह्मा की उपाधि – ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। गुरु भी सृष्टि को चलाता है। बिना ज्ञान के सृष्टि चल ही नहीं सकती।
इसीलिए अंतिम लाइन कही गई है – *”इसके बिना संसार की चाल ही समाप्त।”*
गुरु न हो तो –
ना धर्म रहेगा, ना ज्ञान, ना संतान, ना धन का संचय, ना भाग्य का साथ।
सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति दिशाहीन हो जाएगा।
इसलिए गुरु को जगाना सबसे जरूरी है।
*सरल उपाय -*
रोज सुबह विष्णु जी का नाम, माथे पर केसर का तिलक, गुरुवार को पीली चीज – चने की दाल, बेसन, केला का दान, केले के पेड़ में जल। पिता और गुरु तुल्य व्यक्ति का सम्मान – इससे गुरु अपने आप बलवान होकर शुभ फल देने लगता है।