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"वारी का शिरा और आँखों का पानी" दिल को छू लेने वाली कहानी

|| वारी में ‘खाना-पीना’ आनंद नहीं… ‘बाँटना’ ही असली आनंद है। ||
|| एक निवाला पेट भरता है… एक निवाला मन भर देता है। ||
|| सत्य घटना: सासवड से जेजुरी – वारी 2023 ||
|| श्री स्वामी समर्थ || श्री विठ्ठल-रखुमाई || 🙏🚩🍲

प्रसंग: “5 किलो शिरा और 5 लाखों का संतोष”

आषाढ़ी वारी 2023सासवड में पड़ाव था।
लाखों वारकरी, तंबू, पाल और भजन-कीर्तन की गूंज चारों ओर फैली हुई थी।
रात के 8 बजे अन्नछत्र में भोजन की पंगत लगी।

पुणे का एक 28 वर्षीय युवक था – ऋषि
वह एक आईटी कंपनी में नौकरी करता था। सालाना पैकेज 25 लाख रुपये था।
वह पहली बार वारी में आया था, लेकिन भक्ति के लिए नहीं… बल्कि वारी व्लॉग” बनाने के लिए।

उसके पास GoPro, iPhone और महंगे चश्मे थे।

भोजन की पंक्ति में उसकी थाली में चावल, आमटी और थोड़ा-सा शिरा परोसा गया।

उसने कैमरा ऑन किया और बोला—
दोस्तों, देखिए वारी का भोजन… कितना साधारण, लेकिन कितना आत्मीय।”

जैसे ही वह कैमरे के सामने शिरा खाकर यम्मी” कहने वाला था…

उसी समय बगल से एक मासूम आवाज़ आई—

अम्मा…”

ऋषि ने मुड़कर देखा।

करीब 7-8 साल का एक लड़का था – सखाराम

फटे-पुराने कपड़े, बिखरे हुए बाल और बड़ी-बड़ी मासूम आँखें।

उसकी थाली में केवल चावल और आमटी थी।
शिरा खत्म हो चुका था।

भोजन परोसने वाले काका ने कहा—

माफ करना बेटा… शिरा खत्म हो गया है। कल जरूर मिलेगा।”

सखाराम की आँखें भर आईं।

धीरे से बोला—

काका… मैंने तीन दिनों से कोई मीठी चीज़ नहीं खाई। माँ ने कहा था कि वारी में बूंदी का लड्डू मिलेगा… वह तो नहीं मिला… कम से कम थोड़ा-सा शिरा ही मिल जाता…”

ऋषि ने यह सब सुना।

उसने अपना GoPro बंद कर दिया।

कुछ पल सोचा…

फिर अपनी थाली का पूरा शिरा उठाकर सखाराम की थाली में रख दिया।

मुस्कुराकर बोला—

लो बेटा… यही तुम्हारा बूंदी का लड्डू है।”

सखाराम की आँखें चमक उठीं।

लेकिन उसने तुरंत शिरा नहीं खाया।

उसने उसे चार हिस्सों में बाँट दिया।

पहला निवाला खुद खाया।

दूसरा बगल में बैठी चार साल की बच्ची को दिया—

बहन, तुम भी खाओ।”

तीसरा पीछे बैठी दादी को दिया—

दादी, आप भी थोड़ा मीठा खाइए।”

चौथा निवाला…

उसने ऋषि की ओर देखा…

मुस्कुराया…

और वही निवाला ऋषि की थाली में रख दिया।

भैया, आप भी खाइए। वारी में अकेले नहीं खाते।”

ऋषि स्तब्ध रह गया।

25 लाख का पैकेज पाने वाला युवक…

आज एक सात साल के बच्चे से बाँटना” सीख रहा था।

उसने वह निवाला खाया।

उसका स्वाद थोड़ा नमकीन था…

क्योंकि उसमें उसकी आँखों के आँसू मिल चुके थे।

उस रात नींद नहीं आई… अगली सुबह शिरा नहीं, एक विचार जन्मा

ऋषि पूरी रात सो नहीं पाया।

उसने अपना पूरा व्लॉग डिलीट कर दिया।

सुबह चार बजे वह सासवड के बाजार गया।

रवा, चीनी, घी, काजू और बाकी सामान खरीदा।

खुद चूल्हा जलाया।

लगभग 5 किलो शिरा बनाया।

उसकी खुशबू से कई वारकरी वहाँ इकट्ठा हो गए।

ऋषि ने ऊँची आवाज़ में कहा—

माऊली! कल मेरा एक कटोरा शिरा चार लोगों ने मिलकर खाया था।

आज मेरा पाँच किलो शिरा पाँच सौ लोग मिलकर खाएँगे।

लेकिन एक शर्त है—

एक निवाला खुद खाना…

दूसरा अपने पास बैठे व्यक्ति को खिलाना।

क्योंकि वारी में सिर्फ पेट नहीं… प्रेम भरना होता है।”

500 वारकरी पंक्ति में लग गए।

ऋषि खुद सबको शिरा परोस रहा था।

हर किसी से कहता—

पहले अपने पड़ोसी को खिलाइए।”

सखाराम भी वहाँ था।

उसने तीन निवाले खुद खाए…

और तीन लोगों को अपने हाथ से खिलाए।

फिर ऋषि से बोला—

भैया, कल आपने मुझे मिठास दी थी…

आज आप सबको मिठास बाँट रहे हैं।

आप ही मेरे विठोबा हैं।”

ऋषि की आँखें भर आईं।

वह बोला—

नहीं बेटा… मैं विठोबा नहीं हूँ।

मैं तो सिर्फ लाइक, शेयर और सब्सक्राइब के पीछे भागने वाला इंसान था।

तुमने मुझे प्रेम, सेवा और त्याग का अर्थ सिखाया।

आज से मेरा व्लॉग बंद…

और वारकरी जीवन शुरू।”

जेजुरी का खंडोबा और शिरा

जब दिंडी जेजुरी पहुँची…

चारों ओर हल्दी का भंडारा उड़ रहा था।

ऋषि फिर से शिरा बनाने की तैयारी कर रहा था।

तभी सखाराम दौड़ता हुआ आया।

उसके हाथ में एक पुरानी थैली थी।

उसने उसे खोला।

उसमें 2 रुपये, 5 रुपये और छोटे-छोटे नोट मिलाकर कुल 137 रुपये थे।

वह बोला—

भैया, ये मेरे वारी के पैसे हैं।

माँ ने खर्च करने के लिए दिए थे।

मैंने खर्च नहीं किए।

इन पैसों से भी शिरा बनाइए।

ताकि उसमें मेरा भी हिस्सा हो।”

ऋषि ने वे 137 रुपये अपने माथे से लगाए।

और बोला—

बेटा… तुम्हारे 137 रुपये की मिठास मेरे 25 लाख रुपये में भी नहीं है।

क्योंकि तुमने ये अपने लिए नहीं… किसी और के लिए बचाए हैं।”

उस दिन जेजुरी में 10 किलो शिरा बाँटा गया।

उसका नाम रखा गया—

सखाराम का शिरा”

और एक पट्टिका लगाई गई—

एक निवाला आप खाइए… दूसरा अपने पड़ोसी को खिलाइए।

क्योंकि पंढरपुर का रास्ता पेट से नहीं… परस्पर प्रेम से तय होता है।”

आज… वर्ष 2026

आज ऋषि ने आईटी की नौकरी छोड़ दी है।

वह अब कोई फूड व्लॉगर नहीं है।

वह वारी अन्नपूर्णा” नाम की एक संस्था चलाता है।

हर वर्ष वारी में लगभग 10 टन शिरा, लड्डू और बिस्कुट बाँटता है।

लेकिन उसका नियम आज भी वही है—

एक निवाला अपना… दूसरा पड़ोसी का।”

और सखाराम?

अब वह 10 साल का हो चुका है।

हर साल ऋषि के साथ वारी में जाता है।

उसकी जेब में चाहे केवल 10 रुपये हों…

फिर भी वह 5 रुपये शिरा फंड” में जरूर डालता है।

वह मुस्कुराकर कहता है—

भैया, हम गरीब नहीं हैं…

हम अमीर हैं…

क्योंकि हमारे पास बाँटने के लिए कुछ है।”

ऋषि के कार्यालय में केवल एक तस्वीर लगी है।

सखाराम की…

जब वह शिरे को चार हिस्सों में बाँट रहा था।

उस तस्वीर के नीचे लिखा है—

“My CEO – He taught me, Sharing is Earning.”

वारी से मिलने वाली 6 सीख

  1. वारी में बुफे नहीं… प्रसाद मिलता है।
    होटल में हम अपना पेट भरते हैं, लेकिन वारी में पूरी पंगत एक परिवार बन जाती है। वहाँ भोजन केवल शरीर नहीं, मन को भी तृप्त करता है।
  2. एक निवाला लाखों रुपये से भी अधिक मूल्यवान हो सकता है।
    ऋषि का एक छोटा-सा निवाला सखाराम के लिए बूंदी के लड्डू से भी बढ़कर था। आपका बचा हुआ एक कौर किसी के लिए पहला निवाला बन सकता है।
  3. बच्चे केवल खाते नहीं… बाँटना जानते हैं।
    बड़े लोग जमा करते हैं, लेकिन बच्चे सहज भाव से बाँटते हैं। शायद इसी निष्कपटता के कारण भगवान को बाल रूप सबसे प्रिय है।
  4. Vlog से ज़्यादा लोग महत्वपूर्ण हैं।
    ऋषि रील बनाने आया था, लेकिन जीवन की सबसे बड़ी सीख लेकर लौटा। कभी-कभी कैमरा बंद करके दिल खोलना ज़्यादा ज़रूरी होता है।
  5. 137 रुपये करोड़ों पर भारी पड़ सकते हैं।
    दान की कीमत उसकी राशि से नहीं, भावना से होती है। भगवान धन नहीं, भाव देखते हैं।
  6. वारी मनोरंजन नहीं… सेवा और जिम्मेदारी है।
    सिर्फ खाना, पीना और नाचना वारी नहीं है। किसी भूखे को खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना और थके हुए का सहारा बनना ही सच्ची वारी है।

अंतिम संदेश

बच्चों, वारी में जाते समय केवल भोजन का डिब्बा मत ले जाना… अपना दिल भी साथ लेकर जाना।

रोटी बासी हो जाती है… लेकिन प्रेम कभी बासी नहीं होता।

शिरा खत्म हो जाता है… लेकिन उसकी याद हमेशा जीवित रहती है।

यदि आपका एक निवाला किसी और के मुँह तक पहुँच गया… तो समझिए उसी में विठ्ठल के दर्शन हो गए।

इस वर्ष वारी अवश्य कीजिए…

लेकिन अकेले नहीं…

सबको साथ लेकर।

क्योंकि खाने में नहीं…

खिलाने में जो आनंद है…

वही पंढरपुर की वारी का सच्चा आनंद है।

भक्तों, इस बार वारी में जाते समय एक अतिरिक्त भोजन का डिब्बा या कुछ बिस्कुट साथ ले जाइए। रास्ते में आपको कोई ‘सखाराम’ मिल सकता है। उसे प्रेम से थोड़ा-सा शिरा या भोजन दे दीजिए। हो सकता है वही मासूम आपकी सोच बदल दे और आपको भी एक नया ‘ऋषि’ बना दे। यदि यह कहानी आपके हृदय को छू गई हो, तो इसे किसी एक वारी-प्रेमी के साथ अवश्य साझा करें, ताकि पंढरपुर की राह पर भूख नहीं, केवल भक्ति और प्रेम का प्रसार हो।

हिस्सा लेते होशियार रहना
किसी का हिस्सा खा तो नही रहे
वरना आने वाली पुश्ते
हिस्सा का कर्जा ढोते रहेंगे |

अन्नदान का महत्व

फूड फैक्टरी

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