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फूड फैक्टरी

हिटलर का सपना था कि दुनिया के फूड पर कब्जा किया जाए और सबको लारा लगा कर रखा जाए।

सन पचास के दौर में दुनिया के देशों को अग्रीमेंटस में बांधने का सिलसिला चला जिसमें बीजों को लेकर संधियां की गयी और इन्हीं संधियों में देशों में बीज एक्ट बनाने की बातें लिखी गयी थी।

हमारे देश में बीज एक्ट भी फ्रांस से हुई संधि के बाद बना। बीज एक्ट में बीजों को लेकर नियम कानून बनाये गए और  प्रमाणित बीज का कांसेप्ट आया।

किसानों ने बीज बनाने बंद कर दिये समय आगे बढ़ता रहा। बीज ऐसे बनाये गए जो रसायनिक खाद को रेस्पोंस करते थे।

मतलब यह कि बीज को जब खाद दिखाई जायेगी तो वो आगे भागेगा। अन्यथा मरू मरू करता रहेगा। यहाँ से खाद खेती में घुस गयी।

कीड़े जो पौधों के साथ जन्म जन्म से सहजीविता के नियम से रह रहे थे जब उन्होंने पाया कि आवांछित गुणों वाले पौधे खेतों में आये हैं उन्होंने उन्हें उखाड़ने के लिए उनपर हमला बोला।

फिर यहाँ पेस्टिसाईड आ गए और खेती अब जहरीली हो गयी।

अनाज अब एक फोक बन चुका था और उसमें पोषण की बात कोई कर नहीं रहा था। उधर घी को राक्षस बताना शुरू कर दिया और सफोला सफोला होने लग गयी।

 

पीछे पीछे रिफाईण्ड हमारे घरों में आ गया। तब तक ऐसी पीढी तैयार हो चुकी थी जिसको फूड की कोई समझ नहीं थी उसका उद्देश्य बस पेट को ठूसना था।

 

फूड अब इंडस्ट्री बन चुका था और फूड फैक्टरी सब जगह लगने लगी।

 

यहाँ तक फिर भी सहनीय था।

 

लेकिन इंडस्ट्री इससे बहुत आगे का विषय लेकर आ गयी।

दूध पैदा करने के लिए  बायोटेक्नोलॉजी  ने मशीन बना दी मीट पैदा करने के लिए भी प्रोटोकॉल बन गए।

 

मीडिया ने वेजिटेरियन मीट कह कर प्रचारित करना शुरू कर दिया।

 

अब नई भसड सामने आ रही है जिसका जिकर डॉ देवेंद्र शर्मा जी ने अपने उद्बोधन में किया है वो है इंसेक्ट फार्मिंग के जरिये उनके शरीरों में से प्रोटीन निकाल कर उसे चॉकलेट से लेकर हरेक फूड में मिला कर जनता को खिलाना।

 

मनुष्यता जो कि विवेक संस्कार और मर्यादा से बंध कर चलती थी अब वो प्रॉफिट लॉस,वैल्यूएशन, फंडिंग के गोल पर नज़रें गड़ाये हुए हैं।

 

दो कौड़ी के लुच्चे और टुच्चे शार्क बन कर आविष्कारकों से डेली बदतमीजी करते हुए TV पर नज़र आते हैं। चिंता की बात यह है कि हमारा खून खौलना बंद हो गया है।

 

फूड जो कि हमारी सभ्यता का मूल आधार है उसका खेत से एक फैक्टरी में शिफ्ट हो जाना बड़ी चिंता का सबब है।

 

दुकानों में पड़े चमकीले खाद्य पदार्थों के पैक्टों पर लिखे इंग्रेडिएंट मेरे जैसे फूड टेक्नोलॉजी पढ़े जीवों की समझ से भी बाहर हो जाने वाले हैं।

 

हमारी सभ्यता को यदि टिके रहना है तो ये एनुअल् ग्रोथ की सोच का मूल्यांकन करना पड़ेगा और सारे संसाधनों को हड़पने की सोच को भी रोकना पड़ेगा।

 

मेरे परम मित्र सरदार राजेंद्र सिंह जी जो इंदौर के बाई पास के नजदीक असरावद बुजुर्ग गाँव में जैविक खेती करते है। कल वो मुझे बता रहे थे कि उनके पास एक जेंटलमैन किसी रेफरेंस से आ गया जो उनका फेसबुक मित्र भी था।

 

भारतीय आतिथ्य परम्परा के मुताबिक राजेंद्र सिंह जी ने उसका स्वागत सत्कार किया और उसे अपना खेत घुमाया अपने पेड़ दिखाये जैविक भोजन भी कराया। दो घंटे मौज लूटने के बाद जब वो जेंटलमैन चलने लगा तो सरदार राजेंद्र सिंह जी से बोला कि आपके खेत की इकॉनॉमिक्स क्या है।

 

मुझे नहीं लगता है कि आप इससे कोई खास पैसे कमा पा रहे हैं। आपके बहुत सारे पेड़ तो बिना फल के ही हैं।

सरदार जी का क्रोध उनके गले तक आ गया जिसे उन्होंने अपने अनुभव और तप से रोका और बस एक ही बात कही कि यहाँ सिर्फ हम नहीं रहते हैं हज़ारों पंछी और लाखों कीट भी रहते हैं। जिन्हे फलों की और पैसों की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

 

तू पांच साल बाद भी आ जाना हमारा खेत और बगीचा बिना इकोनॉमिक्स के भी यूँ ही मस्त चलता मिलेगा।

 

बस अगले दो मिनट में सरदार जी ने वो जेंटलमैन अपने खेत से तो दफ़ा किया ही और उसे अपनी फ़्रेंड लिस्ट से भी ब्लॉक करके दफा किया और उसका नम्बर भी ब्लॉक मार दिया।

क्योंकि हमें भस्मासुर नहीं चाहिए अपने जीवन में।

हमारे फूड और ऐग्रीकल्चर एकोसिस्टम से लेकर मार्किट इकोनॉमी में नीचे से उपर तक भस्मासुर लदे पड़े हैं। उनका ईलाज विरोध नहीं है।

 

हमें अपने इलाज़ की आवश्यकता है क्योंकि हमारी नालायकी निकम्मेपन और नाकारापन की वजह से हमारी यह हालत हुई है।

 

करना क्या है?

 

इसका कोई एक जवाब नहीं है।

हमें अपनी अपनी दहलीज के अंदर अंदर खासकर रसोई और विशेषत Pantry में काम करने का स्कोप ढूँढना पड़ेगा। और अपने फुड में फिर से अपने बुजुर्गो वाले खाने को व उनकी संस्कृति को व उनकी वहीं पुरानी कृषि पद्धति को अपनाना होगा  तभी हम अपने परिवार व अपने देश वासियों को स्वस्थ रख पायेंगे अगर हम ऐसे ही इन फुड कम्पनियों के झूठे  प्रचार प्रसार में आकर हम ऐसे जहरीले फुड खाते रहे तो हमरा बिमार होना और डाक्टरो को अपने खुश पसीने की कमाई को लुटाते रहेंगे अब भी समय है आप सभी मेरे इस सन्देश को हरेक जन जन तक पहुंचाएंगे और हम सब मिलकर अपने पुर्वजों वाले खाने को अपनाएंगे और जहर मुक्त उगायेंगे और जहर मुक्त खाएंगे और आज से ग्रीन लैंड औरगेनीक स्टोर से जुड़कर अपने परिवार व देश को स्वस्थ बनाएंगे ग्रीन लैंड औरगेनीक स्टोर से जुड़ने पर उस  किसान का भी फायदा होगा जो आप सभी के लिए जहर मुक्त खाना उगाते हैं आओ उन किसानों को सपोर्ट करें व अपने परिवार को स्वस्थ करें निवेदन करें |

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
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