
१. अन्नदान करने वाले की २१ पीढ़ियों का उद्धार होता है।
२. अन्नदान सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान है। अन्नदान के पुण्य से ही राजा रंतिदेव को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई थी।
३. जो लोग अन्नदान नहीं करते, उन्हें परलोक में भूखा रहना पड़ता है।
४. अन्नदान करने वाला शिवलोक जाता है, तीनों लोकों में अन्नदान के समान कोई श्रेष्ठ दान नहीं है।
५. अन्नदान करने वाला वास्तव में प्राणदान करने वाला होता है।
६. अन्नदान एक ऐसा दान है जिसमें दाता और भोक्ता दोनों प्रत्यक्ष रूप से संतुष्ट होते हैं। अन्य सभी दानों का फल अप्रत्यक्ष होता है।
७. जब तक दान देने वाले और दान ग्रहण करने वाले को भूख-प्यास की भावना का अनुभव होता है, तब तक अन्नदान से श्रेष्ठ कोई दूसरा दान नहीं है।
८. लक्ष्मी कब रूठकर हमसे पीठ फेर लें, यह कहा नहीं जा सकता, इसलिए दान तत्काल करना चाहिए। यथाशक्ति, यथासामर्थ्य दान देते रहना चाहिए।
९. अन्नदान के लिए दिया जाने वाला धन कभी कम नहीं होता, वह नित्य बढ़ता ही है। जैसे कुएं से पानी निकालने पर वह अधिक स्वच्छ होता है और पानी का जलस्तर भी बढ़ता है।
१०. संसार में अन्नदान जैसा श्रेष्ठ दान न पहले कभी था और न भविष्य में होगा। अन्न से ही शरीर का बल बढ़ता है। अन्न के आधार पर ही हमारे प्राण टिके रहते हैं, इसलिए अन्नदान करने वाले को प्राणदाता और सर्वस्व दान करने वाला माना जाता है।
११. न्यायपूर्ण मार्ग से अर्जित आय का दसवां हिस्सा (दशांश) भगवान के कार्यों में उपयोग करना चाहिए, ऐसा शास्त्र बताते हैं।
१२. अन्नदाता परमात्मा है, इसका स्मरण रखकर अन्न ग्रहण करना चाहिए। स्वाद के वशीभूत न होकर, जब आवश्यकता हो और जितनी आवश्यकता हो उतना ही खाना ‘सात्विक आहार’ कहलाता है।
१३. सैकड़ों मनुष्यों में कोई एक शूरवीर होता है, हजारों में कोई एक पंडित होता है, लाखों में कोई एक वक्ता होता है, परंतु इन सब में कोई एक ही दानी होता है या शायद वह भी नहीं होता।
१४. अन्नदान के समान दूसरा कोई श्रेष्ठ दान नहीं है।
१५. भूखे को अन्न देना और भगवान के नाम का स्मरण करना, केवल ये दो ही बातें परलोक में काम आती हैं।