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आदि शंकराचार्य - भाग -2 - शंकरो शंकर: साक्षात्'

आदिशंकर ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे।उन्होंने अद्वैत वेदांत को ठोस आधार प्रदान किया।उन्होंने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएं बहुत प्रसिद्ध हैं।इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं।वे चारों स्थान ये हैं-

(2)ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम,(2)श्रृंगेरीपीठ,

(3) द्वारिकाशारदा पीठ और (4) पुरीगोवर्धन पीठ।

इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये शंकर के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है।

 

आदिशंकराचार्य-

जन्म शंकर 507B.C.स्थान-कलाड़ी,चेर साम्राज्य वर्तमान में केरल,भारत,भट्ट ब्राह्मण।

समाधि – 32 वर्ष की उम्र में।

उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया और भारत में चार कोनों पर ज्योति, गोवर्धन, श्रृंगेरी एवं द्वारिका आदि चार मठों की स्थापना की।

कलियुग के प्रथम चरण में विलुप्त तथा विकृत वैदिक ज्ञानविज्ञान को उद्भासित और विशुद्ध कर वैदिक वाङ्मय को दार्शनिक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक धरातल पर समृद्ध करने वाले एवं राजर्षि सुधन्वा को सार्वभौम सम्राट ख्यापित करने वाले चतुराम्नाय-चतुष्पीठ संस्थापक नित्य तथा नैमित्तिक युग्मावतार श्रीशिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य की अमोघदृष्टि तथा अद्भुत कृति सर्वथा स्तुत्य है।

सतयुग की अपेक्षा त्रेता में, त्रेता की अपेक्षा द्वापर में तथा द्वापर की अपेक्षा कलि में मनुष्यों की प्रज्ञाशक्ति तथा प्राणशक्ति एवं धर्म औेर आध्यात्म का ह्रास सुनिश्चित है। यही कारण है कि कृतयुग में शिवावतार भगवान दक्षिणामूर्ति ने केवल मौन व्याख्यान से शिष्यों के संशयों का निवारण किय‍ा। त्रेता में ब्रह्मा, विष्णु औऱ शिव अवतार भगवान दत्तात्रेय ने सूत्रात्मक वाक्यों के द्वारा अनुगतों का उद्धार किया। द्वापर में नारायणावतार भगवान कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का विभाग कर महाभारत तथा पुराणादि की एवं ब्रह्मसूत्रों की संरचनाकर एवं शुक लोमहर्षणादि कथाव्यासों को प्रशिक्षित कर धर्म तथा आध्यात्म को उज्जीवित रखा।

कलियुग में भगवत्पाद श्रीमद शंकराचार्य ने भाष्य,प्रकरण तथा स्तोत्रग्रन्थों की संरचना कर,विधर्मियों-पन्थायियों एवं मीमांसकादि से शास्त्रार्थ,परकाया प्रवेश कर,नारदकुंड से अर्चाविग्रह श्री बदरीनाथ एवं भूगर्भ से अर्चाविग्रह श्रीजगन्नाथ दारुब्रह्म को प्रकटकर तथा प्रस्थापित कर , सुधन्वा सार्वभौम को राजसिंहासन समर्पित कर एवं चतुराम्नाय – चतुष्पीठों की स्थापना कर अहर्निश अथक परिश्रम के द्वारा धर्म और आध्यात्म को उज्जीवित तथा प्रतिष्ठित किया।

व्यासपीठ के पोषक राजपीठ के परिपालक धर्माचार्यों को श्रीभगवत्पाद ने नीतिशास्त्र , कुलाचार तथा श्रौत-स्मार्त कर्म , उपासना तथा ज्ञानकाण्ड के यथायोग्य प्रचार-प्रसार की भावना से अपने अधिकार क्षेत्र में परिभ्रमण का उपदेश दिया। उन्होंने धर्मराज्य की स्थापना के लिये व्यासपीठ तथा राजपीठ में सद्भावपूर्ण सम्वाद के माध्यम से सामंजस्य बनाये रखने की प्रेरणा प्रदान की। ब्रह्मतेज तथा क्षात्रबल के साहचर्य से सर्वसुमंगल कालयोग की सिद्धि को सुनिश्चित मानकर कालगर्भित तथा कालातीतदर्शी आचार्य शंकर ने व्यासपीठ तथा राजपीठ का शोधनकर दोनों में सैद्धान्तिक सामंजस्य साधा।

शंकराचार्य के चार शिष्य-1.पद्मपाद (सनन्दन),2.हस्तामलक 3.मंडन मिश्र 4.तोटक (तोटकाचार्य)। माना जाता है कि उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे।

ग्रंथ-शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएँ की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।

दसनामी सम्प्रदाय-शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ। इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए। इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियाँ विकसित हुई। शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे।

दसनामी सम्प्रदाय के साधु प्रायः गेरुआ वस्त्र पहनते, एक भुजवाली लाठी रखते और गले में चौवन रुद्राक्षों की माला पहनते। कठिन योग साधना और धर्मप्रचार में ही उनका सारा जीवन बितता है। दसनामी संप्रदाय में शैव और वैष्णव दोनों ही तरह के साधु होते हैं।

यह दस संप्रदाय निम्न हैं-1.गिरि,2.पर्वत और 3.सागर।इनके ऋषि हैं भ्रगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती। इनके ऋषि हैं शांडिल्य।7.वन और 8.अरण्य के ऋषि हैं काश्यप। 9.तीर्थ और 10. आश्रम के ऋषि अवगत हैं।

हिंदू साधुओं के नाम के आगे स्वामी और अंत में उसने जिस संप्रदाय में दीक्षा ली है उस संप्रदाय का नाम लगाया जाता है, जैसे- स्वामी अवधेशानंद गिरि।

उनका चमत्कारिक जीवन व उनके कार्य-आज से साढ़े बारह सौ वर्ष पूर्व केरल के कालड़ी ग्राम में 788 ई॰ में भगवान् शंकर की कृपा से बालक शंकराचार्य का जन्म हुआ।उनकी माता आर्याम्बिका देवी और पिता शिवगुरु अत्यन्त धर्मनिष्ठ थे। तीन वर्ष की अवस्था होते-होते बालक शंकराचार्य के पिता का देहावसान हो गया।

असाधारण मेधासम्पन्न इस बालक ने तमिल भाषी होते हुए भी संस्कृत, गणित संगीत उतदि के साथ-साथ गरत्रों का भी गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था । इतनी छोटी अवस्था में इतना ज्ञान दैवीय चमत्कार से कम नहीं था । उनकी विद्वता से प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से लोग आते थे तथा अपनी समस्याओं का उचित हल पाकर संतुष्ट होकर चले जाते थे।

8 वर्ष की अवस्था में उनके मन में वैराग्य लेने की अदम्य भावना जाग पड़ी।मां यह सुन कर संत रह गई।बालक शंकर ने मां को वह घटना सुनायी, जब किसी पर्व के अवसर पर वे नदी के जल में उतरे थे, तो उन्हें एक मगर ने पकड़ लिया था।मां ने यह प्रार्थना की कि भगवान उनके बेटे को बचा लें तो वे बोले-”मां!यदि तू मुझे शिवजी को अर्पण कर देगी,तो मेरे प्राण बच सकते हैं।”

संन्यासी होकर जाने से पहले उन्होंने मां को यह तचन दिया कि वे कहीं भी रहें, उनके अन्तिम समय में वे उनके पास ही रहेंगे । संन्यासी होकर वे भ्रमण करते हुए वन के एक पेड़ के नीचे थकान मिटाने लेटे थे, तो देखा कि एक सांप, मेंढक को अपने फन की छाया में रखकर गरमी से बचा रहा है । उन्होंने दिव्य ज्ञान से यह जान लिया कि यह अवश्य ही किसी महात्मा की भूमि है।

उन्हें यह पवित्र स्थान श्रुंगी ऋषि कें पवित्र आश्रम भूरि के रनप में ज्ञात हुआ।उन्होंने इस पवित्र भूमि में कोरी मठ के सका में स्थापित करने को संकल्प लिया । अपनी भ्रमण यात्रा  में नर्मदा नदी के किनारे उनकी भेंट आचार्य गोविन्द भगवत्पाद से हुई।गुरु ने उनके दित्य ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें शंकराचार्य का नाम दिया।

ऐसी ही एक घटना उनके गुरु से संबन्धित  हैं-गुरु गुफा में साधना में रत थे।अचानक नदी के बहाव से गुफा तक पानी आ पहुंचा।शंकराचर्या ने गुफा के द्वार पर एक घड़े को रख दिया। जितना भी जल आता, घड़े में भरता जाता । गुरु को इस घटना का पता लगा, तो उन्होंने उसे काशी जाकर विश्वनाथ करते हुए ब्रम्हासूत्रशाष्य लिखने को कहा।

काशी पहुंचे तो गंगा तट पर एक चाण्डाल का सामना हुआ । उसके स्पर्श से शंकराचार्य कुपित हो उठे । चाण्डाल ने हंसते हुए शंकर से  पूछा: आत्मा और परमात्मा तो एक है । जिस देह से तुम्हारा स्पर्श हुआ, अपवित्र कौन है ? तुम या तुम्हारे देह का अभिमान?परमात्मा तो सभी की आत्मा में है।तुम्हारे संन्यासी होने का क्या अर्थ है, जब तुम ऐसे विचार रखते हो?”

कहा जाता है कि चांडाल के रूप में साक्षात शंकर भगवान ने उन्हें दर्शन देकर ब्रह्मा और आत्मा का सच्चा ज्ञान दिया । इस ज्ञान को प्राप्त करके वे  दुर्ग रास्तों से होते हुए बद्रीकाश्रम पहुंचे । यहां चार वर्ष रहकर तहारत पर भाष्य लिखा । वहीं से केदारनाथ पहुंचे।

यहां मंडन मिश्र नाम के कर्मकांडी ब्राह्मण उनका शास्त्रार्थ हुआ।शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी भारती को भी पराजित किया।दक्षिण पहुंचकर उन्होंने कर्मकाण्ड की प्रचार किया । कापालिकों के प्रभाव को समाप्त किया । माता की बीमारी का अन्तर्ज्ञान होते ही दिये हुए वचनानुसार वे मां के अन्तिम दर्शनों के लिए कालडी ग्राम पहुंचे।

एक संन्यासी होकर भी उन्होंने अपने हाथों से माता का दाह संस्कार किया, जो एक संन्यासी के लिए वर्जित था । शंकराचार्य ने कश्मीर से लैकर कन्याकुमारी, अटक से लेकर कटक तक भारतवर्ष की यात्रा करते हुए विद्वानों से शास्त्रार्थ किया । वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विशाल सेना कनायी । लोगों को वैदिक धर्म के सच्चे और पवित्र रूप से अवगत कराया।

भारत की चार दिशाओं मैं मैसूर  में श्रुंगेरी पीठ, जगन्नाथपुरी में गोवर्धन पीठ, द्वारिका में द्वारका पीठ, बद्रीनाथ में ज्योति पीठ की स्थापना की । 16 वर्ष की अवस्था गे ही अनेक धार्मिक ग्रन्थ लिखे।ब्रह्मसूत्रभाष्य,गीताभाष्य,सर्ववेदान्त सिद्धांत, विवेक चूड़ामाणी, प्रबोध सुधाकर तथा बारह उपनिषदों पर भाष्य लिखे।

चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर भारत को एकता के सूत्र में बांधा । आज उनके नाम से चारों दिशाओं में शंकराचार्य मठ स्थापित हैं । मात्र 33 पर्ष की आयु में जगदगुरु शंकराचार्य पंचतत्त्व में विलीन हो गए।

शंकराचार्य का दर्शन-शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है। शंकराचार्य के गुरु दो थे। गौडपादाचार्य के वे प्रशिष्य और गोविंदपादाचार्य के शिष्य कहलाते थे। शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में है।

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं भगवान बुद्ध ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ। इस औपनिषद अद्वैत दर्शन को गौडपादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया। वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।

उनका चमत्कारिक जीवन व उनके कार्य-

आज से साढ़े बारह सौ वर्ष पूर्व केरल के कालड़ी ग्राम में 788 ई॰ में भगवान् शंकर की कृपा से बालक शंकराचार्य का जन्म हुआ । उनकी माता आर्याम्बिका देवी और पिता शिवगुरु अत्यन्त धर्मनिष्ठ थे । तीन वर्ष की अवस्था होते-होते बालक शंकराचार्य के पिता का देहावसान हो गया ।

आदि शंकराचार्य -भाग-3

आदि शंकराचार्य – भाग -१

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