
हिन्दू धर्म के महान प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य को कौन नहीं जानता?किन्तु अगर मैं कहूं कि हममें से अधिकतर लोग उनके विषय में सत्य नहीं जानते तो आपको आश्चर्य होगा।किन्तु सत्य यही है कि आदि शंकराचार्य के विषय में जो मिथ्या और भ्रामक जानकारी उपलब्ध है उसे ही अधिकतर हिन्दू जानते और मानते हैं।सबसे अधिक मिथक तो इनके जन्म का समय है जो इन्हें८वीं सदी का विद्वान बताता है किन्तु सत्य ये नहीं है।तो आइए आदि शंकराचार्य के विषय में कुछ जानने से पहले अपने मन पर जमी अज्ञानता की धूल हम हटा लें।
अधिकतर आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि शंकराचार्य का जन्म ८वीं शताब्दी में सन ७८८ ईस्वी में हुआ था और ७८० ईस्वी में इन्होने निर्वाण लिया।किन्तु ये सत्य नहीं है।आज से १३८ वर्ष पहले १८८२ में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में लिखा था कि आदि शकराचार्य का जन्मकाल लगभग २२०० वर्ष पूर्व का है।उस समय स्वामी दयानन्द सरस्वती ५८ वर्ष के थे और एक वर्ष बाद १८८३ में ५९ वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हुई।
इस समय सन २०२६ अर्थात विक्रम सम्वत २०८३ चल रहा है।अगर कलि सम्वत की बात करें तो अभी ५१२३ चल रहा है। अगर उससे भी प्राचीन युधिष्ठिर सम्वत की बात करें जो कलि संवत से ३८वर्ष पूर्व का माना जाता है तो अभी५१६१ युधिष्ठिर संवत चल रहा है।ये तो सर्व विदित है कि आदि शंकराचार्य ने देश के चारो दिशाओं में ४महान मठों की स्थापना की थी।अभी हम मठों के विवरण की ओर नहीं जाएंगे और केवल कालखंड देखेंगे।ये कालखंड उन्हीं मठों में रखे लिखित स्मृतियों से प्राप्त हुआ है।जब आप इन मठों में जाएंगे तो ये कालखंड वहां लिखा मिल जाएगा।
१.बद्री ज्योतिर्मठ पीठ-२६४५ युधिष्ठिर संवत
२.द्वारका कलिका पीठ-२६४८ युधिष्ठिर संवत
३.श्रृंगेरी शारदा पीठ -२६४८ युधिष्ठिर संवत
४.पुरी गोवर्धन पीठ-२६५५ युधिष्ठिर संवत
इन सभी मठों में सभी गुरु और शिष्य का विवरण संरक्षित रखा हुआ है।जब कोई व्यक्ति गुरुपद प्राप्त करता है और जब वो निर्वाण प्राप्त करता है,ये दोनों तिथि इस विवरण में जोड़ दी जाती है।इसी तरह अगला जो गुरु होता है उसका कालखंड भी आगे जुड़ता रहता है।ये तिथियां श्लोक के रूप में लिखी जाती है और शिष्य इसे कंठस्थ कर लेते हैं।शारदा मठ के इतिहास में ऐसा ही एक श्लोक लिखा गया है-
युधिष्ठिरशके२६३१वैशाखशुक्लापंचमी श्री मच्छशंकरावतार:।।
तदुन २६६३ कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां श्रीमच्छंशंकराभगवत्।।
पूज्यपाद निजदेहेनैव निजधाम प्रविशन्निति।।
अर्थात२६३१युधिष्ठिर संवत में शंकर अवतार आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था एवं युधिष्ठिर संवत२६६३ में वे निर्वाण लेकर अपने निजधाम को चले गए।
अभी ५१५९ युधिष्ठिर सम्वत चल रहा है। इसका अर्थ ये है कि आदि शंकराचार्य का जन्म ५१५९ – २६३१ = २५२८ वर्ष पहले हुआ था।यदि वर्तमान ईसा काल २०२० को उसमे घटा दिया जाए तो २५२८ – २०२० = ५०८ ईस्वी पूर्व उनका जन्म माना जा सकता है। इसी प्रकार ४७४ ईस्वी पूर्व उन्होंने निर्वाण ले लिया था।
आदि शंकराचार्य के काल में ही राजा सुधन्वा हुए जिन्होंने एक ताम्रपत्र लिखा जो उनकी मृत्यु के एक मास पूर्व लिखा गया था।उसमे शंकराचार्य का जन्म तिथि २६३१ युधिष्ठिर सम्वत ही लिखी थी।इसके अतिरिक्त शंकराचार्य के सहपाठी चित्तसुखाचार्य जी ने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था “वृहत शंकर विजय” और उसमें भी शंकराचार्य के जन्म का समय २६३१ ही बताया गया है।हालांकि ये पुस्तक अब अपने मूल रूप में तो उपलब्ध नहीं है किन्तु उसमें वर्णित दो श्लोक शंकराचार्य के जन्म के समय की पुष्टि करते हैं।
आदि शंकराचार्य के जन्म की मिथ्या तिथि जनमानस में कैसे फैली?
इस भ्रम का कारण एकऔर आचार्य है जिनका नाम भी शंकर था। कहा जाता है कि आगे चल कर ये आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों मठों में से एक शृंगेरी मठ के मठाधीश बने जो अन्य सभी मठाधीशों से अधिक तेजस्वी और प्रसिद्ध थे।इन मठों के अधिपति को भी शंकराचार्य की उपाधि मिलती है। इन अभिनव शंकराचार्य की वेश-भूषा और जीवन भी बिलकुल आदि शंकराचार्य की ही तरह था।ऊपर से शंकराचार्य की उपाधि प्राप्त होने के कारण अधिकतर इसिहासकारों ने इन्ही को आदि शंकराचार्य के रूप में प्रचारित करना आरम्भ कर दिया।
किन्तु ये शंकराचार्य आदि शंकराचार्य नहीं थे।इनका जन्म ८वीं शताब्दी में वर्तमान तमिलनाडु राज्य के चिदंबरम जिले में हुआ इनके पिता का नाम “श्रीविश्वजी” था।जबकि आदि शंकराचार्य का जन्म वर्तमान के केरल राज्य के मालाबार क्षेत्र में कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण कुल में हुआ।उनके माता पिता का नाम “अर्याम्बा” और “शिवगुरु” था।नवीन शंकराचार्य भी बहुत कम आयु में कैलाश में तपस्या करने चले गए।जहां आदि शंकराचार्य नेे केेवल ३२ वर्ष की आयु में केदारनाथ में निर्वाण प्राप्त किया वहीं नवीन शंकराचार्य (या केवल शंकराचार्य) ने लगभग ४५ वर्ष में कैलाश पर निर्वाण प्राप्त किया।
दोनों में इतनी समानता होने के कारण ही इतना भ्रम उत्पन्न हुआ है और लोगों को वास्तविक जानकारी नहीं है।आदि शंकराचार्य ने ४ मठों के अतिरिक्त १० संप्रदाय की स्थापना की थी।ऐसी मान्यता है कि धर्म की रक्षा हेतु अपना सामर्थ्य बढ़ने के लिए नवीन शंकराचार्य ने ही अखाड़ों की स्थापना की थी जो आज ना केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। अब आप लोग समझ गए होंगे कि ये दोनों शंकराचार्य अलग-अलग हैं और भगवान शंकर (शिव नहीं) का अवतार आदिशंकराचार्य को माना जाता है,नवीन शंकराचार्य को नहीं।पुराणों में कई ऐसे श्लोक हैं जो इन्हे भगवान शंकर का अवतार सिद्ध करते हैं। आइए उनमें से कुछ पर दृष्टि डालते हैं।